भारतीय काव्यशास्त्र/रीति सिद्धांत

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भारतीय काव्यशास्त्र
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रीति सिध्दांत[सम्पादन]

रीति शब्द का सामान्य अर्थ हैं - ढंग, शैली, प्रकार, मार्ग तथा प्रणाली। 'रीति' शब्द की व्युत्पत्ति हुई है रीयते गम्यतेनेनेतिरीति अर्थात मार्ग' जिसके द्वारा गमन किया जाए। रीति निरूपक आचार्यों में वामन की देन सर्वाधिक है,उन्होंने रीति को काव्य की आत्मा माना है। इनसे पूर्व भरत, भामह, और दण्डी ने रीति विषयक सामग्री प्रस्तुत की। तथा वामन के बाद उद्भट, रूद्रट, आनन्दवर्धन, कुन्तक,अग्निपुराणकार, भोजराज, मम्मट, और विश्वनाथ ने भी रीति का साक्षात् निरूपण या प्रतिपादित किया है।

  • भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में रीति का प्रत्यक्ष वर्णन न कर विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित चार वृतियों का उल्लेख किया है- आवन्ती, दाक्षिणात्य, अर्धमागधी,पांचाली। वृति की परिभाषा उन्होंने इस प्रकार दी,पृथिव्यां नानादेशवेशभाषाचारवार्ता: ख्यापयतीति प्रवृति। अर्थात् जो पृथ्वी के नाना देशों के वेश, भाषा तथा आचार की वर्ता को व्यक्त करें उसका नाम प्रवृति हैं।
  • भामह ने दो काव्य माने- एक वैदर्भ दूसरा गौड़; इस प्रकार काव्य शब्द का प्रयोग उन्होंने 'रीति' के अर्थ में किया है। भामह ने गुण और रीति का कोई मौलिक संबंध नहीं माना , उन्होंने 'रीति' की प्रादेशिकता पर आघात किया।
  • दण्डी ने 'रिति' के लिए 'मार्ग' शब्द का प्रयोग किया है। दण्डी के अनुसार इनमें से वैदर्भ काव्य ही श्रेष्ठ है जो श्लेष, प्रसाद, आदि गुणों पर आश्रित है। गौडिय मार्ग में प्राय: इनका विपरित भाव होता है।
  • वामनके अनुसार विशिष्टा पदरचना रीति अर्थात् विशेष पद रचना को रीति कहा है। और इसमें वह मानते कि यह विशेषता गुणों के समावेश के कारण आती है- विशेषो गुणात्मा। काव्य शोभाया: कर्तारौं धर्मा: गुणा।उनके अनुसार गुण कहते हैं काव्य के शोभाकारक धर्म को, जो कि शब्दगत भी हैं और अर्थगत भी, इनकी संख्या दस-दस माने हैं।
  • रूद्रट ने वामन स्वीकृत रीतियों के अतिरिक्त लाटी को भी माना है। वे रीति के संदर्भ में गुणों के स्थान पर रचना-चारूत्व की ओर ध्यान देते हैं और रीति के अस्तित्व को सामाजिक शब्दों में निर्भर करते हैं।
  • आनन्दवर्धन ने रिति को संघटना का नाम दिया। संघटना से तात्पर्य सम्यक् घटना अथवा यथोचित घटना है। इसे 'समास' से सम्बन्ध मानकर इसके तीन रूप स्वीकार किये- असमासा, अल्पसमासा और दीर्घसमासा। उनके अनुसार संघटना का कार्य है गुणों के आश्रित रहकर रस को व्यक्त करना।
  • राजशेखर ने वचन-विन्यास क्रम रीति: अर्थात् वचन विन्यास का क्रम रीति कहा है।
  • कुन्तक ने दणडी के समान ही 'मार्ग' शब्द का प्रयोग किया और रीतियों के प्रादेशिक विभाजन के स्थान पर कविस्वभावप्रेरित विभाजन को स्वीकार करते हैं।
  • मम्मट ने नियत वर्णों का रस व्यापार वृति को रीति कहा है।
  • विश्वनाथ ने पदों की संघटना को रीति कहा है। अर्थात् शब्द-गुम्फ तथा समस्त पदावली का महत्त्व स्थापित किया। वे इसे अंगसंथान (शारीरिक गठन) के समान कहा है। ये वैदर्भी, गौड़ी, पांचाली और लाटी के समर्थक हैं।

वैदर्भी- माधुर्य गुण के व्यंजक वर्णों से युक्त रचना वैदर्भी रीति कहाती हैं, और यह श्रृंगार, करूण आदि कोमल रसों का उपकार करती है। इसे मम्मट ने उप-नागरिका वृति भी कहा है।

गौडी- ओज गुण के व्यंजक वर्णों से युक्त रचना गौडी रीति कहाती हैं, और यह रौद्र, वीर, आदि कठोर रसों का उपकार करती है। इसे मम्मट ने परूषा वृत्ति भी कहा है।

पांचाली- माधुर्य और ओज गुणों के व्यंजक वर्णों से अतिरिक्त वर्णों से युक्त रचना पांचाली रीति कहाती हैं। इसे मम्मट ने कोमल वृत्ति नाम दिया है।

अतः वामन के उपरान्त वामनसम्मत रीति का किसी ने अनुमोदन एवं अनुकरण नहीं किया, बल्कि इसके विपरित वामन का उपहास तक किया। आनन्दवर्धन के शब्दों में - ध्वनि जैसे अवर्णनीय काव्यतत्व को समझ सकने में असमर्थ लोगों द्वारा काव्यशास्त्रीय जगत् में रीतियां चला दी गयी है।

वहीं कुन्तक ने भी कुछ इस स्वर में कहा- अजी हटाओं भी, कौन रीति जैसी 'नि:साथ वस्तु के साथ अपना मगज खपाए (तदलमनेन निस्सार-वस्तु परिमल-व्यसनेन)।

निष्कर्ष[सम्पादन]

इस प्रकार हमने देखा कि वामनसम्मत रीति एक विशिष्ट प्रकार की पद-रचना है, जो गुणों से निर्मित होती है। तथा गुण पर आश्रित रूप में रीति को काव्य की आत्मा माना। इसी आधार पर आनन्दवर्धन ने 'रीति के स्थान पर 'संघटना' शब्द का प्रयोग कर 'समासबध्दता से सम्बन्धित माना। मम्मट ने इसका नया लक्षण प्रस्तुत किया कि 'ऐसी पदसंघटना रीति कहलाती है जो गुणों पर आश्रित रहकर रस का उत्कर्ष करती है। और विश्वनाथ के शब्दों में रीति रस का उत्कर्ष इस प्रकार प्रकारन्तर से करती है जिस प्रकार हमारी अंगों की बनावट हमारी आत्मा का प्रकारान्तर से उत्कर्ष करती है। इसके बाद भारतीय काव्य-भाषा में इन्हीं मान्यताओं का पोषण होता रहा है। रीति काल से लेकर आधुनिक काल तक अब यह केवल रचना-मात्र है, आधुनिक शब्दावली में कहें तो एक 'शैली' (style) मात्र है।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र---डाँ. सत्यदेव चौधरी, डाँ. शन्तिस्वरूप गुप्त। अशोक प्रकाशन, नवीन संस्करण-२०१८, पृष्ठ--११४-११८

२. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र की पहचान---प्रो. हरिमोहन । वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण-२०१३,पृष्ठ--७०-७५