हिंदी कविता (रीतिकालीन)/गिरिधर कविराय

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पाठ[सम्पादन]

कुंडलियाँ

(1)

चिंता ज्वाल सरीर की, दाह लगे न बुझाय।

प्रकट धुआं नहिं देखिए, उर अंतर धुंधुवाय॥

उर अंतर धुंधुवाय, जरै जस कांच की भट्ठी।

रक्त मांस जरि जाय, रहै पांजरि की ठट्ठी॥

कह 'गिरिधर कविराय, सुनो रे मेरे मिंता।

ते नर कैसे जियै, जाहि व्यापी है चिंता॥


(2)

साईं, बैर न कीजिए, गुरु, पंडित, कवि, यार ।

बेटा, बनिता, पँवरिया, यज्ञ–करावनहार ॥

यज्ञ–करावनहार, राजमंत्री जो होई ।

विप्र, पड़ोसी, वैद्य, आपकी तपै रसोई ॥

कह गिरिधर कविराय, जुगन ते यह चलि आई,

इअन तेरह सों तरह दिये बनि आवे साईं ॥


(3)

साईं सब संसार में, मतलब को व्यवहार।

जब लग पैसा गांठ में, तब लग ताको यार॥

तब लग ताको यार, यार संगही संग डोलैं।

पैसा रहा न पास, यार मुख से नहिं बोलैं॥

कह 'गिरिधर कविराय जगत यहि लेखा भाई।

करत बेगरजी प्रीति यार बिरला कोई साईं॥


(4)

बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।

काम बिगारै आपनो, जग में होत हंसाय॥

जग में होत हंसाय, चित्त चित्त में चैन न पावै।

खान पान सन्मान, राग रंग मनहिं न भावै॥

कह 'गिरिधर कविराय, दु:ख कछु टरत न टारे।

खटकत है जिय मांहि, कियो जो बिना बिचारे॥


(5)

बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ।

जो बनि आवै सहज में, ताही में चित देइ॥

ताही में चित देइ, बात जोई बनि आवै।

दुर्जन हंसे न कोइ, चित्त मैं खता न पावै॥

कह 'गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती।

आगे को सुख समुझि, होइ बीती सो बीती॥


(6)

पानी बाढो नाव में, घर में बाढो दाम।

दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम॥

यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।

परमारथ के काज, सीस आगै धरि दीजै॥

कह 'गिरिधर कविराय, बडेन की याही बानी।

चलिये चाल सुचाल, राखिये अपनो पानी॥


(7)

राम तूहि, तुहि कृष्ण है, तहि देवन को देव

तूही ब्रह्मा तूहि शक्ति है, तूहि सेक, तूहि सेव

तूही सेवक, तूही सेव, तूही इंदर, तूही सेसा

तूही होय सब रूप, तू किया सबमें परवेसा

कह गि रिधरक कविराय, पुरुष तूही तूही बाम

तूही लछमन, तूही भरत, शत्रुहन, सीताराम

लेखक परिचय[सम्पादन]