हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक)/मैं अकेला

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
मैं अकेला
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

मैं अकेला;
देखता हूं, आ रही

मेरे दिवस की सान्ध्य बेला।

पके आधे बाल मेरे,
हुए निष्प्रभ गाल मेरे,
चाल मेरी मन्द होती आ रही,

हट रहा मेरा।

जानता हूं, नदी-झरने,
जो मुझे थे पार करने,
कर चुका हूं, हंस रहा यह देख,

कोई नहीं भेला।