हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल)/भारतेन्दु और द्विवेदी-युगीन काव्य की प्रवृत्तियाँ

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भारतेंदु युगीन प्रवृत्तियां[सम्पादन]

आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह भारतेन्दु जी

भारतेन्दु जी को आधुनिक हिन्दी साहित्य का प्रवर्तक माना जाता हैं। भाषा, काव्य रूपों की विविधता, नया जागरण संदेश उन्हीं की कविता द्वारा हिन्दी साहित्य में आया। इसलिए हिन्दी नवजागरण के साहित्यिक अग्रदूत भी उन्हें कहा जाता हैं। श्रृंगार और विलासिता के केंचूल को उन्होंने दूर किया था और कविता को जनसाधारण के निकट लाया। नायिका का नखशिख वर्णन, और विरह की व्याकुल का स्थान देश की जनता की दुर्दशा का वर्णन, देश स्वाभिमान की भावना ने ले लिया। यही कारण है की श्रृंगार, अलंकार, रीति निरुपण, प्रकृति का उद्दीपन चित्रण प्राय: कम होता गया। भक्ति, नीति भी पिछड़ती गयी। जातीय, राष्ट्रीय प्रबोधन को पराश्रय मिला। राष्ट्रीय भावनाओं का देश भक्ति का चित्रण इस कालखंड में अधिक देखा जा सकता हैं। शिक्षा का महत्व, विधवा विवाह का समर्थन, बालविवाह का विरोध, अंग्रेजी राजनीति की आलोचना, राजभक्ति, गो-रक्षा जैसे विषय कविता के केन्द्र में आए। ब्रिटिशों ने भौतिक साधनों तर्क पद्धतियों शासन प्रबंधन से नया युग पहले ही लाया था। मुद्रण तंत्र का अविष्कार, समाचारपत्रों का विकास आदि ने जन-जागरण को फैलाने में महत्वपूर्ण भुमिका निभाई। समाजसुधार एवं देश सुधार की भावना पल्लवित-पुष्पीत होती गई।

भारतेन्दु युगीन महिला रचनाकार पंडिता रमाबाई

भारतेन्दु काल के प्रमुख अन्य साहित्यकारों ने भी भारतेन्दु की प्रवृत्तियों को स्वीकारा और साहित्य सृजन किया। जिनमें महत्वपुर्ण है, बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन, प्रतापनारायण मिश्र, जगन्मोहन सिंह, राधाकृष्ण दास, जगन्नाथदास रत्नाकर, नवनीत चतुर्वेदी आदि। डॉ. नगेन्द्र ने राष्ट्रीयता, सामाजिक चेतना, भक्तिभावना, श्रृंगारिकता, प्रकृति चित्रण, हास्य-व्यंग, रीति-निरुपण, समस्यापुर्ति, काव्यानुवाद, कलापक्ष के अन्तर्गत आनेवाली प्रवृत्तियों का विश्लेषण अपने इतिहास में किया हैं।

देशभक्ति और राजभक्ति[सम्पादन]

भारतेन्दु युग में देशभक्ति के साथ राजभक्ति की प्रसार भावना का अविष्कार हुआ हैं। देशभक्ति के अंतर्गत ही राष्ट्रीयता का विस्तार उनकी उपलब्धि रहीं हैं। स्वयं बाबू भारतेन्दु ने क्षेत्रियता से ऊपर संपूर्ण राष्ट्र की नब्ज को टटोलने का प्रयास किया। इस काल के कवियों में देशभक्ति एवं राजभक्ति की भावना को कविताओं द्वारा अभिव्यक्त दी हैं। डॉ. नगेन्द्र के अनुसार देशभक्ति की यह भावना बाद में मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत-भारती' में लक्षित हुई। भारतेन्दु की 'विजयिनी' विजय 'वैजयन्ती', प्रेमधन की 'आनंद अरुणोदय', प्रतापनारायण मिश्र की 'महापर्व', राधाकृष्णदास की 'भारत बारहमासा' और विनय शीर्षक कविताएँ देशभक्ति से पुरित एवं प्रेरित हैं--

भीतर भीतर सब रस चूसै,

हंसि हंसि के तन मन धन लूटै।
जाहिर बातन में अति तेज,

क्यों सखि सज्जन! नहीं अंगरेज।

ऐसी कविता लिखकर एक ओर अंग्रेजों द्वारा किये जानेवाले शोषण का चित्र वे खींचते हैं। देशवासियों को जागृत करते दिखतें हैं तो दूसरी ओर अंग्रेजों द्वारा देश की संपत्ती का होनेवाला दोहन देखकर मन भारी भी करते हैं -

अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी,
पै धन विदेश चल जात यह आति ख्वारी।

भारतेन्दु युग की कविता राष्ट्रीय भावना की कविता हैं। विदेशी वस्तुओं के प्रयोग का बहिष्कार भी उन्होंने किया हैं। देश की जागृति के लिए बार-बार ईश्वर वंदना भी वे करते हैं। देश के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक पतन को देखकर वे अतीत का गौरव गान भी करते हैं। जिससे साम्प्रदायिक भावनाओं के विकास में आगे चलकर सहयोग मिलें। प्रताप नारायण का हिन्दी-हिन्दू-हिन्दूस्तान वाला गुणगान इसी कोटि का हैं। अंग्रेजी राज के कारण भारत मुगलों के कठोर शासन से मुक्त हुआ, इसप्रकार का एक दृष्टिकोन भारतेन्दु की कविता में आया हैं। अत्याचारी शासन की समाप्ति के प्रती वे गुस्सा जाहिर करते हुए अंग्रेजों के प्रति राजभक्ति, निष्ठा को भी इस समय की कविता व्यक्त करते हैं। इस देश में सुधार लाने की गुहार भी वे ब्रिटिशों से लगाते हैं। एक ओर यह कविता देशभक्ति का परिचय देती हैं तो एक ओर राजभक्ति का। स्वंय भारतेन्दु बाबू को ब्रिटिश राज परम मोक्ष का फल लगता हैं--

परम-मोक्ष फल राजपद परसन जीवन माँही।
बृटन देवता राजसुत पर परसह चित चाहि॥

भारतेन्दु युग में अगर अँग्रेजो के शोषण को उभारती कविताएं थी तो ऐसी भी कविताएं थी जिसमें राजभक्ति साफ झलकती है। महाराणी विक्टोरिया की घोषणा का स्वागत, विक्टोरिया की मृत्यु पर शोक, लार्ड रिपन के प्रति श्रध्दांजली आदि विषयों पर इस काल के कवियों ने कविता लिखी हैं।

महारानी विक्टोरिया
करहु आज सों राज आप केवल भारत हित,
केवल भारत के हित साधन में दीने चित।

विद्वानों का कहना हैं राजभक्ति के अंतर्गत आनेवाली कविता को देखकर कवियों पर राजद्रोह या साम्प्रदायिकता का दोष लगाना नहीं चाहिए। सही भी हैं परंतु इस काल के साहित्य ने साम्प्रदायिकता की प्रवृत्ति का बीजारोपन किया इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नगेन्द्र के अनुसार भले ही 'यह नयी राजनीतिक चेतना की कविता हो' फिर भी यह कहना होगा की स्वतंत्रता के बाद भारत उत्तर नयी राजनीति से रुढ़ होकर सन १९९० के साहित्य, राजनीति में यहीं उभरकर आयी। इसी कारण नवजागरण को ही हिन्दूधर्म पुनरुत्थान के रुप में शंभुनाथ, वीर भारत तलवार जैसे विद्वानों ने देखा जो सही प्रतित होती हैं।

नयी सामाजिक चेतना[सम्पादन]

युगीन कविता ने नयी सामाजिक समस्याओं पर कविता लिखी। जिसमें सामाजिक समस्याओं को दूर करते हुए, ब्राह्म समाज, आर्य समाज, के आंदोलनों का प्रभाव उक्त काल की कविता पर पड़े। विधवा विवाह का समर्थन, बालविवाह का विरोध, सती प्रथा का विरोध, छुआछूत के प्रती उदारता का दृष्टीकोण, सड़ी-गली रुढ़ियों का विरोध, करने के लिए मध्यवर्ग के सामाजिक जीवन का चित्रण कविता में आया।

एक तरह से यह कविता जनवाद की ओर दृष्टीपात करती हैं। भारतेन्दु युग के कवियों को समाजसुधार के कवि माना जाता हैं। जिस पर प्रश्न भी उठते हैं। कुछ कवि उदारता का परिचय नहीं देते। 'भारत धर्म' कविता में अंबिका दत्त व्यास द्वारा वर्णाश्रम धर्म का दृढ़तापूर्वक अनुमोदन और राधाचरण गोस्वामी द्वारा विभिन्न कविताओं में प्राचीन शास्त्र-नीतियों का समर्थन एवं विधवा-विवाह का विरोध ऐसे ही उदाहरण हैं। अर्थात यह स्पष्ट हैं की कुछ कवि समाजसुधार के आग्रही थे तो कुछ यथास्थितीवाद को बनाये रखने के पक्षधर थे।

'भारत दुर्दशा' जैसे नाटकों में वर्णव्यवस्था की संकीर्णता का विरोध उन्होंने किया हैं बहुत हमने फैलाये धर्म, बढ़ाया छुआछूत का कर्म इनके समकालीन कवि बालमुकुन्द गुप्त ने भी समाजसुधार की दृष्टी अपनायी हैं। धनिकों को संबोधित करते हुए वे कहते हैं -

हे धनिकों, क्या दीन जनों की, नहीं सुनते हो हाहाकार,

जिसका मरे पड़ोसी भूखा, उसके भोजन को धिक्कार।
भूखों की सुधि उसके जी मे, कहिए किस पथ से जावे,

जिसका पेट मिष्ट भोजन से, ठीक नाक तक भर जावें।

वस्तुतः आर्य समाज की सामाजिक एवं धार्मिक सुधार वृत्ती का प्रभाव कुछ लेखकों पर स्पष्ट हैं। कुछ सहर्ष स्वीकारते हैं, कुछ नहीं। ऐसे ही वेद मार्ग छोड़कर मुस्लिम धर्म संस्कृति को स्वीकारने वालों की कटु आलोचना राधाचरण गोस्वामी करते हैं:-

यज्ञ,याग, सब मेट पेट भरन में चातुर

पितर पिन्ड नहीं देते यवन-सेवा में आतुर।
पढ़े जनम तैं फारसी छोड, वेद मारग दियो।

हा हा हा विधि वाम ने सर्वनाश भारत कियो।

'हा हा हा' से स्पष्ट हैं की गोस्वामी की व्यथा कौनसी और किस प्रकार की रहीं हैं।

प्रतापनारायण मिश्र भी स्त्री शिक्षा का महत्व अपनाते हैं, बालविवाह का विरोध भी करते हैं और विधवाओं के दुख से विलाप भी करतें हैं-

प्रताप नारायण मिश्र के सम्मान में जारी डाक टिकट
निज धर्म भली विधि जाने, निज गौरव पहिचानै,

स्त्रीगण को विद्या देवै, करि पतिव्रता यश लावै।
झूठी यह गुलाब की लाली धोवत ही मिटी जाय,
बाल-ब्याह की रीति मिटाओ रहे लाली मुँह छाय।

विधवा विलपै नित धेनु कटें कोऊ लागत हाय गोहार नहीं।

एक तरह से मानवतावादी विचारों-भावनाओं का सृजन कर्म इस दौर में शुरू हो चुका था।

आर्थिक चिंताओं का प्रकटीकरण[सम्पादन]

ब्रिटिशों द्वारा की जानेवाली आर्थिक लूट को देखकर भारतेन्दु का मन भी बड़ा व्यथित हो चुका था। इसलिए कवियों ने स्वदेशी उद्योगों एवं वस्तुओं का प्रयोग करने का आव्हान किया था। भारतेन्दु ने 'प्रबोधिनी' कविता में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को प्रत्यक्ष प्रेरणा दी हैं। भारतीय परिपत्रक पर सवाल उठाते हुए भी ब्रिटीशों की आर्थिक शोषण नीति का विरोध प्रतापनारायण मिश्र जैसे कवियों ने किया हैं:-

अभी देखिए क्या दशा देशकी हो,
बदलता हैं रंग आसमां कैसे कैसे!

सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की ओर से भी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार भाव भारतेन्दु में आया हैं। जिसमें वे मलमल और मारकीर का व्यवहार करनेवालों की आलोचना कटु शब्दों में करते हैं -

मारकीन मलमल बिना चलत कछु नाहिं काम,
परदेसी जुलहान के मानहुँ भये गुलाम।

ब्रिटिशों की साम्राज्यवादी नीति के प्रति गहरा क्षोभ कवियों ने व्यक्त करते हुए स्वतंत्रता की माँग की है--

सब तजि गहौ स्वतंत्रता, नहिं चुप लाते खाब।
राजा करै सो न्याव हैं, पाँसा परे सो दाँव।

या तत्कालीन भारतीय समाज की आर्थिक दुरावस्था देखकर कवि करुणार्द्र हो जाते हैं--

रोवहु सब मिलि, आवहु भारत भाई।
हा! हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई॥

भारत की आर्थिक दुर्गति का ब्रिटीश शासन कारण रहा हैं, इस बात को कवि भूलते नहीं और वे देशप्रेम भाव को भी व्यक्त करने से चुकते नहीं।

जन-जीवन का चित्रण[सम्पादन]

डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार भारतेन्दु युग की जनवादी भावना उसके समाज सुधार में निहित हैं। आगे वे कहते हैं की, वह केवल राजनीतिक स्वाधीनता का साहित्य न होकर मनुष्य की एकता, समता और भाईचारे का भी साहित्य हैं।

भारतेन्दु स्वदेशी आन्दोलन के ही अग्रदूत न थे, वे समाज सुधारकों में से भी प्रमुख थे। स्त्री-शिक्षा, विधवा विवाह आदि के समर्थक थे। भारतीय महाजनों के पुराने पेशे सूदखोरी की उन्होंने कड़ी आलोचना की थी, सर्वदा से अच्छे लोग ब्याज खाना और चुड़ी पहनना एक-सा समझते हैं पर अब आलसियों को इसी का अवलंब हैं, न हाथ हिलाना पड़े न पैर, बैठे बैठे भुगतान कर लिया।[१]

आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती

कवियों ने मानवहित के लिए सामाजिक सुधार को अपनाते हुए कुप्रथाओं, धार्मिक मिथ्याचार, छल-कपट, स्वार्थपरायणता, आदि विषयों पर कविता द्वारा प्रहार किया हैं। अंग्रेजों के शोषण विरुद्ध जागरण फैलाया हैं। प्राचीन भारतीय संस्कृति के गौरव को आदर्श रुप में प्रस्तुत किया हैं। शासन सुधार की आकांक्षा भी जन-जीवन को व्यक्त करती हैं। उनकी कविता में यथार्थ चित्रण समाज जीवन का ही चित्रण हैं। जन-जीवन को उभारने हेतू उन्होंने लावणी, गजल, ठुमरी, मलार, दादरा जैसे लोकगीतों, संगीत का प्रयोग कविता में भारतेन्दु में किया हैं। जनता में जागरण हेतू ग्रामगीतों द्वारा उन्नति का मार्ग इन्होंने स्वीकारा हैं।

श्रृंगार की कविता[सम्पादन]

रीतिकालीन भक्ति एवं श्रृंगार की परम्परा भारतेन्दु युग तक चली आयी थी। जिसका प्रभाव उनके साहित्य पर पड़ा हैं। भारतेन्दु वैष्णव परम्परा के उपासक थे। राधा-कृष्ण के प्रति उनमें अनन्य भक्ति थी। सदैव राजसी ठाँट-बाँट से रहते थे पर विलासिता इनका सबसे बड़ा अवगुण था। एक बार इन्होंने कहा था--

जगत जाल में नित बंध्यो, परयो नारि के कंद।
मिथ्या अभिमानी पतित, झुठो कवि हरिचन्द॥

उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम का वर्णन किया हैं, माधुर्य भक्तिपरक श्रृंगार चित्रण, रीतिकालीन पद्धति पर नखशिख, षड़ऋतु और नायिका भेद वर्णन, उर्दु प्रभाव संपर्क में वेदनात्मक प्रेमाभिव्यक्ति भारतेन्दु और प्रेमघन की रचनाओ में मिलती हैं। प्रेमसरोवर, प्रेममाधुरी, प्रेमतरंग, प्रेमफुलवारी आदि रचनाओं में भारतेन्दु ने भक्तिश्रृंगार और विशुध्द श्रृंगार का वर्णन किया हैं। सौन्दर्य, प्रेम, विरह की व्यंजना में कहीं, कहीं ये दोनों उर्दु काव्यशैली के प्रभाव में भी हैं।

प्रेमादर्श में वे घनानंद, रसखान, एवं पद्माकर जैसे रीतिकालीन कवियों का अनुसरण करतें हैं--

साजि सेज रंग के महल में उमंग भरी।

पिय गर लागी काम-कसक मिटाये लेत॥
ठानि विपरीति पूरी मैन मसूसन सों।
सुरत-समर जय पत्रहि लिखायें लेत॥
हरीचन्द उझकि उझकि रति गाढ़ी करि।
जोम भरी पियहि झकोरन हराये लेन॥
याद कर पी की सब निरदय घातें अजु।

प्रथम समागम को बदलो चुकाये लेत॥

उन्होंने रीतिकालीन कवियों की तरह यौन-विकृति जैसे स्वरति, समरति, चित्ररति, वस्त्ररति, पपडीपन, रति इत्यादि का वर्णन किया हैं। बिहारी, सुरदास जैसे साहित्यिक श्रृंगार की झलक भी इनकी कविता में पायी जाती हैं। बिहारी की तर्ज पर इन दुखिया अँखियान को सुख सिरज्यो ही नाँही।

इन दुखियान को न सुख सपने हुँ मिल्यों

यों ही सदा व्याकुल विकल अकुलायेंगी।
बिना प्रान प्यारे भये दरस तिहारे हा,

देखि लीजों आँखे ये खुली रह जायँगी॥

सुरदास के तर्ज पर -

सखि ये नैना बहुत बुरे।

तब सों भये पराये, हरि सों जब सों जाइ जुरें।

मोहन के रस भर हैं डोलत तलफल तनिक दुरे।

राधाकृष्ण दास, ठाकुर जगनमोहनसिंह, अंबिका दत्त व्यास में भी श्रृंगार वर्णन पाया जाता हैं।

भक्ति भावना[सम्पादन]

हमने पहले ही कहा हैं की भारतेन्दु वैष्णव भक्त थे। राधा-कृष्ण के प्रती उनमें भक्ति थी। बल्लभ सम्प्रदाय में वह दीक्षित थे।

मेरे तो राधिका नायिका हो गति

लोक दोऊ रहौ कै नसि जाओ।
मेरे तो साधन एक ही हैं,

जय नंदलाला वृषभानु कुमारी।

उनके काव्य में विनय-भाव की भक्ति प्राप्त होती हैं। प्रेमधन ने 'अलौकिक लीला' नामक कविता में स्फुट भक्ति पदों को रखा हैं, अंबिका दत्त व्यास की 'कंसवध' जैसी प्रबंध रचना राधाकृष्णदास की विनयभावयुक्त कृष्ण स्तुती का उल्लेख भारतेन्दु युगीन कृष्णभक्ति काव्य के संदर्भ में आवश्यक है। इसके अलावा प्रेमधन की 'सूर्यस्त्रोत', भारतेन्दु की 'उत्तरार्ध भक्तमाल', और 'कार्तिकस्नान', प्रतापनारायण मिश्र की 'नवरात्र के पद', और राधाचरण गोस्वामी की 'नवभक्तमाल' उल्लेखनीय कृतियाँ हैं।

भारतेन्दु भक्ति में देशानुरागी भाव भी दिखाई देता हैं अर्थात वह देशहित की कामना करता हैं। साम्प्रदायिक मत-मतान्तरो पर आधारित धार्मिकता के स्थान पर उन्होंने उदारता का परिचय दिया हैं। 'जैन कुतुहल' में उन्होंने धार्मिक विद्वेष की व्यर्थता को प्रतिपादित किया हैं। प्रतापनारायण मिश्र, राधाकृष्णदास जैसे कवियों में भी देशानुराग भक्ति को देखा जा सकता हैं।

प्रकृति चित्रण[सम्पादन]

रीतिकाल की तरह प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण का अभाव भारतेन्दु युगीन कविता में रहा है और वह स्वाभाविक है। सौन्दर्य बोध में सहायक स्वतंत्र प्रकृति चित्रण का श्रेय किसी सीमा तक ठाकुर जगमोहनसिंह को ही दिया जा सकता हैं। अम्बिकादत्त व्यास की 'पावस पचासा', गोविन्द गिल्लाभाई की 'षडऋतु', और 'पावस पयोनिधी', आदि कृतियों में वसंत और वर्षा ऋतु का आलंबनात्मक चित्र मौजुद हैं। भारतेन्दु की 'प्रात समीरन', प्रेमधन की 'मयंक महिमा' और प्रतापनारायण मिश्र की 'प्रेम पुष्पांजली' में स्वतंत्र प्रकृति चित्रण हैं किन्तु सफलतापुर्वक नहीं ऐसा मत नगेन्द्र व्यक्त कर चुके हैं क्योंकि प्रकृति को श्रृंगारिक मनोदशाओं, सामाजिक उद्बोधन, नीति कथन आदि से संबंधित करने की अनिवार्यता ने प्रकृति के स्वतंत्र वर्णन को थोड़ी चोट पहुंचा दी है। भारतेन्दु युगीन प्रकृति चित्रण का एक ‌उदाहरण प्रस्तुत है:-

तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये

झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाये।
किधौं मुकुर में लखत उझकि सब निज-निज सोभा

कै प्रणवत जल जानि परम पावन फल लोभा।।

रीतिकाल के उद्दीपक वर्णन को न स्वीकारते हुए संस्कृत काव्य में उपलब्ध नैसर्गिक सौन्दर्य वर्णन से प्रकृति का सजीव चित्रण उनके काव्य में आया हैं। पर्वत श्रृंखला का सौन्दर्य चित्रण इसी प्रकार का हैं-

पहार अपार कैलास से कोटिन उंची शिखा लगि अम्बर चूम।

निहारत दीठि भ्रमै पगिया गिरि जाक उत्तंगता ऊपर झूम॥
प्रकाश पतंग सो चोटिन के बिकसें अरविन्द मलिन्द सुझूम।

लसै कटि मेखला के जगमोहन कारी घटा घन घोरत धूम॥

हास्य-व्यंग्य[सम्पादन]

हास्य-व्यंग की अभिभक्ति भी इस युग की महत्वपूर्ण विशेषता हैं। हास्य-व्यंग को राष्ट्रीय समस्याओं से जोड़ने का प्रयास इस काल में हुआ हैं। पश्चिमी सभ्यता, विदेशी शासन, सामाजिक अंधविश्वासो, रुढ़ियों, पर कवियों ने कठोर व्यंग्य किए हैं। उनमें विषय एवं शैली की भिन्नता भी रही हैं। अनेक विषयों पर इन कवियों ने हास्य-व्यंग लिखे हैं, जैसे:- एक प्राचीन रुढ़िगत विकृतियों पर, दो विदेशी संपर्क में भारतीयों की स्थिती पर, तीन भक्ति संबंधी संकीर्ण विचारों पर, चार विकृत सांस्कृतिक जीवन पर, पाँच राजनैतिक व्यवस्था पर महत्व आदि पूर्ण हैं। भारतेन्दु ने तो अपने व्यंग्य वाणी से पूरे देश के शोषकों को नंगा कर दिया है। एक ‌उदाहरण है--

चूरन अलमबेद का भारी, जिसको खाते कृष्ण मुरारी।।

मेरा पाचक है पचलोना, जिसको खाता श्याम सलोना।।
चूरन बना मसालेदार, जिसमें खट्टे की बहार।।
मेरा चूरन जो कोई खाए, मुझको छोड़ कहीं नहि जाए।।
हिंदू चूरन इसका नाम, विलायत पूरन इसका काम।।
चूरन जब से हिंद में आया, इसका धन-बल सभी घटाया।।
चूरन ऐसा हट्टा-कट्टा, कीन्हा दाँत सभी का खट्टा।।
चूरन चला डाल की मंडी, इसको खाएँगी सब रंडी।।
चूरन अमले सब जो खावैं, दूनी रिश्वत तुरत पचावैं।।
चूरन नाटकवाले खाते, उसकी नकल पचाकर लाते।।
चूरन सभी महाजन खाते, जिससे जमा हजम कर जाते।।
चूरन खाते लाला लोग, जिनको अकिल अजीरन रोग।।
चूरन खाएँ एडिटर जात, जिनके पेट पचै नहीं बात।।
चूरन साहेब लोग जो खाता, सारा हिंद हजम कर जाता।।

चूरन पुलिसवाले खाते, सब कानून हजम कर जाते।।

इस समय के राजनैतिक व्यंग में उल्लेखनिय है--अंग्रेजो की शोषण नीति, भारतीयों की निष्क्रियता एवं नपुसंक मनोवृत्ति, पराधीन वृत्ति आदि। भारतेन्दु की तीन व्यंग शैलियाँ हैं - पैरोडी, स्यापा और गाली। डॉ. नगेन्द्र कहते हैं--'बन्दरसभा' के गीतों की रचना उन्होंने उर्दु नाटक इन्दर सभा के गीतों की पैरोडी के रुप में की हैं। उर्दु का स्यापा उर्दु-फारसी के स्यापा, नामक काव्यरुप की शैली में लिखित हैं। है-हैं उर्दू हाय-हाय, कहाँ सिधारी हाय-हाय, आदि पंक्तियों में उन्होंने बनारस अखबार के समाचार-शीर्षक उर्दु मारी गयी पर व्यंग किया हैं। 'समधिन मधुमास' की रचना 'गाली' व्यंगगीति की शैली में की गयी हैं। नये जमाने की मुकरी, समकालीन सामाजिक, राजनीतिक विसंगतियों पर लिखी हैं। साथ ही प्रतापनारायण मिश्र की हरगंगा, बुढ़ापा, कारष्टक, आदि प्रसिध्द रचनाएँ हैं। भारतेन्दु में अमीर खुसरो की मुकरी शैली स्पष्ट होती हैं। मद्यपान संबंधी व्यंग का उदाहरण है--

मुँह जब लागै तब नही छुटे, जाति मान धन सब कुछ लूटे।
पागल करि मोहि करे खराब, क्यों सखि सज्जन नहीं सराब॥

रीति-निरुपण के परम्पराबध्द ग्रंथो की रचना[सम्पादन]

रीति-निरुपण संबंधी परम्परा से संबंध ग्रंथो का लेखन भी इस कालखन्ड में हुआ हैं। भारतेन्दु युग में लछिराम, बह्मभट्ट, कविराजा मुरारिदान और बालगोविन्द मिश्र आदि रीति-निरुपण पध्दती ग्रंथ लिख रहे थे। जिसमें प्रमुख हैं लछिराम की 'महेश्वर विलास' जिसमें नायिकाभेद एवं नवरस का विश्लेषण हैं, 'रामचन्द्रभूषण' अलंकार शास्त्र का ग्रन्थ है, 'रावणेश्वर कल्पतरु' सर्व-काव्यांग निरुपण कृती हैं। मुरारिदान का 'जसवन्त जसोभूषण' वृहत काव्य शास्त्रीय ग्रंथ हैं। यह मुलतः अलंकार ग्रंथ हैं जिसमें काव्य-स्वरुप, शब्दशक्ति, गुण और रीति का सार मौजुद है। बालगोविन्द मिश्र का 'भाषा छन्द प्रकाश' में अड़तालीस मात्रिक-वार्णिक छन्दों का स्वरचित काव्य-लक्षण-उदाहरण प्रस्तुत है। अन्य दो उल्लेखनिय रचनाकार के रचनाएं हैं प्रताप नारायण की 'रसकुसुमाकर' (१८९४) और कन्हैयालाल पोद्दार की 'अलंकार प्रकाश' (१८९६)। महत्वपूर्ण बात यह भी है की रीति-निरुपण की वृत्ती पिछड़ती जा रही थी और काव्य नये साँचे में ढल रहा था। भारतेन्दु के बाद तो यह प्रवृत्ति रही ही नहीं।

समस्यापूर्ति परक काव्य रचना[सम्पादन]

समस्यापूर्ति परक काव्य रचना इस काल में बड़ी लोकप्रिय रही हैं। बकायदा इस प्रकार की काव्य गोष्टियों का आयोजन किया जाता था और बड़े-बड़े कवि उसमें ससम्मान भाग लेते। कठिन से कठिन विषयों पर समस्यापूर्ति करायी जाती। कहा जाता हैं की, अम्बिकादत्त व्यास ने अपने कवि जीवन का आरंभ काशी से 'कविता वर्धिनी सभा में पुरी अम्मी की कटोरिया-सी, चिरंजीवी रहें विक्टोरिया रानी समस्या की पूर्ति करके सुकवि की उपाधी पायी थी। कानपूर की रसिक समाज, बाबा सुमेरसिंह द्वारा निजामाबाद (जिला आजमगढ़) की 'कवि समाज' काफी प्रसिद्ध मंच हैं। अम्बिकादत्त के पिता दुर्गादत्त व्यास का 'समस्यापूर्ति-प्रकाश' अम्बिकादत्त व्यास का ‘समस्यापूर्ति सर्वस्व', गोविन्द गिल्लाभाई का 'समस्यापूर्ति प्रदीप', गंगाधर द्विजगंग का 'समस्या प्रकाश', नर्मदेश्वरप्रसाद सिंह का 'पंचरत्न', तथा भारतेन्दु ग्रंथावली में समस्यापूर्तियों का संग्रह उपलब्ध हैं। प्रतापनारायण मिश्र की समस्यापूर्ति काव्य का एक उदाहरण देखिए--

वन बैठी है मान की मूरति-सी, मुख खोलत बोलें न 'नाही' न हां।

तुम ही मनुहारी कै हारि परे, सखियान की कौन चलाई तहां॥
बरषा है 'प्रतापजू', धीर धरों, अब लो मन को समझायो जहाँ।

यह ब्यारि तबै बदलेगी कछू, पपीहा जब पुछिहै पीव कहाँ?

काव्यानुवाद का आरंभ[सम्पादन]

काव्यानुवाद की परम्परा भी इसी युग से शुरु हो चुकी है। संस्कृत और अंग्रेजी के काव्यानुवाद बड़ी मात्रा में हुए है। सर्वप्रथम उल्लेखनिय हैं, राजा लक्ष्मणसिंह का 'रघुवंश' और 'मेघदूत'। भारतेन्दु ने 'नारद-भक्ति-सूत्र' और शांडिल्य के 'भक्तिसूत्र' को 'तदीय सर्वस्व' और 'भक्तिसूत्र वैजयन्ती' नाम से अनुवाद किया हैं। बाबू तोताराम ने वाल्मिकी रामायण का 'राम-रामायण', ठाकुर जगमोहनसिंह ने 'ऋतूसंहार' एवं 'मेघदूत', लाला सीताराम भूप ने 'मेघदूत', 'कुमार संभव', रघुवंश और ऋतूसंहार। अंग्रेजी से श्रीधर पाठक ने गोल्डस्मिथ का 'हरमिट' और 'डेंजर्टेड विलेज' को 'एकांतवासी योग' तथा 'उजड़ ग्राम' नाम से अनुवाद किया हैं। भाषा, लालित्य, शब्दानुभाव सरलता के गुणों से ये सम्पन्न हैं ऐसा डाक्टर नागेन्द्र ने कहा हैं।

काव्य रूपों की विविधता[सम्पादन]

भारतेन्दु युग में काव्य रुपों के विविध प्रयोग रुढ हो गये कुछ परम्परागत, लोकगीत, संगीतात्मक थे तो व्यंग नये रुप में विकसित हुए किन्तु प्रधानता मुक्तक काव्य की ही रही हैं। उसके साथ प्रबंध गीति में भारतेन्दु के रानी छद्मलीला, देवी छमलीला, और तन्मयलीली का उल्लेख किया जाता हैं। निबंध काव्य रुपों में विजयिनी विजय वैजयन्ती तथा हिन्दी भाषा महत्वपूर्ण हैं। कुछ सतसई परम्परा के उदाहरण भी देखे जा सकते हैं। हरीऔध का कृष्णशतक (१८८२) अम्बिकादत्त व्यास का 'सुकवि सतसई' आदि।

प्राचीन पद शैली के आधार पर ठुमरी, मलार, दादरा, ईमन, आदि राग-रागिनीयों में काव्य रचनाएँ की गई हैं। लोकसंगीत की शैली काफी लोकप्रिय थी उदाहरणार्थ प्रेमघन और प्रतापनारायण मिश्र की कजलियाँ तथा भारतेन्दु की वर्षा विनोद आदि। भारतेन्दु ने मुकरियों का लेखन भी किया हैं। गज़ल का नवप्रयास 'रसा' उपनाम से भारतेन्दु द्वारा तथा 'अब्रु' उपनाम से प्रेमधन द्वारा किया गया हैं। इससे यह कहा जा सकता हैं की काव्य के परम्परागत रुपों में इस काल के कवियों ने बंधे न रहकर नये प्रयोग भी किये हैं।

भाषा[सम्पादन]

भारतेन्दु युग में काव्य के क्षेत्र में ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ तो गद्य के क्षेत्र में खड़ी बोली का। हिन्दी-उर्दु का विवाद इस काल के राजनीति की देन रही फिर भी भारतेन्दु ने हिन्दी के दायित्व को 'हिन्दी भाषा' नामक ग्रंथ लिखकर पूर्ण किया। उन्होंने उर्दु-फारसी की जटिलतम तत्सम शब्दावली का बहिष्कार भी किया। काव्य में ब्रज के साथ-साथ अन्य बोली, भाषा शब्दों के प्रयोग दिखाई देता हैं, जैसे भोजपूरी, बुंदेलखंडी, अवधी, आदि। इसके अलावा उर्दु-अंग्रेजी का प्रयोग भी किया गया हैं। ब्रजभाषा और खड़ीबोली को लेकर आंदोलन चला। अयोध्याप्रसाद खत्री ने खडीबोली का आंदोलन (१८८८) में चलाया। कुछ कवियों ने विरोध भी किया। परिणामतः खडीबोली गद्य के साथ पद्य का विकास हुआ। आगे चलकर द्विवेदी युग में यह विवाद खत्म हुआ। काव्य क्षेत्र में भी खड़ी बोली का प्रयोग होने लगा।

छंद-अलंकार[सम्पादन]

भारतेन्दु युगीन कवियों ने परम्परागत छंद-अलंकारो का प्रयोग अपनी कविताओं में किया हैं। जिसमें उल्लेखनिय हैं आर्या, कुण्डलियाँ, दोहा, चौपाई, सोरठा, रोला, हरिगीतिका जैसे छंदो तथा कविता, सवैया, मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी, वंशस्थ, वसन्ततिलका जैसे वर्णिक छंदों का विविधमुखी प्रयोग, लोकसंगीत का गाँवो में प्रचार-प्रसार करने के लिए भारतेन्दु ने कजली, ठुमरी, खेमटा, कहरबा, गेल, चैती, अद्ध, होली, साँझी, लाबें, लावनी, बिरहा, चनैनी आदि छंदो को उपयोग में लाया हैं। किसी नये छंद का प्रयोग भले ही इन कवियों ने न किया हो परंतु काव्य की नई उद्भावना विषय एवं शैली के दृष्टि से मौलिक रही हैं।

द्विवेदी युगीन प्रवृत्तियां[सम्पादन]

महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्मान में जारी डाक टिकट

अंग्रेजों के दमन चक्र और कुटनीतिक शासन का विरोध करने के लिए इस युग में परंपरा को छोड़कर, साहित्य में पौराणिक तथा ऐतिहासिक घटनाओं और चरित्रों को राष्ट्रीय भावना के परिपेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया। मध्यवर्ग के साथ निम्नवर्ग का चित्रण किया जाने लगा। परिणामत: किसान, मजदूर, स्त्री-दलितों का कष्टप्रद जीवन उभरकर आया। राजनीतिक चेतना और राष्ट्रीय भावना का स्वर मुखरित हुआ। प्रखर बुद्धिवाद के कारण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नीर-क्षीर विवेक का आग्रह शुरु हुआ। मानवीय मूल्यों का आग्रह भी इसी काल में शुरू हुआ। भारतीय और युरोपिय दर्शन का संघर्ष प्रारंभ भी इसी काल की देन है। भारत के हृदय तथा युरोप को बुद्धि पक्ष मानकर उसके एकमेक होने की स्थिती को आदर्श माना जाने लगा। आर्य समाज का आंदोलन इस समय जोर पर था। गुरुकुल कांगडी की स्थापना हो चुकी थी। आर्यसमाज के नेतृत्व में डी.ए.वी कॉलेजस खुलने लगे थे। शिक्षा का सार्वत्रिक प्रचार-प्रसार हो रहा था। तर्क, मानवता, राष्ट्रीयता, स्त्री-शिक्षा, आदर्शवाद इस युग के मूल्य और प्रेरणा रही है। जिसका व्यापक प्रभाव साहित्य पर पड़ा। साथ-साथ इस युग की सबसे महत्वपूर्ण देन थी हिंदी भाषा का विकास, जिसके विकास में महावीर प्रसाद द्विवेदी और सरस्वती पत्रिका ने विशेष भूमिका निभाई।

बौद्धिकता का प्रतिपादन[सम्पादन]

ब्रह्मसमाज, आर्यसमाज, थियोसाफिकल सोसायटी के साथ भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने सामाजिक जागरण का बड़ा कार्य भारतेन्दु युग से ही शुरु किया था। वेद को तर्क प्रमाण पर कसकर उसकी नयी आलोचना आर्य समाज प्रस्तुत कर रहा था। चाहे वह अध्यात्मिक उन्नत्ति हो, कर्मकांड हो, स्त्री प्रश्न हो इन सबके प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोन एवं नयी शिक्षा से प्राप्त दृष्टि से देखने का प्रयत्न किया गया। परिणामत: पुराने को आँख मूंद कर न स्वीकारते हुए उसके प्रति विद्रोह का भाव प्रकट होने लगा। अनेकेश्वर की जगह एकेश्वर वाद इसका प्रमाण है। बुद्धिवाद के कारण ही देवी-देवताओं की ओर देखने की दृष्टि बदल गयी। कर्मकांड के थोथे पन को उजागर किया गया। रूढ़िवादिता एवं सड़ी-गली प्राचीन परंपराओं पर कुठाराघात किये जा रहे थे। देवता की अवतारवादी संकल्पना को नकारा जा रहा था। अलौकिता की जगह लौकिकता का चित्रण किया जा रहा था। एक तरह से यह बौद्धिकता का युग, तार्किक प्रणाली से सोचने-विचारने का युग प्रारंभ गया था। जातीवाद की आलोचना इसी कारण होती रही। प्रकृति तथा अलौकिक शक्ति के प्रति मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाने लगा था। यह आग्रह भाषा के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। बौध्दिकता इस युग की प्रधान प्रवृत्ती रही है उसका प्रभाव आनेवाले काल पर भी पड़ा।

मानवता का प्रकटीकरण[सम्पादन]

मानवतावाद की भावना का विकास भारतेन्द युग से ही प्रारंभ हो चुका था। साहित्य में जनवादी प्रवृत्ति के संकेत इसी युग से प्राप्त होते है। शायद यही कारण रहा है की 'हरिऔध' के 'राम-कृष्ण' आदर्श समाज-सुधारक और नेता है। मैथिलीशरण गुप्त के 'राम' अवतारी न होकर आदर्श मानव है, जो निजकर्मों से इस धरती को स्वर्ग बनाने आये है।

भारत सरकार द्वारा 1974 में मैथिलीशरण गुप्त जी के सम्मान में जारी डाक टिकट
मैं आया उनके हेतु कि जो तापित हैं,

जो विवश, विकल, बल-हीन, दीन, शापित हैं।
हो जायँ अभय वे जिन्हें कि भय भासित हैं,
जो कौणप-कुल से मूक-सदृश शासित हैं।
मैं आया, जिसमें बनी रहै मर्यादा,
बच जाय प्रलय से, मिटै न जीवन सादा;
सुख देने आया, दुःख झेलने आया;
मैं मनुष्यत्व का नाट्य खेलने आया।
मैं यहाँ एक अवलम्ब छोड़ने आया,
गढ़ने आया हूँ, नहीं तोड़ने आया।
मैं यहाँ जोड़ने नहीं, बाँटने आया,
जगदुपवन के झंखाड़ छाँटने आया।
मैं राज्य भोगने नहीं, भुगाने आया,
हंसों को मुक्ता-मुक्ति चुगाने आया।
भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया,

नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया!

अर्थात पशुवत जीवन जीने वाले सामान्य मनुष्य के प्रती गहरी संवेदना का भाव इस युग के साहित्य में आया है। उसके प्रति स्नेह, सहानुभूती, कर्तव्य, क्षमा की भावना का अभिव्यक्तिकरण कवियों ने किया है। सर्वधर्म समता का बिगुल भी इसी काल में बजने लगा था। स्त्री-दुर्दशा के चित्र कविता में उतारे जा रहे थे।

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में दूध और आँखों में पानी
रबीन्द्रनाथ ठाकुर

से उसकी कारुणिक अवस्था प्रकट कर, उसके प्रती क्षोभ ही व्यक्त किया जा रहा था। रबीद्रनाथ के विश्वबंधुत्व की कल्पना इस समय का आदर्श रही है। साहित्य का सृजन आदर्श की प्रतिष्ठापना और मनुष्य महत्त्व के लिए किया जा रहा था।

आदर्शवाद[सम्पादन]

यह युग पाश्चात्य वैज्ञानिक एवं नये शिक्षा के संपर्क में आये भारतीय तथा परंपरागत कालबाह्य मुल्यों की टकराहट का रहा है। वेदों को वैज्ञानिक आधार प्रदान करने की भरसक कोशिशे आर्य समाज, ब्रह्मसमाज, विवेकानंद तथा प्रार्थना समाज ने की थी।

स्वामी विवेकानंद

विवेकानंद ने तो भारतीय आध्यात्मवाद को हृदयवाद के रूप में पश्चिमी भौतिकवाद के सामने रखकर उसको प्रतिष्ठा दिलायी थी। यह सिधा-सिधा दो संस्कृतियों के भीतर की टकराहट थी। पश्चिम ने देश को पिछड़ा और सड़ा-गला साबित कर दिया था। अज्ञानी, अंधविश्वासी करार दिया था। इस सबको दूर कर भारतीयता का गौरव गान करने की प्रवृत्ती इस काल में विद्यमान है। बुद्धिवाद पर अध्यात्म की अर्थात बुद्धि पर हदय की विजय के रुप में भारतीय अध्यात्म परंपरा का समन्वय साधने की चेष्टा की जा रही थी। छायावाद में इसे प्रसाद ने कामायनी में अभिव्यक्त किया है। इसी को साहित्यकार आदर्श के रुप में स्थापित करते जा रहे थे। भौतिक सुख सुविधाओं की अपेक्षा मानसिक संतुष्टि की चर्चा चल रही थी। आर्यसमाज, ब्रह्म समाज, तथा राष्ट्रीय काँग्रेस ने भी 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' को पराश्रय दिया था। एक तरह से इसके पीछे ईसाई मत के नकार का भाव भी छिपा हुआ था। रविद्रनाथ के मानवतावाद ने हिन्दी को बल प्रदान किया, यह सच्चाई है।

राष्ट्रीय भावना और राजनीतिक चेतना[सम्पादन]

द्विवेदी युगीन कवियों ने देशभक्ति संबंधी कविता द्वारा जागरण फैलाया है। इस युग की कविता राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत है। राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन को प्रेरित करने, देशवासीयों को उनकी गुलामी का अहसास कराने, उनकी निष्क्रियता, अकर्मण्यता की मनोवृत्ती को स्पष्ट करने का प्रयास कविता द्वारा हुआ है। लोकमान्य की राजनीतिक स्वतंत्रता की माँग, स्वदेशी वस्तुओं के प्रति प्रेम आदि भावना का विकास काँग्रेस की ओर से किया जा रहा था।

साहित्य में भी इसके प्रतिबिंब आये है। देश प्रेम कविता का विषय हो गया, फिर कविता छोटी हो या प्रबंधात्मक। मैथिलीशरण गुप्त का 'साकेत', अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का 'प्रिय प्रवास' रामचरित उपाध्याय का 'रामचरित चिंतामणी' और सत्यनारायण कविरत्न का 'भ्रमरगीत' आदि रचनाएँ हिन्दी भाषा के गौरव ग्रंथ होने के साथ-साथ देशभक्ति और अतीत की ज्वलंत विभुतियों के भव्य निदर्शक भी है। इसमें वर्तमान भारतीय स्थिती पर करुणा प्रकट की है और अतित को गौरवशाली बनाया गया है। इस युग की कविता ने किसी प्रकार की जातिगत, धर्मगत संकीर्णता को पराश्रय नहीं दिया। संपूर्ण भारत एक का भाव कविता में आया।

इस व्यापक चेतना को फैलाने में हिन्दु, मुस्लिम, सिख, इसाई सब ने आपस में भाई-भाई का नारा फैलाया। जिसमे शिक्षित भारतीय जनता में नवसंचार हुआ और वह आजादी के आंदोलन में आत्मोत्सर्ग करने के लिए तत्पर हुआ। नयी राजनीतिक चेतना का भय ब्रिटिश शासन को भी था। इसलिए इस काल की पत्रकारिता पर कड़े कानुन लागु किये गये थे। कविवर शंकर ने आत्मोत्सर्ग एवं स्वतंत्रता प्राप्ती के संदर्भ में अपनी कविता 'बलिदान गान' में कहा है-

देशभक्त वीरो, मरने से नेक नही डरना होगा
प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा।

प्रत्येक कवि देश की हीन-दीन दशा और उसके प्रती क्षोभ व्यक्त करता है। मिथ्या दंभ, अभिमान को निकालकर देश दशा पर ध्यान देने का आग्रह करता है। रायदेवीप्रसाद 'पूर्ण' की कविता "आलस, फुट, खुदगर्जी, मिथ्या कुलीनता आदि अभिशापों की ओर भी इस युग का कवि दृष्टि डालता है और उसके निराकरण की कामना करता है"

भरतखण्ड का हाल जरा देखो है कैसा।

आलस का जंजाल जरा देखो है कैसा॥
जरा फूट की दशा खोलकर आँखे देखो।
खुदगर्जी का नशा खोलकर आंखे देखो॥
है शोखी दौलत की कहीं, बल का कही गुमान है।

है खानदान का मद कहीं, कहीं नाम का ध्यान है॥

द्विवेदी युग ने देशवासीयों को उनकी स्थिति से अवगत कराकर आजादी के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी। इसलिए उन्होंने कुप्रथाओ, बाह्याडम्बरों, सामाजिक कुरीतियो, देश दुर्दशा को कविता का विषय बनाया। काँग्रेस में मध्यवर्ग का उदय एवं उभार देश में नयी राजनीतिक चेतना फैलाने में कारगर सिध्द हुआ। देशोन्नती के लिए सभी जाती वर्ग आग्रही रहे। बंग-भंग की भारत विरोधी और जाति-भेदीकरण की नीति से राष्ट्रीय भावनाओं से पूरित भारतीय जनता की आँखे खुल गई और वे अंग्रेजो को बड़े संदेह की दृष्टि से देखने लगे और इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप तथा राष्ट्रीयता के अनुरुप सभी जातियों में भ्रातृत्व भावना का प्रचार हुआ। रुपनारायण पण्डेय की एक कविता इसी प्रकार की है--

जैन बौध्द पारसी यहूदी मुसलमान सिख ईसाई।

कोटि कंठ से मिलकर कह दो, हम सब है भाई-भाई॥
पुण्य भूमि है, स्वर्ग भूमि है, जन्म भूमि है देश यही।

इससे बढ़कर या ऐसी ही दुनिया में है जगह नहीं॥
भारत सरकार द्वारा सुभद्रा कुमारी चौहान जी के सम्मान में जारी डाक टिकट

युगों से ही यह धारणा चली आ रही थी कि कविता करना मुख्यतः पुरुषों का कार्य है किन्तु नवजागरण के बाद कई महान कवयित्रियों ने भी साहित्य के क्षेत्र में कदम जमाना शुरू की। इन्हीं कवयित्रियों में सुभद्रा कुमारी चौहान थी जिनके हृदय में राष्ट्रीय प्रेम कुट कुट कर भरी थी। ‘जलियांवाला बाग' १९१९ के नृशंस हत्याकांड से उनके मन पर गहरा आघात लगा। उन्होंने तीन आग्नेय कविताएँ लिखीं। ‘जलियाँवाले बाग़ में वसंत’ में उन्होंने लिखा-[२]

परिमलहीन पराग दाग़-सा बना पड़ा है

हा! यह प्यारा बाग़ ख़ून से सना पड़ा है।
आओ प्रिय ऋतुराज! किंतु धीरे से आना
यह है शोक स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खाकर

कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर।

सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की भावना[सम्पादन]

द्विवेदी युगीन कविता में देश के अतीत का गौरव गान बड़ी श्रद्धा, सहानुभूती और प्रेम के साथ किया है। स्वदेशी आंदोलन को जगाने के लिए इस प्रकार का वर्णन किया गया। वैसे हमने पहले ही कहा है की 'नवजागरण' हेतु हिन्दु धर्म ग्रंथों की नयी व्याख्या कर उनका पुनरुत्थान इस युग में किया जा रहा। तत्कालीन समय में स्वाधीनता आंदोलन तो विकसित हुआ पर कुछ समय के बाद साम्प्रदायिक भावनाओं का विकास भी हुआ। भारतेन्दु एवं द्विवेदी युगीन साहित्य ने पाठकों, आम जनता के मन में, वर्तमान में जिसे हम 'हिन्दुत्व' कहते है उसका विकास करने में योग दिया ऐसा कहा जा सकता है। नाटक एवं उपन्यास, कहानी और एकंकी साहित्य के प्रमाण दिये जा सकते हैं।

इस समय के विद्वानों ने कहा है "जहाँ भारतेन्दु युग में केवल प्राचीन के प्रति पूज्य भाव था और नवीन के प्रति निराशा, वहाँ द्विवेदी युग के कवियों में शक्ति और साहस का अपूर्व मिश्रण दिखाई पडता है।" मातृभूमि की वंदना, उसे पूण्यभूमि के रूप में चित्रित करना आदि भाव जहाँ भारतेन्दु युग में निराशा के स्थान पर द्विवेदी युग में आशा और विश्वास का भाव भरते है। मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत-भारती' जैसे काव्यों ने जोश एवं उत्साह का संचार किया। हर कंठ की वह भारत-जननी बनी उक्त युग में यह कार्य राजनीतिक चेतना की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। परंतु आनेवाले भविष्य को मात्र अतीत की ओर मोड़ दिया गया इसमें दो राय नहीं होनी चाहिए। बंकीमचंद्र की 'आनंदमठ' का प्रकाशन हो चुका था। हिन्दी के अधिकांश साहित्यकार बांग्ला से प्रभावित रहे है।

आनन्द मठ के रचनाकार बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय।

'आनंदमठ' के संबंध में बड़ी मार्मिक टिप्पणी वीर भारत तलवार ने की है, "आनंदमठ (१८८२) में प्रकाशित इस उपन्यास में विद्रोही हिंदू सन्यासियों के गुप्त संगठन का वर्णन है। ये सन्यासी मीरजाफर के शासन को 'मुसलमानी राज' मानकर उसके ख़िलाफ़ लड़ते है, लेकिन कलकत्ते में प्रबल हो रहे अंग्रेजों के खिलाफ नहीं... (अंग्रेजी राज को मित्र बताते हुए उसके रहने और बनने में विद्रोहीयों ने सहयोग दिया ताकी) अंग्रेजों के बिना राजा हुए सनातन धर्म का उध्दार नहीं होगा। हर वर्ग में राजनीतिक चेतना जगाने का प्रयास काँग्रेस के साथ कवियों ने भी किया मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' रामनरेश त्रिपाठी आदि। श्रीधर पाठक विद्यार्थीयों को प्रेरित करते हुए लिखते है-

अहो छात्रवर-वृद नव्य भारत-सुत प्यारे।

मातृगर्व-सर्वस्व मोदप्रद गोद-दुलारे॥
सतसेवा व्रत धार जगत के हरो क्लेश तुम।

देश प्रेम में करो प्रेम का अभिनिवेश॥

एक प्रकार से राजनीतिक चेतना को जगाने में प्रतिबध्द काव्य की रचना, काँग्रेस के आंदोलन को अपने कंधे पर लेकर चल रहा था। नयी राष्ट्रीय भावना का विकास हो रहा था।

धार्मिक कल्पना[सम्पादन]

इस काल की कविता में धार्मिकता की अलग कल्पना की गई है। बौद्धिकता के प्रभाव के कारण ईश्वर आदी के मानवीय रूपों की कल्पना की गई है। 'साकेत' में मैथिलिशरण गुप्त लिखते है-

राम, तुम मानव हो? ईश्वर नहीं हो क्या?

आदर्श की प्रस्थापना करने हेतू 'राम' का मानव रुप की कल्पना मनुष्य के दुःख, कष्ट, हरण हेतू की गयी साथ ही आर्य धर्म बनाकर, धरती को स्वर्ग बनाने की बात भी राम करने लगते है। आगे गुप्तजी कहते है-

मैं आये का आदर्श बताने आया,

जन-सम्मुख धन को तुच्छ जताने आया।
भव में नव वैभव प्राप्त कराने आया,
नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया।
सन्देश यहाँ नहीं मैं स्वर्ग का लाया,

इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।

मानव की सेवा और सामन्ती सभ्यता के निंदा का भाव कवियों में रहा है। इसलिए उनमें मानव सेवा से ही ईश्वर सेवा का भाव विद्यमान है। जिस प्रकार 'साकेत' के राम मानव रूप में आये उसी प्रकार 'प्रिय प्रवास' (हरिऔध') के कृष्ण भी मानव सेवा करते दिखाए गए है। बुद्धिवाद के युग में अवतार वाद का प्रतिपादन करना द्विवेदी युग को असंभव था। इसलिए दीन-दलितों, दुखितों, श्रमजीवों में ईश्वर की कल्पना की गई और ईश्वर प्रेम, विश्व प्रेम में बदल गया ठाकुर गोपालशरण सिंह कहते है-

जग की सेवा करना ही है, सब सारों का सार
विश्वप्रेम के बंधन ही में, मुझ को मिला मुक्ति का द्वार।

वस्तुत: जीवन, जगत और प्रकृती में व्याप्त ईश्वर के प्रती कवि की अभिव्यक्ति भावना में रहस्यात्मकता आ गई। वही आगे छायावाद की प्रमुख प्रवृत्ति बन गई। धार्मिक भावना को जनसेवा, विश्वप्रेम से जोड़कर उसे कुछ अलग ढंग से विकसित किया गया।

नारी स्वातंत्र्य और उत्कर्ष[सम्पादन]

रीतिकालीन नारी के सौंदर्य वर्णन की परंपरा को जोरदार आघात द्विवेदी युग में मिला। नारी संबंधी मान्यताएँ बदलने लगी। विभिन्न सामाजिक कार्य करनेवाली संस्थाओं तथा काँग्रेस के राजनीतिक अंदोलन के परिणाम स्वरुप स्त्री के कोमल भाव की जगह कठोर, वीर भाव का चित्रण होने लगा। उनकी स्वतंत्रता का उत्कर्ष हुआ। पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर वह राजनीतिक आंदोलन में उतर चुकी थी। प्रचीन रूढ़ियो, परंपराओं को वे स्वंय तोड़ रही थी। जीवन और जगत के प्रती उनकी अपनी दृष्टि का विकास हो रहा था। अपनी स्वतंत्रता, अधिकार के प्रती वह सजग हो चुकी थी। पुरुषसत्ताक व्यवस्था को धक्का दिया जा रहा था। स्त्री जाति पर होनेवाले अन्याय, अत्याचारों के प्रति कवियों ने दृष्टि डाली। श्रीधर पाठक, मैथिलिशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' आदि प्रमुख कवियों ने उसकी बदली चेतना द्वारा नवयुग लाने का प्रयास किया। साथ ही उसके प्रती अन्याय-अत्याचार की भावना को सामाजिकों से निकालने का तथा उसमें सुधार करने का भाव कवियों में रहा है। ईश्वर से प्रार्थना करते हुए श्रीधर पाठक लिखते है--

दीनबंधु सदृष्टि कीजें बाल-विधवा और।

नारी के नये रूपों को वे हमारे सामने लाते है वह जनसेविका, देशभक्त रागीनी, जननी के रूप में लोकसेविका के रुप में चित्रित की गई है। मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों ने उनके उपेक्षित व्यक्तित्व को उत्कर्षित किया। साकेत की 'उर्मिला हो, या यशोधरा 'यशोधरा' या द्वापर की 'विधृता'। उनपर आधुनिक विचार-संवेदना की गहरी छाप रही है। साकेत की 'उर्मिला' तो सैन्य संगठन कर रावण से युध्द करने के लिए तत्पर है। गुप्त जी ने नारी को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए ही उसका कारुणिक उत्कर्ष दिखलाया है--

अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में दूध और आँखों में पानी॥

इसके साथ उसे त्याग, संयम, आत्मोत्सर्ग, शक्ति से कठोर रुपों में भी चित्रित हुई है। इस काल में कोमल गुणों से नहीं बल्की शक्ति समृद्ध महान गुणों से पुरित हो चुकी थी। उसके व्यक्ति स्वातंत्र्य का अविष्कार हो चुका वह हर स्तर पर पुरुषों से समानता रखती है।

राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाते हुए स्त्री के उस आनन्द और जोश में सुभद्रा जी ने कविताएँ लिखीं जो उस आन्दोलन में एक नयी प्रेरणा भर देती हैं। स्त्रियों को सम्बोधन करती हुई वह कहती हैं--

सबल पुरुष यदि भीरु बनें, तो हमको दे वरदान सखी।

अबलाएँ उठ पड़ें देश में, करें युद्ध घमासान सखी॥
पंद्रह कोटि असहयोगिनियाँ, दहला दें ब्रह्मांड सखी।

भारत लक्ष्मी लौटाने को , रच दें लंका काण्ड सखी॥

१८५७ के स्वाधीनता संग्राम में वीरता से लड़ने वाली विरांगना रानी लक्ष्मीबाई पर सुभद्रा कुमारी चौहान जी ने "झांसी की रानी" कविता लिखी और समाज के समक्ष सिद्ध कर दिया कि युगों से स्त्रियों ने जिस प्रकार का पराक्रम दिखाया है वह अद्भुत है। चाहें वह पद्मावत हो या रानी लक्ष्मीबाई। सुभद्रा कुमारी चौहान जी की "झांसी की रानी" कविता प्रस्तुत है[३]--

सोलापुर, महाराष्ट्र में लक्ष्मीबाई की प्रतिमा
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

सामाजिकता की ओर उन्मुख[सम्पादन]

मानवता और आदर्शवाद की विचार प्रवृत्ति से कविता अधिकाधिक सामाजिकता की ओर उन्मुख हुई है। समाज के सभी वर्ग पर कवि की दृष्टि पड़ी। सभी वर्गों की उन्नति का भाव कविता में आया है, जैसे स्त्री, दलित, कृषक, मज़दूर इनके विकास की भावना कविता में आयी है। सामाजिक सड़ी-गली रूढ़ियों, परंपराओं, शास्त्र का खंडण कर नया तर्क और बुद्धि परक वैज्ञानिक विचार दृढ़ करने पर कवियों ने बल दिया है। स्त्री उद्घार, बालविवाह विरोध, विधवा विवाह समर्थन, दहेज प्रथा विरोध, शिक्षा समर्थन आदि का खुलकर चित्रण कविता में हुआ है। मैथिलीशरण गुप्त इस दिशा में उल्लेखनीय है। कवियों को हिंदूधर्म की सामाजिक, सांस्कृतिक विकास की चाह थी इसलिए अतीत गौरव, जातीय गौरव, जातीय प्रेम का भाव उनकी कविता में आया। काँग्रेस के व्यापक होते आंदोलन के साथ किसान, दलित, महिला वर्ग जुड़ता जा रहा था। किसानों का संघटन एवं विकास का अजेंडा काँग्रेस के रडार पर था। किसानों को बड़ा महत्व काँग्रेस ने दिया। मैथिलीशरण गुप्त की 'किसान' कविता इसका उदाहरण है--

हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है

पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है

हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ

आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा

देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा

तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है

तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है

मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है

शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है

अछुतोध्दार की भावना भी कविता का विषय रही है। इसी कालखंड में वर्णव्यवस्था पर तीखे प्रश्न खड़े हो चुके थे। सामाजिक कुरुपताओं को दूर करने के लिए कवियों ने व्यंग्य कविता का आश्रय लिया।

इतिवृत्तात्मकता[सम्पादन]

इस काल की कविता श्रृंगार के बोझ से मुक्त हुई। उसकी जगह देश प्रेम, सामाजिकता, आशावादिता ने लिया। स्वंय महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का जीवन बड़ा कठोर, संयत, सात्विक एवं आदर्श था, जीवन शुचिता के साथ काव्यशुचिता, भाषा शुचिता पर उन्होंने बल ही नहीं दिया बल्की उसके प्रती वे आग्रही थे। शायद यही कारण है की श्रृंगार की उच्छृंखलता का विरोध कर दाम्पत्य श्रृंगार को कविता में सुष्ठ रुप में स्वीकारा। परिणामत: कविता इतिवृत्तात्मकता की ओर मुड़ी। उसके लिए सरस गद्य शैली को युग ने स्विकारा।

अत: कविता में लाक्षणिकता, चित्रमयता और वक्रोक्ति रही नहीं। विद्वानों ने ऐसा माना है कि इस समय द्विवेदी जी के सामने दो शैलियाँ थी- बंगाल की कोमलकांत पदावली और मराठी की वर्णन प्रधान इतिवृत्तात्मक शैली। उन्होंने दूसरी शैली को अपनाया। क्योकि वह उनके मन के अनुकुल थी और साथ ही वह नैतिकता के प्रचार तथा आदर्श की प्रतिष्ठा के लिए भी उपयुक्त थी।

परिणामत: इस काल की कविता में आकर्षण लालित्य कम हुआ वह शुष्क एवं निरस हुई। मुक्तक कविता की रचना का प्रचलन बढ़ा। 'साकेत' में ही गुप्तजी ने इसका प्रयोग किया--

वेदने। तू भी भली बनी।

पाई मैंने आज तुझी में अपनी चाह घनी।।
X X X
दोनों ओर प्रेम पलता है।

सखि, पतंग भी जलता है, हा ! दीपक भी जलता है।

कविता का यह गद्यात्मक रूप मैथिलीशरण गुप्त, ठाकुर गोपालशरण सिंह, लोचनप्रसाद पाण्डेय, मुकुटधर पण्डेय में आया। बौद्धिकता के कारण वह बोझील हुई प्रतिक्रियास्वरुप 'रहस्यात्मकता की खोज, रहस्योन्मुख प्रेम' के प्रति कवि भावना बढ़ी। प्रकृती वर्णन में भी यही भावना रही। गुप्त जी में भी यह संकेत मिलते है-

तेरे घर के द्वार बहुत है किससे होकर आऊ मैं
सब द्रारों पर भीडबड़ी है कैसे भीतर जाऊ मैं।

प्रकृति-चित्रण[सम्पादन]

द्विवेदी युग का प्रकृति चित्रण बड़ा सच्चा और मनोयोग पूर्ण किया गया है। श्रृंगारकाल में जो प्रकृति वर्णन किया गया है वह श्रृंगार भावना उद्दीपन हेतु हुआ है। भारतेन्दु युग में सौंदर्यानुभूति के अभाव में केवल अलंकारिक चित्रण की प्रधानता रही है। परंतु द्विवेदी युग में यह वर्णन संवेदनात्मक और चित्रात्मक रूपों में उपस्थित हुआ है। जिसमे अग्रसर है श्रीधर पाठक, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी' आदि। श्रीधर पाठक की कविता में तन्मयता और माधुर्य भाव सनिहित है, कश्मीर का वर्णन कुछ इसी प्रकार का है-

प्रकृति यहाँ एकांत बैठि निज रुप सँवारति।

पल-पल पलटति मेष छनिक छबि छिन-छिन धारति।
बिहरति विविध विलास भरी जोबन मद में सनि।

ललकति किलकति पुलकति निरखति थिरकति बनठनि।

आचार्य शुक्ल द्वारा ग्राम सौंदर्य वर्णन भी चित्रात्मक रूप में हुआ है-

गया उसी देवल के पास से है ग्राम्य-पथ,

श्वेत धारियों में कई घास को विभक्त कर।
थूहरों से सटे हुए पेड और झाड हरे,

गोरज से धूमले जो खड़े है किनारे पर।

रामनरेश त्रिपाठी ने उनके काव्य 'पथिक' और 'स्वप्न' में नदी में पर्वत, समुद्र आदि का दृश्य भव्य रूप में चित्रित किया है। उनके प्रकृति चित्रण में कहीं-कहीं रहस्यात्मकता भी पाई जाती है- 'हरिऔध' ने प्रकृति को पाँच रूपों में चित्रित किया है--"आलम्बन रूप, उद्दीपन रूप, बिम्ब-प्रतिबिम्ब रूप, उपदेशात्मक रूप एवं आलंकारिक रूप।"

इस काल के कवियों ने प्रकृति-वर्णन में भी उपदेशात्मकता की वृत्ति रखी शायद इसी कारण वह न मानवी, न प्रकृति के रहस्यों को खोल पाया, न सहज, सुंदर हो पाया। वह नीरस और शुष्क ही रहा है। प्रकृत्ति वर्णन भी इस काल की प्रमुख प्रवृत्ति रही है।

अनुवाद[सम्पादन]

देशी और विदेशी साहित्य के अनुवाद की भारतेन्दु परंपरा का अधिक विकास द्विवेदी युग में हुआ। यह अनुवाद मात्र केवल पद्यात्मक नहीं गद्यात्मक भी हुआ और ठेठ खड़ी बोली में हुआ। स्वंय द्विवेदी जी 'सरस्वती' में अंग्रेजी कविताओं का अनुवाद प्रकाशित करते थे। बांगला के उत्कृष्ट ग्रंथों का अनुवाद इस कालखंड में हुआ। श्रीधर पाठक ने गोल्डस्मिथ के हरमिट का 'एकांतवासी योग' तथा 'ट्रैवलर का' श्रांत पथिक' का पद्यानुवाद किया। द्विवेदी युग के हिन्दी काव्य में अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद विशिष्ट स्थान रखते है। १९०३ से १९०८ के मध्यवर्ती काल में महावीरप्रसाद द्विवेदी ने आधुनिक हिन्दी साहित्य के विकास के लिए अथक परिश्रम किया था। ये अनुवाद अनवरत रुप से सरस्वती में प्रकाशित होते रहे।

शेक्सपियर, बायरन, आदि की कविताओं के अनुवाद हुए है। साथ ही बांग्ला और मराठी के अनुवाद भी किये गये। बांग्ला से साम्रगी ली गयी तो मराठी से शैली। मैथिलीशरण गुप्त ने माईकेल मधुसुदनदत्त के 'मेघनाथ वध' और 'वीरांगना' तथा नवीनचंद्रसेन के 'पलासीर युध्द' का अनुवाद किया। सियारामशरण गुप्त तथा मुकुटधर पाण्डेय की कविताओं पर रविद्रनाथ ठाकूर की 'गीतांजली' के रहस्यवाद का प्रभाव दिखाई देता है। अनुवाद कार्य की परंपरा को समृद्ध किया द्विवेदी युग ने।

काव्य विषय एवं रूपों में विविधता[सम्पादन]

द्विवेदी युग में काव्य विषयों एवं रुपों में महत्वपूर्ण बदलाव आये है। रीतिकालीन परंपरा को छोड़कर अनेक नये विषयों को काव्य में स्थान दिया। द्विवेदी 'कवि कर्तव्य'[४] निबंध में लिखते है— "चीटी से लेकर हाथी पर्यन्त, पशु, भिक्षुक से लेकर राजपर्यन्त, मनुष्य, बिन्दू से लेकर समुद्र पर्यन्त, जल, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत- सभी पर कविता हो सकती है।"

जीवन जगत संबंधी विविध विषयों पर काव्य लेखन किया गया। विषय की कोई सीमा नही थी। डॉ० नगेद्र ने विषय सुची ही दी है- परोपकार मुरली, कृषक, सत्य, लड़कपन, ग्रन्थ-गुण-गान, प्रणय, ईष्या, निद्रा, कलियुगी साधु, पुस्तक प्रेम, ब्रह्मचर्य, हिन्दी की अपील, बालक, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, मूढ मानव, मेहंदी, नैकटाई, मनोव्यथा, कामना, विद्या, कुलीनता, पौरुष, शिशू-स्नेह, सुखमय जीवन, भारतीय छात्रों से नम्र निवेदन, लक्ष्मी-लीला, सपूत, ग्राम-गौरव, सज्जनों का स्वभाव, समालोचक-लक्षण दरिद्र विद्यार्थी आदि।"

इसके साथ ही आचार्य शुक्ल ने भी कुछ संकेत किये है- देशदशा, समाज-दशा, स्वदेश प्रेम, आचरण संबंधी उपदेश के साथ, त्याग, वीरता, उदारता, सहिष्णुता, पौराणिक-ऐतिहासिक प्रसंग पद्यबद्ध हुए है जिसके बीच-बीच में जन्मभूमि प्रेम, स्वजातीय गौरव, आत्मसम्मान की व्यंजना करनेवाले भाषण रखे गये है। गुप्तजी ने 'विकट घर', 'तिलोत्तमा', 'रंग में भंग', 'सौरन्धी', 'द्रापर', 'किसान', 'विश्व वेदना', 'काबा और कर्बला' में इसे विस्तार दिया है। कामनाप्रसाद गुरु की 'दुर्गावती' (सरस्वती, फरबरी १९१५) रामचरित उपाध्यय की 'देवसभा', 'देवदूत' इसके उदाहरण है।

काव्यरुपों की भिन्नता भी द्विवेदी युग की विशेषता है। खंडकाव्य, प्रबंधकाव्य, और प्रगति मुक्तकों का प्रयोग काव्य लेखन हेतु किया गया है। साथ ही मुक्तक के बजाय महाकाव्य, आख्यान काव्य, प्रेमख्यान काव्य, गीत काव्य और स्फुट गीतों का क्ष स्वतंत्र लेखन हुआ है। खड़ीबोली का प्रयोग गद्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रहा है। गद्य साहित्य में घटनाप्रधान, चरित्र प्रधान, ऐतिहासिक तथा पौराणिक घटना और कथाओं को लेकर उपन्यास, कहानियों का लेखन किया गया है। अलोचना तथा निबंध साहित्य का समृद्ध विकास भी इसी युग में हुआ है। कहने का तात्पर्य है की विषय एवं शिल्पगत विविध प्रयोग इस काल में हुए है।

खड़ीबोली काव्य की भाषा[सम्पादन]

द्विवेदी युग में 'भाषा परिवर्तन' यह एक प्रमुख प्रवृत्ति है। ब्रजभाषा की जगह खड़ीबोली ने काव्य भाषा के रुप में स्थान लिया "आज खड़ीयोली के भाषा-सौंदर्य, मार्दव और अभिव्यंजना क्षमता के दर्शन के पश्चात उसकी काव्योपयुक्तता विवादास्पद नहीं रह गयी है।"

जो लोग खड़ीबोली प्रयोग पर शाशंक थे उन्हें 'जयद्रथवध', 'भारत-भारती' ने उपयुक्तता समझायी। द्विवेदीजी ने भाषा तथा व्याकरण संबंधी त्रुटियों को दूर कर उसे प्रयोगसामर्थ्यशील बनाया। द्विवेदीजी ने गद्य-पद्य की भाषा भी एक-सी करने का आदर्श-रखा, इसका परिणाम कवियों पर हुआ। 'हरिऔध' जी जैसे कवियों में तो द्विवेदीजी के संस्कृतनिष्ठता का भी अभाव है उन्होने ठेठ हिन्दुस्थानी का प्रयोग 'प्रिय प्रवास' में किया-

मदीय प्यारी अयि कुंज कोकिला

मुझे बता तू ढिग कूक क्या उठी।
विलोक मेरी चित्त-भ्रान्ति क्या बनी

विषादती संकचित्ता नीपीडिता।

द्विवेदीजी ने भाषा को समयानुरूप बदला। डॉ० नगेंद्र ठीक कहते है. 'जयंद्रथ वध' की प्रसिद्धि ने ब्रज भाषा के मोह का वध कर दिया 'भारत-भारती' की लोकप्रियता खड़ीबोली की विजय-भारती सिद्ध हुई ब्रजभाषा का वैभवशाली रुप धराशयी हुआ और खड़ीबोली ने विकास पाया। भाषा के बदलने से जो क्रांति हुई वह आगे हिन्दी साहित्य में स्पष्ट है। छंदोबद्धता को त्यागकर भी कविता जन के ओर अधिक निकट हुई।

  1. कविवचन सुधा, २२ दिसम्बर १८७३
  2. गद्य कोश
  3. कविता कोश
  4. महावीर प्रसाद द्विवेदी--कवि कर्तव्य