हिंदी साहित्य का सरल इतिहास/भक्ति की धाराएँ: विभिन्न संप्रदाय

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भक्ति की दो धाराएँ प्रवाहित हुईं-निर्गुण धारा और सगुण धारा। निर्गुण और सगुण धारा में अंतर इस बात का नहीं है कि निर्गुणियों के राम गुणहीन हैं और सगुण मतवादियों के राम या कृष्ण गुण सहित। निर्गुण का अर्थ संतों के यहाँ गुणरहित नहीं, गुणातीत है। निर्गुण और सगुण मतवाद का अंतर अवतार एवं लीला की दो अवधारणाओं को लेकर है। निर्गुण मत के इष्ट भी कृपालु, सहृदय, दयावान, करुणाकर हैं, वे भी मानवीय भावनाओं से युक्त हैं, किंतु वे न अवतार ग्रहण करते हैं न लीला। वे निराकार हैं। सगुण मत के इष्ट अवतार लेते हैं, दुष्टों का दमन करते हैं, साधुओं की रक्षा करते हैं और अपनी लीला से भक्तों के चित्त का रंजन करते हैं। अत: सगुण मतवाद में विष्णु के 24 अवतारों में से अनेक की उपासना होती है, यद्यपि सर्वाधिक लोकप्रिय और लोक-पूजित अवतार राम एवं कृष्ण ही हैं।


निर्गुण एवं सगुण, दोनों प्रकार की भक्ति का मुख्य लक्षण है- भगवद्विषयक रति एवं अनन्यता। नाथ-सिद्धों के आसन-प्राणायाम, सहज-समाधि, शरीर, प्राण, मन, वाणी की अचंचलता का योग-सब इसी महाराग में विलीन हो गए है भक्ति के अनेक संप्रदाय हैं।

उनमें से चार प्रमुख संप्रदायों और उनके आचार्यों का परिचय संक्षेप में दिया जा रहा है। ये हैं-श्री, ब्राह्म, रुद्र, सनकादि या निंबार्क।

1. श्रीसंप्रदाय- श्रीसंप्रदाय के आचार्य रामानुजाचार्य हैं। कहा जाता है कि लक्ष्मी ने इन्हें जिस मत का उपदेश दिया उसी के आधार पर इन्होंने अपने मत का प्रवर्तन किया। इसलिए इनके संप्रदाय को श्रीसंप्रदाय कहते हैं। इन्हीं की परंपरा में रामानंद हुए। रामानंद प्रयाग में उत्पन्न हुए थे। इनके गुरु का नाम राघवानंद था। रामानंद संस्कृत के पंडित, उच्च कुलोत्पन्न ब्राह्मण थे, किंतु वे आकाशधर्मा गुरु थे। उन्होंने अवर्ण-सवर्ण, स्त्री-पुरुष, राजा-रंक सभी को शिष्य बनाया। उनका विचार था कि ऋषियों के नाम पर गोत्र और परिवार बन सकते हैं, तो ऋषियों के भी पूजित परमेश्वर के नाम पर सब का परिचय क्यों नहीं दिया जा सकता! इस प्रकार सभी भाई-भाई हैं, सभी एक जाति के हैं। श्रेष्ठता भक्ति से होती है, जाति से नहीं। इनके जो बारह शिष्य प्रसिद्ध हुए वे हैं- रैदास, कबीर, धन्ना, सेना, पीपा, भावानंद, नरहर्यानंद, सुखानंद, अनंतानंद, सुरसुरानंद, पद्मावती और सुरसुरी। रामानंद के रचनात्मक व्यक्तित्व का अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने हिंदी को अपने मत के प्रचार का माध्यम बनाया।


2. ब्राह्य संप्रदाय- ब्राहा संप्रदाय के प्रवर्तक मध्वाचार्य थे। उनका जन्म गुजरात में हुआ था। चैतन्य महाप्रभु पहले इसी संप्रदाय में दीक्षित हुए थे। इस संप्रदाय का सीधा संबंध हिंदी साहित्य से नहीं है।


3. रुद्र संप्रदाय- इसके प्रवर्तक विष्णुस्वामी थे। वस्तुतः यह महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुष्टि संप्रदाय के रूप में हिंदी में जीवित है। जिस प्रकार रामानंद ने 'राम' की उपासना पर बल दिया था, उसी प्रकार वल्लभाचार्य ने 'कृष्ण' की उपासना पर बल दिया। उन्होंने प्रेमलक्षणा भक्ति ग्रहण की। भगवान के अनुग्रह के भरोसे नित्यलीला में प्रवेश करना जीव का लक्ष्य माना। सूरदास एवं अष्टछाप के कवियों पर इसी संप्रदाय का प्रभाव है।

बल्लभाचार्य ने देश का काफ़ी भ्रमण किया था। वे महान विद्वान एवं दार्शनिक थे। उनका व्यक्तित्व अत्यंत लोकप्रिय एवं मानवीय रहा होगा। उनके जीवन की जो बातें इधर-उधर बिखरी मिलती हैं, उनसे लगता है कि मानव-मन में उनकी गहरी पैठ रही होगी।


4. सनकादि संप्रदाय- यह निबार्काचार्य द्वारा प्रवर्तित है। हिंदी भक्ति साहित्य को प्रभावित करने वाले राधावल्लभी संप्रदाय का संबंध इसी से जोड़ा जाता है। राधावल्लभी संप्रदाय के प्रवर्तक गोसाईं हितहरिवंश का जन्म 1502 में मथुरा के पास बाँदगाँव में हुआ। कहा जाता है कि हितहरिवंश पहले माध्वानुयायी थे। इसमें राधा की प्रधानता है।