हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/कहाँ तो तय था

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हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका
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कहाँ तो तय था
दुष्यन्त कुमार

संदर्भ:- प्रस्तुत पंक्ति दुष्यंत कुमार गज़ल (सांसे धूप से) अवतरित है।

प्रसंग:- प्रस्तुत काव्य में कवि राजनीति और समाज में जो कुछ चल रहा है उसे ख़ारिज करने और विकल्प की तलाश इस गज़ल का केंद्रीय भाव है।

व्याख्या:- प्रस्तुत पंक्ति में कवि दुष्यंत जी ने राजनीति पर व्यंग करते हुए कहते हैं कि राजनीति लोगों को बड़े- बड़े लुभाने सपने दिखाते है उन्होंने यह तय किया था कि पति घर के लिए एक चिराग़ होगा अर्थात् हर घर की रोशनी प्रधान की जाएगी। इन घरों में रहने वालों के जीवन में खुशहाली आएगी। अर्थात् कवि कहते है कि नेताओं ने घोषणा की थी कि देश के हर घर कुछ चिराग़ अर्थात् सुख- सुविधाएं उपलब्ध करवाएंगे। आज स्थिति यह है कि शहरों में भी चिराग़ अर्थात् सुविधाएं उपलब्ध नहीं है नेताओं की घोषणा कागज़ी है इसे घरों में रहने वालों के जीवन में खुशहाली आएगी पर उनका आश्वासन थोथा होकर रह गया। अर्थात् स्थिति यह कि पूरे शहर के लिए एक भी चिराग़ नहीं है। यह कि कटनी और करनी में अंतर। पूरा शहर अंधकार में डूबा है अर्थात् भावों में रह रहा है। कवि ने उन्हें दस्त्रव की संज्ञा दी है दरब के नीचे छाया मिलने की वजह धूप मिलती है अब यह संस्थाएं ही आम आदमी का शोषण करने लगी है। चारों तरफ़ भ्रष्टाचार फैला हुआ है। कवि इन सभी व्यथा और से रहकर अपना जीवन बिताना चाहता है ऐसे में आम व्यक्ति को राशि होती है। कवि कहते हैं हम व्यक्ति की यह लोग गरीबों वा शोषितों जीवन को जीने पर मजबूर करते हैं यदि उनके पास वस्त्र बिना हो तो गेरो को मोड़ कर ख़ुशी अपने पेट को ढक लेगे उस में विरोध करने का आभाव समाप्त हो चुका है ऐसे में लोग ही शासकों के लिए उपयुक्त है क्योंकि इनके कारण उनका राज शांति से चलता है दूसरे में कवि ने सारे संसार में भगवान नहीं है। वह कोई बात नहीं आम आदमी का में सपना तो है। कहने का तात्पर्य है कि ईश्वर माना कि कल्पना तो है ही इस कल्पना के ज़रिए उसे आकर्षण दृश्य देखने के लिए निज जाते हैं इस तरह उनका जीवन कट जाता है। आखिर में कवि व्यक्ति की विश्वास की बात करता है आम व्यक्ति के दिल पत्थर के होते है उनमें संवेदना नहीं होती। कवि को इसके वितरित इंतजार है कि आम आदमियों के स्वर में असर (क्रांति की चिनगारी) है। इनकी आवाज़ बुलंद हो तथा आम व्यक्ति संगठित होकर विरोध करें। तो दूसरे में भ्रष्ट व्यक्ति समाप्त हो सकते है। दूसरे में कवि शायर वह समाज के ख़िलाफ़ लोगों को जागरूक करता है वह स्वयं को बचाने के लिए शासक जब आना था कविताओं प्रतिबंध लगा सकते है। जैसे गजल के छंद के लिए बंद थी सावधानी ज़रूरी है उसी तरह शासकों को भी अपनी सत्ता कायम रखने के लिए विरोध का दबाना ज़रूरी है। तीसरे में कवि कहते हैं कि जब तक हम अपने बगीचे में जिए गुलमोहर के नीचे जिए और जब ऋतु हो तो दूसरेकी गलियों में गुलमोहर के लिए मरे दूसरे शब्दों में मनुष्य जब तक जिये दूसरे के लिए भी टूटी मूल्यों की रक्षा करते हुए बाहर की गलियों में ही मरे यह काव्य की मूल व्याख्या है।

विशेष :- 1. राजनीतिज्ञों की कथनी- करनी का अंतर दर्शाया गया है। 2. दरख़्तो के साये में धूप लगना "विरोधाभासी" स्थिति है, अत: विरोधाभास अलंकार का प्रयोग है। 3. उर्दू- शब्दों का भरपूर प्रयोग किया गया है। जो गज़ल विधा के लिए उपयुक्त है।