हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/उसकी गृहस्थी

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

सन्दर्भ - प्रस्तुत पंक्तिया कवि राजेश जोशी द्वारा रचित है। यह उनकी कविता 'उसकी गृहस्थी' से उद्धरित है।

प्रसंग- कवि ने इसमें एक स्त्री (पत्नी) की कार्य-प्रणाली और उसकी गृहस्थी के बारे में चर्चा की है। उसकी गृहस्थी की सीमा उसकी रसोई तक सीमित नहीं, बल्कि उसका सहयोग करना भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कवि ने स्त्री-जीवन पर प्रकाश डाला है। वह पुरुष और परिवार की महत्वपूर्ण धुरी है उसके बिना गृहस्थी आगे नहीं बढ़ एवं चल पाएगी. यही कवि ने इसमें दर्शाया है।

व्याख्या - वह (स्त्री) जो एक कामकाजी महिला है। वह अपने ऑफिस में सारे दिन काम-काज़ में लगी रहती है। वह काम करते-करते थककर अपने घर में वापिस लौटती है। कवि कहता है कि वह अभी-अभी थकी-हारी अपने दफ्तर से लौटी है। वह शरीर से थकी है। वह पहले अपना खाना खाने वाला लंच बॉक्स रसोई में रखती है। वह स्वयं को तरोताजा करने के लिए और ताजगी दिखाने के लिए अपने मुंह पर पानी के छिटें मारती है, ताकि उसका चेहरा अपनी थकावट को खो दे। इस तरह से वह यह क्रिया करके रसोई से बाहर आ जाती है। इतना ही नहीं उसने अपने बिखरे बालों की लटों को एक जगह पर इकट्ठे करने के लिए उन्हें वापस उसी स्थान पर खोंसती है। उसके बालों में बंधन है। वे एक जगह पर टिके हुए हैं।

वह अपनी आँखों को थोड़ी देर के लिए बंद करती है ताकि उसे थकावट न हो सके। वे फिर से काम करने में उसे ताजगी दे सके ये ठीक ढंग से अपना कार्य करें। वह हथेलियों से अपनी आँखों को दबाती है, ताकि उन आँखों को आराम मिल सके। और उन्हीं हथेलियों से वह अपनी आँखों की पलकों को खोलने का प्रयास करती है। उसे मालूम है कि उसे अब अपनी रसोई की तरफ बढ़ना है जो उसका रचना-संसार है। जहाँ उसे कार्य करना है। वह स्वयं को उसके लिए तैयार करती है। मगर उसका पति उसकी हालत को देखकर उससे कहता है कि तुम थोड़ा-सा आराम करो। मैं तुम्हारे लिए चाय बनाता हूँ। तुम थकी हुई हो। पति को महसूस होता है कि मेरी ही आवाज़ मुझे ही नोंक की तरह चुभने लगती है। मुझे पीड़ा देती है।

वह चाय बनाने की कोशिश करने लगता हैं। वह इसके लिए गैस पर चाय का पानी चढ़ाने लगता हैं। उसके बाद वह अपनी पत्नी से पूछता हैं कि चीनी किस डिब्बे में रखी है? इसके लिए उसे आवाज़ लगानी पड़ती है क्योंकि यह बात पत्नी को ही पता है। साथ ही साथ वह अपनी पत्नी से चाय की पत्ती के बारे में भी पूछता हैं। उसके बाद पत्नी ने उसकी आवाज सुनकर अपनी साड़ी संभालकर उसे अपनी कमर के पल्लू से खोंसती हुई आकर मेरे पास खड़ी हो जाती है। वह अपने पति से कुछ कहे इससे पहले वह उसे वहाँ से हटने के लिए कहती है।

वह बड़े ही गंभीर-भाव से कहती है कि तुम्हें कोई चीज नहीं मिलेगी तुम्हें नहीं पता है कि कौन-सी चीज़ कहाँ रखी है? मैं ही जानती हूँ। उसके होठों की बनावट अजीब-सी हो जाती है। वे तिरछे हो जाते हैं। वह चकित-भाव से मुस्कराने का प्रयास करती है पति का मानना है कि पत्नी के होठों की मुस्कराहट का अर्थ समझना बड़ा ही कठिन हो जाता है उसमें छिपे हुए भावों को समझना कठिन-सा हो जाता है। वह मुस्कराहट अपने में किन-भावों को छिपाए हुए है, इसे जानना जरा कठिन हो जाता है। पति को ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह कहना चाह रही है कि तुम्हारा मेरी रसोई के संसार को जानना कठिन है। यह मेरी कार्यशाला का मेरा ही संसार है। इसका ज्ञान मुझे ही है। तुम्हें इस की समझ या जानकारी नहीं है। इसे तुम्हारे लिए जानना बहुत ही कठिन है। तुम्हें नहीं मालूम कि किन बादलों के टुकड़ों में वर्षा की बूंदे छिपी हुई हैं। वे कहाँ हैं ? किन में रखा है कपास।

वह तत्पश्चात् कोई डिब्बा खोलती है, जिसमें आवश्यक चीजें रखती हैं। यह भी कहना चाह रही है कि मुझे ही पता है कि कौन-सी चीज कहाँ रखी है, तुम्हें नहीं पता है। यह केवल में ही जानती हूँ सब कुछ। मैं यदि न हूँ तो तुम्हारा चीज ढूढना बहुत ही कठिन है। गृहस्थी की गाड़ी चलाना मेरे बिना मुश्किल हो जाएगा। मैं ही गृहस्थी का मूल आधार हूँ। मेरी मदद के बिना कुछ भी संभव नही है तुम तो अपने आपको भी ढंग से नहीं चला पाओगे। मैं तुम्हारी पूर्ण रूप से मददगार हूँ। तुम्हारा अस्तित्व मेरे बिना नहीं है। तुम अंदर जाकर टी.वी. देखो। तुम मनोरंजन प्राप्त करो। तुम एक काम भी पूरा नहीं कर सकोगे, बल्कि सारा काम और फैला दोगे। मैं ही सारा काम संभाल सकती हूँ, तुम नहीं। यह रसोई मेरी है। मेरा वह संसार है। मैं ही पूरी तरह से रसोई संभाल सकती हूँ।

विशेष- (1) इसमें कवि ने एक स्त्री, जो पत्नी है, की कार्य-प्रणाली एवं क्षमता का, वर्णन किया है। (2) उसकी भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। उसके बिना गृहस्थी नहीं चल सकती है। (3) वह गृहस्थी का मूल आधार हूँ। (4) पति उसके बिना अधूरा है। (5) वह दोहरी भूमिका निभाती है। वह एक तरफ कामकाजी महिला है तो दूसरी तरफ वह गृहस्थी संचालक है। (6) कवि ने नारी-भूमिका, महत्त्व और स्थान का नियमन किया है। (7) भाषा में सपाट बयानी है। (8) वह सरल, स्वाभाविक एवं अर्थ-गर्भत्व को आत्मसात किए हुए है। (9) कवि ने वर्तमान व्यवस्था पर सटीक टिप्पणी की है। (10) परिवार में स्त्री की भूमिका भी स्पष्ट की है। (11) वह सहनशीला है। वह पति की सहायक है। यही उसका जीवन-संसार है।