हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक)/दीन न हो गोपी

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दीन न हो गोपी, सुनो, हीन नहीं नारी कभी,
भूत-दया-मूर्ति वह मन से, शरीर से,
क्षीण हुआ मन में क्षुधा से मैं विशेष जब,
मुझको बताया मातृजाति ने ही खीर से।
आया जब मार मुझे मारने को वार वार
अप्सरा-अनीकिनी सजाये हेम-हिर से,
तुम तो यहाँ थी, धीर ध्यानी ही तुम्हारा वहाँ,
जूझा, मुझे पीछे कर, पंचशर वीर से।
मेरे निकट तुम्हारी
तुलना में अन्य कौन सुकुमारी?
समझ सकी क्या यह भी
बुद्धि गई मार की मारी!
अंतिम अस्त्र, तुम्हारा रूप धरे एक अप्सरा आई,
किंतु बराकी अपनी प्रवृत्ति पर आप काँप सकुचाई!
सुना था कलकंठी से ही कहीं
मैंने मन का यह मंत्र—
तने, पर इतना, जो टूटे नहीं
तंत्री, तेरा वह तंत्र!
बतलाऊँ मैं क्या अधिक तुम्हें तुम्हारा कर्म,
पाला है तुमने जिसे, वही वधू का धर्म।