हिंदी भाषा 'ख'/बहुत दिनों बाद खुला आसमान

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निराला की यह कविता 'अनामिका' में संकलित है।[१]

बहुत दिनों बाद खुला आसमान!
निकली है धूप, हुआ खुश जहान।

दिखीं दिशाएँ, झलके पेड़,
चरने को चले ढोर-गाय-भैंस-भेड़,

खेलने लगे लड़के छेड़-छेड़-
लड़कियाँ घरों को कर भासमान।

लोग गाँव-गाँव को चले,
कोई बाजार, कोई बरगद के पेड़ के तले
जाँघिया-लँगोटा ले, सँभले,
तगड़े-तगड़े सीधे नौजवान।

पनघट में बड़ी भीड़ हो रही,
नहीं ख्याल आज कि भीगेगी चूनरी,
बातें करती हैं वे सब खड़ी,
चलते हैं नयनों के सधे बान।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'-रागविराग, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद:२०१४, पृ.१२४-२५