हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/केदारनाथ सिंह

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केदारनाथ सिंह जी / हिंदी की आधुनिक कविता में प्रयोगवादी कविता कोही नई कविता के रूप में मान्यता मिली लेकिन प्रयोगवादी कविता के आरंभ में तार सप्तक के माध्यम से कवियों ने कविता में नई संवेदनाएं संभावनाएं प्रकट की केदारनाथ सिंह ने भी तीसरे सप्तक में अपना स्थान दर्ज कराया है उनके काम में में संवेदना के विविध आए हैंकेदारनाथ सिंह के कवि व्यक्तित्व में अन्य संस्कारों और तत्वों के अतिरिक्त कविता संगीत और अकेलापन के प्रति विशेष रूचि है कविता उन्हें अद्भुत देती है और उनकी अनुभूति कविता केदार जी के अनुभूति का प्रवेश अतीत से भविष्य ग्राम से शहर घर से बाहर जगत से मानस तक है इन सभी के दर्शन अध्याय और मनन तथा जीवन के व्यक्तित्व संघर्ष और समाज की संगीत विसंगतियों के उनके कवि मानस के एक लालच प्याज और अग्नि का जन्म हुआ है पर मेरे भीतर एक विश्वास एक लालसा एक लपट जरूर है जिसमें मैहर प्रतिकूल झोंके से बचने की कोशिश करता हूं करता रहूंगा यही अग्नि कवि की जागरूक है जिसमें हर प्रतिकूल झोंके से बचने की कोशिश करता हूं करता रहूंगा यही अग्नि कभी की जागरूक चेतना और सार ग्रहणी सकती है इसी ने कवि ने संश्लेषण शक्ति को जन्मा है काव्य में अनुभूत अनुभूति की विशालता को संश्लिष्ट करने में विमल बनता है विवो की संचिता में आशय है जितना उग्र लोग समा के कवि उतना ही सजीव होता है केदारनाथ सिंह रुचि से ही विमान प्रिय कवि हां तीसरे सप्तक के वक्तव्य में उन्होंने अपनी टीम अंबा भी रूचि और काव्य में विवो के मूल्य की विशद व्याख्या की है उनकी धारणा है कि मनुष्य की चेतना का विकास संस्कृति का इतिहास है चेतना के विकास के अनुरूप काव्य का स्वरूप भी बदलता है प्राय अपनी जागरूक चेतना के घोतक है एवं जीवन के उच्च मूल्यों का व्यक्त करने के लिए साहित्य में लाए जाते हैं यॉन्बी मामू के साथ आध्यात्मिक मूल्यों का संभव है किसी संस्कृति अवलंब अंतर अवलंबन का प्रतिफल हो कवि का चुनाव करने के लिए प्रति विज्ञान मनोविज्ञान धर्म लोक साहित्य और इतिहास का सहारा ले सकता है प्रभु मैं पानी पृथ्वी का प्रथम नागरिक आपसे कुछ कहने की अनुमति चाहता हूं यदि समय हो तो पिछले दिन का हिसाब हुआ आपको एक इतिहास जीवित कहानी नहीं केदारनाथ सिंह की अनेक कविताएं आर्थिक संदर्भ को लेकर चलती है ऐसी कविताओं की विशिष्टता यह है कि उनमें एक सामान्य सी वस्तु एक महत्वपूर्ण रूप कार लेकर प्रस्तुत होती है और पाठकों की संवेदना को झकझोर ती है जड़ों के शुरू में आलू शीर्षक कविता समाजशास्त्र काव्य भाषा में अधिक बड़ी दुनिया में चीजों के संबंध को प्रत्यक्ष करती है यथा वह जमीन से निकलता है और सीधे बाजार में चला जाता है या उसकी एक ऐसी क्षमता है जो मुझे अक्सर दहशत में भर देती तब तक के संदर्भ में महत्वपूर्ण टिप्पणी देते हुए श्री परमानंद श्रीवास्तव लिखते हैं जरूरी है कविता के पाठक के पाठ की संरचना संवेदना स्तर पर इसकी अनेक अनेक कर सकता और जटिलता को जाने और यह सारा जानना एक अत्यंत प्रचलित भाषा को अधिक घनिष्ठ तनावपूर्ण शब्दों की अध्यक्षता फोर्स बंद संदर्भ सहित वासिता की ओर जाना चाहिएवह शब्द की आवृत्ति के साथ उसका होना और भी उजागर होता है मध्यवर्ग इस समाजशास्त्र से अर्थशास्त्र से आलू का रिश्ता व्याख्या की जरूरत नहीं रखताजहां बहुत सी चीज से लगता टूट रहे हैं और पिछले मौसम के स्वाद से जुड़ जाता है टूटना और जुड़ना इन शब्दों का अर्थ वक्ता का जो निश्चित निषेचन भेद है वह एक सामाजिक सच्चाई के अधीन है पर सच क्या समाजशास्त्र में चीजें जिस स्तर परिभाषित हो जाती है इससे वस्तु सत्य की काव्यात्मक संरचनाओं में चीजों को उसी तरह परिभाषित किया जाता है एक काव्य शब्द यथार्थ को घुघरा और अमृत किए बिना भी अपनी और सत्ता का विस्तार करते हैं अपने दो तक जाने देते हैं इसी अर्चिता के विस्तार में इनकी अस्पष्टता के अर्थ खुलते और फैलते हैं इसलिए कहा जाता है कि कविता का अर्थ नहीं होता उसके बस होना चाहिए केदारनाथ सिंह की इस कविता में कुछ शब्द का संदर्भ संबंध देखे जमीन वजह की संदर्भ संगीत स्पष्ट है यह संकेत कि वह जमीन से निकलता है और सीधे बाजार चला जाता है पर घर इस तीसरे शब्द संदर्भ क्या अर्थ होता हैमैं उसका छिलका उठाता हूं और झांक कर पूछता हूं मेरा घर मेरा घर कहां है उत्पादन उत्पादक और उपभोक्ता के बीच के संबंधों के भीतर ही कहो ना कहीं केदारनाथ जी की मान्यता है किस रस वाद के द्वारा कल्पित काव्य की साधारण विकरण आज पुराना हो चुका है पुराने काव्य में जिसका निष्कर्ष रस ही था चरित्र चित्रण की विशिष्टता के साथ साधारण होता है आज के काव्य में चरित्र की विशेषता काम में नहीं है अब कविताओं व अधिकता और वह प्रत्येक वस्तु सत्य को व्यक्त करती है वह साधारण के अनुकूल शक्ति को स्वर पर की सीमा से परे कर देता है