हिंदी साहित्य का सरल इतिहास/सामान्य विशेषताएं

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यों तो इतिहास का प्रत्येक युग परस्परविरोधी एवं प्रधान-अप्रधान प्रवृत्तियों का युग होता है, किंतु आदिकाल के विषय में यह बात विशेष रूप से रेखांकित करने योग्य है। वह राजनीतिक दृष्टि से छोटे-छोटे सामंतों में विभक्त प्रदेश का साहित्य है। किसी केंद्रीय सत्ता का अभाव है। उसके पूर्व में पाल, पश्चिम में प्रतिहार और दक्षिण में राष्ट्रकूट प्रबल हैं। केवल गाहडवार वंशीय गोविंद चंद्रदेव इस काल में मध्य देश के प्रतापी नरेश हुए, किंतु उनके पूर्वजों और वंशजों का वैसा प्रताप नहीं था। धार्मिक दृष्टि से यह अनेक ज्ञात-अज्ञात सांप्रदायिक साधनाओं का काल है। बौद्ध धर्म का पूर्व प्रभाव नहीं रह गया था। बौद्ध धर्म से विकसित महायान, वज्रयान एवं नाथ-सिद्धों की साधना सामान्य जनता में स्वीकृत हो पाएं, यह संभव नहीं था। जैन मत का प्रभाव मध्य देश की अपेक्षा पश्चिम में था। भाषा की दृष्टि से यह काल अपभ्रंश और हिंदी का संधिकाल है। दसवीं शती के आसपास से अपभ्रंश का प्रभाव क्रमशः क्षीण होता जा रहा था और हिंदी भाषा की प्रवृत्तियाँ उसका स्थान लेती जा रही थीं। हिंदी साहित्य के आदिकाल में जो साहित्य मिलता है वह अधिकांशतः अपभ्रंश-हिंदी का साहित्य है, शुद्ध अपभ्रंश या शुद्ध हिंदी का नहीं। आदिकाल समाप्त होते-होते दिल्ली के सिंहासन पर अलाउद्दीन खिलजी जैसा शासक दिखलाई पड़ता है, जो मध्य देश ही नहीं, लगभग समूचे देश में अपना शासन स्थापित करता है। विद्यापति-खुसरो की रचनाओं एवं उक्ति-व्यक्ति प्रकरण जैसी कृतियों में आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का रूप स्थापित दिखलाई पड़ता है। उधर धार्मिक क्षेत्र में महान भक्ति आंदोलन छोटी-छोटी साधनाओं का सार ग्रहण करके धर्म को लोक का व्यापक क्षेत्र प्रदान करता है।