हिन्दी/विलुप्त करने का प्रयास

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हिन्दी भाषा विश्व की दूसरी सबसे अधिक बोले जानी वाली भाषा है और मातृभाषा के रूप में भी यह तीसरी या चौथी सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा है। इस कारण इसके विकास को रोकने और विलुप्त करने का कई लोगों ने प्रयास किया है। यह प्रयास इस भाषा के निर्माण से लेकर वर्तमान समय में भी हो रहा है।

अंग्रेजों द्वारा[सम्पादन]

हिन्दी भाषा को विलुप्त करने और इसके विकास को रोकने का सबसे अधिक प्रयास अंग्रेज़ो ने ही किया है। वर्तमान में अंग्रेजी भाषा का बहुत लोगों को ज्ञान है, लेकिन बहुत से लोग इसे समझ नहीं पाते हैं, जबकि हिन्दी को जो भी सीखता है, वह आसानी से इसे समझने और बोलने लगता है। इसके अलावा यह जान कर भी सभी को आश्चर्य होगा कि अंग्रेजी भाषा से अधिक लोग हिन्दी भाषा को जानते हैं।

अलग करने की नीति[सम्पादन]

अंग्रेजों ने भाषा में भी फूट डालो और राज करो की नीति को अपनाया था। हिन्दी को बहुत बड़ी संख्या में बोला जाता था, इस कारण अंग्रेजों ने इसे दो अलग अलग भाषाओं में बाँटने का निर्णय लिया। इससे यह हिन्दी और उर्दू जो एक ही भाषा है, वह दो अलग अलग भाषाओं में बाँट दिये गए। इसके कारण इस भाषा की शक्ति लगभग आधी हो गई। इसके साथ ही अंग्रेजों ने कुछ कुछ दूरी में क्षेत्र आदि के अनुसार हिन्दी भाषा को ही अलग अलग भाषा के रूप देने लगे। हिन्दी भाषा का उस समय कोई विद्यालय नहीं था, इस कारण कई लोग इस भाषा के उच्चारण और व्याकरण में गलती करते थे, या यह भी कहा जा सकता है कि हर कोई अपने ढंग से इस भाषा को बोलता था। इस कमजोरी का लाभ अंग्रेजों ने उठाया और हिन्दी को मातृभाषा के रूप में थोड़े अलग ढंग से बोलने वालों को यह विश्वास दिलाया कि वह कोई अन्य भाषा बोलते हैं। इस कारण हिन्दी कई अलग अलग क्षेत्रीय भाषा और बोली के रूप में बट गई।

काल्पनिक कहानी की नीति[सम्पादन]

अंग्रेजों ने इसके अलावा आर्यन और द्रविड़ भाषा नामक एक काल्पनिक कहानी तैयार की। जिसका मुख्य लक्ष्य भाषाओं के मध्य मतभेद पैदा करना था। मुख्य रूप से हिन्दी भाषा के रूपों को अंग्रेजों ने आर्यन के रूप में दिखाया और बाकी को द्रविड़ भाषा के रूप में। लेकिन यह काल्पनिक का पता कोई भी आसानी से लगा सकता है। क्योंकि इन सभी भाषाओं कि लिपि ब्राह्मी लिपि से बनी है। इसके अलावा सभी भाषाओं में संस्कृत भाषा का प्रभाव मिलता है। लेकिन हिन्दी भाषा और उसके कुछ अन्य ढंग में फारसी भाषा का बहुत प्रभाव मिलता है, क्योंकि अंग्रेजों से पहले फारसी लोगों ने यहाँ अपनी भाषा के प्रचार करने में लगे थे। फारसी लोग मुख्यतः हिन्दी भाषा के बोलने वाले क्षेत्रों में ही इस भाषा का मुख्य रूप से प्रचार कर रहे थे। इस कारण इसका प्रभाव मुख्य रूप से हिन्दी पर पड़ा था और इसी से अंग्रेजों ने इस कहानी को निर्मित करने कि योजना बनाई।

अपने भाषाओं को तोड़ने के नीति को मजबूत बनाने के लिए इस नीति का भी अंग्रेजों ने सहारा लिया था। इस कारण ही हिन्दी भाषा का कई लोग विरोध करने लगे और अंग्रेजी भाषा को भारत की आधिकारिक भाषा बनाना पड़ा।

लिपि हटाने की नीति[सम्पादन]

हिन्दी भाषा में मुख्य रूप से ऐसे शब्द हैं, जिसे किसी अन्य लिपि में लिखा ही नहीं जा सकता है। अंग्रेजों ने अपनी भाषा के कई शब्द हिन्दी में डालने का प्रयास किया लेकिन देवनागरी लिपि में उच्चारण पर आधारित होने के कारण हिन्दी शब्दों को ही लोगों ने स्वीकारा और अंग्रेजी शब्दों को हटाते गए। इस कारण अंग्रेजों ने लिपि को हटाने कि नीति पर काम करने लगे। क्योंकि यदि हिन्दी भाषा से देवनागरी लिपि को हटा दिया जाये और रोमल लिपि का उपयोग किया जाये तो उसमें कोई भी अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करने लगेगा और धीरे धीरे अंग्रेज़ उसमें और अपने भाषा का शब्द जोड़ कर हिन्दी भाषा को विलुप्त कर देंगे।

व्याकरण त्रुटि की नीति[सम्पादन]

अंग्रेजों ने हिन्दी के कई व्याकरण के पुस्तक लिखें हैं, लेकिन इसका उद्देश्य केवल हिन्दी भाषा के विनाश का ही है। वे लोग हिन्दी व्याकरण को अंग्रेजी व्याकरण की तरह बनाने का प्रयास करते हैं। इसके अलावा कई गैर हिन्दी अर्थात अंग्रेजी शब्द को हिन्दी के रूप में डालने लगे हैं।

भाषा को कठिन बताने की नीति[सम्पादन]

कई लोगों को यह कहा जाता है कि हिन्दी भाषा बहुत कठिन है, शुद्ध हिन्दी समझ नहीं आती है। लेकिन यह केवल अंग्रेजों द्वारा बनाया गया भ्रम ही है। क्योंकि हिन्दी भाषा दिल से निकलने वाली भाषा है। लेकिन "मानक हिन्दी" जिसे पढ़ाई के लिए उपयोग किया जाता है, उसे अच्छे अनुवाद करके बनाया गया है। इस कारण कई बार "मानक हिन्दी" लोगों को कठिन लगने लगती है। क्योंकि ये दिल से निकली भाषा न हो कर अनुवाद की गई भाषा है। कोई भी अनुवाद की गई भाषा कभी अच्छे से समझ नहीं आती है। लेकिन इस अनुवाद की गई भाषा को लोग हिन्दी भाषा कठिन है कि रट लगा कर इसे कठिन बताते रहते हैं।

वैसे हिन्दी भाषा इतना आसान है कि इसके सामने फारसी और अंग्रेजी भाषा भी टिक नहीं सकी। लेकिन आजादी के बाद लोगों को पढ़ाने के लिए "मानक हिन्दी" के उपयोग के साथ ही अंग्रेजों ने और हिन्दी विरोधी लोगों ने इस नीति का उपयोग करने लगे। अंग्रेजों ने हिन्दी भाषा को कमजोर करने के लिए आजादी के बाद अखबार, टीवी आदि का सहारा लेने लगे।

अंग्रेजी भाषा को लाने की नीति[सम्पादन]

भारत के आजादी के बाद भी कई हजार कंपनियों ने भारत में व्यापार नहीं छोड़ा। इसके अलावा बीबीसी जैसे कई ब्रिटिश कंपनी निरंतर हिन्दी भाषा आदि के बारे में नकारात्मक बातें लिख लिख कर इसे हटा कर अंग्रेजी भाषा को लाने की तैयारी में हैं। वैसे बीबीसी हिन्दी में भी समाचार प्रदान करता है, लेकिन उसका उद्देश्य केवल अपने देश, भाषा और धर्म को अच्छा बताना और बाकी को बुरा आतंकी आदि बताने भर का ही है। इस तरह के कार्य करने के कारण भारत सरकार ने इसे प्रतिबंधित करने का भी निर्णय लिया था। लेकिन इससे बीबीसी किसी तरह बच निकला।

यह नीति अभी भी सक्रिय है और कई तरह से देवनागरी लिपि को हटाने का प्रयास भी इन लोगों द्वारा जारी है। अतः यदि हमें हिन्दी भाषा को विलुप्त होने से बचाना है तो इन सभी नीतियों को सफल होने से रोकना होगा और देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा जो दिल से निकलती है, उसके लिए प्रचार प्रसार का कार्य करना होगा।