हिंदी कविता (छायावाद के बाद) सहायिका/सुई और तागे के बीच में

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सन्दर्भ: यह कविता (छायावाद के बाद) पुस्तक से ली गई है।इसके रचियता केदारनाथ सिंह है। यह हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि भी रहे।

प्रसंग : कविता में आधुनिक जीवन की विवशताओं का चित्रण किया गया है इस कविता में कवि ने मां का अपने बच्चे के लिए जो सम्पूर्ण जीवन का त्याग है उसी को उखेरा है।

व्याख्या: कवि कहता है कि मेरी मां अकेलेपन में बैठी सोचती रहती है कि बारिश न हो जाए पर होने की संभावना है।कवि को ऐसे वातावरण में बाहर जाना है लेकिन मां के मन में वही चल रहा है कि बच्चे को बाहर जाना है और बारिश होने वाली है अर्थात् मां बच्चे के मन में चलने वाली उठा - पटक को अच्छे से जानती है।कवि को यह एहसास है कि जब में बाहर जाऊंगा तो मैं माँ को अपने कामकाज की व्यस्तता में भूल जाऊंगा लेकिन माँ मेरी चिंता करती रहेगी।जैसे मैं माँ द्वारा दी गई कटोरी और सफ़ेद साड़ी को भूल गया हूं।कवि कहता है कि सही मायने में वे सब बातें भूल जाऊंगा लेकिन मेरी माँ उन बातों को याद रखती है। और शायद यही कारण था कि केदारनाथ की माँ अंत में उन्हें ही पहचान नहीं पाती। माँ सब भूल गई है परन्तु कवि को लगता है कि समय सब कुछ भुला देता है। कवि कहता है कि हम अपने माँ- बाप को शहर ले आते है और उनकी स्थिति से उन्हें अलग कर देते है । उनके पहचाने पलो से अलग कर दिया है ।उनकी पहचानी हुई गलियों से , पेड़ - पोधों से,तालाबों से, बरगद से, पीपल सब से उन्हें अलग कर दिया है। माँ और कवि का रिश्ता गाव से बना रहता है। गांव में एक पहचान होती है।और जहां पहचान होती है वहां अपनापन होता है। परन्तु माँ को डर है की यह रिश्ता टूट न जाए। लोग हर स्थिती में भागे जा रहे है।और स्थिती में यादें बहुत पीछे छूट जाती हैं। कवि कहता है की सर्दी आ गई है और हर सर्दियों के बाद माँ और बूढ़ी हो जाती है ।और वह झुक जाती है।और उसकी परछाई जमीन पे पड़ती है। यह पर वो परछाई अलग है जो जमीन पर पड़ रही है। इसका अर्थ यादों से जुडे़ वो पल जिन्हें माँ याद कर रही है।माँ मारने से डरती नहीं है।हर सर्दी माँ के लिए मुश्किल होती है। सर्दी माँ को और बूढ़ा बना देती है।और ये एक माँ की कहानी नहीं है।यह सारे बुजुर्गों की कहानी है। माँ खुद को आसहाय महसूस करती है। पक्षियों के बारे में माँ के विचार अत्यंत कोमल है।वह पक्षियों के बारे में चाहे कुछ ना कहे पर उनके प्रति वह कोमल भाव रखती हैं।कवि कहता है कि वह कुछ नहीं कहती पर नींद अपने पर स्वयं एक कोमल मासूम पक्षी की भांति दिखती है। कवि कहता है कि माँ बहुत परिश्रमी है। हो सकता है कि कपड़े सिलकर उन्होंने अपने बच्चे को पाला हो? रात में जब सब सो जाते हैं तो माँ बैठ जाती है सुई और तागे लेकर। यह क्रम एक दिन का नहीं है। पता नहीं कितने दिन का क्रम है ये। ६० साल उन्होंने ऐसे ही बिताए हैं। सुई और तागे के द्वारा माँ अपने जीवन को बुन रही है। सूई और तागे मेहनत का प्रतीक हैं।

विशेष:

० मां और बच्चे के बीच रंगतमक, आत्मीय सम्बन्ध का उल्लेख है। ० बिंबात्मकता है। ० भाषा प्रभावी और सटीक है। ० शहरी और भौतिक जीवन की आपादाई और विडम्बना को बताया गया है। ० धीरे-धीरे में पुनुरुक्ती प्रकाश अलंकार है। कर्घा मां का प्रतीक है। ० मां की मासूमियत और कोमलता का वर्णन है। ० सहज भाषा है। ० केदारनाथ सिंह जन जीवन परिवार को देखते है।