हिंदी कविता (रीतिकालीन) सहायिका/घनानंद

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घनानंद
सुजानहित

दोहे


रूपनिधान सुजान सखी जब तैं इन नैननि नेकु निहारे।

दीठि थकी अनुराग-छकी मति लाज के साज-समाज बिसारे।

एक अचंभौ भयौ घनआनंद हैं नित ही पल-पाट उघारे।

टारैं टरैं नहीं तारे कहूँ सु लगे मनमोहन-मोह के तारे।।


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिमुक्त कवि घनानंद द्वारा रचित सुजानहित से संकलित किया गया है

प्रसंग : घनानंद द्वारा उनकी प्रेमिका सुजान के सौंदर्य का वर्णन किया गया है

व्याख्या : घनानंद कवि कहते हैं कि उनकी प्रियतम सुजान का रूप तो एक खजाना है अर्थात सुजान एक अनुपम सुंदरी है जब मैं उसकी आंखों में आंखें डाल कर देखता हूं तो मैं अपनी आंखों को वहां से हटा नहीं पाता मेरी दृष्टि उसको देखते देखते थक जाती है परंतु मेरी आंखें उसे देखना बंद नहीं करना चाहती अर्थात घनानंद को सुजान से प्यार हो गया है वे समाज की मान मर्यादा को भी भूल गए है घनानंद जैसे ही अपने पलक ऊपर को उठाते हैं तो उनके सामने सुजान के ही दर्शन मिलते हैं अंत में वे कहते हैं कि मेरे पलक रूपी कपाट उसकी सुधरे को देखते ही रहना चाहते हैं वे हटाने से भी नहीं हटते हैं इस प्रकार यहां पर सुजान की अत्याधिक आसक्ति के दर्शन होते हैं

विशेष १. कोई स्वार्थ की भावना नहीं

२. उपालन है कहीं कड़वाहट नहीं है

३. इनका प्रेम स्वच्छ प्रेम है परिपाटी से मुक्त कवि है

४. स्विच ऑन हित से लिया गया है

५. कवित्त सवैया छंद है

६. संगीतात्मकता का गुण है


हीन भएँ जल मीन अधीन कहा कछु मो अकुलानि समानै।

नीर सनेही कों लाय कलंक निरास ह्वै कायर त्यागत प्रानै।

प्रीति की रीति सु क्यों समुझै जड़ मीत के पानि परें कों प्रमानै।

या मन की जु दसा घनआनंद जीव की जीवनि जान ही जानै।।


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिमुक्त कवि घनानंद द्वारा रचित सुजानहित से संकलित किया गया है

प्रसंग : इस छंद के माध्यम से घनानंद ने प्रेम की उच्च आदर्श को बताने का प्रयास किया है

व्याख्या : इस छंद के माध्यम से कवि घनानंद कहते हैं कि जल से बिछुड़ कर मछली व्याकुल हो जाती है और अपने प्राण त्याग देती है| परंतु मेरा दुख उसके भी समान नहीं है क्योंकि वह प्रेम में निराश होकर कायरों की तरह प्राण त्याग देती है और उसके मरने का कलंक उसके प्रेमी पर लगता है उसने विरह में जीवन कहां जिया, वह तो प्रेम की रीति को पहचान ही नहीं पाई जिसमें वियोग में तिल तिल जलकर भी प्रिय स्मृति में जीवन जीकर विरह के क्षणों को प्रिय समिति के साथ व्यतीत किया है विरह के भाव को कैसे समझ सकती है घनानंद कवि कहती हैं कि मैं सुजान के विरह में निरंतर व्याकुल रहता हूं मेरी इस विरह की पीड़ा को मेरी जीवन प्राण सुजान ही समझ सकती है प्रेम की इस रीति को विरह वेदना के दुख को मछली या जड़ प्रेमी क्या समझ पाए

विशेष १. घनानंद का प्रेम आज के लिए आदर्श है

२. यथाक्रम है प्रीति की रीति है


मीत सुजान अनीत करौ जिन, हाहा न हूजियै मोहि अमोही।

डीठि कौ और कहूँ नहिं ठौर फिरी दृग रावरे रूप की दोही।

एक बिसास की टेक गहे लगि आस रहे बसि प्रान-बटोही।

हौं घनआनँद जीवनमूल दई कित प्यासनि मारत मोही।।


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिमुक्त कवि घनानंद द्वारा रचित सुजानहित से संकलित किया गया

प्रसंग : कवि घनानंद के इस छंद में सुजान के भावनात्मक अत्याचारों का कड़ा विरोध किया गया है

व्याख्या : कविवर घनानंद कहते हैं कि हे प्रिय सुजान! मेरे साथ जो तुम अनीति का व्यवहार कर रही हो वह उचित नहीं है तुम मुझसे पीछा छुड़ाने वाली मत बनो मेरे साथ ऐसे निष्ठुरता का व्यवहार कर तुम अनीति क्यों कर रहे हो? मेरे प्राणरूपी रास्तागीर को केवल तुम्हारे विश्वास का सहारा है और उसी की आशा में अब तक जिंदा है तुम तो आनंदरूपी घन हो जो जीवन का प्रदाता है| हे देव! मोही होकर भी तुम मुझे अपने दर्शनों के लिए इस तरह क्यों तड़पा रहे हो अर्थात मुझे शीघ्र ही अपने दर्शन दे दो

विशेष १.


बंक बिसाल रंगीले रसाल छबीले कटाक्ष कलानि मैं पंडित|

साँवल सेत निकाई-निकेत हियौं हरि लेत है आरस मंडित|

बेधि के प्रान कर फिलिम दान सुजान खरे भरे नेह अखंडित|

आनंद आसव घूमरे नैंन मनोज के चोजनि ओज प्रचंडित|


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिमुक्त कवि घनानंद द्वारा रचित सुजानहित से संकलित किया गया

प्रसंग : कवि घनानंद नायिका सुजान के कटीले नेत्रों और उनके बंकिम कटाक्ष से नायक के मन पर पड़े प्रभाव का वर्णन करता है

व्याख्या : कवि कहना चाहता है कि एक तो प्रकृति ने ही उन्हें इतना सुंदर बनाया, दूसरी और उन नेत्रों की चितवन का प्रभाव विषय पर अधिक घातक हो उठा है| नायिका सुजान के नेत्र विशाल हैं, रसपूर्ण और सुंदर हैं| लेकिन उन से चलने वाले कटाक्ष तीर की तरह नुकिले और बेधक है| उसकी तिरछी चितवन को देख लगता है कि वह कटाक्ष करने की कला में तीरंदाज के सम्मान निपुण है| इसलिए उसकी चितवन के तीर से कोई घायल हुए बिना नहीं रह सका| उसके नेत्रों की पुतलियां काली है, पुतली के आसपास का भाग श्वेत वर्ण का है| कुल मिलाकर श्वेत श्याम रतनार नेत्र शोभा के भंडार प्रतीत होते हैं| उन्हें देखते ही दर्शक अपना ह्रदय दे बैठता है, अर्थात मुग्ध हो जाता है| कामावेश के कारण इन नेत्रों में आलस्य और मस्ती के भाव भरे रहते हैं, जिससे उन मित्रों का प्रभाव और भी घातक हो उठता है|यद्यपि इन कटाक्षों के कारण नायक को प्रथम अनुभूति कष्ट की होती है, वह विरही चितवन के आघात से तिलमिला उठता है पर बाद में उसे लगता है कि वह नायिका के इस सौंदर्य और मस्ती भरी अदा के बिना जीवित नहीं रह सकता| अंतः वे उसे एक साथ जीवन मृत्यु दान का करती है| उसमें अखंड प्रेम की मदिरा छलकती है जिस के सौंदर्य का पान कर दर्शक अपना विवेक खो बैठता है और कामोदीप्त हो शराबी के समान आचरण करने लगता है| वह अनुभव करता है कि इन नेत्रों के कटाक्षों का आघात सहना उसके वंश के बाहर है फिर भी अनुरक्ति के कारण वह बार-बार उसकी ओर निहारता है और कटाक्ष-बाण सहर्ष सहता है|

विशेष १.


देखि धौं आरती लै बलि नेकू लसी है गुराई मैं कैसी ललाई|

मनों उदोत दिवाकर की दुति पूरन चंदहि भैंअंन आई|

फूलन कंज कुमोद लखें घबआनंद रूप अनूप निकाई|

तो मुख लाल गुलालहिं लाय के सौतिन के हिय होरी लगाई|


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिमुक्त कवि घनानंद द्वारा रचित सुजानहित से संकलित किया गया

प्रसंग : इस पद के द्वारा कवि घनानंद ने होली के अवसर पर फाग खेलती नायिका के सौंदर्य का चित्र उपस्थित किया है गुलाल लगाने से उसके गोर मुख की शोभा कैसी हो गई इसका वर्णन किया है

व्याख्या : नायक कहता है हे सुंदरी मैं तेरी इस छवि पर बलिहारी जाता हूं तनिक अपने गुलाल लगे मुख्य की छवि दर्पण में तो देख | तुम्हारे गोरे मुख पर गुलाल की लाली कैसी फब रही है | गुलाल की लालिमा ने गोरे रंग में मिलकर एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर दिया है | इस गोरे और लाल रंग के मिश्रण से जो छवि उत्पन्न हुई है उसे देख कर ऐसा लगता है मानो पूर्णिमा का चंद्र प्रातः काल के उदय होते सूर्य की लालिमा धारण कर आकाश में आया हो | सूर्य और चंद्र के इस अद्भुत मिलन से प्रकृति में एक अद्भुत दृश्य उपस्थित हो गया है साधारणतयः कमल दिन में सूर्य के उदित होने पर और कुमुदिनी रात्रि के समय चंद्रमा की चांदनी में लिखते हैं, परंतु तुम्हारे इस अद्भुत रूप के कारण जो सूर्य चंद्र का संगम हुआ है, उसके फलस्वरूप कमल और कुमुदिनी दोनों साथ -साथ लिख रहे हैं | तुम्हारे इस रूप लावण्य की शोभा अमुपम है | तुम्हारी सुंदरता ऐसी हो उठी है की सौदों के हृदय में है ईर्ष्या की आग प्रतिप्त हो उठी है | ऐसा लगता है मानो तुमने गुलाल तो लगाया है साथ ही होलिका दहन के लिए आग भी लगाई है और इस प्रकार होली का उत्सव पूरे समारोह के साथ मनाया है |

विशेष १.


पहिले अपनाय सुजान सनेह सों क्यों फिरि तेहिकै तोरियै जू.

निरधार अधार है झार मंझार दई, गहि बाँह न बोरिये जू .

‘घनआनन्द’ अपने चातक कों गुन बाँधिकै मोह न छोरियै जू .

रसप्याय कै ज्याय,बढाए कै प्यास,बिसास मैं यों बिस धोरियै जू .


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिमुक्त कवि घनानंद द्वारा रचित सुजानहित से संकलित किया गया

प्रसंग : इस पद के माध्यम से घनानंद सुजान पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि तुमने मुझे तन्हा और अकेला छोड़ दिया | सुजान वेश्या थी | उसने तत्कालीन शासक के भय और प्रलभन में आकर घनानंद के प्रेम को ठुकरा दिया पहले प्रेम करके फिर विश्वासघात किया | इससे घनानंद को अत्यंत पीड़ा हुई | उनके इसी विश्वासघात को याद कर इस सवैये में कवि नीति की दुहाई देते हुए कहता है की प्रेम मार्ग में विश्वासघात से बड़ा कोई पाप नहीं है

व्याख्या : हे प्रिय सुजान पहले तुमने मुझसे प्रेम किया, प्रेम का नाता जोड़ा, विश्वास दिलाया कि यह प्रेम बंधन अटूट है, पर अब क्यों रुष्ट हो कई? क्या कारण है कि आपने मुझसे मुख मोड़ लिया? तुम्हारा यह आचरण उतना ही अनुचित और अनीतिपूर्ण है जिना उस व्यक्ति का जो पहले तो पानी में डूबते हुए व्यक्ति को सहारा दे, बाँह पकड़े और फिर मझधार में पहुंचाने पर उसे बेसहारा छोड़ कर डूबने दे | उस समय तुमने मुझे अपने प्रेम से आश्वस्त किया तुम्हारे उस आचरण से मुझे जीवनदान मिला | पर अब जब हम दोनों प्रेम पथ पर आगे बढ़ चुके थे तुमने मेरा साथ छोड़ दिया और मानो मुझे जीवन रूपी नदी कि मझधार में डूबने के लिए बेसहारा और निरूपाय बना कर छोड़ दिया | तुम्हारा यह आचरण कठोर और नीति विरुद्ध है तुम्हारी सोचो | यह विश्वासघात मत करो | मैं जीते जी मर जाऊंगा | तुम मेघ के समान प्रेमामृत की वर्षा करने वाली हो | मेघ चातक के प्रति कभी कठोर नहीं होता | उसके प्राण की रक्षा के लिए स्वाति नक्षत्र में बरसता है, उसे जीवनदान देता है | तुमने अपने गुणों से, अपने रूप लावण्य से प्रेम की दोरी में बांधा था | अब उसे दोरी को काट दोगी तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा | अर्थात तुम्हारे अतिरिक्त मेरा और कोई नहीं है | अतः तुम मेरे प्रति निष्ठुर मत बनो | मेरे जीवन में विष घोलकर तुम्हारा क्या लाभ होगा? इससे तो प्रेम बदनाम होगा | प्रेम को कलंक लगेगा | विश्वासघात करना नीति की दृष्टि से भी उचित नहीं | अतः मुझे अपने प्रेम का वरदान दो, इस कठोरता को त्याग मुझे अपना लो


विशेष १. मुहावरा- (धार-मझधार), नेह के तौरियै जु बाहँ डूबोना

२. कवि स्वयं को भाग्यवादी कहते हैं


रावरे रूप की रीति अनूप, नयो नयो लागत ज्यौं ज्यौं निहारियै।

त्यौं इन आँखिन वानि अनोखी, अघानि कहूँ नहिं आनि तिहारियै।।

एक ही जीव हुतौ सुतौ वारयौ, सुजान, सकोच और सोच सहारियै।

रोकी रहै न दहै, घनआनंद बावरी रीझ के हाथनि हारियै।।


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिमुक्त कवि घनानंद द्वारा रचित सुजानहित से संकलित किया गया

प्रसंग : यहां पर कवि ने प्रेमी की अनन्यता, घैर्य, दृढ़ संकल्प शक्ति और प्रेमी के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की भावना का वर्णन किया है

व्याख्या : हे प्राणप्रियं ! तुम्हारे रूप लावण्य की रीति अनोखी है। ज्यों ज्यों उसे निकट से देखते हैं, त्यों त्यों उसे और देखने की चाहा उमड़ती है, मन तृप्त ही नहीं होता क्योंकि वह प्रत्येक क्षण बदलता रहता है, पहले से अधिक आकर्षक होता जाता है। प्रिय का आकर्षण आयु के साथ-साथ कटता नहीं अपितु नया-नया होकर बढ़ता जाता है, बिखर रहा है। उधर मेरे नेत्रों को की अजीब आदत पड़ गई है। तुम्हारी शपथ, मैं सच कहता हूं कि यह नेत्र तुम्हारे रूप का पान कर कभी तृप्त नहीं होते। अंतः वे किसी और की ओर देखते तक नहीं। मेरे पास तो मेरा एक प्राण था, वह मैंने तुम पर न्योछावर कर दिया, अब मेरे पास अपना कुछ नहीं है। आप ही मेरे सर्वस्व है, मेरे स्वामी है, मेरे संरक्षक है। अतः आपसे विनम्र प्रार्थना है कि संकोच त्याग मेरे चिंताकुल मन को सहारा दो, आपकी कृपा से ही मैं जीवित रह सकता हूं। प्रेम का कड़वा फल जानते हुए मैं अपने नेत्रों को तुम्हारी ओर जाने से रोकता हूं कि कहीं रूप जाल में फँसाकर अपना सब कुछ ना गंवा दे और शेष जीवन विरह-यातना में बीते। पर यह आंखें मेरा कहा नहीं मानती और फिर वही होता है जिसकी आशंका थी। मैं रीक्ष के हाथ बिक जाता हूं। वह रीक्ष मुझसे मेरा अधिकार छीन लेती है, मैं उसके हाथों पराजित होकर सब कुछ खो जाता हूं। विवश होकर तुम्हारी प्रेम में पागल बना हुआ हूं।


विशेष १. मार्मिक पक्ष है

२. उदात प्रेम है (उच्च कोटि का प्रेम)


आसहि-अकास मधिं अवधि गुनै बढ़ाय ।

चोपनि चढ़ाय दीनौं की नौं खेल सो यहै ।

निपट कठोर एहो ऐंचत न आप ओर,

लाडिले सुजान सों दुहेली दसा को कहै ।।

अचिरजमई मोहि घनआनद यौं,

हाथ साथ लाग्यौ पै समीप न कहूं

विरह-समीर कि झकोरनि अधीर,

नेह, नीर भीज्यौं जीव तऊ गुडी लौं उडयौं रहै ।।49||


संदर्भ : यह पद हिंदी साहित्य के रीतिकाल के रीतिमुक्त कवि घनानंद द्वारा रचित सुजानहित से संकलित किया गया

प्रसंग : इस कविता में कवि ने पतंग का रूपक बांधकर यह बताया है की सुजान ने पहले तो कवि को प्रेम के मार्ग में बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया अपने आचरण से उसके मन में आशा बधाई, पर फिर अचानक उसके प्रति निष्ठुर हो उदासीन हो गई है और उसकी उदासीनता के कारण कवि की दशा अत्यंत दयनीय हो उठी है

व्याख्या : उस निष्ठुर सुजान ने पतंग उड़ाने जैसा निष्ठुर खेल मेरे साथ खेला है। पहले तो मेरे मन को आशा मैं बांधा, आश्वासन दिया, मिलने की अवधि निश्चित की और मेरा मन आशा की ऊंचाइयों में उड़ने लगा। मुझे सारा संसार तुच्छ लगने लगा। उत्साह, उमंग, और प्रेमातिरेक के कारण मैं बहुत आशावान और प्रसन्न था। पर अब उसने निष्ठा पूर्वक आचरण कर मेरी सारी आशाओं को धूल में मिला द लिया है। उसके लिए यह कीड़ा भले ही हो, पर इससे मेरे प्राण तो संकट में पड़ गए हैं। उसका यह मजाक बड़ा कठोर है। सुजान मैं प्रेम की डोर ढ़ीली छोड़ी, मिलन की अवधि बढ़ातीं गई, आशा देती रही और मेरे मन आशा के आकाश में फूला फूला विचरण करता रहा। उसने आशा बँधा कर पता नहीं, आप कठोर आचरण अपना लिया है, जिसके परिणाम स्वरुप वह मेरे मन को और मुझे अपनी ओर आने का अवसर नहीं देते और मैं उसके दर्शन नहीं कर पाता, स्पर्श सुख से भी वंचित हूं। अपने इस दुख को, उसके कठोर व्यवहार से उत्पन्न वेदना को किससे कहूं, निर्मोही तक अपनी वेदना का संदेश कैसे पहुंचा पहुंचाऊं ? आश्चर्य तो यह है कि मेरा मन रूपी पतंग उसके हाथों में है, अर्थात मैं उसके वशीभूत हूं, पर वह प्रेम की डोर को खींच उसे अपने पास नहीं आने देती। फल स्वरुप मेरा मन रूपी पतंग विरह रूपी वायु के झोंकों में हिचकोले खाता रहता है, नेत्रों से निकले आंसू के अविरल प्रभाव में भीगता रहता है पर फिर भी आशा के आकाश में उड़ता रहता है। कभी का प्रेम मग्न हृदय वियोग कष्ट सहते और आंसू बहाते हुए भी सुजान का प्रेम, उससे मिलने की आशा त्याग नहीं पाता और उसके चारों ओर मंडराता रहता है