हिंदी कविता (रीतिकालीन)/गिरिधर कविराय

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            केशवदास 


         ( वन गमन वर्णन )

द्रुतविलम्बित:- विपिन मारग राम बिराजहीं। सुखद सुन्दरि सोदर भ्राजहीं॥ विविध श्रीफल सिद्ध मनों फलो। सकल साधन सिद्धिहि लै चलो॥

शब्दार्थ:- श्री शोभा। फल तपस्या के फल, साधन-संयम, नियम, ध्यानादि सिद्धजनों के कर्त्तव्य सिद्ध अष्ट सिद्धियां (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व)।

भावार्थ:- राम जी वन मार्ग से जाते हुए शोभा पा रहे हैं, साथ में सुखप्रद पत्नी (सीता) और भाई लक्ष्मण भी शोभा दे रहे हैं। ऐसाजान पड़ता है मानो कोई सिद्ध पुरुष (महात्मा योगी) अपनी तपस्या में सफल होकर शोभा पा रहा है और अपने साधनों और प्राप्त सिद्धियों को समेट कर अपने घर जा रहा है।

(राम जी सिद्ध हैं, लक्ष्मण साधन हैं, सीता जी एकत्रीभूत सिद्धियां हैं)।

अलंकार- उत्प्रेक्षा


दोहा- राम चलत सब पुर चल्यो, जहं तहं सहित उछाह। मनो भगीरथ पथ चल्यो, भागीरथी प्रवाह॥

भावार्थ:- राम के चलते ही जहां-तहां से समस्त पुरवासी जन भी बड़े उत्साह से नगर छोड़कर उनके पीछे चले मानो राजा भगीरथ के पीछे गंगा की धारा बह चली हो । अलंकार- उत्प्रेक्षा


चंचला:- रामचन्द्र धाम तें चले सुने जबै नृपाल। बात को कहै सुने सुदै गए महा बिहाल॥ ब्रह्मरंध्र फोरि जीव यौं मिल्यो जुलोक जाय। गेह तूरि ज्यों चकोर चन्द्र में मिलै उड़ाय॥

शब्दार्थ:- बरही-बलही से, बलपूर्वक जबरदस्ती बरी है-विवाही है। उपदि अपनी इच्छा से उपदि बर्यो है यह इस राजकुमारी ने अपनी इच्छा से चुनकर तुम्हें वरण किया है। शोभा अभिरत हौ ऐसी सुन्दरता से युक्त हो, तुम ऐसे सुन्दर हो । जस-सुयश बिरत वैरागयुक्त श्री लक्ष्मी सिवा (शिव) = पार्वती । चाहत फिरत हौ खोजते फिरते हो।

भावार्थ:- (लोग पूछते हैं) या तो तुमने इस राजपुत्री को जबरदस्ती विवाहा है, या इसने ही माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध केवल अपनी इच्छा से तुम को बुरा है (इसी से डर कर वन-वन छिपे करते हो), तुम ऐसे सुन्दर हो ( कि क्या कहें ) केशवदास कहते हैं कि या तो तुम तीनों (रति, काम और संसार विजयी होने का) सुयश हो- (लक्ष्मण जी सुयश रूप हैं) और शिव का बैर स्मरण करके वन में एकान्तवास करने जा रहे हो या किसी मुनि द्वारा शापित व्यक्ति हो, या किसी ब्राह्मण का कुछ दोष करने में मन लगाये हो (अतः रूप बदले वन में फिर रहे हो घात पाकर हत्या करोगे) या सिद्धि प्राप्त कोई परम विरागी सिद्ध पुरुष हो या तुम दोनों पुरुष (राम और लक्ष्मण) विष्णु और शिव हो । जिनके साथ लक्ष्मी तो हैं पर (खोई हुई) पार्वती को खोजते फिरते हो ( बतलाओं तुम हो कौन ) । अलंकार- संदेह


मत्तमातंगलीलाकरण दंडक:- मेघ मंदाकिनी चारू सौदामिनी रूप रूरे लसे देहधारी मनो। भूरि भागीरथी भारती हंसजा अंश के है मनो, भगो भारे भनो। देवराजा लिये देवरानी मनो पुत्र संयुक्त भूलोक में सोहिये। पक्ष दूं संधि संध्या सधी है मनों लक्षिये स्वच्छ प्रत्यक्ष ही मोहिये ।

शब्दार्थ:- मंदाकिनी आकाशगंगा सौदामिनी बिजली। रूरे सुन्दर भागीरथी=गंगा। भारती=सरस्वती (नदी) | हंसजा-सूर्यकन्या, यमुना पक्ष दू-दोनों पक्ष (कृष्ण और शुक्ल)। संधी हैं परस्पर संधित हैं (एक दूसरे से जुड़ी हुई एकत्र है)। लक्षिये=लखते हैं, देखते हैं। स्वच्छ अति निर्मल प्रत्यक्ष ही इन्हीं चर्मचक्षुओं से (देखते हैं)।

नोट:-

राम, सीता, लक्ष्मण तीनों आगे-पीछे मार्ग में चल रहे हैं। वन के कारण तीनों की स्थिति अति सन्निकट की है, अर्थात् सटे हुए से चलते हैं इसी स्थिति पर केशव जी उत्प्रेक्षा द्वारा अपनी प्रतिभा प्रकट करते हैं-कहते हैं कि-

भावार्थ:- (राम, सीता, लक्ष्मण मार्ग में चलते हुए कैसे मालूम होते हैं)

शब्दार्थ:- नृपाल राजा दशरथ बिहाल-व्याकुल । ब्रह्मरंध्र मस्तक पर का वायु ब्रह्मांड, नवमद्वार जुलोक (द्युलोक) सुरलोक, बैकुंठ। गेह-पिंजरा ।

भावार्थ:- जब राजा ने सुना कि रामजी घर से वन प्रस्थान कर गए, तब इतने व्याकुल हो गए कि उन्हें किसी से कुछ बातचीत करने की शक्ति न रही। तदनन्तर ब्रह्मांड फोड़कर उनके प्राण सुरलोक को इस प्रकार चले गए जैसे पिंजरा तोड़कर चकोर उड़कर चन्द्रमा से जा मिलता है। अलंकार- उदाहरण


चित्रपदा:- रूपहिं देखत मोहैं। ईश! कहो नर को हैं? संभ्रम चित्त अरूझै! रामहि यों सब बूझे ॥

भावार्थ:- (पंथ में जाते हुए) राम, लक्ष्मण, सीता को देखकर लोग मोहित होते हैं। मन में विचार करते हैं कि हे भगवान्! ये कौन नर है (कहां के रहने वाले और किसके पुत्र हैं?) जब कुछ निश्चित नहीं कर सकते और चित्त भारी भ्रम में उलझ जाता है, तब लोग रामजी से यों पूछते हैं


चंचरी:- कौन हो कित तु चले जात हो केहि काम जू? तू कौन की दुहिता बहू कहि कौन की यह बाम जू।। एक गांउ रहो कि साजन मित्र बन्धु बखानिये। देश के परदेश के किधौं पंथ की पहिचानिये॥

शब्दार्थ:-

दुहिता-पुत्री। बहू पुत्रबधू। बाम स्त्री | साजन आदरणीय सज्जन । किधौ पंथ की पहिचानिये-या तुम में सिर्फ रास्ते ही भर की जान पहचान है, पंथ के साथी ही हो । तात्पर्य यह कि तुम तीनों गांव के हो, एक कुल के हो या केवल मार्ग ही के साथी-संगी हो ।

भावार्थ:-सरल है। अलंकार- सन्देह



        (जगनमोहन दण्डक)

दण्डक:-

किधौं यह राजपुत्री वरही बरी है,

किधौं उपदि बर्यो है यह सोभा अभिरत हौ। किधौं रतिनाथ जस साथ केसोदास। जात तपोबन सिव बैर सुमिरत हौ। किधौं मुनि साप हत किधौं ब्रह्मदोषरत, किधौं सिद्धि युत सिद्ध परम बिरत हौ।। किधौ कोऊ ठग हौ गठौरी लीन्हे किधौं तुम, हर हरि श्री हौ सिवा चाहत फिरत हौ।।

मानो मेघ, आकाशगंगा और बिजली ही देहधारी होकर सुन्दर रूप से शोभा दे रहे हैं राम मेघ हैं, जानकी आकाशगंगा है और लक्ष्मण बिजली है। या यों कहो कि अनेक गंगा, सरस्वती और यमुना अंशों के देहधारी रूप हैं, जो इनके दर्शन कर रहे हैं उनका बड़ा सौभाग्य है (इनके दर्शन अनेक तीर्थराज प्रयाग के समान पुण्यप्रद है) अथवा मानो इन्द्र महाराज इन्द्राणी और अपने पुत्र जयंत को लिए हुए भूलोक की शोभा बढ़ा रहे हैं। या मानो दोनों पक्षों की सन्धि (पूर्णमासी या श्रमावास) की तीनों संध्यायें सन्निकट होकर एकत्र हो गई हैं जिन्हें प्रत्यक्ष ही अत्यन्त निर्मल देखकर मन मोहित होता है।

सूचना:- सामवेदी संध्या में यह प्रमाण है कि प्रात: संध्या का रंग लाल, मध्याह्न संध्या का रंग श्वेत तथा सायं-संध्या का रंग श्याम है। इस उक्ति से यह भी लक्षित होता है कि केशवदास जी सामवेदी संध्या ही किया करते थे (अर्थात् सामवेदी सनौढ़िया ब्राह्मण थे)। अलंकार- उत्प्रेक्षा



          (अनगशेखर दंडक)

तड़ाग नीरहीन ते सनीर होत केशोदास, पुंडरीक झुंड भौंर मंडक्लीन मंडही। तमाल वल्लरी समेत सूखि सूखि कै रहे, ते बाग फूलि फूलि कै समूल सूल खंड ही॥ चितै चकोरिनी चकोर मोर मोरनी समेत, हंस हंसिनी सुकादि सारिका सबै पढ़े। जहीं जहीं बिराम लेत राम जू तहीं नहीं, अनेक भांति के अनेक भोग भाग सो बढ़े॥

शब्दार्थ:- पुंडरीक कमल । बल्लर लत। सूल दुःख विराम लेत-ठहर कर सुस्ताते हैं, ठहरते हैं।

भावार्थ:- सरल ही है।



मोदक:- धाम को राम समीप महाबल। सीतहिं लागत है अति सीतल।। ज्यों धन संयुत दामिनी के तनु। होत है पूषन के कर भूषन।। मारग की रज तापित है अति। केशव सीतहिं सीतल लागति॥ प्यौ पद पंकज ऊपर पायनि। दै जु चले तेहि ते सुख दायनि।।

शब्दार्थ:-पूषन के कर सूर्य की किरणें। प्यौ-पति। भावार्थ:- सरल है।


दोहा:-

प्रतिपुर और प्रति ग्राम की प्रति नगरन की नारि । सीता जू कौ देखि कै बरनत है सुखकारि॥

भावार्थ-सरल ही है।


        ( सीता मुख वर्णन )

प्रकर्ष दंडक:- बासों मृग अंग कहें तोसों मृगनैनी सब, वह सुधाधर तुहूं सुधाधर मानिये। वह द्विजराज तेरे द्विजराजि राजै, वह कलानिधि तुहूं कलाकलित बखानिये। रत्नाकार के हैं दोऊ केशव प्रकाशकर, अम्बर बिलास कुवलय हितु मानिये। वाके अति सीत कर तुहूं सीता सीतकर, चन्द्रमा सी चन्द्रमुखी सब जग जानिये॥

शब्दार्थ:- सुधाधर=सुधा है अधर में जिसके द्विजराजि दांतों की पंक्ति। कलाकलित चौंसठ कलाओं को जानने वाला रत्नाकर 1. समुद्र, 2. रत्नसमूह, रत्न जटित आभूषण अम्बर विलास 1. आकश में है विलास जिसका 2. जो सुन्दर वस्त्रों से शोभित है। कुवलय हितु 1. कुमोदिनी का हितैषी, 2. पृथ्व मंडल (कु पृथ्वी+वलय मंडल) की हितैषिणी सोतकर 1. ठंढी किरणें, 2. सन्ताप हारिणी (दर्शकों को आनंनदायिनी ।

भावार्थ:- (ग्रामवासिनी स्त्रियों में से एक सीता के प्रति कहती है) हे चन्द्रमुखी सीता, सब जग निवसी तुझे चन्द्रमा के समान जानते हैं। (जो गुण चन्द्रमा में हैं वे सब तुझ में भी हैं अर्थात्) उस चन्द्रमा को लोग मृगांक क हैं तो तुझे भी सब लोग मृगनैनी कहते हैं; वह सुधाकर (अमृतधारी) है तो तू भी ओठों में सुधा रखती है; वह द्विजराज है तो तेरे भी दन्तपंक्ति द्विज (राज) शोभित है, वह कलानिधि (कला-कला करके बढ़ने वाला) है तो तू भी चौंसठ कलाओं की जानकारी से युक्त है; तुम दोनों रत्नाकर के प्रकाशक हो- अर्थात् चन्द्रमा आकाश में विलास करता है और तेरे शरीर पर वस्त्र विलास करते हैं, चन्द्रमा कुमोदिनी का हितू है तू तो भूमंडल (कु वलय) की हितैषिणी है (पृथ्वी की कन्या होने से); उस चन्द्रमा की किरणें शीतल हैं, तो तू भी दर्शकों के संताप (त्रिताप) हर करके उनके चित्त को शान्ति रूपी शीतलता देने वाली है अतः तू चन्द्रमा से किसी गुण में कम नहीं। अलंकार:- श्लेष से पुष्ट उपमा ।


मनहरण दण्डक:- कलित कलंक केतु, केतु अरि सेत गात, भोग योग को अयोग रोग ही को थल सो। पून्यो ई को पूरन पै आन दिन ऊनो ऊनो, छन छन छीन होत छीतर के जल सो। चन्द्र सो जो बरनत रामचन्द्र की दोहाई, सोई मतिमंद कवि केशव मुसल सो। सुन्दर सुवास अरू कोमल अमल अति, सीता जू को मुख सखि केवल कमल सो॥

शब्दार्थ:- कलित कलंक केतु-कलंक केतु से युक्त (भारी कलंकी)। केतु अरि-केतु है शत्रु जिसका राहु और केतु को ही एक मान कर केश्व ने ऐसा लिखा। ऊनो अपूर्ण छीलर उथला जलाशय (थोड़ा जल और अधिक कीचड़ वाला जलाशय) । मुसल-मूसल (मूर्ख)।

भावार्थ:- दूसरी स्त्री उसके मत का खंडन करती हुई अपनी उक्ति लड़ाती है) हे सखी! सीता जी का मुख केवल कमल सा है चन्द्रमा के समान नहीं, क्योंकि चन्द्रमा तो भारी और प्रसिद्ध कलंकी है, केतु उसका शत्रु है, वह श्वेतांग भी है (कुष्ठरोगी है), भोग योग के अयोग्य है, रोगी है (क्षय रोग है), शुक् पक्ष में भी केवल पूर्णिमा को ही होता है अन्य दिनों तो अपूर्ण ही रहता है, कृष्णपक्ष में तो उथले जलाशय के जल की भांति प्रतिदिन क्षीण ही होता है। सीता जी के मुख को जो कवि चन्द्रमा सा कहता है वह मतिमंद पक्का मूसरचन्द (महामूर्ख) है। सीता जी का मुख तो इन दोषों से रहित तथा सौंदर्य, सुगंध, कोमलता और स्वच्छता से युक्त है, अतः केवल कमल के समान है चन्द्रसम नहीं। अलंकार- उपमा ।


            (अन्य उवाच)

दण्डक:- एकै कहै अमल कमल मुख सीता जूको, एकै कहै चन्द्र सम आनन्द को कंद री। होय जो कमल तो रयनि में न सकुचै री, चन्द जो तो बासन न होती दुति मंद रही। बासर ही कमल रजनि ही में, चन्द्र मुख, बाहर हू रजनि बिराजै जगबंद री। देखे मुख भावै अनदेखई कमल चन्द्र, ताते मुख मुखै सखी कमलै न चंद री॥

शब्दार्थ:- आनंद को कंद-आनंद बरसाने वाला बादल। रथनि (रजनि) रात्रि । जगबंद-जगत भर से वंदनीय अनदेखई कमल चंद-बात यह है कि कमल और चन्द्रमा अपने गुणों और प्रभाव के बदौलत ही अच्छे समझे जाते हैं। इ वास्तविक रूप देखने में सुन्दर नहीं।

भावार्थ:- (तीसरी स्त्री दोनों का मंत खंडन करके कहती है) कोई कहता है सीता जी का मुख कमल-सा है, कोई कहता है चन्द्र-सा आनन्ददायक है। पर मैं कहती हूँ कि यदि कमल-सा होता तो रात्रि को संकुचित न होता? यदि चन्द्र-सा होता तो दिन में उसकी आभा मंद न पड़ती? कमल तो दिन ही में प्रफुल्लित रहता है, चन्द्रमा रात्रि ही में प्रकाशित रहता है, पर वह मुख तो रात-दिन समस्त जग में सम्मान पाने योग्य है। कमल और चन्द्रमा देखने में तो सुन्दर नहीं हैं (केवल उनके गुण सुनने में भले जंचते हैं) पर यह मुख टकटकी बांधकर देखने में ही आता है (सौन्दर्य से तृप्ति नहीं होती)। इस कारण मेरी सम्मति तो यह है कि इस मुख के समान यही मुख हे, न तो कमल ही इसके समान है न चन्द्रमा ही इसके तुल्य है। अलंकार-अनन्वयोपमा।


दोस:- सीता नयन चकोर सखि, रविवंशी रघुनाथ। रामचन्द्र सिय कमल मुख, भलो बन्यो है साथ॥

शब्दार्थ:- भलौ-अत्यन्त अद्भुत बड़ा ही विलक्षण।

भावार्थ:- हे सखी! सीता के नेत्र चकोर हैं, रघुनाथ जी रविवंशी हैं (चकोर और रवि से विरोध होने पर भी सीता के नेत्र चकोर उन पर आसक्त हैं, यह आश्चर्य है) और राम जी चन्द्र हैं (पर उसे देखकर) सीता का मुख कमल प्रसन्न रहता है (चन्द्र और कमल का विरोध होने पर भी) यह बड़ा ही अद्भुत संयोग है। अलंकार- विरोधाभास

सूचना:- इस दोहे में अद्भुत रस झलक रहा है। केशव के पांडित्य और प्रतिभावान होने का अच्छा नमूना है। द


            (चन्द्रकला)

दुर्मिल:- कहूं बाग तड़ाग तरंगिनि तीर तमाल की छांह बिलोकि भली। घटिका यह बैठत है सुख पाय विछाय तहां कुस कांस थली।। मग को श्रम श्रीपति दूर करै सिय को शुभ बालक अंचल सो। श्रम तेऊ हरैं तिनको कहि केशव चंचल चारु दूंगल सों॥

शब्दार्थ:- तरंगिनी-नदी। श्रीपति श्री राम जी (पति की हैसियत से)। बालक अंचल सों वल्कल वस्त्र की हवा करके। तेऊ श्री सीता जी। तिनको श्री राम जी का। दृगंचल कटाक्ष बांकी चितवन।

भावार्थ:- (रास्ते में चलते हुए) कहीं किसी बाग में व तड़ाग अथवा नदी के किनारे तमाल की अच्छी घनी छाया देखकर कुशासन बिछाकर एक घड़ी आनन्दपूर्वक बैठते हैं। सीता जी को थकावट बल्कल वस्त्र की हवा करके श्रीराम जी दूर करते हैं और सीता जी बांकी चितवन से हेर कर श्रीराम जी की थकावट दूर करती हैं। अलंकार- अन्योन्य।

सोरठा:- श्री रघुबर के इष्ट, अश्रुबलित सीता नयन। सांची कही अदृष्ट, झूठी उपमा मीन की॥

शब्दार्थ:- इष्ट-प्रति। अश्रुबलित-आनन्दाश्रु युक्त । अदृष्ट होनहार।

भावार्थ:- श्री राम जी का इतना प्रेम देख जानकी के क्षेत्रों में आनन्द के आंसू आ जाते हैं। वे अश्रुयुक्त नेत्र श्रीराम जी को अति प्यारे मालूम होते हैं। कवि कहता है कि संयोगवश इस होनहार ने (सीता सहित राम का वनगमन) नेत्रों की मीन की उपमा जो झूठी ही दी जाती है क्योंकि मीन तो पानी में रहती है, नेत्र सदैव पानी में नहीं रहते, अतः उपमा झूठी थी सो) वह इस समय सत्य हो गई अर्थात् अश्रुयुक्त सीता के नेत्र ठीक मीन-से जान पड़ते हैं।


दो.- मारग यों रघुनाथ जू, दुख सुख सब ही देत। चित्रकूट परबत गये, सोदर सिया समेत॥

भावार्थ:- दर्शनों से लोगों का सुख तथा पुनः निज वियोग से दुख देते हुए श्री रघुनाथ जी लक्ष्मण और सीता सहित चित्रकूट पर्वत पर पहुंचे।


      ॥ नवाँ प्रकाश समाप्त ॥

प्रकाशन : रामनारायण बेनी माधव, इलाहाबाद राज सभा न विलोकिय कोऊ। सोक गहे तब सोद दोऊ।। मंदिर मातु बिलोकि अकेली। ज्यों बिन वृक्ष बिराजति बेली।।

शब्दार्थ:- बिन वृक्ष की बेलि बिना आश्रय की बेलि अर्थात् भूमि पर पतित, जमीन पर पड़ी हुई।

भावार्थ:- दोनों छन्दों का सरल ही है।


तोटक:-

तब दीरघ देखि प्रनाम कियो। उठि कै उन कंठ लगाय लियो।। न पियो जल संभ्रम भूलि रहे। पुनि मातु सों बैन भरत्य कहे।।

शब्दार्थ:- दीरघ देखि-जमीन पर लम्बायमान पड़ी हुई (शोक से भू-पतिता)। न पियो जल केकैयी का दिया हुआ जलपान न किया भ्रम भारी भ्रम।


दुर्मिल:- मातु कहां नृप ? तात गये सुरलोकहि, क्यों? सुत शोक लये। सुत कौन सु? राम, कहां है अबै? बन लच्छमन सीय समेत गये। बन काज कहा कहि? केवल मों मुख, तोको कहां सुख यामें भये? तुमको प्रभुता, धिक तोकों कहा अपराध बिना सिगरेई हये।।

शब्दार्थ:- प्रभुता राज्याधिकार सिगरे (सकल) सब हये (हने) मारे। अलंकार- प्रश्नोत्तर


दो.-

भर्ता सुत विद्वेषनी, सब ही कौ दुखदाइ। यह कहि देखे भरत तब कौसल्या के पाइ॥

शब्दार्थ:- विद्वेषिनी बहुत अधिक द्वेष रखने वाली। देखे.... पाइ तब भरत जी कौशल्या जी के निकट जा उनके पैर छुए, प्रणाम किया।


तोटक:-

तब पायन जाइ भरत्थ परे। उन भेंटि उठाय के अंक भरे॥ सिर संधि विलोक बलाइ लई। सुत तो बिन या विपरीत भई॥

शब्दार्थ:- सिर सूघि प्राचीन काल में वात्सल्य प्रेम प्रकाशन की यह रीत थी (अब भी छोटे बालकों के सिर पर लोग हाथ फेरते हैं)। बलाई लई बलिहारी गई। (बच्चों को चुम्बन करते हुए स्त्रियाँ ऐसा कहती हैं।


           ( भरत ) 


तारक:- सुन मातु भाई यह बात अनैसी। जु करो सुत-भर्तृ बिनाशिनि जैसी।। यह बात भई अब जानत जाके। द्विज दोष परै सिगरे सिर ताके।।

शब्दार्थ:- अनैसी = (अनिष्ट) बहुत बुरी | भर्तृ (भर्ता) पति। द्विजदोष ब्रह्म हत्यादि पाप। सिगरे- सब।

भावार्थ:- (भरत जी कौशल्या जी को इतमीनान कराने को शपथ खाते हैं) हे माता! यह घटना जैसी पुत्र और पति-घातिनी कैकेयी ने की है, बहुत ही बुरी हुई। जिसके जानते हुए यह बात हुई हो उसके सिर ब्रह्महत्या का पाप पड़े (अर्थात् यदि मेरे जानते यह बात हुई हो तो मुझे ब्रह्महत्या का पाप लगे)।

जिनके रघुनाथ विरोध बसै जू। मठधारिन के तिन पाप ग्रसै जू।। रसराम रस्यो मन नाहिन जाको। रण में नित होय पराजय ताको।।

शब्दार्थ:- रसराम-रामप्रेम रस्यो रस से भीगी। पराजय हार।