हिंदी गद्य का उद्भव और विकास ख/मेले का ऊँट- बाल मुकुंद गुप्त

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मेले का ऊँट
बालमुकुंद गुप्त

भारत मित्र संपादक! जीते रहो, दूध बताशे पीते रहो । भांग भेजी सो अच्छी थी । फिर वैसी ही भेजना । गत सप्ताह अपना चिट्‌ठा आपके पत्र (भारत मित्र) में टटोलते हुए 'मोहन मेले' के लेख पर निगाह पड़ी । पढ़कर आपकी दृष्टि पर अफसोस हुआ । भाई, आपकी दृष्टि गिद्ध की सी होनी चाहिए, क्योंकि आप संपादक हैं, किंतु आपकी दृष्टि गिद्ध की सीहोने पर भी उस भूखे गिद्ध की सी निकली, जिसने ऊँचे आकाश में चढ़े-चढ़े भूमि पर गेहूं का एक दाना पड़ा हुआ देखा, पर उसके नीचे जो जाल बिछा रहा था वह उसे नहीं सूझा । यहां तक कि उस गेहूं के दाने को चुगने के पहले जाल में फंस गया । 'मोहन मेले' में आपका ध्यान एक-दो पैसे की पूरी की ओर गया । न जाने आप घर से कुछ खाकर गए थे या नहीं । शहर के एक पैसे की पूरी के दाम मेले में दा पैसे हों तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए, चार पैसे भी हो सकते थे । यह क्या देखने की बात थी? आपने व्यर्थ बातें बहुत देखीं, काम भी द्‌क भी देखते? दाई ओर जाकर आप ग्यारह सौ सतरों का एक पोस्टकार्ड देख आए, पर बाई तरफ बैठा हुआ ऊँट भी आपको दिखाई न दिया? बहुत लोग इस ऊँट की ओर देखते और हँसते थे । कुछ लोग कहते थे कि कलकत्ते में ऊँट नही होता, इसी से मोहन मेले वालों ने इस विचित्र जानवर का दर्शन कराया है । बहुत-सी शौकीन बीवियों, कितने ही फूल-बाबू भी आए, और झुक-झुककर उस काठ के घेरे में बैठे ऊँट की तरफ देखने लगे । एक ने कहा, ऊँटडो है' दूसरा बोला, ऊँटडो कठेतै आयो ?' ऊँट ने भी यह देख होंठों को फड़काते हुए, अनी फटकारी । भंग की तरंग में मैंने सोचा कि ऊँट जरूर ही मारवाड़ी बाबूओं से कुछ कहता है । जी में सोचा कि चलो देखें कि वह क्या कहता हे? क्या उसकी भाषा मेरी समझ में न आवेगी? मारवाड़ियों की भाषा मैं समझ लेता हूँ तो क्या मारवाड़ के ऊँट की बोली समझ में न आवेगी? इतने में तरंग कुछ अधिक हुई । ऊँट की बोली साफ-साफ समझ में आने लगी । ऊँट ने उन मारवाड़ी बाबूओं की ओर -धनी करके कहा: 'बेटा! तुम बच्चे हो, तुम मुझे क्या जानोगे? यदि मेरी उमर का कोई होता -का वह जानता । तुम्हारे बाप के बाप जानते थे कि मैं कौन हूँ । तुमने कलकत्ते के महली में जन्म लिया, तुम पोतड़ों के अमीर हो । मेले में बहुत चीजें हैं, उन्हें देखो और यदि- तुम्हें कुछ फुरसत हो तो लो सुनो, सुनाता हूँ-आज दिन तुम विलायती फिटिन, टमटम और जोड़ियों पर घूमते-फिरते हो, जिसकी कतार तुम मेले के द्वार पर मीलों तक छोड़ आए हो, तुम उन्हीं पर चढ़कर मारवाड़ से कलकत्ते नहीं पहुँचे थे । ये सब तुम्हारे साथ ही जन्मी हुई है । तुम्हारे बाप पचास साल के भी नहीं होंगे, इसलिए वे भी मुझे भली भांति नहीं पहचानते, लेकिन उनके भी बाप को मैंने पीठ पर लादकर कलकत्ते पहुँचाया है, वे हों तो मुझे पहचान लें । आज से पचास साल पहले रेल कहीं थी? मैंने मारवाड़ से मिरजापुर तक और मिरजापुर से रानीगंज तक कितने ही फेरे किए हैं । महीनों तुम्हारे पिता के पिता तथा उनके भी पिताओं का घर मेरी पीठ पर रहा । जिन स्त्रियों ने तुम्हारे बाप के भी बाप को जना है, वे सदा मेरी पीठ को ही पालकी समझती थीं । मारवाड़ में मैं सदा तुम्हारे द्वार पर हाजिर रहता था, पर यहाँ वह मौका कहाँ? इसी से इस मेले में मैं तुम्हें देखकर आँखें शीतल करने आया हूँ । तुम्हारी भक्ति घट जाने पर भी मेरा वात्सल्य नहीं घटा है । घटे कैसे? मेरा-तुम्हारा जीवन एक ही रस्सी से बंधा हुआ था । मैं ही हल चलाकर तुम्हारे खेतों में अन्न उपजाता था और मैं ही चारा आदि पीठ पर लादकर तुम्हारे घर पहुँचता था । यहाँ कलकत्ते में जल की कलें हैं, गंगाजी हैं, जल पिलाने को लाखों कहार हैं, पर तुम्हारी जन्मभूमि में मेरी पीठ पर लादकर कोसों से जल लाया जाता था और मैं तुम्हारी प्यास बुझाता था । मेरी इस घायल पीठ को पूणा से मत देखो । इस पर तुम्हारे बड़े (पूज्य) अन्न, रस्सियाँ यहाँ तक कि उपले लादकर दूर-दूर ले जाते थे । जात समय मेरे साथ पैदल जाते थे और लौटते समय मेरी पीठ पर चढ़े हुए हिचकोले खाते, स्वर्गीय सुख लूटते आते थे । तुम रबड़ के पहिए वाली चमड़े की कोमल गद्दियोंदार फिटिन में बैठकर भी वैसा आनन्द प्राप्त नहीं कर सकते । मेरी बलबलाहट उनके कानों को इतनी सुरीली लगती थी कि तुम्हारे बगीचे में तुम्हारे गवैयों तथा तुम्हारी पसंद की बीवियों के स्वर भी तुम्हें उतने अच्छे न लगते होंग । मेरे गले के घंटों का शब्द उन्हें सब बाजों से प्यारा लगता था । फोंग के जंगल में मुझे चरते देखकर वे उतने ही प्रसन्न होते थे जितने तुम अपने बगीचों में भंग पीकर, पेट भरकर और ताश खेलकर । भंग की निंदा सुनकर मैं चौंक पड़ा । मैंने ऊँट से कहा, ' 'बस, बलबलाना बंद यह बावला शहर नहीं, जो तुम्हें परमेश्वर समझे । तुम पुराने हो तो करो । यह बावला शहर नहीं, जो तुम्हें परमेश्वर समझे । तुम पुराने हो तो क्या, तुम्हारी कोई कल सीधी नहीं है । जो पेड़ों की छाल और पत्तों से शरीर ढाँपते थे, उनके बनाए कपड़ों से सारा संसार बाबू बना फिरता है । जिनके पिता स्टेशन से सिर गठरी आप ढोकर लाते थे, उनके सिर पर पगड़ी सँभालना भारी है । जिनके पिता का कोई पूरा नाम न लेकर पुकारता था, वही बड़ी-बड़ी उपाधि धारे हुए हैं । संसार का जब यही रंग है, तो ऊँट पर चढ़नेवाले सदा ऊँट पर ही चढ़े, यह कुछ बात नहीं ।' '