हिंदी पत्रकारिता/प्रिंट वर्शन

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हिंदी पत्रकारिता

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हिंदी पत्रकारिता के विविध चरण और प्रवृत्तिमूलक अध्ययन


हिन्दी पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता की कहानी है। हिन्दी पत्रकारिता के आदि उन्नायक जातीय चेतना, युगबोध और अपने महत् दायित्व के प्रति पूर्ण सचेत थे। कदाचित् इसलिए विदेशी सरकार की दमन-नीति का उन्हें शिकार होना पड़ा था, उसके नृशंस व्यवहार की यातना झेलनी पड़ी थी। उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य-निर्माण की चेष्टा और हिन्दी-प्रचार आन्दोलन अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भयंकर कठिनाइयों का सामना करते हुए भी कितना तेज और पुष्ट था इसका साक्ष्य ‘भारतमित्र’ (सन् 1878 ई, में) ‘सार सुधानिधि’ (सन् 1879 ई.) और ‘उचित वक्ता’ (सन् 1880 ई.) के जीर्ण पृष्ठों पर मुखर है।

वर्तमान में हिन्दी पत्रकारिता ने अंग्रेजी पत्रकारिता के दबदबे को खत्म कर दिया है। पहले देश-विदेश में अंग्रेजी पत्रकारिता का दबदबा था लेकिन आज हिन्दी भाषा का झण्डा चहुंदिश लहरा रहा है। ३० मई को 'हिन्दी पत्रकारिता दिवस' के रूप में मनाया जाता है।


भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता का आरम्भ और हिन्दी पत्रकारिता[सम्पादन]

भारतवर्ष में आधुनिक ढंग की पत्रकारिता का जन्म अठारहवीं शताब्दी के चतुर्थ चरण में कलकत्ता, बंबई और मद्रास में हुआ। 1780 ई. में प्रकाशित हिके (Hickey) का "कलकत्ता गज़ट" कदाचित् इस ओर पहला प्रयत्न था। हिंदी के पहले पत्र उदंत मार्तण्ड (1826) के प्रकाशित होने तक इन नगरों की ऐंग्लोइंडियन अंग्रेजी पत्रकारिता काफी विकसित हो गई थी।

इन अंतिम वर्षों में फारसी भाषा में भी पत्रकारिता का जन्म हो चुका था। 18वीं शताब्दी के फारसी पत्र कदाचित् हस्तलिखित पत्र थें। 1801 में 'हिंदुस्थान इंटेलिजेंस ओरिऐंटल ऐंथॉलॉजी' (Hindusthan Intelligence Oriental Anthology) नाम का जो संकलन प्रकाशित हुआ उसमें उत्तर भारत के कितने ही "अखबारों" के उद्धरण थे। 1810 में मौलवी इकराम अली ने कलकत्ता से लीथो पत्र "हिंदोस्तानी" प्रकाशित करना आरंभ किया। 1816 में गंगाकिशोर भट्टाचार्य ने "बंगाल गजट" का प्रवर्तन किया। यह पहला बंगला पत्र था। बाद में श्रीरामपुर के पादरियों ने प्रसिद्ध प्रचारपत्र "समाचार दर्पण" को (27 मई 1818) जन्म दिया। इन प्रारंभिक पत्रों के बाद 1823 में हमें बँगला भाषा के 'समाचारचंद्रिका' और "संवाद कौमुदी", फारसी उर्दू के "जामे जहाँनुमा" और "शमसुल अखबार" तथा गुजराती के "मुंबई समाचार" के दर्शन होते हैं।

यह स्पष्ट है कि हिंदी पत्रकारिता बहुत बाद की चीज नहीं है। दिल्ली का "उर्दू अखबार" (1833) और मराठी का "दिग्दर्शन" (1837) हिंदी के पहले पत्र "उदंत मार्तंड" (1826) के बाद ही आए। "उदंत मार्तंड" के संपादक पंडित जुगलकिशोर थे। यह साप्ताहिक पत्र था। पत्र की भाषा पछाँही हिंदी रहती थी, जिसे पत्र के संपादकों ने "मध्यदेशीय भाषा" कहा है। यह पत्र 1827 में बंद हो गया। उन दिनों सरकारी सहायता के बिना किसी भी पत्र का चलना असंभव था। कंपनी सरकार ने मिशनरियों के पत्र को डाक आदि की सुविधा दे रखी थी, परंतु चेष्टा करने पर भी "उदंत मार्तंड" को यह सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी।

हिंदी पत्रकारिता का पहला चरण[सम्पादन]

1826 ई. से 1873 ई. तक को हम हिंदी पत्रकारिता का पहला चरण कह सकते हैं। 1873 ई. में भारतेन्दु ने "हरिश्चंद्र मैगजीन" की स्थापना की। एक वर्ष बाद यह पत्र "हरिश्चंद्र चंद्रिका" नाम से प्रसिद्ध हुआ। वैसे भारतेन्दु का "कविवचन सुधा" पत्र 1867 में ही सामने आ गया था और उसने पत्रकारिता के विकास में महत्वपूर्ण भाग लिया था; परंतु नई भाषाशैली का प्रवर्तन 1873 में "हरिश्चंद्र मैगजीन" से ही हुआ। इस बीच के अधिकांश पत्र प्रयोग मात्र कहे जा सकते हैं और उनके पीछे पत्रकला का ज्ञान अथवा नए विचारों के प्रचार की भावना नहीं है। "उदन्त मार्तण्ड" के बाद प्रमुख पत्र हैं :

बंगदूत (1829), प्रजामित्र (1834), बनारस अखबार (1845), मार्तंड पंचभाषीय (1846), ज्ञानदीप (1846), मालवा अखबार (1849), जगद्दीप भास्कर (1849), सुधाकर (1850), साम्यदन्त मार्तंड (1850), मजहरुलसरूर (1850), बुद्धिप्रकाश (1852), ग्वालियर गजेट (1853), समाचार सुधावर्षण (1854), दैनिक कलकत्ता, प्रजाहितैषी (1855), सर्वहितकारक (1855), सूरजप्रकाश (1861), जगलाभचिंतक (1861), सर्वोपकारक (1861), प्रजाहित (1861), लोकमित्र (1835), भारतखंडामृत (1864), तत्वबोधिनी पत्रिका (1865), ज्ञानप्रदायिनी पत्रिका (1866), सोमप्रकाश (1866), सत्यदीपक (1866), वृत्तांतविलास (1867), ज्ञानदीपक (1867), कविवचनसुधा (1867), धर्मप्रकाश (1867), विद्याविलास (1867), वृत्तांतदर्पण (1867), विद्यादर्श (1869), ब्रह्मज्ञानप्रकाश (1869), अलमोड़ा अखबार (1870), आगरा अखबार (1870), बुद्धिविलास (1870), हिंदू प्रकाश (1871), प्रयागदूत (1871), बुंदेलखंड अखबर (1871), प्रेमपत्र (1872) और बोधा समाचार (1872)।

इन पत्रों में से कुछ मासिक थे, कुछ साप्ताहिक। दैनिक पत्र केवल एक था "समाचार सुधावर्षण" जो द्विभाषीय (बंगला हिंदी) था और कलकत्ता से प्रकाशित होता था। यह दैनिक पत्र 1871 तक चलता रहा। अधिकांश पत्र आगरा से प्रकाशित होते थे जो उन दिनों एक बड़ा शिक्षाकेंद्र था और विद्यार्थीसमाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। शेष ब्रह्मसमाज, सनातन धर्म और मिशनरियों के प्रचार कार्य से संबंधित थे। बहुत से पत्र द्विभाषीय (हिंदी उर्दू) थे और कुछ तो पंचभाषीय तक थे। इससे भी पत्रकारिता की अपरिपक्व दशा ही सूचित होती है। हिंदीप्रदेश के प्रारंभिक पत्रों में "बनारस अखबार" (1845) काफी प्रभावशाली था और उसी की भाषानीति के विरोध में 1850 में तारामोहन मैत्र ने काशी से साप्ताहिक "सुधाकर" और 1855 में राजा लक्ष्मणसिंह ने आगरा से "प्रजाहितैषी" का प्रकाशन आरंभ किया था। राजा शिवप्रसाद का "बनारस अखबार" उर्दू भाषाशैली को अपनाता था तो ये दोनों पत्र पंडिताऊ तत्समप्रधान शैली की ओर झुकते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि 1867 से पहले भाषाशैली के संबंध में हिंदी पत्रकार किसी निश्चित शैली का अनुसरण नहीं कर सके थे। इस वर्ष 'कवि वचनसुधा' का प्रकाशन हुआ और एक तरह से हम उसे पहला महत्वपूर्ण पत्र कह सकते हैं। पहले यह मासिक था, फिर पाक्षिक हुआ और अंत में साप्ताहिक। भारतेन्दु के बहुविध व्यक्तित्व का प्रकाशन इस पत्र के माध्यम से हुआ, परंतु सच तो यह है कि "हरिश्चंद्र मैगजीन" के प्रकाशन (1873) तक वे भी भाषाशैली और विचारों के क्षेत्र में मार्ग ही खोजते दिखाई देते हैं।

हिंदी पत्रकारिता का दूसरा युग : भारतेन्दु युग[सम्पादन]

हिंदी पत्रकारिता का दूसरा युग 1873 से 1900 तक चलता है। इस युग के एक छोर पर भारतेन्दु का "हरिश्चंद्र मैगजीन" था ओर नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा अनुमोदनप्राप्त "सरस्वती"। इन 27 वर्षों में प्रकाशित पत्रों की संख्या 300-350 से ऊपर है और ये नागपुर तक फैले हुए हैं। अधिकांश पत्र मासिक या साप्ताहिक थे। मासिक पत्रों में निबंध, नवल कथा (उपन्यास), वार्ता आदि के रूप में कुछ अधिक स्थायी संपत्ति रहती थी, परन्तु अधिकांश पत्र 10-15 पृष्ठों से अधिक नहीं जाते थे और उन्हें हम आज के शब्दों में "विचारपत्र" ही कह सकते हैं। साप्ताहिक पत्रों में समाचारों और उनपर टिप्पणियों का भी महत्वपूर्ण स्थान था। वास्तव में दैनिक समाचार के प्रति उस समय विशेष आग्रह नहीं था और कदाचित् इसीलिए उन दिनों साप्ताहिक और मासिक पत्र कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे। उन्होंने जनजागरण में अत्यंत महत्वपूर्ण भाग लिया था।

उन्नीसवीं शताब्दी के इन 25 वर्षों का आदर्श भारतेन्दु की पत्रकारिता थी। "कविवचनसुधा" (1867), "हरिश्चंद्र मैगजीन" (1874), श्री हरिश्चंद्र चंद्रिका" (1874), बालबोधिनी (स्त्रीजन की पत्रिका, 1874) के रूप में भारतेन्दु ने इस दिशा में पथप्रदर्शन किया था। उनकी टीकाटिप्पणियों से अधिकरी तक घबराते थे और "कविवचनसुधा" के "पंच" पर रुष्ट होकर काशी के मजिस्ट्रेट ने भारतेन्दु के पत्रों को शिक्षा विभाग के लिए लेना भी बंद करा दिया था। इसमें संदेह नहीं कि पत्रकारिता के क्षेत्र भी भारतेन्दु पूर्णतया निर्भीक थे और उन्होंने नए नए पत्रों के लिए प्रोत्साहन दिया। "हिंदी प्रदीप", "भारतजीवन" आदि अनेक पत्रों का नामकरण भी उन्होंने ही किया था। उनके युग के सभी पत्रकार उन्हें अग्रणी मानते थे।

भारतेन्दु के बाद[सम्पादन]

भारतेन्दु के बाद इस क्षेत्र में जो पत्रकार आए उनमें प्रमुख थे पंडित रुद्रदत्त शर्मा, (भारतमित्र, 1877), बालकृष्ण भट्ट (हिंदी प्रदीप, 1877), दुर्गाप्रसाद मिश्र (उचित वक्ता, 1878), पंडित सदानंद मिश्र (सारसुधानिधि, 1878), पंडित वंशीधर (सज्जन-कीर्त्ति-सुधाकर, 1878), बदरीनारायण चौधरी "प्रेमधन" (आनंदकादंबिनी, 1881), देवकीनंदन त्रिपाठी (प्रयाग समाचार, 1882), राधाचरण गोस्वामी (भारतेन्दु, 1882), पंडित गौरीदत्त (देवनागरी प्रचारक, 1882), राज रामपाल सिंह (हिंदुस्तान, 1883), प्रतापनारायण मिश्र (ब्राह्मण, 1883), अंबिकादत्त व्यास, (पीयूषप्रवाह, 1884), बाबू रामकृष्ण वर्मा (भारतजीवन, 1884), पं. रामगुलाम अवस्थी (शुभचिंतक, 1888), योगेशचंद्र वसु (हिंदी बंगवासी, 1890), पं. कुंदनलाल (कवि व चित्रकार, 1891) और बाबू देवकीनंदन खत्री एवं बाबू जगन्नाथदास (साहित्य सुधानिधि, 1894)। 1895 ई. में "नागरीप्रचारिणी पत्रिका" का प्रकाशन आरंभ होता है। इस पत्रिका से गंभीर साहित्यसमीक्षा का आरंभ हुआ और इसलिए हम इसे एक निश्चित प्रकाशस्तंभ मान सकते हैं। 1900 ई. में "सरस्वती" और "सुदर्शन" के अवतरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के इस दूसरे युग पर पटाक्षेप हो जाता है।

इन 25 वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता अनेक दिशाओं में विकसित हुई। प्रारंभिक पत्र शिक्षाप्रसार और धर्मप्रचार तक सीमित थे। भारतेन्दु ने सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दिशाएँ भी विकसित कीं। उन्होंने ही "बालाबोधिनी" (1874) नाम से पहला स्त्री-मासिक-पत्र चलाया। कुछ वर्ष बाद महिलाओं को स्वयं इस क्षेत्र में उतरते देखते हैं - "भारतभगिनी" (हरदेवी, 1888), "सुगृहिणी" (हेमंतकुमारी, 1889)। इन वर्षों में धर्म के क्षेत्र में आर्यसमाज और सनातन धर्म के प्रचारक विशेष सक्रिय थे। ब्रह्मसमाज और राधास्वामी मत से संबंधित कुछ पत्र और मिर्जापुर जैसे ईसाई केंद्रों से कुछ ईसाई धर्म संबंधी पत्र भी सामने आते हैं, परंतु युग की धार्मिक प्रतिक्रियाओं को हम आर्यसमाज के और पौराणिकों के पत्रों में ही पाते हैं। आज ये पत्र कदाचित् उतने महत्वपूर्ण नहीं जान पड़ते, परंतु इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने हिन्दी की गद्यशैली को पुष्ट किया और जनता में नए विचारों की ज्योति भी। इन धार्मिक वादविवादों के फलस्वरूप समाज के विभिन्न वर्ग और संप्रदाय सुधार की ओर अग्रसर हुए और बहुत शीघ्र ही सांप्रदायिक पत्रों की बाढ़ आ गई। सैकड़ों की संख्या में विभिन्न जातीय और वर्गीय पत्र प्रकाशित हुए और उन्होंने असंख्य जनों को वाणी दी।

आज वही पत्र हमारी इतिहासचेतना में विशेष महत्वपूर्ण हैं जिन्होंने भाषा शैली, साहित्य अथवा राजनीति के क्षेत्र में कोई अप्रतिम कार्य किया हो। साहित्यिक दृष्टि से "हिंदी प्रदीप" (1877), ब्राह्मण (1883), क्षत्रियपत्रिका (1880), आनंदकादंबिनी (1881), भारतेन्दु (1882), देवनागरी प्रचारक (1882), वैष्णव पत्रिका (पश्चात् पीयूषप्रवाह, 1883), कवि के चित्रकार (1891), नागरी नीरद (1883), साहित्य सुधानिधि (1894) और राजनीतिक दृष्टि से भारतमित्र (1877), उचित वक्ता (1878), सार सुधानिधि (1878), भारतोदय (दैनिक, 1883), भारत जीवन (1884), भारतोदय (दैनिक, 1885), शुभचिंतक (1887) और हिंदी बंगवासी (1890) विशेष महत्वपूर्ण हैं। इन पत्रों में हमारे 19वीं शताब्दी के साहित्यरसिकों, हिंदी के कर्मठ उपासकों, शैलीकारों और चिंतकों की सर्वश्रेष्ठ निधि सुरक्षित है। यह क्षोभ का विषय है कि हम इस महत्वपूर्ण सामग्री का पत्रों की फाइलों से उद्धार नहीं कर सके। बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, सदानं मिश्र, रुद्रदत्त शर्मा, अंबिकादत्त व्यास और बालमुकुंद गुप्त जैसे सजीव लेखकों की कलम से निकले हुए न जाने कितने निबंध, टिप्पणी, लेख, पंच, हास परिहास औप स्केच आज में हमें अलभ्य हो रहे हैं। आज भी हमारे पत्रकार उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। अपने समय में तो वे अग्रणी थे ही।


तीसरा चरण : बीसवीं शताब्दी के प्रथम बीस वर्ष[सम्पादन]

बीसवीं शताब्दी की पत्रकारिता हमारे लिए अपेक्षाकृत निकट है और उसमें बहुत कुछ पिछले युग की पत्रकारिता की ही विविधता और बहुरूपता मिलती है। 19वीं शती के पत्रकारों को भाषा-शैलीक्षेत्र में अव्यवस्था का सामना करना पड़ा था। उन्हें एक ओर अंग्रेजी और दूसरी ओर उर्दू के पत्रों के सामने अपनी वस्तु रखनी थी। अभी हिंदी में रुचि रखनेवाली जनता बहुत छोटी थी। धीरे-धीरे परिस्थिति बदली और हम हिंदी पत्रों को साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में नेतृत्व करते पाते हैं। इस शताब्दी से धर्म और समाजसुधार के आंदोलन कुछ पीछे पड़ गए और जातीय चेतना ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना का रूप ग्रहण कर लिया। फलत: अधिकांश पत्र, साहित्य और राजनीति को ही लेकर चले। साहित्यिक पत्रों के क्षेत्र में पहले दो दशकों में आचार्य द्विवेदी द्वारा संपादित "सरस्वती" (1903-1918) का नेतृत्व रहा। वस्तुत: इन बीस वर्षों में हिंदी के मासिक पत्र एक महान साहित्यिक शक्ति के रूप में सामने आए। शृंखलित उपन्यास कहानी के रूप में कई पत्र प्रकाशित हुए - जैसे उपन्यास 1901, हिंदी नाविल 1901, उपन्यास लहरी 1902, उपन्याससागर 1903, उपन्यास कुसुमांजलि 1904, उपन्यासबहार 1907, उपन्यास प्रचार 19012। केवल कविता अथवा समस्यापूर्ति लेकर अनेक पत्र उन्नीसवीं शतब्दी के अंतिम वर्षों में निकलने लगे थे। वे चले रहे। समालोचना के क्षेत्र में "समालोचक" (1902) और ऐतिहासिक शोध से संबंधित "इतिहास" (1905) का प्रकाशन भी महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं। परंतु सरस्वती ने "मिस्लेनी" () के रूप में जो आदर्श रखा था, वह अधिक लोकप्रिय रहा और इस श्रेणी के पत्रों में उसके साथ कुछ थोड़े ही पत्रों का नाम लिया जा सकता है, जैसे "भारतेन्दु" (1905), नागरी हितैषिणी पत्रिका, बाँकीपुर (1905), नागरीप्रचारक (1906), मिथिलामिहिर (1910) और इंदु (1909)। "सरस्वती" और "इंदु" दोनों हिन्दी की साहित्यचेतना के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हैं और एक तरह से हम उन्हें उस युग की साहित्यिक पत्रकारिता का शीर्षमणि कह सकते हैं। "सरस्वती" के माध्यम से आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और "इंदु" के माध्यम से पंडित रूपनारायण पांडेय ने जिस संपादकीय सतर्कता, अध्यवसाय और ईमानदारी का आदर्श हमारे सामने रखा वह हिन्दी पत्रकारिता को एक नई दिशा देने में समर्थ हुआ।

परंतु राजनीतिक क्षेत्र में हिन्दी पत्रकारिता को नेतृत्व प्राप्त नहीं हो सका। पिछले युग की राजनीतिक पत्रकारिता का केंद्र कलकत्ता था। परंतु कलकत्ता हिंदी प्रदेश से दूर पड़ता था और स्वयं हिंदी प्रदेश को राजनीतिक दिशा में जागरूक नेतृत्व कुछ देर में मिला। हिंदी प्रदेश का पहला दैनिक राजा रामपालसिंह का द्विभाषीय "हिंदुस्तान" (1883) है जो अंग्रेजी और हिंदी में कालाकाँकर से प्रकाशित होता था। दो वर्ष बाद (1885 में), बाबू सीताराम ने "भारतोदय" नाम से एक दैनिक पत्र कानपुर से निकालना शुरू किया। परंतु ये दोनों पत्र दीर्घजीवी नहीं हो सके और साप्ताहिक पत्रों को ही राजनीतिक विचारधारा का वाहन बनना पड़ा। वास्तव में उन्नीसवीं शतब्दी में कलकत्ता के भारत मित्र, वंगवासी, सारसुधानिधि और उचित वक्ता ही हिंदी प्रदेश की रानीतिक भावना का प्रतिनिधित्व करते थे। इनमें कदाचित् "भारतमित्र" ही सबसे अधिक स्थायी और शक्तिशाली था। उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल और महाराष्ट्र लोक जाग्रति के केंद्र थे और उग्र राष्ट्रीय पत्रकारिता में भी ये ही प्रांत अग्रणी थे। हिंदी प्रदेश के पत्रकारों ने इन प्रांतों के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया और बहुत दिनों तक उनका स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व विकसित नहीं हो सका। फिर भी हम "अभ्युदय" (1905), "प्रताप" (1913), "कर्मयोगी", "हिंदी केसरी" (1904-1908) आदि के रूप में हिंदी राजनीतिक पत्रकारिता को कई डग आगे बढ़ाते पाते हैं। प्रथम महायुद्ध की उत्तेजना ने एक बार फिर कई दैनिक पत्रों को जन्म दिया। कलकत्ता से "कलकत्ता समाचार", "स्वतंत्र" और "विश्वमित्र" प्रकाशित हुए, बंबई से "वेंकटेश्वर समाचार" ने अपना दैनिक संस्करण प्रकाशित करना आरंभ किया और दिल्ली से "विजय" निकला। 1921 में काशी से "आज" और कानपुर से "वर्तमान" प्रकाशित हुए। इस प्रकार हम देखते हैं कि 1921 में हिंदी पत्रकारिता फिर एक बार करवटें लेती है और राजनीतिक क्षेत्र में अपना नया जीवन आरंभ करती है। हमारे साहित्यिक पत्रों के क्षेत्र में भी नई प्रवृत्तियों का आरंभ इसी समय से होता है। फलत: बीसवीं शती के पहले बीस वर्षों को हम हिंदी पत्रकारिता का तीसरा चरण कह सकते हैं।

आधुनिक युग[सम्पादन]

1921 के बाद हिंदी पत्रकारिता का समसामयिक युग आरंभ होता है। इस युग में हम राष्ट्रीय और साहित्यिक चेतना को साथ साथ पल्लवित पाते हैं। इसी समय के लगभग हिंदी का प्रवेश विश्वविद्यालयों में हुआ और कुछ ऐसे कृती संपादक सामने आए जो अंग्रेजी की पत्रकारिता से पूर्णत: परिचित थे और जो हिंदी पत्रों को अंग्रेजी, मराठी और बँगला के पत्रों के समकक्ष लाना चाहते थे। फलत: साहित्यिक पत्रकारिता में एक नए युग का आरंभ हुआ। राष्ट्रीय आंदोलनों ने हिंदी की राष्ट्रभाषा के लिए योग्यता पहली बार घोषित की ओर जैसे-जैसे राष्ट्रीय आंदोलनों का बल बढ़ने लगा, हिंदी के पत्रकार और पत्र अधिक महत्व पाने लगे। 1921 के बाद गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन मध्यवर्ग तक सीमित न रहकर ग्रामीणों और श्रमिकों तक पहुंच गया और उसके इस प्रसार में हिंदी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण योग दिया। सच तो यह है कि हिंदी पत्रकार राष्ट्रीय आंदोलनों की अग्र पंक्ति में थे और उन्होंने विदेशी सत्ता से डटकर मोर्चा लिया। विदेशी सरकार ने अनेक बार नए नए कानून बनाकर समाचारपत्रों की स्वतंत्रता पर कुठाराघात किया परंतु जेल, जुर्माना और अनेकानेक मानसिक और आर्थिक कठिनाइयाँ झेलते हुए भी हिन्दी पत्रकारों ने स्वतंत्र विचार की दीपशिखा जलाए रखी।

1921 के बाद साहित्यक्षेत्र में जो पत्र आए उनमें प्रमुख हैं-

स्वार्थ (1922), माधुरी (1923), मर्यादा, चाँद (1923), मनोरमा (1924), समालोचक (1924), चित्रपट (1925), कल्याण (1926), सुधा (1927), विशालभारत (1928), त्यागभूमि (1928), हंस (1930), गंगा (1930), विश्वमित्र (1933), रूपाभ (1938), साहित्य संदेश (1938), कमला (1939), मधुकर (1940), जीवनसाहित्य (1940), विश्वभारती (1942), संगम (1942), कुमार (1944), नया साहित्य (1945), पारिजात (1945), हिमालय (1946) आदि।

वास्तव में आज हमारे मासिक साहित्य की प्रौढ़ता और विविधता में किसी प्रकार का संदेह नहीं हो सकता। हिंदी की अनेकानेक प्रथम श्रेणी की रचनाएँ मासिकों द्वारा ही पहले प्रकाश में आई और अनेक श्रेष्ठ कवि और साहित्यकार पत्रकारिता से भी संबंधित रहे। आज हमारे मासिक पत्र जीवन और साहित्य के सभी अंगों की पूर्ति करते हैं और अब विशेषज्ञता की ओर भी ध्यान जाने लगा है। साहित्य की प्रवृत्तियों की जैसी विकासमान झलक पत्रों में मिलती है, वैसी पुस्तकों में नहीं मिलती। वहाँ हमें साहित्य का सक्रिय, सप्राण, गतिशील रूप प्राप्त होता है।

राजनीतिक क्षेत्र में इस युग में जिन पत्रपत्रिकाओं की धूम रही वे हैं -

कर्मवीर (1924), सैनिक (1924), स्वदेश (1921), श्रीकृष्णसंदेश (1925), हिंदूपंच (1926), स्वतंत्र भारत (1928), जागरण (1929), हिंदी मिलाप (1929), सचित्र दरबार (1930), स्वराज्य (1931), नवयुग (1932), हरिजन सेवक (1932), विश्वबंधु (1933), नवशक्ति (1934), योगी (1934), हिंदू (1936), देशदूत (1938), राष्ट्रीयता (1938), संघर्ष (1938), चिनगारी (1938), नवज्योति (1938), संगम (1940), जनयुग (1942), रामराज्य (1942), संसार (1943), लोकवाणी (1942), सावधान (1942), हुंकार (1942) और सन्मार्ग (1943), जनवार्ता (१९७२)।

इनमें से अधिकांश साप्ताहिक हैं, परंतु जनमन के निर्माण में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है। जहाँ तक पत्र कला का संबंध है वहाँ तक हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि तीसरे और चौथे युग के पत्रों में धरती और आकाश का अंतर है। आज पत्रसंपादन वास्तव में उच्च कोटि की कला है। राजनीतिक पत्रकारिता के क्षेत्र में "आज" (1921) और उसके संपादक स्वर्गीय बाबूराव विष्णु पराड़कर का लगभग वही स्थान है जो साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को प्राप्त है। सच तो यह है कि "आज" ने पत्रकला के क्षेत्र में एक महान संस्था का काम किया है और उसने हिंदी को बीसियों पत्रसंपादक और पत्रकार दिए हैं।

आधुनिक साहित्य के अनेक अंगों की भाँति हिन्दी पत्रकारिता भी नई कोटि की है और उसमें भी मुख्यत: हमारे मध्यवित्त वर्ग की सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक औ राजनीतिक हलचलों का प्रतिबिंब भास्वर है। वास्तव में पिछले २०० वर्षों का सच्चा इतिहास हमारी पत्रपत्रिकाओं से ही संकलित हो सकता है। बँगला के "कलेर कथा" ग्रंथ में पत्रों के अवतरणों के आधार पर बंगाल के उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यवित्तीय जीवन के आकलन का प्रयत्न हुआ है। हिंदी में भी ऐसा प्रयत्न वांछनीय है। एक तरह से उन्नीसवीं शती में साहित्य कही जा सकनेवाली चीज बहुत कम है और जो है भी, वह पत्रों के पृष्ठों में ही पहले-पहल सामने आई है। भाषाशैली के निर्माण और जातीय शैली के विकास में पत्रों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, परंतु बीसवीं शती के पहले दो दशकों के अंत तक मासिक पत्र और साप्ताहिक पत्र ही हमारी साहित्यिक प्रवृत्तियों को जन्म देते और विकसित करते रहे हैं। द्विवेदी युग के साहित्य को हम "सरस्वती" और "इंदु" में जिस प्रयोगात्मक रूप में देखते हैं, वही उस साहित्य का असली रूप है। 1921 ई. के बाद साहित्य बहुत कुछ पत्रपत्रिकाओं से स्वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा होने लगा, परंतु फिर भी विशिष्ट साहित्यिक आंदोलनों के लिए हमें मासिक पत्रों के पृष्ठ ही उलटने पड़ते हैं। राजनीतिक चेतना के लिए तो पत्रपत्रिकाएँ हैं ही। वस्तुत: पत्रपत्रिकाएँ जितनी बड़ी जनसंख्या को छूती हैं, विशुद्ध साहित्य का उतनी बड़ी जनसंख्या तक पहुँचना असंभव है।

स्रोत[सम्पादन]



लघु पत्रिका आंदोलन


लधु-पत्रिका आन्दोलन[सम्पादन]

भारत पर सन् 1962 में चीन के हमले और 1964 में नेहरू के निधनोपरान्त एक ओर जहाँ हरेक क्षेत्र में स्वान्त्र्योत्तर मोहभंग हो रहा था।वहीं दूसरी ओर नेहरूवादी एकछत्र सत्ता के बुर्जुआ लोकतंत्र में अन्तर्विरोध और दरारे उभरने लगी थी तथा समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपोक्षिता विरोधी तमाम तरह की दक्षिणपंथी और मध्यममार्गी अवसरवादी ताकतें, मुख्य रूप से साम्प्रदायिक और हिन्दुत्ववादी दक्षिणपंथी शक्तियाँ गोलबन्द होकर शक्तिशाली हो रही थी। उन्हें अमेरिका के नेतृत्व में पश्चमी साम्राज्यवादी ताकतों, उनकी बहुराष्ट्रीय पूँजी तथा देशी इजारेदार पूँजीपति घरानों और उनकी पत्र-पत्रिकाओं का भरपूर समर्थन था। इसका असर तमाम सांस्कृतिक क्षेत्रों और साहित्यिक पत्रकारिता पर भी प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था। सरकारी, अर्द्ध-सरकारी और प्रतिष्ठानी पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही 'धर्मयुग', ‘सारिका’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘ज्ञानोदय’ जैसी सेठाश्रयी पत्रिकाओं ने गतिशील सोच के लेखकों, विशेष रूप से नए लेखकों के लिए प्रकाशन के अपने सभी दरवाज़े बद कर दिए । इसी के विरोध में हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओ में 1964-65 ई. से जबर्दस्त लघु- पत्रिका आदोलन चला । लेखकों के समूह छोटे-छोटे आयोजन कर अनेक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया तथा नवोदित लेखकों को भी उसमें स्थान दिया जाने लगा । कई पत्र निकलने लगे । आकण्ठ, सुमनलिपि, यू.एस.एम. पत्रिका का लघुकथा विशेषांक, नाट्य विद्या विशेषांक, लोकनाट्यरंग विशेषांक, कविता विशेषांक आदि ने साहित्य को समृद्ध किया । वस्तुतः इस दौर में खास बात यह हुई कि 1967 ई. में नक्सलवादी आन्दोलन के सांस्कृतिक क्षेत्रों खासकर साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में उसका जबर्दस्त असर देखा गया । लघु-पत्रिकाओं का खासा बड़ा हिस्सा तथा नवजवान लेखकों-संस्कृतकर्मियों का बहुमत इस ओर आकर्षित होने लगा ।

फलस्वरूप 1969-70 से लधु-पत्रिका आन्दोलन ने जोर पकड़ा। इसके बाद 1995 तक या यों कहें कि 2000 तक साहित्यिक पत्रकारिता में मार्क्सवादी विचारधारा तथा व्यापक तथा प्रगतिशील और वामपंथी दृष्टिकोण से प्रतिबद्ध लेखकों, सम्पादकों तथा पत्र-पत्रिकाओं का वर्चस्व कायम रहा। वहीं ‘आलोचना’(नामवर सिंह एवं नन्दकिशोर नवल) के आलावा ‘पहल’ (ज्ञानरंजन), ‘लहर’ (प्रकाश जैन और मनमोहिनी), ‘कथा’ (मार्कण्डेय), ‘कलम’ (चन्द्रबली सिंह), ‘धरातल’, ‘कसौटी’(नन्दकिशोर नवल) और ‘समारम्भ’ (भैरवप्रसाद गुप्त) - जैसी श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने दौर की साहित्यिक पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करती है।



पीत पत्रकारिता

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पीत पत्रकारिता[सम्पादन]

आज के दौर में पत्रकारिता का स्वरूप बदल गया है। पत्रकारिता के मूल सिद्धान्तो को ताक पर रखकर की जाने वाली पत्रकारिता ही पीत पत्रकारिता है। ज्यादतर समाचार संगठन आगे निकलने की होड़ में पत्रकारिता धीरे-धीरे अपना दायरा बढ़ता जा रहा है। बाजारवादी ताकतों ने पत्रकारिता को व्यवसाय की जगह व्यापार का स्वरूप प्रदान कर दिया। इसे ध्यान में रखते हुए कई बड़े राजनीतिक और व्यावसायिक घरानों का पत्रकारिता के क्षेत्र में आगमन हुआ, जिनका मुख्य उद्देश्य जनसेवा न होकर समाज और सत्ता पर नियंत्रण बनाये रखना है। उन्हें यह भली भाँति मालूम है कि पत्रकारिता एक ऐसा जरिया है, जिससे जनसमूह में पैठ बनाई जा सकती है।बदलते हुए परिदृश्य में जनसमूह को आर्कषित करने के लिए समाचारों को सनसनीखेज बनाना, तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना तथा चटपटी कहानियाँ प्रकाशित एवं प्रसारित करना सम्पादकीय नीति का बना दिया गया है। इसके दायरे में निम्न गतिविधियाँ आती है –

  1. किसी समाजार या विचार का पआकाशन प्रसारण पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर करना।
  2. किसी समाचार या विचार के वढ़ा-चढ़ाकर पेश करना।
  3. किसी समाचार या विचार का प्रस्तुतीकरण सनसनीखेज तरीके से करना।
  4. फीचर के रूप में चटपटी, मसालेदार और मनगढ़ंत कहानियों को पेश करना।
  5. मानसिक और शारीरिक उत्तेजना को बढ़ावा देने वाले चित्रों और कार्टूनों का प्रकाशन करना।
  6. समाज को अहम मुद्दों को दरकिनार कर अपराध और सिनेमा से जुडी गतिविधियों का प्रस्तुतीकरण।
  7. राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व वाले समूह से प्रभावित होकर पत्रकारिता करना।

पत्रकारिता की साख बनाए रखना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है,क्योंकि इसमें निम्न सिद्धान्तों का पालन करना अत्यन्त जरूरी होता है -

  1. यथार्थता
  2. वस्तुपरकता
  3. निष्पक्षता
  4. संतुलन
  5. स्त्रोत



जनतांत्रिक व्यवस्था में चौथे खंभे के रूप में पत्रकारिता का दायित्व

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जनतांत्रिक व्यवस्था में चौथे खंभे के रूप में पत्रकारिता[सम्पादन]

प्रजातंत्र में पत्रकारिता का विशेष महत्व होता है। समय और समाज के संदर्भ में सजग रहकर नागरिकों में दायित्व बोध कराने की कला को पत्रकारिता करते हैं। आज पत्रकारिता जनसेवा का सशक्त माध्यम है। पत्रकारिता हमें हमारे समाज, देश की समस्याओं तथा विचारों से रूबरू नहीं कराती बल्कि संपूर्ण विश्व भर की घटनाओं को हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। आज पत्रकारिता एक ऐसी शक्ति बन गई है, जो समाज की कमियों, गलतियों तथा कुरीतियों को उजागर करके उन्हें दूर करने का प्रयास करती है।

प्रजातांत्रिक व्यवस्था के तीन स्तंभ व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका है। इनमें से कौन पहला तथा कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है? यह चर्चा का विषय है। परंतु निर्विवादित रूप से चौथा स्तम्भ पत्रकारिता ही हैं। पत्रकारिता का जन्म और शासक और शासित के मध्य एक समझदारी, समन्वय तथा तारतम्यता बनाए रखने के उद्देश्य से हुआ। चूंकि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सामान्य लोग अपने मतदान के अधिकार का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रयोग कर अपने शासकों का चुनाव करते हैं।यह आवश्यक हो जाता है कि शासक यह समझे कि शासित क्या चाहता है और शासित भी जाने कि उनके शासक उनके और देश के लिए कैसे काम कर रहे हैं! अतः पत्रकारिता ही वह माध्यम है जो जनता की भावनाओं के भावनाओं के अनुकूल नीति निर्धारण करने का दबाव बनाता है। इसी प्रकार शासक देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, शिक्षा, विदेश नीति को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। इसकी संपूर्ण जानकारी पत्रकारिता के माध्यम से जनमानस को हो पाती है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारिता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना और उनकी रक्षा करना है। एक ओर पत्रकारिता शासकों के निजी एवं सार्वजनिक आचरण पर नियंत्रण रखता है और उन्हें साफ-सुथरी शासन की प्रक्रिया को स्थापित करने के लिए बाध्य करता है। लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानमंडलों में होने वाली नीतिगत गंभीर बहस तथा अन्य अनेक ज्वलंत मुद्दों पर होने वाली चर्चा से पत्रकारिता लोगों को परिचित कराता है और लोगों को उनके जनतांत्रिक अधिकारों और कर्तव्यों से भी अवगत कराता है। वही पत्रकारिता अपने कर्तव्य द्वारा कार्यपालिका को निरंकुश तथा भ्रष्ट होने से रोकता है, और अन्य जरूरी सूचनाओं को जन-जन तक‌ पहुंचाता है। न्यायपालिका के महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक फैसलों की जानकारी भी सरल एवं स्पष्ट रूप में उपलब्ध कराता है। इन सब कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए पत्रकारिता का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष होना अत्यंत आवश्यक है नहीं तो वह खुलकर सरकार की आलोचना नहीं कर पाएगी तथा हाशिए पर खड़े विषयों, लोगों को केंद्र में नहीं ला पाएगी।

जनमत निर्माण की दिशा में भी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी नीति को देश या विदेश के नागरिकों पर बलपूर्वक थोपा नहीं जा सकता है। किसी भी नीति को लागू करने के लिए जनमत की आवश्यकता होती है या काम वृहद स्तर पर पत्रकारिता (प्रेस) करता है।



समाचार मूल्य

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समाचार-मूल्य[सम्पादन]

समाचार-मूल्य से तात्पर्य है - समाचार की गरिमा, महत्व एवं मान्यताएँ। समाचार के तत्व और विशेषताओं के मूल्य को पहचानना समान्यतः समाचार बोध (News Sense) कहलाता है।समाचार को बड़ा या छोटा यानी कम या अधिक महत्व का बनाने के लिए निम्न तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इन्हें समाचार का मूल्य कहा जाता है।

1. व्यापकता: समाचार का विषय जितनी व्यापकता लिये होगा, उतने ही अधिक लोग उस समाचार में रुचि लेंगे। जैसे- देशहित से जुड़ा कोई भी विषय।

2. नवीनता: जिन बातों को मनुष्य पहले से जानता है वे बातें समाचार नही बनती। ऐसी बातें समाचार बनती है जिनमें कोई नई सूचना, कोई नई जानकारी हो। इस प्रकार समाचार का बड़ा गुण है-नई सूचना, यानी समाचार में नवीनता होनी चाहिये। कोई समाचार कितना नया या तत्काल प्राप्त हुआ हो, उसे जानने की उतनी ही अधिक चाहत होती है। कोई भी पुरानी या पहले से पता जानकारी को दुबारा नहीं लेना चाहता। समाचार पत्रों के मामले में एक दिन पुराने समाचार को ‘रद्दी’ कहा जाता है, और उसका कोई मोल नहीं होता। वहीं टीवी के मामले में एक सेकेंड पहले प्राप्त समाचार अगले सेकेंड में ही बासी हो जाता है। कहा जाने लगा है- News this second and History on next second.

3. असाधारणता: हर समाचार एक नई सूचना होता है, परंतु यह भी सच है कि हर नई सूचना समाचार नही होती। जिस नई सूचना में कुछ असाधारणता होगी वही समाचार कहलायेगी। अर्थात नई सूचना में कुछ ऐसी असाधारणता होनी चाहिये जो उसमें समाचार बनने की अंतरनिहित शक्ति पैदा होती है। काटना कुत्ते का स्वभाव है। यह सभी जानते हैं। मगर किसी मनुष्य द्वारा कुत्ते को काटा जाना समाचार है। क्योंकि कुत्ते को काटना मनुष्य का स्वभाव नही है। जिस नई सूचना में असाधारणता नहीं होती वह समाचार नहीं लोकाचार कहलाता है।

4. सत्यता और प्रमाणिकता: समाचार में किसी घटना की सत्यता या तथ्यात्मकता होनी चाहिये। समाचार अफवाहों या उड़ी-उड़ायी बातों पर आधारित नही होते हैं। वे सत्य घटनाओं की तथ्यात्मक जानकारी होते हैं। सत्यता या तथ्यता होने से ही कोई समाचार विश्वसनीय और प्रमाणिक होते हैं।

5. रुचिपूर्णता: किसी नई सूचना में सत्यता होने से ही वह समाचार नहीं बन जाती है। उसमें अधिक लोगों की दिलचस्पी भी होनी चाहिये। कोई सूचना कितनी ही आसाधारण क्यों न हो अगर उसमें लोगों की रुचि न हो, तो वह सूचना समाचार नहीं बन पायेगी। कुत्ते द्वारा किसी सामान्य व्यक्ति को काटे जाने की सूचना समाचार नहीं बन पायेगी। कुत्ते द्वारा काटे गये व्यक्ति को होने वाले गंभीर बीमारी की सूचना समाचार बन जायेगी क्योंकि उस महत्वपूर्ण व्यक्ति में अधिकाधिक लोगों की दिलचस्पी हो सकती है।

6. प्रभावशीलता: समाचार दिलचस्प ही नही प्रभावशील भी होने चाहिये। हर सूचना व्यक्तियों के किसी न किसी बड़े समूह, बड़े वर्ग से सीधे या अप्रत्यक्ष रुप से जुड़ी होती है। अगर किसी घटना की सूचना समाज के किसी समूह या वर्ग को प्रभावित नही करती तो उस घटना की सूचना का उनके लिये कोई मतलब नही होगा।

7. स्पष्टता: एक अच्छे समाचार की भाषा सरल, सहज और स्पष्ट होनी चाहिये। किसी समाचार में दी गयी सूचना कितनी ही नई, कितनी ही असाधारण, कितनी ही प्रभावशाली क्यों न हो, लेकिन अगर वह सूचना सरल और स्पष्ट भाषा में न हो तो वह सूचना बेकार साबित होगी। क्योंकि ज्यादातर लोग उसे समझ नहीं पायेंगे। इसलिये समाचार की भाषा सीधी और स्पष्ट होनी चाहिये।



समाचार संकलन और विभिन्न स्रोत

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समाचार संकलन[सम्पादन]

कोई भी व्यक्ति स्वाभाविक रूप से पूछ सकता है कि समाचार पत्र के लिए खबरें कहाँ से एकत्र हो जाती है? उसके संवाददाता खबरों को कहांँ से और किस तरह प्राप्त कर लेते हैं? इसका बड़ा सीधा और सटीक ‌उत्तर यह है- यदि समाचार विवेक हो तथा उन्हें संकलित करने की योग्यता या क्षमता तो समाचारों के अनगिनत स्त्रोत है।

इस संबंध में स्मरण योग्य बात है कि रिपोर्टर (संवाददाता/प्रतिनिधि/उप-संपादक) का परिश्रम, उनकी सूझ-बूझ, समाचार सूंघने, खोजने और समाचार का पीछा करने की प्रवृत्ति द्वारा विभिन्न स्त्रोतों तथा माध्यमों से सर्वसामान्य के लिए ज्ञातव्य विभिन्न सूचनाओं, तथ्यों, घटनाओं के विवरणों, भाषणों आदि में व्यक्त विचारों इत्यादि का विधिवत संग्रह (समाचार कथा के रूप में प्रकाशित करना) समाचार संकलन कहलाता है।

कई बार कोई संवाददाता समाचार की खोज में मारा-मारा फिरता है, फिर भी उसे कोई समाचार हाथ नहीं आता। जबकि कई बार अनायास ही राह चलते उसे कोई महत्वपूर्ण समाचार हस्तगत हो जाता है। परंतु यह निर्भर करता है कि आपके आँख, कान और नाक कितने सचेत और अनुभवी हैं।

बड़े समाचार पत्रों, आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए समाचारों का संकलन और आयोजन कोई एक व्यक्ति या संवाददाता नहीं करता। इस काम में पूरा समाचार संकलन अनुभाग या समाचार एकांश (News Unit) जुड़ा रहता है। समाचार संपादक या मुख्य संवाददाता की मेज पर या समाचार एकांश में समाचारों, प्रेस रिलीज, वक्तव्यों, भाषणों आदि अनेक चीजों का ढेर सा लगा रहता है। इस ढेर से छांटकर समाचारों को प्रकाशन के योग्य बनाना। किंतु कई बार उन समाचारों में दी गई सूचनाएं कई बार पर्याप्त नहीं होती/पुष्ट नहीं हुआ करती। ऐसे में समाचार प्रभाग को सर्वाधिक ध्यान समाचार स्त्रोतों देना होता है। इसके पश्चात उसकी‌ विश्वसनीयता और प्रमाणिकता की जांच होती है तदुपरांत फिर यह निर्णय लिया जाता है कि समाचार प्रकाशन या प्रसारण योग्य है अथवा नहीं।

समाचार स्रोत[सम्पादन]

समाचार स्त्रोत वास्तव में भी स्थानीय केंद्र है जहाँ से समाचार प्राप्त होते हैं अथवा हो सकते हैं। विशिष्ट व्यक्ति, संस्था, अदालत, पुलिस स्टेशन, विधानसभा, सम्मेलन, समारोह, सार्वजनिक स्थल जैसे- मण्डी, रेलवे स्टेशन इत्यादि कुछ भी समाचार स्रोत हो सकते हैं।

उपलब्धता के आधार पर समाचार स्रोत निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं-

  1. प्रत्याशित स्त्रोत
  2. पूर्वानुमानित स्त्रोत
  3. अप्रत्याशित स्त्रोत

'प्रत्याशित स्त्रोत'वह है जहाँ से या जिनके माध्यम से समाचार विश्वसनीय ढंग से सहज ही उपलब्ध हो सके। पुलिस स्टेशन, नगरपालिका, अस्पताल, अदालत, विभिन्न समितियों तथा निगमों की बैठकें, संसद तथा विधानसभाओं के अधिवेशन, पत्रकार सम्मेलन, प्रेस विज्ञप्तियांँ इत्यादि समाचारों के प्रत्याशित स्त्रोत हैं।

'पूर्वानुमानित समाचार स्त्रोत' वे हैं, जिनसे पूर्व अनुमान लगाकर संवाददाता संपर्क करता है और तथ्य तथा समाचार प्राप्त करता है। इनमें संभावना के आधार पर अनुमानित समाचार ग्रहण किए जाते हैं। गंदी बस्तियों, शिक्षण संस्थानों, कल-कारखानों, कार्यालयों के कामकाज की शैली इत्यादि के संदर्भ में पहले से ही अनुमान लगा कर समाचारों की खोज में निकला जा सकता है।

'अप्रत्याशित स्रोत' वे है जो किसी संवाददाता या संपादक को अचानक अप्रत्याशित रूप में उपलब्ध हो जाते हैं। कई बार समाचार पत्र कार्यालय में अचानक टेलीफोन आ जाते हैं और उनके माध्यम से अप्रत्याशित समाचार मिल जाते हैं। लेकिन ऐसे समाचारों की विश्वसनीयता तथा प्रामाणिकता को परखने के बाद ही समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाता है। इस प्रकार के समाचार प्रायः कम ही प्रकाशित होते हैं क्योंकि इनका कोई ठोस आधार (स्त्रोत) नहीं होता है।



समाचार लेखन

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समाचार लेखन[सम्पादन]

समाचार लेखन एक विशिष्ट कला है। श्रेष्ठ समाचार वही है, जो सूचनात्मक हो और उसमें तथ्यों को इस प्रकार संकलित किया गया हो कि पाठक घटित घटना का विवरण सही परिप्रेक्ष्य में समझ सके। समाचार लेखन में निम्नलिखित प्रक्रियाएँ पूरी की जाती है -

  1. समग्र तथ्यों को संकलित करना।
  2. कथा (News Story) की काया की योजना वनाना एंव लिखना।
  3. आमुख लिखना।
  4. परिच्छेदों का निर्धारण करना.
  5. वक्ता के कथन को अविकल रूप नें प्रस्तुत करना।
  6. सूत्रों के संकेत को उद्धृत करना।

समाचार लेखन की प्रक्रिया तीन चरणों में पूर्ण होती है – आमुख (Introduction),समाचार की शेष रचना (Body of the Story), शीर्षक (Headline).


आमुख(Intro)[सम्पादन]

अंग्रेजी के Introduction का लघु रूप Intro है। जिसे अमेरिका पत्रकारिता में लीड कहा जाता है। उल्टा पिरामिड शैली में समाचार लेखन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आमुख लेखन या इंट्रो या लीड लेखन है। आमुख समाचार का पहला पैराग्राफ होता है, जहां से कोई समाचार शुरु होता है। आमुख के आधार पर ही समाचार की गुणवत्ता का निर्धारण होता है। एक आदर्श आमुख में किसी समाचार की सबसे महत्वपूर्ण सूचना आ जानी चाहिये और उसे किसी भी हालत में 35 से 50 शब्दों से अधिक नहीं होना चाहिये। समाचार का पहला अनुच्छेद जिसमें संवाद का सार-सर्वस्व निहित हो, आमुख होता है। क्या, कहाँ, कब, किसने, क्यो, और कैसे की तुलना सीधे-सपाट और छोटे वाक्यों में पाने के लिए आमुख दिया जाता है। यह पूरे समाचार का प्रदर्शन प्रारूप है। कहा जाता है कि Well begun is half done – शुरूआत ठीक हो गई तो समझो आधा काम हो गया। यह बात समाचार के इंट्रो पर शब्दशः लागू होती है। एक आदर्श इंट्रो लिखना आसान काम नहीं है, किन्तु अच्छा इंट्रो लिखने की योग्यता को अभ्यास तथा सजगता के गुणों से हासिल किया जा सकता है। एक अच्छे इंट्रो में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए जैसे- संक्षिप्तता, अनुरूपता, सहजता, रोचकता और दार्शनिकता।


समाचार की शेष रचना(Body of the story)[सम्पादन]

इंट्रो के बाद समाचार की शेष रचना लिखी जाती है। इसे प्रायः (Body of the story) कहा जाता है। यह हिस्सा क्रमबद्ध ढंग से घटना तथ्यों को संजोये हुए रहता है। एक आकर्षक तथा रूचिपूर्ण इंट्रो पाठक को पूरा समाचार पढ़ने के लिए प्रेरित करता है, इसलिए समाचार लेखन द्वितीय चरण भी उतने सजगतापूर्वक लिखा जाना चाहिए। समाचार लेखन‌ के इस द्वितीय चरण में आमुख में उल्लेखित तथ्यों की व्याख्या और विश्लेषण होता है।

समाचार तथा पत्र-पत्रिकाओं को कम से कम जगह में अधिक से अधिक साम्रगी का समायोजन करना होता है। इसलिए सार्थक, संक्षिप्त और समाचार लिखना सर्वोत्तम है, जिन्हें साधारण जन भी रूचिपूर्वक कम समय देकर पढ़ सके। किसी घटना के विषय में (क्या, कब, कहाँ, कैसे, क्यों और कौन) जैसे मूल प्रश्नों का उत्तर विस्तारपूर्वक मिलना चाहिए।समाचार का समापन करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि न सिर्फ उस समाचार के प्रमुख तथ्य आ गये हैं बल्कि समाचार के आमुख और समापन के बीच एक तारतम्यता भी होनी चाहिए। समाचार में उल्लेखित तथ्यों और उसके विभिन्न पहलुओं को इस तरह से पेश करना चाहिए कि उससे पाठक को किसी निर्णय या निष्कर्ष पर पहुंँचने में मदद मिले।


शीर्षक(Headline)[सम्पादन]

शीर्षक समाचार-सार, घटना-परिणाम तथा स्थिति संकेत का सूचक होता है। शीर्षक बनाना एक कला है जिसके द्वारा पाठकों के मन और मस्तिष्क पर सत्ता स्थापित की जाती है। समाचार के शीर्षक लिखने वालों को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना पड़ता है-

  1. शीर्षक में समाचार का मूल-भाव निहित हो।
  2. शीर्षक भूतकाल में ना लिखा जाए।
  3. अकर्मक क्रिया का यथासंभव कम प्रयोग हो।
  4. शीर्षक के द्वारा ही पृष्ठ-सज्जा को प्रभावपूर्ण बनाना।


शीर्षक लेखन के बाद यह बताया जाता है कि खबर किस से प्राप्त हुई है। वह खबर अखबार के अपने संवाददाता ने भेजी है या फिर किस एजेंसी से प्राप्त हुई है। इसका उल्लेख शीर्षक के ठीक नीचे इस प्रकार करते हैं- जनसत्ता संवादाता द्वारा, विशेष संवाददाता द्वारा, कार्यालय संवाददाता द्वारा आदि। समाचार लिखते समय सबसे पहले बाई ओर सर्वप्रथम समाचार से जुड़े स्थान तथा तिथि का उल्लेख करते हैं। यथा- नई दिल्ली, 15 जुलाई।



संवाददाता की योग्यता और दायित्व

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समाचारों का शीघ्र संकलन,उनकी सुस्पष्ट व्याख्या तथा शुद्धता के साथ पाठकों के लिए उसे बोधगम्य बनाने का कार्य संवादाता करता है। वह गुप्तचर,मनोवैज्ञानिक एवं वकील के गुणों से संपन्न होकर अपनी प्रतिभा के बल पर समाज सेवा करता है। यह कार्य बड़ा कठिन है।व्यवहारिक ज्ञान और भाषा पर अधिकार यह संवादाता के मूल गुण होते हैं साथ ही उसमें श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों का भी समावेश होना आवश्यक है। किसी भी संवादाता को पर्याप्त सहनशील, परिश्रमी, दूरदर्शी होने के साथ-साथ वाकपटुता में भी निपुण होना आवश्यक है। संवाददाता बनने के लिए निम्न योग्यताएं होना का आवश्यक है-

  1. संवाददाता के अंदर समाचार का बोध होना आवश्यक है। जैसे- किसी घटना को एक अच्छे समाचार का रूप कैसे दें तथा आस-पास घटित होने वाली अनेक घटनाओं के इस ढ़ेर में से पाठक या श्रोता के महत्व और रूचि के अनुसार समाचारों का वर्गीकरण कर उन्हें किस प्रकार संप्रेषित किया जाए।
  2. पैनी दृष्टि तथा विस्तृत श्रवण शक्ति।
  3. मुद्र लेखन, आशु लेखन एवं टंकण का ज्ञान।
  4. सत्यनिष्ठा और निर्भीकता।
  5. जटिल घटनाओं, विविध समस्याओं को समझने की शक्ति।
  6. समाचार की गहराई में जाने के लिए, नए-नए तथ्यों तथा सत्य को उद्घाटित करने के लिए जिज्ञासु-वृति का होना आवश्यक है।
  7. संवाददाता में कल्पना शक्ति साथ ही गतिशीलता, यथार्थता, वस्तुनिष्ठता भी होना महत्वपूर्ण है।



संपादन कला,संपादक का उत्तरदायित्व,शीर्षकीकरण, आमुख

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सम्पादन का शाब्दिक अर्थ है – किसी काम को अच्छी और ठीक तरह से पूरा करना। किसी पुस्तक का विषय या सामयिक पत्र के लेख आदि अच्छी तरह देखकर उनकी त्रुटियाँ आदि दुर करके और उनका ठीक क्रम लगा कर उन्हें प्रकाशन के योग्य बनाना।

वास्तव में सम्पादन एक कला है। इसमें समाचारों, लेखों, या कहें कि किसी समाचार पत्र-पत्रिका में प्रकाशित की जाने वाली सभी तरह की सामग्री का चयन किया जाता है। सम्पादन आसान काम नहीं है। इसमें मेधा, निपुणता और अभिप्रेरणा की आवश्यकता होती है। जे. एडवर्ड मर्रे ने ठीक ही कहा है – “Because copy editing is an art, the most important ingredient after training and talent is strong motivation. Not only he should know his job but also he must love it………”

संचार माध्यमों के संदर्भ में जब हम सम्पादन की चर्चा करते हैं तब सम्पादन का अर्थ समाचार के पाठक, दर्शन तथा श्रोता के लिए ग्रहणीय बनाना होता है। अतः समाचार का उद्देश्य - “समाचार को पाठक, दर्शक तथा श्रोता के लिए उपयोगी बनाना।”



पत्रकारिता प्रबंधन और वितरण

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प्रबंधन को अंग्रेजी में Management कहते हैं। किसी कार्य की पूर्ति करने के लिए सभी बातों को Manage करना पड़ता है। सभी बातों का किसी एक निश्चित कार्य पूर्ति के लिए समायोजन करना ही प्रबंधन है। आधुनिक काल में व्यापार, उद्योग, शैक्षिक या सामाजिक‌ या ‌निजी संगठनों में भी प्रबंधन महत्वपूर्ण माना गया है। पत्रकारिता आज मात्र समाज सेवा या मात्र सामाजिक जिम्मेदारी निभाने वाला संगठन नहीं रहा, बल्कि अब वह एक उद्योग की दृष्टि से देखा जाने लगा है। अपनी पत्रिका अनेक लोगों तक पहुँचे,जिससे पाठकों की संख्या बढ़े और विज्ञापन आदि द्वारा संगठन का मुनाफा मिले, यह प्रयास आजकल हर संगठन कर रहा है। आज अलग-अलग यंत्र-सामग्री, पैसा तथा श्रमशक्ति होने के बावजूद प्रबंधन के अभाव में अनेक पत्रिकाएँ घाटे में चल रही हैं। इसलिए पत्रकारिता में प्रबंधन महत्वपूर्ण माना गया है।


प्रबंधन विभाग (Management Department) :- समाचार पत्र के सभी विभागों में सुसूत्रता बनाए रखना, उनमें समन्वय निर्माण करना, प्रबंधन तथा प्रशासनिक व्यवस्था को निखारना, विज्ञापनदाताओं तथा एजंटों से संपर्क करना, समाचार पत्र का आर्थिक स्तर ऊँचा करने के लिए नित्य नई कल्पनाओं द्वारा पाठकों तथा विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करना तथा मनुष्य बल का अधिकाधिक लाभ उठाना प्रबंधन विभाग का प्रमुख लक्ष्य होता है। इस विभाग में लेखा परीक्षण, विज्ञापन, वितरण, संस्करण वृद्धि आदि कार्य चलते रहते हैं। पाठकों का संपर्क सीधे संपादक से होता है। लेकिन विज्ञापन संस्था तथा वितरण व्यवस्था का संबंध सीधे प्रशासनिक व्यवस्था से रहता है।


समाचार पत्र के दफ्तर में प्रशासक अर्थात् प्रबंधक ही प्रमुख होता है। समाचार पत्र की प्रतिमा उसके प्रबंधन पर ही निर्भर होती है। समय का महत्व जानने वाला और समन्वय को बनाए रखने वाला प्रबंधक ही सफल प्रबंधक होता है। दफ्तर के सभी विभाग से उसका समान रूप से संपर्क रहता है। प्रशासनिक व्यवस्था की यह जिम्मेदारी है कि अन्य सभी विभागों को अपने कर्तव्यपूर्ति के लिए हमेशा प्रोत्साहित करें।


वितरण व्यवस्था :- समाचार-पत्र मुद्रित होने के पश्चात् यथाशीघ्र वह पाठकों के हाथ पहुंचे, यह वितरण व्यवस्था की जिम्मेदारी है। समाचार-पत्र की खपत या पत्रकारिता में आई कडी प्रतियोगिता के कारण वितरण व्यवस्था का महत्त्व बढ़ गया है। अपने समाचार-पत्र के पहले कोई अन्य समाचार-पत्र यदि पाठक के हाथ पडता है और यदि यह बार-बार होता रहता है, तो पाठक आगे चलकर अपने समाचार-पत्र की ओर पीठ कर देते हैं। चाहे फिर हमारा समाचार-पत्र कितना भी आकर्षक क्यों न हो? रातभर कड़ी मेहनत से बनाया गया समाचार-पत्र, जिसकी बिक्री पहले घंटे-दो-घंटे में न हो जाए, तो बाद में वह वहीं का वहीं पड़ा रह जाता है।



प्रेस संबंधी प्रमुख कानून

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प्रेस संबंधी प्रमुख कानून[सम्पादन]

प्रेस के कानून पत्रकारों के लिए कुछ विशेषाधिकारों का प्रावधान करते है और उन्हें कुछ कर्तव्यों के लिए बाध्य भी करते है। समाज के सुचारू रूप से संचालन के लिए सरकार को अनेक कानून बनाने पड़ते है। भारत के संविधान में सभी नागरिकों को प्रेस की आजादी का गारंटी दी गई है। परन्तु देश की सुरक्षा और एकता के हित में और विदेशों से सम्बन्धों तथा कानून और व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता या अदालत अवमानना, मानहानि या अपराध को प्रोत्साहन के मामलों में इस अधिकार पर राज्य द्वारा अंकुश लगाया जा सकता है। जो कानून प्रेस पर लागू होते है, वे इस प्रकार है-

मानहानि[सम्पादन]

भारतीय दण्ड संहिता (1860) की धारा 399 के अनुसार राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के अपना ईमानदारी, यश, प्रसिद्धि,प्रतिष्ठा, मान-सम्मान आदि के सुरक्षित रखने का पूरा खधिकार प्राप्त है। इस कानून के अनुसार जो कोई या तो बोले गए या पढ़े जाने के आशय से शब्दों या संकेतो द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में इस हादसे से लांछन लगता है तथा ऐसे लांछन से व्यक्ति की ख्याति की हानि होगी तो वह मानहानि का दावा कर सकता है। दावा साबित होने पर दोषी को 2 वर्ष की साधारण कैद या जुर्माना या दोनों सजा दी जा सकती है।

इसलिए पत्रकारों को इस मामले में सचेत रहना जरूरी है।अब प्रमाणित कथा सुनी सुनाई बातों के आधार पर किसी पर आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं, जिनमें पत्रकार मानहानि के दो‌षों से बच सकता है। सार्वजनिक हित में किसी संस्था या व्यक्ति के आचरण पर टिप्पणी की जा सकती है। इसमें निजी स्वार्थ या बदला लेने की भावना ना हो

संसद तथा विधान मंडलों के सदस्यों के विशेषाधिकार[सम्पादन]

विश्व के प्रायः सभी देशों के संसद तथा विधान मंडलों के सदस्यों को कुछ विशेष अधिकार प्राप्त है। भारत में यह विशेषाधिकार हमारी शासन व्यवस्था में सन् 1833 से किसी न किसी रूप में विद्यमान है। इस विशेषाधिकार के अनुसार यदि संसद की कार्यवाही को तोड़-मरोड़ कर उस पर अनुचित या निंदाजनक टिप्पणी करके संसद की कार्यवाही से निकाली गई बातों को प्रकाशित करने पर विशेषाधिकार हनन का मामला बनता है।

न्यायालय की अवमानना[सम्पादन]

सन् 1971 में न्यायालय की अवमानना का नया कानून पारित किया गया। यह कानून अत्यंत व्यापक है तथा थोड़ी भी असावधानी संपादकों और पत्रकारों को मुसीबत में डाल सकती है। न्याय प्रणाली की पवित्रता और विश्वसनीयताको बनाए रखने के लिए यह कानून बनाया गया है। अवमानना की परिस्थितियाँ निम्नलिखित है-

  1. अगर न्यायालय के न्यायाधीश पर अनौचित्य और अयोग्यता का आरोप लगाया जाए अथवा उनके चरित्र के हनन का प्रयास किया जाए तो यह न्यायालय की अवमानना है।
  2. न्यायपालिका की प्रतिष्ठा, गरिमा, अधिकार अथवा निष्पक्षता पर संदेह प्रकट करना।
  3. विचाराधीन मामलों में संबंधित जज, पक्षकारों तथा साक्षियों को प्रभावित‌ करने का प्रयास करना अथवा उन पर किसी प्रकार के आक्षेप लगाना।
  4. अदालत की कार्यवाही की रिपोर्ट चोरी-छिपे प्रकाशित करना।

प्रेस परिषद अधिनियम[सम्पादन]

भारत में समाचार पत्रों तथा समाचार समितियों के स्तर में सुधार एवं विकास तथा प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने की आवश्यकता महसूस करते हुए भारतीय संसद ने सन् 1978 में प्रेस परिषद अधिनियम पारित किया। इसके उद्देश्य इस प्रकार हैं-

  1. समाचार पत्र तथा समाचार समितियों की स्वतंत्रता को कायम रखना।
  2. महत्वपूर्ण तथा जनरुचि के समाचारों के प्रेषण पर, संभावित अवरोधों पर दृष्टि रखना।
  3. उच्च स्तर के अनुरूप पत्रकारों के लिए आचार संहिता तैयार करना।
  4. भारतीय समाचार पत्र तथा समाचार समितियों को मिलने वाली विदेशी सहायता का मूल्यांकन करना।
  5. पत्रकारिता से संबंधित व्यक्तियों में उत्तरदायित्व की भावना तथा जनसेवा की भावना को विकसित करना।

मुद्रण रेखा(Print Line)[सम्पादन]

संपादक और मुद्रक के दायित्वों को कानून की दृष्टि से वैध बनाने के लिए समाचार पत्र के किसी पृष्ठ पर (विशेषकर अंतिम पृष्ठ के किसी किनारे पर) संपादक, मुद्रक, प्रकाशक, प्रेस एवं कार्यालय का नाम कथा पते का विवरण देने की परिपाटी है। इस विवरण को ही मुद्रण रेखा के नाम से जाना जाता है।

इसके अलावा भी कई प्रेस संबंधित कानून है। जिन्हें ध्यान में रखकर पत्रकारिता करनी पड़ती है।



आचार संहिता

हिंदी पत्रकारिता
 ← प्रेस संबंधी प्रमुख कानून प्रिंट वर्शन प्रसार भारती → 

प्रेस परिषद् अधिनियम, 1978 की धारा 13.2(ख) द्वारा परिषद् को समाचार कर्मियों की सहायता तथा मार्गदर्शन हेतु उच्च व्ययवसायिक स्तरों के अनुरूप समाचार-पत्रों, समाचार एजेंसियों और पत्रकारों के लिये आचार संहिता बनाने का व्यादेश दिया गया है। पत्रकारों के लिए अपनाई गई आचार संहिता इस प्रकार है -

  1. पत्रकारिता जनमत के निर्माण के लिए एक प्राथमिक उपकरण है,इसलिए पत्रकारों का यह कर्तव्य है कि वह इसे एक ट्रस्ट या दायित्व समझे और जनहित की सेवा तथा रक्षा के लिए हमेशा तैयार और इच्छुक रहें।
  2. अपने कर्तव्य का पालन करते समय पत्रकार मानव के मूलभूत और सामाजिक अधिकारों को उचित महत्व देंगे और समाचारों की रिपोर्ट देते समय उन पर टिप्पणी करते समय सद्भाव और न्यायप्रियता का ध्यान रखेंगे।
  3. समाचारों और तथ्यों को ईमानदारी से संग्रह करने और प्रकाशन करने की स्वाधीनता तथा उचित टिप्पणी और आलोचना करने का अधिकार ऐसी सिद्धांत है, जिन्हें प्रत्येक पत्रकार को हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए।
  4. सभी सूचना और प्रकाशित टिप्पणियों के लिए दायित्व स्वीकार किया जाएगा। यदि दायित्व स्वीकार नहीं किया जा रहा है, तो पहले से ही स्पष्ट रूप से प्रकट कर दिया जाएगा।
  5. पत्रकार उन समाचारों और टिप्पणियों पर नियंत्रण रखेंगे, जिनसे तनाव बढ़ता है और हिंसा को प्रोत्साहन मिल सकता है।
  6. पत्रकार अपने पेशेवर आचरण को निजी हितों से प्रभावित नहीं होने देंगे।
  7. समाचार-पत्रों में निजी विवादों को जारी रखना, जब कोई सार्वजनिक प्रश्न-मुद्दा न हो, पत्रकारिता की परंपरा के विरुद्ध है।



प्रसार भारती

हिंदी पत्रकारिता
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प्रसार भारती[सम्पादन]

प्रसार भारती देश में सार्वजनिक प्रसारण सेवा है। आकाशवाणी और दूरदर्शन इसके दो घटक है। लोगों को सूचना, शिक्षा तथा मनोरंजन प्रदान करने और रेडियो पर प्रसारण का संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए 23 नवम्बर 1997 को प्रसार भारती का गठन किया गया।प्रसार भारती बिल 1989 ई. में संसद में पेश किया गया। इसे प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने कहा कि इसके माध्यम से इलेक्ट्रानिक मीडिया सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो जाएगा तथा सही अर्थों में यह भारत के लोगो का प्रतिनिधित्व स्वर बनेगी।1989 में लाया गया प्रसार भारती बिल मुख्यतः 1978 के वर्गीज कमिटी पर ही आधारित था। वर्गीज कमिटी की रिर्पोट में जोर इस बात पर था कि एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे भविष्य में संचार माध्यमों का दुरूपयोग न हो सके तथा प्रसारण की स्वायत्ता के लिए वैधानिक प्रावधान की बात करता है। प्रसार भारती बिल 1990 में पारित किया गया लेकिन इसे लागू करने से पूर्व ही सरकार गिर गई। जिसके कारण एक लम्बें अन्तराल के बाद 1997 में प्रसार भारती कानून लागू हुआ। प्रसार भारती अधिनियम 1990 में वर्णित प्रसार भारती निगम के प्रमुख लक्ष्य इस प्रकार है---

  1. देश की एकता एवं अखण्डता को बढ़ावा देना।
  2. संविधान में वर्णित मूल्यों को बनाए रखना।
  3. जनहित के सभी मामलों के बारे में जानकारी प्रदान करना।
  4. शिक्षा एवं सारक्षता का प्रचार-प्रसार करना।
  5. समाज के जरुरतमन्द लोगों के हितों के बारे में जागरूकता पैदा करना।



डिजिटल युग में पत्रकारिता

हिंदी पत्रकारिता
 ← प्रसार भारती प्रिंट वर्शन

तकनीकी विकास को साथ-साथ जनसंचार माध्यमों यथा हिन्दी पत्रकारिता के रूख में तेजी से परिवर्तन देखने को मिला है। तकनीकी के विस्तार से हिन्दी पत्रकारिता के विस्तार में मदद मिली है। हिन्दी समाचार चैनल, समाचार पत्रों के साथ-साथ हिन्दी में समाचार वेबसाइट के कारण हिन्दी पत्रकारिता का दायरा बढ़ा है। हिन्दी पत्रकारिता को व्यवसायिक कलेवर में ढाला जा चुका है। वहीं तमाम समानान्तर माध्यम भी कार्य कर रहे है, जो व्यवसायिकता से अभी परे है। यह समय के साथ लगातार विकसीत हो रहा है। तकनीकी के कारण सूचनाओं पर लगने वाली बंदिशे कम हुई है और लोगो तक अबाध सूचना का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इन सबके चलते हिन्दी पत्रकारिता ने नये दौर मे प्रवेश किया है।


21वीं शताब्दी सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। आधुनिक संचार तकनीकी का मूल आधार इन्टरनेट है। कलमविहीन पत्रकारिता के इस युग में इन्टरनेट पत्रकारिता ने एक नए युग का सूत्रपात किया है। वेब पत्रकारिता को हम इन्टरनेट पत्रकारिता, ऑनलाइन पत्रकारिता, साइबर पत्रकारिता के नाम के जानते है। यह कम्प्यूटर और इंटरनेट द्वारा संचालित एक ऐसी पत्रकारिता है, जिसकी पहुँच किसी एक पाठक, एक गाँव, एक प्रखण्ड, एक प्रदेश, एक देश तक नहीं अपितु समूचे विश्व तक है।


प्रिंट मीडिया से यह रूप में भी भिन्न है इसके पाठकों की संख्या को परिसीमित नहीं किया जा सकता है। इसकी उपलब्धता भी सर्वाधिक है। इसके लिए मात्र इन्टरनेट और कम्प्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल की जरूरत होती है। इंटरनेट वेब मीडिया की सर्वव्यापकता को भी चरितार्थ करती है जिसमें खबरें दिन के चौबीसों घण्टे और हफ्ते के सातों दिन उपलब्ध रहती हैं वेब पत्रकारिता की सबसे बड़ी खासियत है उसका वेब यानी तरंगों पर आधारित होना । इसमें उपलब्ध किसी दैनिक, साप्ताहिक, मासिक पत्र-पत्रिका को सुरक्षित रखने के लिए किसी आलमीरा या लाइब्रेरी की ज़रूरत नहीं होती।


समाचार पत्रों और टेलीविजन की तुलना में इंटरनेट पत्रकारिता की उम्र बहुत कम है लेकिन उसका विस्तार बहुत तेजी से हुआ है। उल्लेखनीय है कि भारत में इंटरनेट की सुविधा 1990 के मध्य में मिलने लगी। इस विधा में कुछ समय पहले तक अंग्रेजी का एकाधिकार था लेकिन विगत दशकों में हिन्दी ने भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज की है। इंदौर से प्रकाशित समाचार पत्र 'नई दुनिया' ने हिन्दी का पहला वेब पोर्टल 'वेब दुनिया' के नाम से शुरू किया। अब तो लगभग सभी समाचार पत्रों का इंटरनेट संस्करण उपलब्ध है। चेन्नई का 'द हिन्दू' पहला ऐसा भारतीय अखबार है जिसने अपना इंटरनेट संस्करण वर्ष 1995 ई. में शुरू किया। इसके तीन साल के भीतर यानी वर्ष 1998 ई. तक लगभग 48 समाचार पत्र ऑन-लाइन हो चुके थे। ये समाचार पत्र केवल अंग्रेजी में ही नहीं अपितु हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं जैसे मलयालम, तमिल, मराठी, गुजराती आदि में थे। आकाशवाणी ने 02 मई 1996 'ऑन-लाइन सूचना सेवा' का अपना प्रायोगिक संस्करण इंटरनेट पर उतारा था। एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2006 ई. के अन्त तक देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों एवं टेलीविजन चैनलों के पास अपना इंटरनेट संस्करण भी है जिसके माध्यम से वे पाठकों को ऑन-लाइन समाचार उपलब्ध करा रहे हैं।


ऑन-लाइन पत्रकारिता, हिन्दी ब्लॉग, हिन्दी ई-पत्र-पत्रिकाएँ, हिन्दी ई-पोर्टल, हिन्दी वेबसाइट्स, हिन्दी विकिपीडिया आदि के रूप में नव-जनमाध्यम आधारित हिन्दी पत्रकारिता के विविध स्वरूपों को समझा जा सकता है।