हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक)/सरोज-स्मृति

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
सरोज-स्मृति
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

उनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण:
तनये, ली कर दृक्पात तरूण
जनक से जन्म की विदा अरूण ।
गीते, मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम ,
पूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय ,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह-"पिता:, पूर्ण आलोक वर्ण
करती हूं मैं, यह नहीं मरण ,
'सरोज' का ज्योति: शरण-तरण
अशब्द अधरों का, सुना, भाषा ,
मैं कवि हूं, पाया है प्रकाश
मैंने कुछ अहरह रह निर्भर
ज्योतिस्तरणा के चरणों पर ।
जीवित-कविते, शत-शत-जर्जर
छोड़कर पिता को पृथ्वी पर
तू गयी स्वर्ग, क्या यह विचार -
"जब पिता करेंगे मार्ग पार
यह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम,
मारूंगी कर गह दुस्तर तम ?"
कहता तेरा प्रयाण सविनय ,
कोई न अन्य था भावोदय
श्रावण-नभ का स्तब्धान्धकार
शुक्ला प्रथमा, कर गई पार ।

धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका !
जाना तो अर्थागमोपाय ,
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ-समर ।
शुचिते, पहनाकर चीनांशुक
रख सका न तुझे अतः दधिमुख ।
क्षीण का न छीना कभी अन्न ,
मैं लख न सका वे दृग विपन्न:
अपने आंसुओं अतः बिम्बित
देखें हैं अपने ही मुख-चित ।
सोचा है नत हो बार-बार
"यह हिन्दी का स्नेहोपहार ,
यह नहीं हार मेरी, भास्वर
यह रत्नहार-लोकोत्तर वर ।"
अन्यथा, जहां है भाव शुध्द
साहित्य - कला - कौशल - प्रबुध्द
हैं दिये हुए मेरे प्रमाण
कुछ वहां, प्राप्ति को समाधान
पाश्र्व में अन्य रख कुशल हस्त
गध में पध में समाभ्यस्त