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हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक)/दुरित दूर करो नाथ

विकिपुस्तक से

दुरित दूर करो नाथ

अशरण हूँ, गहो हाथ।


हार गया जीवन-रण,

छोड़ गये साथी जन,

एकाकी, नैश-क्षण,

कण्टक-पथ, विगत पाथ।


देखा है, प्रात किरण

फूटी है मनोरमण,

कहा, तुम्ही को अशरण-

शरण, एक तुम्हीं साथ।


जब तक शत मोह जाल

घेर रहे हैं कराल--

जीवन के विपुल व्याल,

मुक्त करो, विश्वगाथ!