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भारतीय काव्यशास्त्र (दिवि)/अलंकार

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भारतीय काव्यशास्त्र (दिवि)
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 अलंकार

अलंकार दो शब्दो के मेल से बना है,अलम् + कार। अलम् का अर्थ आभूषण होता है। जो अलंकृत या अभूषित करे वह अलंकार है। अलंकार काव्य का बाह्य शोभाकारक धर्म है। जिस प्रकार आभूषण स्त्री के नैसार्गिक सौंदर्य को बढा देते है, ठीक उसी प्रकार अलंकार काव्य की रसत्मकता को बढा देते है। वास्तव में अलंकार वाणी का आभूषण है। काव्य में रमणीयता और चमत्कार लाने के लिए अलंकार आवश्यक होता है, परन्तु अनिवार्य नहीं।

अलंकार को तीन भेद-

क. शब्दालंकार
(1) अनुप्रास अलंकार
(2) छेकानुप्रास
(3) वृत्यानुप्रास
(4) लाटानुप्रास
(5) अन्त्यानुप्रास
(6) श्रुतानुप्रास
(7) यमक अलंकार
(8) श्लेष अलंकार
(9) वक्रोक्ति अलंकार

ख. अर्थालंकार
(1) रूपक अलंकार
(2) उपमा अलंकार
(3) उत्प्रेक्षा अलंकार
(4) मानवीकरण अलंकार
(5) विरोधाभास अलंकार
(6) संदेह अलंकार
(7) अतिशयोक्ति अलंकार
(8) भ्रांतिमान अलंकार
(9) विशेषोक्ति अलंकार
(10) विभावना अलंकार( इत्यति)

ग. उभयालकार

शब्दालंकार

जहाँ विभिन्न शब्दों के प्रयोग से रमणीय, सौंदर्य, और चमत्कार उत्पन्न होते हैं, जो अलंकार किसी विशेष शब्द की स्थिती में हो रहे और उस शब्द के पर्याचावाची शब्द रख देने से उसका अस्तित्व न रहे, वह शब्दालंकार शब्द है। उदहारण-

तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती है

स्पष्टीकरण-

यहां बेर शब्द के विशिष्ट प्रयोग से चमत्कार उत्पन्न हो गया है। अतः यह शब्दालंकार है।

(क)अनुप्रास अलंकार

जहाँ पर एक वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो वह अनुप्रास अलंकार कहलाता है। उदाहरण-

मधुर मधुर मुस्कान मनोहर मनुज वेश का उजियाला

स्पष्टीकरण-

उपर्युक्त उदाहरण में ‘म’ वर्ण की आवृति हो रही है, जब किसी वाक्य में किसी वर्ण या व्यंजन की एक से अधिक बार आवृति होती है तब वहां अनुप्रास अलंकार होता है। अतः यह उदाहरण अनुप्रास अलंकार के अंतर्गत आयेगा।

तनुजा तात तमाल तरुवर बहु छाए।

स्पष्टीकरण-

उदाहरण में ‘त’ वर्ण की आवृति हो रही है, किसी वाक्य में किसी वर्ण या व्यंजन की एक से अधिक बार आवृति होती है तब वहां अनुप्रास अलंकार होता है। अतः यह उदाहरण अनुप्रास अलंकार के अंतर्गत आएगा।

अनुप्रास अलंकार के प्रकार-

•छेकानुप्रास •वृत्यानुप्रास •लाटानुप्रास •अन्त्यानुप्रास •श्रुत्यानुप्रास

छेकानुप्रास-

जब वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है तो वह छेकानुप्रास कहलाता है। उदाहरण -

मुद मंगलमय संत समाजू।
जो जग जंगम तीरथराजू॥

वृत्यानुप्रास-

जब एक ही वर्ण की आवृत्ति अनेक बार होती है तो वृत्यानुप्रास होता है। उदाहरण-

काम कोह कलिमल करिगन के।

लाटानुप्रास-

जब एक शब्द या वाक्यखण्ड की आवृत्ति अनेक बार  होती है तो लाटानुप्रास होता है। उदाहरण -

वही मनुष्य है, जो मनुष्य के लिये मरे।

अन्त्यानुप्रास-

जब अन्त में तुक मिलता हो तो, अन्त्यानुप्रास होता है। उदाहरण -

मांगी नाव न केवटु आना।
कहहि तुम्हार मरमु मैं जाना॥

श्रुत्यानुप्रास-

जब एक ही वर्ग के वर्णों की आवृत्ति होती है तो श्रुत्यानुप्रास होता है। उदाहरण -

दिनान्त था थे दिननाथ डूबते,
सधेनु आते गृह ग्वाल बाल थे।

(यहाँ पर त वर्ग के वर्णों अर्थात् त, थ, द, ध, न की आवृति हुई है।)


(ख)यमक अलंकार

सार्थक परन्तु भिन्न अर्थ का बोध करनेवाले शब्द की क्रमशः आवृत्ति को ही यमक कहते है, अर्थात् किसी वाक्य में एक ही शब्द बार बार आए परन्तु हर बार उसका अर्थ भिन्न हो उसे यमक अलंकार कहते हैं। उदाहरण-

कनक कनक ते सौगुनी मादकता अधिकाय।
या खाए बौरात नर या पा बौराय।।

स्पष्टीकण-

इस पद्य में ‘कनक’ शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है। प्रथम कनक का अर्थ ‘सोना’ और दुसरे कनक का अर्थ ‘धतूरा’ है। अतः ‘कनक’ शब्द का दो बार प्रयोग और भिन्नार्थ के कारण उक्त पंक्तियों में यमक अलंकार है।

माला फेरत जग गया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।

स्पष्टीकण-

ऊपर दिए गए पद्य में ‘मनका’ शब्द का दो बार प्रयोग किया गया है। पहली बार ‘मनका’ का आशय माला के मोती से है और दूसरी बार ‘मनका’ से आशय है मन की भावनाओ से। अतः ‘मनका’ शब्द का दो बार प्रयोग और भिन्नार्थ के कारण उक्त पंक्तियों में यमक अलंकार है।


(ग)श्लेष अलंकार

जहाँ श्लिष्ट शब्दों से अनेक अर्थो का बोध हो वहां श्लेष अलंकार होता है । श्लिष्ट शब्दों का अर्थ है - मिला हुआ, ‍‍चिपका हुआ, सटा हुआ। अतः श्लेष अलंकार का अर्थ होता है एक शब्द में अनेक अर्थों का समावेशन। उदाहरण-

रहिमन पानी राखिये,बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून।।

स्पष्टीकण-

इस दोहे में रहीम ने पानी को तीन अर्थों में प्रयोग किया है: १)पानी का पहला अर्थ मनुष्य के संदर्भ में है जब इसका मतलब विनम्रता से है। रहीम कह रहे हैं कि मनुष्य में हमेशा विनम्रता (पानी) होना चाहिए।

२)पानी का दूसरा अर्थ आभा, तेज या चमक से है. रहीम कहते हैं कि चमक के बिना मोती का कोई मूल्य नहीं।

३)पानी का तीसरा अर्थ जल से है जिसे आटे (चून) से जोड़कर दर्शाया गया है। रहीम का कहना है कि जिस तरह आटे का अस्तित्व पानी के बिना नम्र नहीं हो सकता और मोती का मूल्य उसकी आभा के बिना नहीं हो सकता है, उसी तरह मनुष्य को भी अपने व्यवहार में हमेशा पानी (विनम्रता) रखना चाहिए जिसके बिना उसका मूल्यह्रास होता है। अतः यह उदाहरण श्लेष के अंतर्गत आएगा।


(घ) वक्रोक्ति अलंकार

जहाँ वक्ता के कथन में उसके अभिप्रेत अर्थ के बदले श्रोता दूसरा अर्थ ग्रहण करे वहां वक्रोक्ति अलंकार होता है। अर्थात् कहने वाला किसी दूसरे अभिप्राय से कुछ कहे, परन्तु सुनने वाला वक्ता के अभिप्राय से सवर्था भिन्न अर्थ समझ ले तो वहां वक्रोक्ति अलंकार होता है। उदाहरस्वरूप-

है कौन तुम? है घनश्याम,
हम तो बरसो कित जाई।।

स्पष्टीकरण-

उपर्युक्त उदाहरण राधा-कृष्ण संवाद है, जिसमें राधा कृष्ण से पूछती है आप कौन हैं जिसके उत्तर में कृष्ण अपना नाम घनश्याम बताते है परन्तु राधा इसका अर्थ किसी व्यक्ति के नाम से ना ले कर मौसम से लेती है जिसकी वजह से वह बोलती है तो बरस जाओ।


अर्थालंकार

जिस शब्द से जो अलंकार सिद्ध होता है यदि उस शब्द के स्तन पर उसका समानार्थी शब्द रख देने से भी वह अलंकार यथापूर्ण बना रहे, वहां अर्थालंकार होता है। अर्थात् काव्य में जहां शब्द के अर्थ में विशिष्ट सौंदर्य और चमत्कार उत्पन्न होता है वह अर्थालंकार है।

(क)रूपक अलंकार

उपमेय में उपमान के निषेधरहित आरोप को रूपक अलंकार कहते है। इसमें अत्याधिक समानता के कारण प्रस्तुत(उपमेय) में अप्रस्तुत (उपमान) का आरोप करके दोनों में अभिन्नता अथवा समानता दिखाई जाती है। उदाहरण-

चरन कमल बन्दउँ हरिराई

स्पष्टीकरण- इस पद्द में चरण उपमेय है और कमल उपमान। यहां उपमेय और उपमान में समानता दिखाई जा रही हैं इसीलिए यह रूपक अलांकर हैं।


(ख)उपमा अलंकार

दो भिन्न पदार्थो में सदृश्य - प्रतिपादन को ही उपमा कहते है। उपमा का अर्थ है, एक वस्तु के निकट दूसरी वस्तु को रखकर दोनों में समानता प्रतिपादन करना। उपमा शब्द का अर्थ ही सदृश्य, समानता तथा तुल्यता इत्यादि। उपमा अलंकार सर्वाधिक प्राचीन अलंकार है, इसका प्रयोग ऋग्वेद में भी मिलता हैं। उपमा के चार अंग है -

•उपमेय : जिस वस्तु या व्यक्ति के बारे में बात की जा रही है या जो वर्णन का विषय है वो उपमेय कहलाता है।

•उपमान : वाक्य या काव्य में उपमेय की जिस प्रसिद्ध वस्तु से तुलना मेंकि जा रही हो वह उपमान कहलाता है।

•साधारण धर्म : साधारण धर्म उपमान ओर उपमेय में समानता का धर्म होता है। अर्थात जो गुण उपमान ओर उपमेय दोनों में हो जिससे उन दोनों कि तुलना कि जा रही है वही साधारण धर्म कहलाता है।

•वाचक शब्द : वाचक शब्द वह शब्द होता है जिसके द्वारा उपमान और उपमेय में समानता दिखाई जाती है। उदाहरण-

पीपर पात सरिस मन ड़ोला।

स्पष्टीकरण- ऊपर दिए गए उदाहरण में मन को पीपल के पत्ते कि तरह हिलता हुआ बताया जा रहा है। इस उदाहरण में ‘मन’ – उपमेय है, ‘पीपर पात’ – उपमान है, ‘डोला’ – साधारण धर्म है एवं ‘सरिस’ अर्थात ‘के सामान’ – वाचक शब्द है , जब किन्ही दो वस्तुओं की उनके एक सामान धर्म की वजह से तुलना की जाती है तब वहां उपमा अलंकार होता है।अतः यह उदाहरण उपमा अलंकार के अंतर्गत आएगा।


(ग) उत्प्रेक्षा अलंकार

इसमें उपमेय में उपमान की संभावना होती हैं। यहां उपमान की भांति ही कहीं वाचक शब्द होते है,और कहीं नहीं। उदाहरण-

ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप परयौ प्रभात

स्पष्टीकरण-

यहाँ इन पंक्तियों में श्रीकृष्ण के सुंदर श्याम शरीर में नीलमणि पर्वत की और शरीर पर शोभायमान पीताम्बर में प्रभात की धूप की मनोरम संभावना की गई है।मनहूँ शब्द का प्रयोग संभावना दर्शाने के लिए किया गया है। अतः यह उदाहरण उत्प्रेक्षा अलंकार के अंतर्गत आएगा।

(घ) अतिशयोक्ति अलंकार

अतिशयोक्ति अतिशय+ उक्ति से बना है, जिसका अर्थ बढ़ा- चढ़ाकर किया गया कथन। इसमें उपमेय को छिपा कर उपमान के साथ उसकी समरूपता की प्रतीति करना ही अतिशयोक्ति अलंकार है । इसमें उय का नामाल्लेख भी नहीं किया जाता , अपितु उपमान के द्वारा ही उसकी प्रतीति कराई जाती है। उदाहरण -

हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई गए निशाचर भाग।

स्पष्टीकरण-

ऊपर दिए गए उदाहरण में कहा गया है कि अभी हनुमान की पूंछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका जलकर राख हो गयी और सारे राक्षस भाग खड़े हुए। यह बात बिलकुल असंभव है एवं लोक सीमा से बढ़ाकर वर्णन किया गया है। अतः यह उदाहरण अतिशयोक्ति अलंकार के अंतर्गत आएगा।


(ड़ ) विरोधाभास अलंकार

जिस वर्णन में वस्तुत: विरोध न होने पर भी विरोध का आभास हो उस विरोधाभास अलंकार कहते है। उदाहरण-

या अनुरागी चित्त की गति समुझे नहिं कोय।
ज्यों - ज्यों बूड़े स्याम रंग त्यों - त्यों उज्ज्वल होय।

स्पष्टीकण-

यहां श्याम रंग में डूबने पर चित्त के उज्ज्वल होने की बात कहकर विरोध का कथन है, किन्तु श्याम का रंग का अभिप्राय कृष्ण ( ईश्वर) के प्रेम से लेने पर अर्थ होगा कि जैसे जैसे चित्त ईश्वर के अनुराग में डूबता हैं, वैसे वैसे चित्त और भी अधिक निर्मल होता है। यहां विरोध का अभास होने से विरोधाभास अलंकार है।


(च) विशेषोक्ति अलंकार

सम्पूर्ण प्रसिध्द कारणों के होने पर भी कार्य के न होने का वर्णन हो, अर्थात् फल की प्राप्ति ना हो। उदाहरण-

निद्रानिवृत्तावुदिते उतरने सखीजने द्वारापदं परपराप
श्लीथीकृताश्लेषरसे भुजड्गे चचाल नलिड्गनतोऽड्गना सा।।

स्पष्टीकरण-

यहां निद्रनिवृत्ती, सूर्य का उदय होना तथा सखियों का द्वार पर आना आलिंगन परित्याग करने के कारण उपस्थित है, फिर भी नायिका आलिंगन का त्याग नहीं कर पा रही है। अतः यह विशेशोक्ती अलंकार है।


(छ) विभवना अलंकार

जहा कारण के ना होने पर भी कार्य होना वर्णित किया जाता है वहां विभवाना अलंकार है। उदाहरण -

बिनु पग चलै सुनै बिनु काना।
कर बिनु कर्म करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी।

स्पष्टीकरण -

उदाहरण में वह (भगवान) बिना पैरों के चलते है, और बिना कानों के सुनते है। कारण के अभाव में कार्य होने से यहां विभावना अलंकार है।


(ज)भ्रान्तिमान अलंकार

उपमेय में उपमान की भ्रान्ति होने से और तदनुरूप क्रिया होने से भ्रान्तिमान अलंकार होता है। अर्थात् जहां समानता के कारण एक वस्तु में दूसरी वस्तु का भ्रम हो , वहां भ्रान्तिमान अलंकार होता है। उदाहरण -

नाक का मोती अधर की कान्ति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से।
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है।
सोचता है अन्य शुक यह कौन है?

स्पष्टीकरण -

उपरोक्त पंक्तियों में नाक में तोते का और दन्त पंक्ति में अनार के दाने का भ्रम हुआ है, इसीलिए यहाँ भ्रान्तिमान अलंकार है।