हिंदी कविता (रीतिकालीन) सहायिका/केशवदास

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केशवदास
रामचंद्रिका वन-गमन वर्णन

तीसरा प्रभाव

समझैं बाला बालकहूं, वर्णन पंथ अगाध |

कविप्रिया केशव करी, छमियो कवि अपराध|1/1||


संदर्भ :- यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिबद्ध कवि केशवदास द्वारा रचित कविप्रिया के तीसरा प्रभाव से लिया गया है

प्रसंग :- इस पद के द्वारा केशवदास क्षमा मांगते हुए इस पद को लिखने की आज्ञा मांगते हैं

व्याख्या :- १. केशवदास कहते हैं कि बच्चों को, युवकों और युवतियों को समझने के लिए, यह जो काव्य मार्ग है, काव्य लेखन का मार्ग आघात है इसी का में वर्णन करने जा रहा हूं इसका मार्ग बहुत कठिन है मुझे क्षमा करना कि मुझसे कोई गलती हो जाए तो

२. केशवदास कहते हैं कि मैंने इस कविप्रिया पुस्तक को इसीलिए लिखा है कि जिससे कविता के अघात रहस्य को स्त्री तथा बालक भी समझ सके अंतः कविगण मेरा अपराध क्षमा करें |

३. केशवदास ने ‘कविप्रिया’ के ‘तीसरे प्रभाव’ के प्रारंभ में ही क्षमा याचना की है उन्होंने कहा कि उनका ‘कविप्रिया’ ग्रंथ इतना शुभम और आसान है जिसे साधारण शिक्षा संस्कार वाले बालक भी आसानी से समझ सकते हैं इसीलिए केशव कवियों से अपने अपराध की शमा मांगते हैं


अलंकार कवितान के, सुनि सुनि विविध विचार |

कवि प्रिया केशव करी, कविता को शृगार|2/2||


संदर्भ :- यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिबद्ध कवि केशवदास द्वारा रचित कविप्रिया के तीसरा प्रभाव से लिया गया है

प्रसंग :- इस पद के द्वारा केशवदास बताते की उन्होंने किस प्रकार इस कविप्रिया रचना में अलंकारों का प्रयोग किया है

व्याख्या :- १. कवि कहते हैं कि मैंने बार-बार विचार करके अन्य कविगरणों से सुनकर, समझकर और मेरे भी विभिन्न प्रकार के विचार कर कर इन अलंकारों का प्रयोग किया है क्योंकि कविता की शोभा कविप्रिया का निर्माण और अलंकारों का दूसरा नाम ही सौंदर्य है

२. कविता के अलंकारवादि विविध गुणो को विचारपूर्वक सुनने और समझने के बाद 'केशव' ने कविता की शोभा इस कविप्रिया को लिखा है

३. कविता में अलंकार योजना के अलग-अलग विचारों को सुनकर केशवदास ने ‘कविप्रिया’ नामक ग्रंथ लिखा है जिसका श्रृंगार अलंकारों से किया गया है अर्थात इस काव्य को अलंकार ग्रंथ के रूप में लिखा गया है


चरण धरत चिता करत, नींद न भावत शोर ।

सुबरण को सोधत फिरत, कवि व्यभिचारी, चोर|4/3||


संदर्भ :- यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिबद्ध कवि केशवदास द्वारा रचित कविप्रिया के तीसरा प्रभाव से लिया गया है

प्रसंग :- इस पद के माध्यम से कवि ने तीन अर्थ किए हैं यह तीन अर्थ तीन लोगों (कवि, व्यभिचारी और चोर)के संदर्भ में है

व्याख्या :- (कवि पक्ष) कवि कविता के प्रत्येक चरण को लिखते समय बहुत चिंतन करता है उसे नींद और शोर नहीं सुहाता कवि केवल 'सुबरण' अर्थात रस के अनुकूल वर्ण को ढूंढता रहता है|

(व्यभिचारी पक्ष) व्यभिचारी व्यक्ति बहुत सोच-विचारकर काम करता है अन्य लोग सोते रहे और शोर न करें ऐसी स्थिति उन्हें अपने अनुकूल लगती है वह 'सुंदर रंग वाली' नायिका को खोजता रहता है

(चोर पक्ष) चोर खूब सोच समझ कर रखता है वे दबे पांव चलता जैसे कोई उसकी आहट न सुन सके| चोर को भी लोगों का सोते रहना पसंद है कुछ भी शोर नहीं पसंद आता| वह 'सुबरन' अर्थात सोना खोजता रहता है|

विशेष १. इस छंद में सुंदर श्लेष अलंकार का वर्णन है|


राचत रंच न दोष युत, कविता, बनिता मित्र ।

बुंदक हाला परत ज्यों, गंगाघट अपवित्र ।5/4||


संदर्भ :- यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिबद्ध कवि केशवदास द्वारा रचित कविप्रिया के तीसरा प्रभाव से लिया गया है

प्रसंग :- इस छंद के माध्यम से केशव ने कविता, स्त्री और मित्र के विषय में कहा है

व्याख्या :-१. कविता, स्त्री तथा मित्र में थोड़ा सा भी दोष हो तो वे इस प्रकार अच्छे नहीं लगते जिस प्रकार मदिरा की एक बूंद पड़ते ही गंगा जल का भरा हुआ पूरा घडा अपवित्र हो जाता है।

२. कवि कहते हैं कि इन तीनों ( स्त्री, कविता और मित्र) दोषों के रहते हुए शोभा नहीं पाते हैं जैसे एक बूंद मदिरा से गंगाजल से भरा हुआ घड़ा अपवित्र हो जाता है| अंतः थोड़े से दोष से ही ये तीनों निंदा के योग्य माने जाते हैं| अलंकारों एवं गुणों के पक्षपाती केशवदास काव्य, में किसी दोष को क्षमा नहीं करते

विशेष :- १. दोष की तुलना शराब से की गई है


पांचवा प्रभाव

दोहा

जधपि सुजाति सुलक्षणी, सुबरन सरस सुवृत्त ।

भूपण बिन न विराजई, कविता वनिता मित्त|1/5||


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिबद्ध कवि केशवदास द्वारा रचित कविप्रिया के पांचवा प्रभाव से लिया गया है

प्रसंग : पांचवा प्रभाव के दोहे में केशव काव्य में अलंकारों की महत्वता का वर्णन करते हैं

व्याख्या : अतः उनकी कविता में विभिन्न अलंकारों का प्रयोग सर्वत्र दिखाई देता है। अलंकारों के बोझ से कविता के भाव दब से गए हैं और पाठक को केवल चमत्कार हाथ लगता है।

जहां अलंकार-योजना प्रति केशव को कठोर आग्रह नहीं है, वहां उनकी कविता अत्यन्त हृदयग्राही और सरस हैं। उपमा-अलंकार का एक उदाहरण देखिए- दशरथ-मरण के उपरांत भरत जब महल में प्रवेश करते हैं तो वे माताओं को वृक्ष विहीन लताओं के समान पाते हैं।

विशेष १. यह पद स्त्रियों के संदर्भ में कविता के संदर्भ में है

(कवित्त)

कीन्हे छत्र छितिपति, केशोदास गणपति,

दसन, बसन, बसुमति कह्याचार है।

बिधि कीन्हों आसन, शरासन असमसर,

आसन को कीन्हो पाकशासन तुषार है।

हरि करी सेज हरिप्रिया करो नाक मोती,

हर कत्यो तिलक हराहू कियो हारु है।

राजा दशरथसुत सुनौ राजा रामचन्द्र,

रावरो सुयश सब जग को सिगारु है|(66/8)


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिबद्ध कवि केशवदास द्वारा रचित कविप्रिया के पांचवा प्रभाव के कवित्त से संकलित किया गया है

प्रसंग : इस कविता में दशरथ सुत राजा रामचंद्र का गुणगान किया गया है| कवि प्रशस्ति के रूप में राम की कीर्ति का बखान करता है

व्याख्या : 'केशवदास कहते है कि-हे राजा दशरथ के पुत्र श्री रामचन्द्र सुनो। आपका सुयश सारे ससार के गार का कारण है, क्योकि राजाओ ने अपने छात्र, उसी से निर्मित किये है और श्री गणेशजी ने अपना दाँत भी उसी से बनाया है। पृथ्वी ने अपना सुन्दर वस्त्र ( सागर ) ब्रह्मा ने अपना आसन ' पुडरीक ) कामदेव ने अपना धनुष, इन्द्र ने अपना घोडा (उच्च श्रवा । नारायण ने अपना बिछौना शेषनाग, श्री लक्ष्मी जी ने अपनी नाक का मोती, श्री शकर जी ने अपना तिलक (चन्द्रमा) और पार्वती जी ने उसे अपना हार बनाया है।

विशेष १. सफेद रंग की स्तुति की है

(छठा प्रभाव)

(सवैया)

हाथी न साथी न घोरे न चेरे न, गाउँ न ठाउँ को नाउँ विलैहै ।

तात न मात न पुत्र न मित्र, न वित्त न अंगऊ संग न रैहै ।

केशव कामको 'राम' बिसारत और निकाम न कामहिं ऐहै।

चेतुरे चेतु अजौ चितु अंतर अंतकलोक अकेलोहि जैहै|56||


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिबद्ध कवि केशवदास द्वारा रचित कविप्रिया के छठा प्रभाव के सवैया से संकलित किया गया है

प्रसंग : केशवदास मनुष्य को संसार की परिस्थितियों से परिचित कराते हुए इस सवैया को लिखते हैं

व्याख्या : तेरे साथी ये हाथी-घोडे और नौकर-चाकर नहीं है । न गाँव और घर ही तेरा साथ देगे, इनका तो नाम तक लुप्त हो जायगा। पिता, माता, पुत्र मित्र और धन मे से कोई भी तेरे साथ न रहेगा। 'केशवदास' कहते हैं कि तू काम आनेवाले राम को भूल रहा है और तो सब व्यर्थ है, तेरे काम न आवेंगे । अब भी मन मे सावधान हो जा, क्योकि यमलोक को तो तुझे अकेला ही जाना पडेगा।

विशेष १. भक्ति को पद है संसार में सब कुछ व्यर्थ है क्षीणकता का प्रभाव डाला है क्षीणकता के साथ-साथ ईश्वर की महामाया पर प्रभाव डाला है मृत्यु अंतिम सत्य है।

२. मार्मिक पद है

(गणेश जी का दान वर्णन)

(कवित्त)

बालक मृणालनि ज्यों तोरि डारै सब काल,

कठिन कराल त्यो अकाल दीह दुख को।

विपति हरत हठि पद्मिनी के पति सम,

पङ्क ज्यों पताल पेलि पठवै कलुष को।

दूर के कलङ्क अङ्क भव सीस ससि सम,

राखत है 'केशोदास' दास के वपुष को।

साकरे की सांकरन सनमुख होत तोरै,

दसमुख मुख जावै, गजमुख मुख को


संदर्भ : प्रस्तुत पद्यांश केशवदास द्वारा रचित वंदना के शीर्षक गणेश वंदना से उत्कृष्ट है।

प्रसंग : यहां पर कवि केशवदास ने गणेश जी की वंदना की है।

व्याख्या : कवि कहता है कि जैसे पालक कमल की डाल को किसी भी समय आसानी से तोड़ डालता है उसी प्रकार गणेश असमय में आए विकराल दुख को भी दूर कर देते हैं जैसे कमल के पत्ते पानी में फैले कीचड़ को नीचे भेज देते हैं और स्वयं स्वच्छ होकर ऊपर रहते हैं उसी प्रकार गणेश हर विपत्ति को दूर कर देते हैं जिस प्रकार चंद्रमा को निष्कलंक कर शिव जी ने अपने शीश पर धारण किया उसी प्रकार गणेश जी अपने दास को कलंक रहित कर पवित्र कर देते हैं गणेश जी वंदना से अनेक दास मुक्त कर देते हैं रावण भी गणेश जी के मुख की तरफ देखकर अपनी बाधाओं को दूर करने की आशा रखता था।

विशेष १. भक्ति रस का प्रयोग हुआ है

२. अनुप्रास, उपेक्षा अलंकार का प्रयोग

३. गुण- माधुर्य

भाषा में मधुरता का गुण है


(गिरा का दान वर्णन)

(कवित्त)

बानी जगरानी की उदारता बखानी जाय,

ऐसी मति उदित उदार कौन की भई।

देवता प्रसिद्ध सिद्ध ऋषिराज तप वृद्ध,'

कहि कहि हारे सब कहि न काहू लई।

भावी, भूत, वर्तमान, जगत बखानत है,

केशौदास क्यों हूँ न बखानी काहू पैगई।

वर्णे पति चारिमुख, पूत वर्णे पॉच मुख,

नाती वर्णे षटमुख, तदपि नई नई||

संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिबद्ध कवि केशवदास द्वारा रचित कविप्रिया के छठा प्रभाव के गिरा का दान वर्णन के कवित्त से संकलित किया गया है।

प्रसंग : इस पद के माध्यम से केशवदास मां सरस्वती की वंदना करते हैं

व्याख्या : जगत की स्वामिनी श्री सरस्वती जी की उदारता का जो वर्णन कर सके, ऐसी उदार बुद्धि किसकी हुई है ? बडे-बडे प्रसिद्ध देवता, सिद्ध लोग, तथा तपोबद्ध ऋषिराज उनकी उदारता का वर्णन करते करते हार गये, परन्तु कोई भी वर्णन न कर सका । भावी, भूत, वर्तमान जगत सभी ने उनकी उदारता का वर्णन करने की चेष्टा की परन्तु किसी से भी वर्णन करते न बना । उस उदारता का वर्णन उनके पति ब्रह्माजी चार मुख से करते है, पुत्र महादेव जी पाँच मुख से करते है और नाती ( सोमकार्तिकेय ) छ मुख से करते है, परन्तु फिर भी दिन-दिन नई ही बनी रहती है।

विशेष १. सरस्वती वंदना की गई है


आचार्य केशव कठिन काव्य के प्रेत :