हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका/सखी वे मुझसे कहकर जाते

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
हिंदी कविता (आधुनिक काल छायावाद तक) सहायिका
 ← महाभिनिष्क्रमण सखी वे मुझसे कहकर जाते अब कठोरहो वज्रादपि → 
<a> सखी वे मुझसे कहकर जाते</a>


संदर्भ


सखि वे मुझसे कहकर जाते कविता युग प्रवर्तक छायावादी कवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित हैं। मैथिलीशरण गुप्त अकेले ऐसे कवि हैं जिन्होंने द्विवेदी युग से आधुनिक काल तक अनेक व्यक्तियों को आत्मसात करते हुए हिंदी कविता को अनेकार्थक में समृद्ध किया।


प्रसंग

इसमें यशोधरा के स्वाभिमानी रूप वर्णन किया गया है। यशोधरा को यह दुख हुआ कि उसकी पति को जाना ही था तो उसे बता कर क्यों नहीं गए अब वह कहती है कि अगर पति मुझे कहकर जाते तो शायद अपनी राह में बाधा ही नहीं पाते।


व्याख्या


इसमें यशोधरा के स्वाभिमानी रूप वर्णन किया गया है। यशोधरा को यह दुख हुआ कि उसकी पति को जाना ही था तो उसे बता कर क्यों नहीं गए। अब वह कहती है कि अगर पति मुझे कहकर जाते तो शायद अपनी राह में बाधा ही नहीं पाते। सरकारी थी चाहिए यशोधरा यह कह रही है की मेरी पति गौतम मुझे कह क्यों नहीं गए सिद्धि के लिए पति गए यह तो गर्व की बात है परंतु क्यों चोरी चोरी गए सखी अगर वह कह कर जाते तो मुझे अपनी बाधा ना पाते। उन्होंने मुझे माना बहुत परंतु पहचाना नहीं यशोधरा बार-बार कहती है कि हम नारियां कभी पति की राह में बाधा नहीं बनती। हम लोग ही उन्हें सुसज्जित कर के रण में भेजती हैं। क्षत्रिय धर्म का पालन करते होगे हम लोग ही उन्हें युद्ध की मैदान में भेजती हैं इसलिए अगर वह मुझको कहकर जाते तो कभी रह में बाधा न पाते। मेरा भाग्य ही अब अभागा बन गया। अब किस पर यह विफल गर्व जागा। जिसे अपनाया था उन्होंने ही मुझे त्यागा अब केवल यही स्मरण रहा है जब पति छोड़कर जाते हैं तो शायद हमारी आंखे उन्हें निष्ठुर कहते हमारी आंखों से तब जो आंसू निकलती। शायद सहृदय गौतम उसे सह नहीं पाते इसीलिए शायद वह मुझ पर तरस खाकर ही चले गए। फिर यशोधरा अपने मन को समझाती है के पति गए हैं वह जाए और सिद्धि पाए हम जैसे लोगों के दुख से दुखी ना हो मैं किस मुंह से उन्हें उलाहना दूं आज तो वह मुझे अधिक भा गए अगर गए हैं तो लौट कर भी आएंगे और अपने साथ कुछ अनुपम लाएंगे यह जो प्राण आज रो रहे हैं। उन्हें एक दिन जा कर पाएंगे पर ऐसी खुशी से क्या पाएंगे इस बात पर संदेह है यशोधरा एक बात से दुखी होकर बार-बार कहती है सखी वह मुझे कहकर जाते।


विशेष

1) खड़ी बोली है।

2)वियोग का वर्णन है।

3) सिद्धार्थ से गौतम बनन के सफ़र में यशोधर का त्याग है।


(2)

प्रियतम तुम श्रुति पथ से आए कविता में यशोधरा का विरह दिखाई देता है। यशोधरा अपने प्रियतम को संबोधित करते है कहते हैं आप मेरे हृदय में आ गए मेरे कानों के माध्यम से आप मेरे हृदय में आ गए और इसीलिए मैंने अपने होंठो को बंद कर लिया अर्थात किसी से आपके बारे में नहीं कहा। मेरे हास विलास  अर्थात् सांसारिक सुख आपको अपने भाग्य में रख पाए? आप महान गौतम बुद्ध है। क्या आपको अब सांसारिक सुख बांध पाएंगे। आप मे दृष्टि से ओझल हो गए हैं अर्थात अभी भी आप मेरे हृदय में समाए हुए हैं। अब कभी कहते हैं यशोधरा अब क्या कहेंजब आपने यशोधरा का छोड़ ही दिया तो आप कहां रहो कैसे हो इसकी फिक्र यशोधरा नहीं करती। मेरा निस्वार्थ होना व्यर्थ है यदि तुमको मैं खींच कर अपने पास ना रख सकी। अंत में कहते हैं प्रियतम श्रुति पद से आए अर्थात कानों के माध्यम से हृदय में आएं और समा गए।


विशेष

1) भाषा सरल है

2) खड़ी बोली है।

3)विरह की भावना है।

4) वियोग का छंद है।