हिंदी कविता (छायावाद के बाद)/पगडंडी

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हिंदी कविता (छायावाद के बाद)
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पगडंडी
शंभुनाथ सिंह

छिपछिपकर चलती पगडंडी बन-खेतों की छांव में।
अनगाये कुछ गीत गूंजते
है किरनों के हास में,
अकुलायी-सी एक बुलाहट
पुरवा की हर सांस में।
सुनापन है उसे छेड़ता छू आँचल के छोर को,
जलखाते भी बुला रहे हैं बादल वाली नाव में।

अंग-अंग में लचक उठी ज्यों
तरूणाई की भोर में,
नभ के सपनों की छाया को
आंज नयन की कोर में।
राह बनाती अपनी कुस-कांटों में, संख-सिवार में,
कांदो-किच पड़े रह जाते, लिपट-लिपट पांव में।

पांतर पार धुंवारी भौहों
की ज्यों चढ़ी कमान है,
मार रहा यह कौन अहेरी
साधे किरन के बान है ?
रोम-रोम ज्यों बिंधे तीर, टूटी सीमा-मरजाद की,
सुध-बुध खो चल पड़ी अकेली, अपने पी के गाँव में।


रून झुन बिछिया झींगुर वाली
किंकिन ज्यों बक पांत हैं,
स्वयंवर बन चली बावरी
क्या दिन है, क्या रात है।
पहरू से कुछ पीली-कलगी वाले पेड़ बबूल के
बरज रहे हैं, पाँव न धरना भोरी कहीं कुठांव में।
अपना हीं आँगन क्या कम जो चली पराये गाँव में।