हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक)/राम की शक्ति-पूजा

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राम की शक्ति-पूजा
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

रवि हुआ अस्त: ज्योति के पत्र पर लिखा अमर
यह गया राम-रावण का अपराजेय समय
आज का, तीक्ष्ण-शर-विधृत-क्षिप्र-कर वेग-प्रखर,
शतशेलसम्वरणशील, नीलनभ-गज्जित-स्वर,
प्रतिपल - परिवर्तित - व्यूह-भेद - कौशल-समूह,
राक्षस-विरूध्द प्रत्यूह,- क्रुध्द-कपि-विषय-हूह,
विच्छुरितवहिन - राजीवनयन - हत - लक्ष्य - बात
लोहितलोचन - रावण - मदलोचन - महीयान,
राघव-लाघव - रावण - वारण - गत - युग्म- प्रहर,
उध्दत - लंकापति - मद्दित - कपि - दल - बल - विस्तर,
अनिमेष - राम - विश्वजिद्दिव्य - शर - भड्ग - भाव,
विध्दाग्ड - बध्द - कोदण्ड - मुष्टि - खर - रूधिर - स्त्राव,
रावण - प्रहार - दुर्वार - विकल - वानर दल - बल,
मूच्छित - सुग्रीवाग्डद - भीषण - गवाक्ष - गय - नल-,
वारित - सौमित्र - भल्लपति - अगणित - मल्ल - रोध,
गज्जित-प्रलयाब्धि - क्षुब्ध - हनुमत् - केवल - प्रबोध,
उद्गीरित - वहिन - भीम - पर्वत - कपि-चतु: प्रहर-
जानकी - भीरू - उर - आशाभर - रावण - सम्वर।

लौटे युग-दल । राक्षस - पतदल पृथ्वी टलमल,
बिध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल ।
बानर-वाहिनी खिन्न, लख निज-पति-चरण-चिन्ह
चल रही शिविर की ओर स्थविर-दल ज्यों विभिन्न;
प्रशमित है वातावरण; नमित-मुख सान्ध्य कमल
लक्ष्मण चिन्ता - पल, पीछे वानर-वीर सकल ;
रघुनायक आगे अवनी पर नवनीत-चरण ,
श्लथ धनु-गुण है, कटिबन्ध स्त्रस्त तूणीर-धरण,
दृढ़ जटा-मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल
फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वक्ष पर, विपुल
उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशान्धकार ,
चमकतीं दूर ताराएं ज्यों हों कहीं पार ।

आये सब शिविर, सानु पर पर्वत के, मन्थर,
सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदिक वानर,
सेनापति दल-विशेष के, अंगद, हनूमान
नल, नील, गवाक्ष, प्रात के रण का समाधान
करने के लिए, फेर वानर-दल आश्रय-स्थल ।
बैठे रघु-कुल-मणि श्वेत शिला पर, निर्मल जल
ले आये कर-पद-क्षालनार्थ पटु हनूमान
अन्य वीर सर के गये तीर सन्ध्या-विधान-
वन्दना ईश की करने को, लौटे सत्वर ,
सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर ।
पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण, भल्लधीर ,
सुग्रीव, प्रान्त पर पाद-पझ के महावीर ,
यूथपति अन्य जो, यथास्थान, हो निर्निमेष
देखते राम का जित-सरोज-मुख-श्याम-देश ।

है अमानिशा; उगलता गगन घन अन्धंकार ;
खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन-चार;
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल;
भूधर ज्यों ध्यान-मग्न; केवल जलती मशाल ।
स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय,
रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय ;
जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रान्त-,
एक भी, अयुत-लक्ष्य में रहा जो दुराक्रान्त ,
कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार-बार ,
असमर्थ मानता मन उधत हो हार-हार ;
ऐसे क्षण अन्धंकार घन में जैसे विधुत
जागी पृथ्वी-तनया-कुमारिका-छवि, अच्युत
देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन
विदेह का, --प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन।