हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/साध साषीभूत कौ अंग/(१)कबीर हरि का भाँवता....फिरंत।।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत 'दोहा ' कबीर दास द्वारा रचित है। यहां की 'कबीर ग्रंथावली' से उद्धृत हैं। यह उनके 'साध साषीभूत कौ अंग' में से अवतरित है।

प्रसंग[सम्पादन]

जो मनुष्य भगवान् के होते हैं। वे दूर ही दीख जाते हैं। वे अपने में वैरागी तथा दीन-दुनिया से उदासीन होते हैं। वे ही अपने को भक्त मानते हैं। कबीर कहते हैं-

व्याख्या[सम्पादन]

कबीर हरि का भाँवता......जग रूठड़ा फिरंत॥

जो मनष्य भगवान के प्रिय जन होते हैं। वे दूर से ही जाने एवं पहचाने जाते हैं। उनकी मानसिक एवं शारीरिक स्थिति इस तरह की होती है कि वे दूर से ही पहचाने जाते हैं। उनकी वेशभूषा भी वैसी होती है। वे शरीर से क्षीण अर्थात् कमजोर होते हैं और मन से वे उदासीन होते हैं। वे दीन-दनियाँ से अपने को अलग-थलग से रखते हैं। वे मन से भगवान के ही होकर रह जाते हैं। उन्हें किसी की परवाह नहीं होती है।

विशेष[सम्पादन]

इसमें भक्त की भगवान के प्रति भक्ति-भावना पर चर्चा की गई है। वह आंतरिक कप से संसार से बुखार होता है। वह लोगों के प्रति निर्मोही हो जाता है। भाषा में स्पष्टता है। प्रसाद गुण है। मिश्रित शब्दावली का प्रयोग है। सधुक्कड़ी भाषा है। बिंबात्मकता है। उपदेशात्मक के साथ-साथ वर्णनात्मक शैली भी पाई जाती है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

हरि = भगवान, ब्रह्म। भाँवता = प्रिय जन। दूरै = दूर से। दीसंत = दीख पड़ना, दिखाई देना। तन = शरीर| षीणा = क्षीण, कमजोर। उनमनाँ = उदास, उदासीन। रूठड़ा = नाराज़ होना।