हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक)/जुही की कली

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
जुही की कली
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहाग-भरी-स्नेह--स्वप्न-मग्न-
अमल-कोमल-तनु तरूणी- जुही की कली,

दृग बन्द किये, शिथिल,-पत्राड्ग में,
वासन्ती निशा जी;
विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़
किसी दूर देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल।

आयी याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
आयी याद चांदनी की धुली हुई आधी रात,
आयी याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात,
फिर क्या ? पवन
उपवन-सर-सरित गहन-गिरि-कानन
कुन्ज-लता-पुन्जों को पार कर
पहुंचा जहां उसने की केलि
कली-खिली-साथ।

सोती थी,
जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह ?
नायक के चूमे कपोल,
डोल उठी बल्लरी की लड़ी जैसे हिण्डोल।
इस पर भी जागी नहीं,
चूक-क्षमा मांगी नहीं,
निद्रालय बंकिम विशाल नेत्र मूंदे रही-
किवा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये,
कौन कहे ?

निर्दय उस नायक ने
निपट निठुराई की
कि झोंकों को झाड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,
मसल दिये गोरे कपोल गोल;
चौंक पड़ी युवती-
चकित चितवन निज चारों ओर फेर,
हेर प्यारे को सेज-पास,
नम्रमुख हंसी-खिली,
खेल रंग, प्यारे-संग।