भारतीय काव्यशास्त्र/शब्द शक्तियाँ

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शब्द तथा अर्थ के संबंध को शक्ति या शब्दशक्ति कहते हैं। इसको व्यापार भी कहा गया हैं। शब्द में निहित अर्थ-संपत्ति को प्रकट करने वाला तत्त्व शब्दव्यापार या शब्दशक्ति है। शब्दशक्तियाँ साधन के रूप में समादृत हैं। शब्द कारण है और अर्थ कार्य और शब्दशक्तियाँ साधन या व्यापार-रूप हैं। शब्दशक्ति के बिना शब्द के अर्थ का ज्ञान संभव नहीं है। शब्द तथा अर्थ के संबंध में विचार करनेवाले तत्व को शब्दशक्ति कहते हैं। शब्द की तीन शक्तियाँ हैं - अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। शब्द तीन प्रकार के होते हैं - वाचक, लक्षक और व्यंजक तथा इनसे क्रमशः तीन प्रकार के अर्थ प्रकट होते हैं - वाच्यार्थ, लक्ष्यार्थ तथा व्यंग्यार्थ। इन तीनों अर्थों की प्रतीति तीन प्रकार की शक्तियों - अभिधा, लक्षणा और व्यंजना द्वारा होती है।

अभिधा[सम्पादन]

अभिधा को परिभाषित करते हुए आचार्य विश्वनाथ कहते हैं- 'तत्र संकेतितार्थस्य बोधनादग्रिमाभिधा' अर्थात् उनमें (वाक्य में) संकेतित यानि कि मुख्य अर्थ का बोध कराने वाली वृत्ति या शक्ति को अभिधा कहते हैं। चार प्रकार के शब्द होते हैं- जातिवाचक, गुणवाचक,द्रव्यवाचक और क्रियावाचक। इन शब्दों के अर्थ का बोध कराने में जहां किसी अन्य दूसरी शक्ति की आवश्यकता नहीं होती , वहाँ मुख्य अर्थ का व्यवधान रहित बोध कराने वाली शब्द की शक्ति अभिधा कहलाती है। जैसे अश्व , क्रीड़ा, मुख आदि ।

अभिधा के भेद[सम्पादन]

अभिधा के निम्न तीन भेद है:-

रूढ़ि[सम्पादन]

वे शब्द जिनका अर्थ तय हो, उनमे बदलाव नही हो सकते उन्हें रूढ़ि कहते है। जैसे:- रोटी, कलम, पेड़ आदि

योग[सम्पादन]

दो शब्दों के जोड़ से प्राप्त एक नये अर्थ की प्रतीति कराने वाले शब्द को योग कहते है। इसमे दोनो शब्दों को अलग अलग करने पर उनका एक स्वतंत्र अर्थ भी होता है। जैसे:- बैलगाड़ी, मालगाड़ी आदि।

योगरूढ़ि[सम्पादन]

वे योग शब्द जो समाज में अब एक विशेष अर्थ के लिए रूढ़ हो गये है अर्थात उनका कोई भिन्न अर्थ हो भी फिर भी उन सबसे एक अर्थ विशेष की प्रतीति होती है। जैसे:- मुरलीधर, मधुसूदन, गोपाल आदि। यहाँ गोपाल 'गो' तथा 'पाल' के योग से निर्मित है जिसका अर्थ है गाय पालने वाला पर इसका अर्थ कृष्ण के लिए रूढ़ हो गया है।

लक्षणा[सम्पादन]

'मुख्यार्थ बाधे तद्युक्तो ययान्योsर्थः प्रीयते।
रूढ़ेः प्रयोजनाद्वासौ लक्षणा शक्तिर्पिता।।'

(साहित्य दर्पण- २.५)

अर्थात् अभिधा शक्ति से निरूपित मुख्य अर्थ को बाधित करके रूढ़ि(प्रसिद्धि) या प्रयोजन (उद्देश्य) के कारण जिस वृत्ति या शक्ति से अन्य अर्थ की प्रतीति होती है, शब्द के अर्थ का बोध कराने वाली उस शक्ति को लक्षणा शक्ति कहते हैं। जैसे कुशल अर्थात् कुश को लाने वाला। लेकिन यहाँ पर कुशल का अर्थ कार्य में दक्षता प्राप्त व्यक्ति से है। वैसे ही 'कलिंग साहसिक होता है।' यहाँ कलिंग से देश का अर्थ न लेकर कलिंग का निवासी कहना अभिप्रेत है।

लक्षणा के भेद[सम्पादन]

लक्षणा के दो भेद है- १) प्रयोजनवती २) रूढ़ा प्रयोजनवती के दो भेद गौणी और शुद्धा है। गौणी और शुद्धा के दो-दो भेद है उपादान और लक्षण। उपादान और लक्षण के भी दो-दो भेद है सारोपा और साध्यवसाना।[१]

रूढ़ा[सम्पादन]

रूढ़ि कहते हैं प्रयोग-प्रसिद्धि को अर्थात् वैसा बोलने का प्रचलन है, तरीका है। उदाहरणार्थ,' नौ दो ग्यारह होना '। इसके अंतर्गत सभी मुहावरे आदि आते है।

प्रयोजनवती[सम्पादन]

जब मन में कोई ऐसा अभिप्राय हो जो प्रयुक्त शब्द से व्यक्त ना हो तो प्रयोजनवती का प्रयोग होता है। जैसे:- नौकर बैल है।

गौणी[सम्पादन]

जहाँ सादृश्य संबंध होता है वहाँ गौणी लक्षणा होता है। जैसे:- मुख चंद्र है, अर्थात् चंद्र के समान मुख मे भी चमक है। विषय और विषयी में सादृश्य संबंध है।

शुद्धा[सम्पादन]

जहाँ विषय और विषयी में सादृश्येतर संबंध होता है वहाँ शुद्धा लक्षणा होता है। जैसे:- चाँद निकला। अब यहाँ हमे विषय और विषयी का संबंध दिख नहीं रहा है।

उपादान[सम्पादन]

जहाँ मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ दोनों रहते हैं वहां उपादान लक्षणा होती है। जैसे:- लालपगड़ी कहने पर मुख्य अर्थ के साथ सिद्धी पूर्ति के लिए लक्ष्यार्थ 'पुलिस वाले' का भी बोध हो रहा है।

लक्षण[सम्पादन]

जहाँ मुख्यार्थ लक्ष्यार्थ के कारण तिरस्कृत हो जाता है वहां लक्षण लक्षणा होता है। जैसे:- कुशल का अर्थ कुश को लाने वाला होता है किन्तु इसका यह अर्थ प्रायः ग्रहण नहीं किया जाता।

सारोपा[सम्पादन]

जहाँ विषय और विषयी अर्थात् उपमेय और उपमान का संबंध दिखे वहाँ सारोपा लक्षणा होता है। जैसे:- चरण कमल है।

साध्यवसाना[सम्पादन]

यदि विषय और विषयी में विषय को छोड़ केवल विषयी का नाम ले तो वहीँ साध्यवसाना होता है। जैसे:- दीपक जला।

व्यंजना[सम्पादन]

अभिधा और लक्षणा की सीमा के बाहर पड़नेवाले अर्थ को जो शक्ति व्यक्त करती है, उसे व्यंजना कहते हैं ।

व्यंजना के भेद[सम्पादन]

व्यंजना के दो भेद है-- शाब्दी व्यंजना और आर्थी व्यंजना। शाब्दी व्यंजना के दो और भेद है अभिधामूलक व्यंजना और लक्षणामूलक व्यंजना।[२]

शाब्दी व्यंजना[सम्पादन]

जहाँ शब्द से व्यंग्य की प्रतीति होती है वहां शाब्दी व्यंजना होता है। जैसे:- ऊधो तुम अपनो जतन करो, आयों घोष बड़ो व्यापारी।

आर्थी व्यंजना[सम्पादन]

जहाँ अर्थ से व्यंग्य की प्रतीति होती है वहाँ आर्थी व्यंजना। जैसे:- कागज की आजादी मिलती ले लो दो दो आने में।

अभिधामूलक व्यंजना[सम्पादन]

जिसमें वाच्यार्थ व्यंग्यार्थ तक पहुँचाता है। वहां अभिधामूलक व्यंजना होता है। जैसे:- मैं द्रोणाचार्य हो कर भील शिष्य रखूँ! यहाँ द्रोणाचार्य व्यंग्यार्थ में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे हैं।

लक्षणामूलक व्यंजना[सम्पादन]

जहाँ लक्षणा से व्यंग्यार्थ का प्रतीति हो वहाँ लक्षणामूलक व्यंजना होती है। जैसे:- वियोग में नायिका हवा में उड़ने लगी। यहाँ नायिका सच में हवा में नहीं उड़ रही अपितु उसके वियोग के हाल का वर्णन मिलता है।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. काव्य के तत्व, देवेन्द्रनाथ शर्मा, लोकभारती प्रकाशन, आईएसबीएन : ९७८९३५२२१११५९, पृष्ठ - २१
  2. देवेन्द्रनाथ शर्मा, काव्य के तत्व,लोकभारती प्रकाशन, २०१५,पृष्ठ संख्या२४