हिंदी साहित्य का सरल इतिहास/कृष्ण भक्ति धारा

विकिपुस्तक से
Jump to navigation Jump to search

महाप्रभु वल्लभाचार्य ने कृष्ण-भक्ति धारा की दार्शनिक पीठिका तैयार की और देशाटन करके इस भक्ति का प्रचार किया। भागवत धर्म का उदय प्राचीनकाल में ही हो गया था। श्रीमद्भागवत के व्यापक प्रचार से माधुर्य भक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ। वर्लभाचार्य ने दार्शनिक प्रतिपादन और प्रचार से उस रास्ते को सामान्य जन-सुलभ बनाया।


महाप्रभु वर्लभाचार्य का जन्म 1477 में और देहांत 1530 में वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित मार्ग को 'पुष्टिमार्ग' कहते हैं। वर्लभाचार्य के अनुसार यह सारी सृष्टि लीला के लिए ब्रह्म की आत्मकृति है। जीव ब्रह्म का अंश है। ब्रह्म अपनी अचित्य शक्ति से जगत के रूप में भी परिणत होता है और उससे परे भी रहता है। वह सच्चिदानंद है। जड़ में सत् किंतु जीव में सत् और चित्, दोनों होते हैं। आनंद का पूर्ण आविर्भाव पुरुषोत्तम कृष्ण में है। वे अपने भकतों के रंजनार्थ नित्य लीला करते हैं। वल्लभाचार्य ने ब्रह्म के सगुण रूप को पारमार्थिक और निर्गुण को उसका अपूर्ण रूप कहा।


वर्लभाचार्य के अनुसार जीव तीन प्रकार के हैं- 1. 'प्रवाह जीव' जो सांसारिक प्रवाह में पड़े रहते हैं; 2. 'मर्यादा जीव' जो विधि-निषेध का पालन करते हैं और 3. 'पुष्टि जीव' जो भगवान का अनुग्रह प्राप्त कर लेते हैं। वे की नित्य लीला का अनुभव कर सकते हैं। वल्लभाचार्य ने भक्ति में निहित माहात्म्य या श्रद्धा के अवयव की उपेक्षा करके प्रेम के तत्त्व को ही अपनाया है। वल्लभाचार्य के अनेक ग्रंथ हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं- पूर्व मीमांसा भाष्य, अणुभाष्य, श्रीमद्भागवत की टीका, अणुभाष्य एवं मीमांसा या ब्रह्मसूत्र कृष्ण का भाष्य


महाप्रभु वर्लभाचार्य परम विद्वान, सत्संगी एवं परदुखकातर व्यक्ति थे। उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों में घूमकर जन-संपर्क और शास्त्रार्थ किया। श्रीकृष्ण की जन्मभूमि में गोवर्धन पर्वत पर श्रीनाथ जी का विशाल गोवर्धन मंदिर बनवाया और वहीं अपनी गद्दी भी स्थापित की। इस मंदिर में श्रीकृष्ण की जो उपासना होती थी उससे हिंदी साहित्य की कृष्ण-भक्ति धारा का बहुत गहरा संबंध है।