हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/अरुण कमल की कविताओं की विसेषताएं

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हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका
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अरुण कमल की कविताओं की विशेषताएँ[सम्पादन]

परिचय =[सम्पादन]

   अरुण कमल आधुनिक हिन्दी कविता के बहुचर्चित कवि हैं। वे उन कवियों  मे से है  जिन्होंने प्रगतिशील  कवियों केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, नागर्जुन व मुक्तिबोध की परम्परा को अपने भीतर आत्मसात करते हुए अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी कविता जन सामान्य की पक्षधर हैं, वर्तमान व्यवस्था व अन्याय का विरोध करती है किन्तु शालीनता के साथ। स्तुति अरुण कमल जी की कविता हिन्दी की प्रगतिशील और यथार्थवादी कविता की ही अगली कड़ी है किन्तु नवीनता व मौलिकता लिए हुए हैं। कवि अपने परिवेश में व्याप्त सामाजिक एवं राजनीतिक विषमताओं से ग्रस्त जन-सामान्य की पीड़ा व दर्द को निकट से महसूस करता है, उन्होंने अपनी कविता को युग और जीवन से संवाद का महत्वपूर्ण जरिया बनाया है ओर जन-जन की चिन्ताओं को अपनी कविता में उभारा है। उनका यही युगबोध उन्हें प्रासंगिक बनाता है। 


अरुण कमल जी का जन्म सन् 1954 में नासरीगंज, बिहार में हुआ। उनके काव्य-संग्रह हैं-'अपनी केवल धार'(1980), 'सबूत'(1989) 'नये इलाके में' (1996) और 'पुतली में संसार'(2004)। इसके अतिरिक्त वियतनामी कवि तो हैं' की कविताओं, टिप्पणियों की एक अनुवाद-पुस्तिका, 'मायकोब्सकी' की आत्मकथा का अनुवाद तथा अंग्रेजी में 'वॉयसेज' नाम से भारतीय युवा कविता के अनुवादों की पुस्तक भी प्रकाशित की।

अपने सजग लेखन के लिए उन्हें समयानुसार भारत-भूषण अग्रवाल' पुरस्कार तथा 'शमशेर सम्मान' से सम्मानित किया गया। उनके काव्य संग्रह 'नए इलाके में के लिए उन्हें वर्ष 1998 का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। वे एक ओर उच्चकोटि के आलोचक, अनुवाद, सम्पादक व समाचार-स्तम्भ लेखक हैं। रूस, चीन, इंग्लैंड देशों की साहित्यिक यात्राएँ एवं ब्राजाविल और कांगो के युवा सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि के रूप में भी इन्होंने भाग लिया।

काव्यगत विशेषताएँ[सम्पादन]

आधुनिक काल में, छायावाद के बाद अत्यंत सशक्त साहित्यांदोलन प्रगतिवाद है। प्रगतिवाद का मूल आधार सामाजिक यथार्थवाद रहा है। प्रगतिवाद काव्य वह है, जो अतीत की संपूर्ण व्यवस्थाओं के प्रति रोष व्यक्त करता है और उसके बदलाव की आवाज़ को बुलंद करता है अरुण कमल उन साहित्कारों में से जो परम्परा का विरोध नहीं करते परन्तु अंधश्रद्धा का उसमें सर्वथा अभाव है। वस्तुतः वे उसमें गतिशीलता की खोज करते हैं। परम्परा के गले सड़े अंशों को त्याग कर वे जीवन्त तत्वों को ग्रहण कर उसे धारदार बनाते हैं। वे लिखते हैं

अपना क्या है इस जीवन में सब तो लिया उधार सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार।

उनकी दृष्टि में परम्परा ऐसा लोहा है जिसे हमें अपने अनुकूल रूपाकार देना है। समाज, राष्ट्र व विश्व बड़ी तेजी से बनते बिगड़ते चले जा रहे हैं।'अनिश्चित' व भय' शब्द जीवन को कितना सुरक्षित करते चले जा रहे हैं, कवि के इन शब्दों में यह सत्य मार्मिक शब्दों में व्यक्त हुआ है

ऐसे में कुछ भी निश्चित नहीं 

नहीं जानता कल शाम को छह बजे आऊँगा या नहीं। कुछ भी पक्का नहीं।

इस संदर्भ में परमानन्द श्रीवास्तव लिखते हैं-"अरुण कमल जैसा कवि ही एक बार फिर कविता में जीवन की नयी आँच, नयी ऊष्मा, नयी गतिविधि, नयी ताजगी के साथ नये नैतिकबोध के साथ, जीवन-मृत्यु-प्रकृति-प्रेम-राग-विराग हिंसा-बाजार के अछूते प्रसंगों को उद्घाटित करते हुए संभोग कर सकता है।"

अरुण कमल साहित्यकार और श्रमिक को परम्परा और इतिहास का रचयिता मानते है। यही वह वर्ग है जो इतिहास की दिशा बदलने की सामर्थ्य रखता है और सभ्यता-संस्कृति को निर्मित करता है। वर्तमान व्यवस्था में श्रमिकों की सामाजिक आर्थिक स्थितियों को उकेरने वाली अरुण कमल की अनेक कविताएं हैं। उनकी 'महात्मा गांधी सेतु और मजदूर' कविता मजदूरों की अस्तित्वहीन स्थिति का दस्तावेज है

"पुल बन गया

ओर देखते ही देखते उजड़ गया तम्बुओं का नगर 

कहाँ गए वे हजारों मजदूर? पहला कदम तो उन्हीं को रखना था इस पुल पर कहाँ गए वे मजदूर? फिर किसी बात की तलाश में

फिर किसी ठेकेदार के बंगले पर।"

अरुण कमल की कविता में यथार्थ के विविध रंग है। उन्होंने वैयक्तिकता को सामाजिकता से जोड़ने का भरसक प्रयास किया है। और यही उनकी कविता कासबसे बड़ी विशेषता है।

अरुण कमल लोक जीवन के कवि हैं। यही कारण है वे समकालीन क्रूर स्त्रियों के प्रति आक्रोश या क्षोभ नहीं व्यक्त करते। वरन बस कभी-कभी अमानवीयता व्यंग्य का रूप ले लेती है। कवि उच्च वर्ग व निम्न वर्ग की वैषम्यपूर्ण स्थितियों की विडम्बना उजागर कर एक सोच को जन्म देना चाहता है। धन तेरस' कविता इसका अच्छा उदाहरण है जहाँ एक वर्ग इस पावन त्यौहार पर नए-नए बरतन खरीद रहा है वहाँ दूसरा वर्ग उसी दिन सारा बर्तन बेचना चाहता है। यह त्योहार सम्पन्नवर्ग के लिए आनंदमयी है तो दूसरी ओर विपन्न वर्ग की त्रासदी को उभारता है। यथार्थ का यह नग्न रूप कितना भयावह है। अरुण कमल जी का जीवन अनुभूतियों व समय को देखने-परखने का अपना एक विशिष्ट ढंग है। वर्तमान स्थिति पर वे अचम्भित हैं

"अब मुझे क्या हो गया है

बच्चों के समने कुल्फी चाटता चलता हूँ बीच बाजार
कमीज की बाँह बार-बार झाड़ता केश रंगता ब्लू फिल्में देखता 

जेब में कंघी हाथ में रुमाल।"

'शेष' कविता में पुरानी चीजों के विलुप्त हो जाने पर उन्हें खेद हैं। नल लग जाने पर कुँआ छोड़ देना जबकि उसमें पानी शेष है, उनकी चिन्ता का कारण है। इसी प्रकार 'लोककथा' और 'ऐसे में' कविता में क्रमश: डाकुओं के आतंक से भयावह जिन्दगी ओर आतंकवाद के कारण असुरक्षित जिन्दगी का तथा 'जागरण' कविता में वीडियो के कारण बर्बाद होती हुइ गाँव की संस्कृति उनके सामाजिक सरोकार व लोक जीवन से जुड़ी कविताएँ हैं। उनके काव्य संसार में मजदूरी, खेत मजदूरों और अन्य अभाव ग्रस्त लोगों से लेकर किवाड़ से लगकर रोता हुआ नन्हा सा होटल का मजदूर लड़का (होटल) और भीख माँगते बच्चे हैं (अहिंसा और भीख माँगते बच्चे) दूसरों के घरों में काम करने वाली कुबड़ी वृद्धा (और बेचारी कुबड़ी बुढ़िया) है, और साथ ही अभावग्रस्त रिटार्यड स्कूल मास्टर जो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता है किन्तु स्वयं के बच्चे पढ़ाने का समय नहीं निकाल पाता (मुक्ति) इन सभी व्यथितों की पीड़ा कवि-हृदय में गहरा अवसाद उपजाती है। इनके अतिरिक्त रोजमर्रा की खबरों को भी कविता का विषय बनाया है। ऐसी कविताएँ (खबर, मई का एक दिन अपील आदि) कवि की अपने परिवेश के प्रति जागरुकता को दर्शाती हैं।

वर्तमान व्यवस्था में नारी व मजदूर शोषण के सबसे बड़े शिकार रहे हैं। अरुण कमल जी जहाँ मजदूरों-किसानों की दुर्दशा से आहत होते हैं। वहीं अशिक्षा, अज्ञानता व नैतिकता मर्यादाओं की शिकार नारी पर भी उन्होंने अनेक कविताएँ लिखी हैं। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' जैसे आदर्श की बात करने वाली भारतीय संस्कृति व समाज में व्यावहारिक स्तर पर नारी जीवन गुलामी व अपनमान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। अरुण कमल की एक बार भी बोलती' कविता नारी के भीतर व बाहर का कारुणिक यथार्थ चित्र है "और एक दिन सबके सामने

मेहमानों और घर के लोगों के सामने।
मैंने उसे बुरी तरह डाँटा। 

फिर भी वह कुछ नहीं बोली रोयी भी नहीं। अभी भी मैं समझ नहीं पाया कि वह कभी बोली क्यों नहीं। मरते वक्त भी वह कुछ नहीं बोली। वह कभी बोली क्यों नहीं। एक बार भी बोलती।"

उसका मौन रहना समूचे पुरुष समाज, पूरी परम्परा के सामने एक ज्वलंत प्रश्न छोड़ जाता है। भूगोल' में वे नारी की धार्मिक पाखण्डता से परिचित करवाते हैं। अंधश्रद्धा से युक्त नारी को शिक्षित करने का प्रयास यहाँ लक्षित होता है। इसी प्रकार 'एक नवजात बच्ची को प्यार' में कन्या जन्म किस प्रकार पुरुष प्रधान समाज में खलबली मचा देता है, इस घृणित सत्य की कलई, खोलती है। इस उपेक्षित कन्या के प्रति उनके हृदय में ममत्व उमड़ आया है।
अरुण कमल अपने परिवेश के प्रति अत्यन्त जागरूक रहे हैं। यही कारण है कि सामाजिक विद्रूपताओं के साथ-साथ राजनीतिक उथल-पुथल को भी वे पैनी दृष्टि से देखते हैं। शासक और शासित का द्वन्द्व पुराना है। राजनीति का शिकंजा चारों ओर से आम आदमी को कसता चला जा रहा है। उसमें सहानुभूति व करुणा के लिए कोई स्थान नहीं है। भावना' कविता में दिखाते हैं कि किस प्रकार समय-परिवर्तन ने यातना देने के तौर तरीकों को बदल डाला है। जनतांत्रिक मूल्यों को नष्ट करने वाली राजनीति की कवि भर्त्सना करता है -

"उनके खिलाफ कुछ भी सबूत नहीं जो निर्दोष हैं वे दंग हैं हैरत से चुप हैं।" वस्तुतः अरुण कमल एक ऐसे कलाकार हैं जो सही अर्थों में अपने समाज व जन से जुड़े हुए हैं। वे समस्याओं से साक्षात्कार करवाते हैं। उनकी कविताएँ प्रश्न उठाती हैं। वे समस्याओं के प्रति सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं-"ऐसा क्यों हो रहा है', 'तुम चुप क्यों हो', 'आखिर हर्ज ही क्या है', 'एक बार भी बोलती' आदि कविताएँ इसी श्रेणी में आती हैं । कवि इसीलिए प्रश्न उठा रहा है क्योंकि वह जानता है प्रश्न होंगे तो हम उत्तर के लिए संघर्ष करेंगे। वे निराश नहीं हैं। 'उर्वर प्रदेश' तमसो मा ज्योतिर्गमय 'हमारे युग का नायक' आदि आशावादी स्वर की कविताएँ हैं। वस्तुतः अरुण कमल बड़े धैर्यवान कवि हैं। उम्मीद की यह लौ 'फिर भी' कविता में दर्शनीय है "उम्मीद है कि जनरल डायर जिन्दा नहीं बचेगा नए दोस्त बनेंगे नई भित्ति उठेगी जो आज अलग हैं कल एक होंगे।" अरुण कमल का काव्य जन-काव्य है। अत: उनकी कविता की भाषा भी जन-भाषा है। भाषा को बहुत अधिक सजाने सँवारने में उनका विश्वास नहीं है। विधि शर्मा के शब्दों में "वह अपनी कविता की सृजन-प्रक्रिया पर बात करते हुए अपनी जमीन से जुड़ाव को बताते हैं। जिस परिवेश में रहकर कवि का जीवन बीता है उसी से जुड़कर उसकी कविता फूटती है। उसी के सौन्दर्य को वह उभारता है। क्योंकि वह उसके कतरे कतरे से वाकिफ है।" कहीं भी वे भाषा को जटिल नहीं होने देते "हम कुल दो थे दोनों साथी राह थी लम्बी थक कर चूर वह भी मैं भी।"

उनकी कविता में जीवन के विविध क्षेत्रों का चित्रण है। यही कारण है कि उनकी भाषा में भी विविधता के दर्शन होते हैं। वे स्वयं लिखते हैं-"जीवन के जितने ज्यादा क्षेत्र कविता में आएँगे, कविता की भाषा भी उतनी ही विविध होगी। इसलिए भाषा की विविधता वास्तव में जीवन स्थितियों और वस्तुओं की विविधता है।" उन्होंने पुरानी भाषा को फिर से तराशा है। जन-जीवन के कष्टमय जीवन की अभिव्यक्ति भी वे आक्रामक नहीं वरन् सीधे-सरल ढंग से करते हैं। शब्द, मुहावरे लोक-जीवन से लिए गए हैं। स्थानीय प्रयोगों को वे प्राथमिकता देते हैं। 

देव भाषा-अरुण कमल जी आलेच्य कविता में उन पढ़े-लिखे विद्वान गणों पर व्यंग्य करते हैं जो कभी-कभी साभिप्राय हिन्दी भाषा का प्रयोग करते हैं। 'निज भाषा उन्नति' के संदर्भ में उनका यह कृत्रिम प्रयास सराहनीय है। दूसरी ओर ये देव अपनी भीतरी मानसिकता की तृप्ति हेतु 'विदेशी जूते कम्पनी' के राष्ट्रीय उद्घाटन में भाग लेने पहुंच गए। अर्थात राष्ट्र के विषय में भी क्या कहें, वह भी इसी होड़ में है कि किस प्रकार विदेशी प्रभाव का लोहा मनवाया जाए तो विश्व 'ऊँचे लोग बनाम देव' भी तो इसी का हिस्सा है।

"अपनी केवल धार' शीर्षक कविता कवि की उन कविताओं में से है जिसके माध्यम से उन्होंने समकालीन हिन्दी कविता को नव्य तेज व उष्मा से भर दिया है अमिक वर्ग के पास अपना कहने को कुछ भी नहीं है, पोर-पोर कर्ज में डूबा है तन-मन, आवश्यकताएँ दूसरों के रहमो-करम पर साँस लेती है। उसका उधार खता जीवन भर चलता है। केवल धार, कर्मशक्ति उसकी अपनी है। 'उघर के चोर' नयी कविता की प्रतिनिधि कविता कही जा सकती है। अत्यन्त साधारण लोगों वस्थितियों को इस कविता का विषय बनाया गया है। चोर' भी असहाय हो गए है, सहानुभूति के पात्र बन गए हैं क्योंकि चोरी करने के लिए उनके पास कुछ नहीं है। वर्तमान समाज की स्थिति में, लोग, समाज किधर जा रहे हैं? 'उधर के चोर' सखी कविता इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजती है।

'नये इलाके में कवि बदलती हुई युगीन परिस्थितियों मूल्यों व संवेदनाओं में होने वाले परिवर्तन को रेखांकित करते हैं। कल का परिचय आज इतना दूर हो गया है कि ठसे नए सिरे से ढूँढना पड़ेगा, हर दरवाजा खटखटाना पड़ेगा। अपनत्व समाप्त होता जा रहा है। रोज एक नया संसार सामने आकर खड़ा हो जाता है जिसके चलते न वह पुराने को खोज पाता है और न कल आनेवाले से उसके किसी परिचय को संभावना है।