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भारतीय काव्यशास्त्र/ध्वनि के भेद

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भारतीय काव्यशास्त्र
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आनन्दवर्धन ने स्थापित ध्वनि सिद्धांत के मूख्य रूप से दो भेद माने हैं। 1) अविवक्षित वाच्य ध्वनि 2) विवक्षित अन्यपर वाच्य ध्वनि।

अविवक्षित वाच्य ध्वनि

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अविवक्षित वाच्य ध्वनि का अर्थ है कि जो हम कह रहे हो वह हमारा उद्देश्य नहीं है बल्कि हमारा सांकेतित अर्थ प्रधान होता है। जो अर्थ दिखता हो वह प्रधान ना हो कर प्रतीयमान अर्थ प्रधान होता है। जैसैः-

गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहु देस।।

प्रस्तुत दोहे में खुसरो किसी स्त्री के मुख की बात नहीं कर रहे। उनका अर्थ अपने गुरू के उज्जवल ज्ञान से है और जिनके मृत्यु पर चारों दिशा में अंधेरा छा गया है मानों कोई पद्मीणी स्त्री के उज्जवल मुख पर उसके केश आगये हो और उसकी मुख की उज्जवलता छिप गयी हो।

अविवक्षित वाच्य ध्वनि लक्षणामूलक व्यंजना पर आधारित है। इसके दो भेद हैः-

अर्थांतर संक्रमित ध्वनि

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इसमें जो अर्थ दिखता है और जो अर्थ प्रतीयमान होता है वह दोनों ही मुख्य होते हैं। अर्थात मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ दोनों साथ-साथ चलते हैं। प्रतीयमान अर्थ स्वयं को खुद ही ऊपर करता है। यह उपादान लक्षणा पर आधारित है। जैसेः-

गहन अनुमानिता

तन की मलिनता

दूर करने के लिए प्रतिफल

पाप छाया दूर करने के लिए दिन-रात

स्वच्छ करने

ब्रह्मराक्षस

घिस रहा है देह

हाथ के पंजे बराबर

बांह-छाती-मुँह छपाछप

खूब करते साफ

फिर भी मैल

फिर भी मैल

यहाँ जो मुख्यार्थ है वह यह है कि ब्रह्मराक्षस अपनी देह को खूब साफ कर रहा है पर फिर भी मैल नहीं जा रही। इसका लक्ष्यार्थ यह है कि वह मैल तन की नहीं बल्कि मन की है। यहाँ मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ दोनों का अपना महत्व है।

अत्यन्त तिरस्कृत ध्वनि

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इसके अंतर्गत व्यंग्यार्थ के सामने वाच्यार्थ बिल्कुल तिरस्कृत हो जाता है। हम कह सकते है कि वाच्यार्थ का पूर्ण निषेध ही हो जाता है, इसे हम ऐसे समझ सकते है कि कुशल का अर्थ है वह जो सफलता से कुश ले आए किन्तु कुशल बोलने पर हम इसके मुख्य अर्थ को बिल्कुल ही छोड़ कर इसका लक्ष्यार्थ निपुण या योग्य को ही ध्यान में रखते है। यह शब्द शक्ति के लक्षण लक्षणा पर आधारित है। कबीर की ऊलट बांसियां और व्यंग्य कविताएं इसके उत्तम उदाहरण है क्योंकि इन सब के मुख्य अर्थ को हम निषेध कर गौण अर्थ को ग्रहण करते है। जैसेः-

एक अचम्भा देखा रे भाई
ठाड़ा सिंह चरावै गाय

सिंह और गाय का अर्थ यहां मानवीय ईच्छा और मन से है और यहीं वाच्यार्थ ग्रहण कर हमें अर्थ की प्राप्ति होगी।

विवक्षित अन्यपर वाच्य ध्वनि

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विवक्षित अन्यपर वाच्य ध्वनि उसे कहा जाता है, जहाँ वाच्यार्थ का भी महत्व हो और वाच्यार्थ ही प्रधान अर्थ व्यंग्यार्थ को देने में सहायक होता है। अन्यपर वाच्य का अर्थ है कि अन्य पर आधारित अर्थात मुख्यार्थ ही ध्वनि तक पहुँचाता है।। इसका आश्य स्पष्ट होता है। इसके दो भेद हैः-

असंलक्ष्यक्रम

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असंलक्ष्यक्रम के अंतर्गत वाच्य और व्यंग्य का क्रम अनिश्चित होती है। अंत तक हमें इसमे मूल रस का पता नहीं चलता है। जैसे राम की शक्ति पूजा में राम का पहले शोक करना फिर सीता से प्रथम मिलन के याद से प्रेम जागना फिर पिनाक धनुष को तोड़ कर अपने शौर्य को याद करना और अंत में फिर से साहस से खड़े हो जाने से अंत तक हमें किसी एक रस की प्राप्ति नही होता। यहीं क्रम की अनिश्चिता असंलक्ष्यक्रम में होती है। इसी ध्वनि के अंतर्गत रसयुक्त होता है। इसके भीतर ही हमें रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावसंधि, भावोदय, भावसंधि, भानशबलता की प्राप्ति होती हैं। विश्वनाथ की उक्ति "वाक्य रसात्मक काव्यं" में उन्होनें असंलक्ष्यक्रम वाक्य को ही कविता माना है क्योंकि भरत भी कहते है कथन की सीधि उक्ति वार्ता औऱ कथन की थोड़ी वक्रता से ही कविता बनती है। असंलक्ष्यक्रम में भी रस की सीधि प्राप्ति ना होने के कारण आचार्यों ने इसे ध्वनि के भेदों में श्रेष्ट माना है। इसका एख उदाहरण हम निम्न पंक्तियों में देख सकते हैः-

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत,लजियात
भरे भौन मैं करत है, नैननु ही सब बात

संलक्ष्यक्रम

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जहाँ शुरूआत से ही कविता का अर्थ मिलने लगे वहाँ संलक्ष्यक्रम होता है। इसमें वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ का क्रम निश्चित होता यहाँ वस्तु ध्वनि और अलंकार ध्वनि की प्रतीति होती है। उदाहरण हम देख सकते हैः-

आगे के सुकवि रीझि है तो कविताई
न तो राधिका कन्हाई सुमिरण के बहानौ है।