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भारतीय काव्यशास्त्र (दिवि)/काव्य- लक्षण

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भारतीय काव्यशास्त्र (दिवि)
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काव्य- लक्षण

काव्य लक्षण का अर्थ , असाधारण अर्थ ,किसी काव्य का विशेष धर्म जो बाहरी अन्य प्रकारों से काव्य का भेद दर्शाता है । वास्तव में एक और अव्याप्ति और दूसरी ओर अतिव्याप्ति इन दोनों दोष रेखाओं के बीच लक्षण की व्याप्ति को रखना कठिन कार्य है । इसलिए काव्य-लक्षण की अपेक्षा उसका स्वरूप निर्धारण करना अधिक आसान है । काव्य स्वरूप से हमारा आशय काव्य के साधारण धर्म से है , जिसके आधार पर हम काव्य के सामान्य तत्वों को ग्रहण करते हैं इन सामान्य तत्वों में भाव , बुद्धि , कल्पना और शैली का उल्लेख किया जाता है।

संस्कृत आचार्यो के काव्य लक्षण-

आचार्य भरतमुनि

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आचार्य भरत संस्कृत काव्य - शास्त्र के आदि आचार्य माने जाते हैं । इनका ग्रंथ ' नाट्यशास्त्र ' संस्कृत काव्य - शास्त्र का आदि ग्रंथ है । इस ग्रंथ में नाट्य और काव्य में कोई भेद न करके नाट्य - कला का विवेचन किया है । उन्होंने स्पष्ट रूप से काव्य का कोई लक्षण नहीं दिया । काव्य - कला की प्रशास्ति करते हुए इन्होंने लिखा है

"मृदुललित पदाढ्यं गूढ़ं शब्दार्थहीनं
जनपदसुखबोध्यं युक्तिमन्नत्ययोज्यं।
बहुकृत रसमार्गं संधिसंधानयुक्तं
स भवति शुभकाव्यं नाटकप्रेक्षकाणाम्॥"


अर्थात् नाटक को देखने वालों के लिए शुभकाव्य वह होता है जिसकी रचना कोमल और ललित पदों से की गई हो , जिसमें शब्द और अर्थ गूढ न हो , जिसको जन - साधारण सरलता से समझ सके , जो तर्क - संगत हो , जिसमें नृत्य की योजना की जा सके , जिसमें विभिन्न प्रकार के रस स्वीकार किए गए हों और जिसमें कथानक संधियों का पूरा निर्वाह किया गया हो ।

भामह

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" शब्दर्थो सहितौ काव्यम् । " अर्थात् शब्द और अर्थ से युक्त रचना को काव्य कहते हैं । यदि इस पद का यही अर्थ माना जाए तो कहा जा सकता है कि भामह का यह लक्षण अतिव्यप्ति दोष से दूषित है , क्योंकि शब्द और अर्थ युक्त तो व्याकरण , दर्शन के ग्रन्थ भी होते हैं जिन्हें काव्य नहीं कह सकते । इस पंक्ति का अर्थ अनेक प्रकार से किया गया है । डॉ . नगेन्द्र ने इसका अर्थ किया है - ' सहित ' अर्थात सामंजस्य पूर्ण शब्द - अर्थ को काव्य कहते हैं। इस अर्थ की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि भामह ने शब्द और अर्थ के सामंजस्य को काव्य की संज्ञा दी है।

दण्डी

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इसी प्रकार आचार्य दण्डी ने काव्य के लक्षण के संबंध में कहा “ इष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली । अर्थात् अभिलषित अर्थ को व्यक्त करने वाली पदावली को काव्य माना है । उपर्युक्त दोनों लक्षणों में केवल शब्दावली का भेद है - इष्टार्थ को अभिव्यक्त करने वाला शब्द और शब्द - अर्थ का साहित्य या सामंजस्य एक ही बात है , क्योंकि शब्द इष्ट अर्थ की अभिव्यक्ति तभी हो सकती है जब शब्द और अर्थ में सामंजस्य एवं समभाव हो । आगे चलकर भामह और दण्डी के विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि शब्द और अर्थ का सामंजस्य ही काव्य सौंदर्य है और यह अलंकार से अभिन्न है । इस प्रकार भामह के अनुसार ' काव्य निसर्गत अलंकार युक्त होता है ।

रुद्रट

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"तनु शब्दार्थों काव्यम्" ' कहकर शब्द और अर्थ की काव्यानुकूल अनेक विशेषताओं की व्याख्या की है तथा चारूतापूर्ण शब्द और अर्थ के उपादान पर ही बल दिया है । इन्होंने शब्दार्थ को काव्य का शरीर बताकर ध्वनि को उसकी आत्मा माना है ।

कुन्तक

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" "शब्दार्थौ सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनी।
बंधे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणी॥"

अर्थात् गाहादकारक , कवि - व्यापार से युक्त सुंदर रचना में व्यवस्थित शब्द और अर्थ को काव्य कहते है । इस लक्षण का अभिप्राय यह है कि एक अर्थ के वाचक अनेक शब्द होते है । किंतु कवि को उनमें से ऐसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए जो व्यवस्थित हो , और उसके विवक्षित अर्थ को पूर्णता प्रकट कर सकें साथ ही वह इतना रमणीय हो कि सह्रदय को शोभित कर सके । इस प्रकार की शब्द योजना को काव्य कहा जाता है।

आचार्य मम्मट

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"तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि"

अपने प्रसिद्ध ग्रंथ'काव्य प्रकाश' में मम्मट ने काव्य को परिभाषित करते हुए कहा है कि ऐसे शब्दार्थ को काव्य कहा है जो दोष रहित और गुण सहित हो। अलंकारो का प्रयोग चाहे हो या न हो । यदि इस लक्षण की व्याख्या की जाए तो कहा जा सकता है कि आचार्य मम्मट के अनुसार गुण तो काव्य के नित्य धर्म हैं और अलंकार अनित्य। गुण काव्य शोभा का संपादन करने वाले होते है और अलंकार उसकी अतिशयता में वृद्धि करने वाले होते है । यही कारण है कि मम्मट ने काव्य में गुणों का होना अनिवार्य माना है और अलंकारों का वैकल्पिक। संस्कृत में आचार्य मम्मट के ही काव्य - लक्षणों का अनुकरण अधिक हुआ है । आचार्य विद्यानाथ , वाग्भट आदि आचार्यों ने इन्हीं का अनुकरण करके अपने - अपने काव्य - लक्षण , प्रस्तुत किए हैं।

आचार्य विश्वनाथ

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आचार्य विश्वनाथ ने आचार्य मम्मट द्वारा प्रस्तुत काव्य - लक्षण की आलोचना करते हुए काव्य का यह लक्षण प्रस्तुत किया है

' वाक्यं रसात्मकं काव्यम् '

अर्थात रसात्मक वाक्य को काव्य कहते हैं । इस लक्षण में ' रस ' शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया है । इस शब्द से रस , रसाभास , भाव , भावाभास , भावोदय , भावसधि , भावरावलता तथा भावशांति आदि का ग्रहण अपेक्षित है । रसवाद के कट्टर समर्थक होने के कारण आचार्य विश्वनाथ के द्वारा दिया गया लक्षण असंभावित नहीं है । अपने इस लक्षण में आचार्य विश्वनाथ ने मुख्य रूप से ' रस ' का उल्लेख करके काव्य लक्षण को अधिकाधिक पूर्ण और मौलिक बनाने का प्रयास किया है , तथापि यह लक्षण सर्वथा नवीन और मौलिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि आचार्य भामह , दण्डी , रुद्रट आदि अलंकारवादी आचार्यों की दृष्टि में भी रस ही काव्य का फल है । फिर भी आचार्य विश्वनाथ का यह काव्य - लक्षण एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की स्वीकृति हैं ।

आचार्य पंडितराज जगन्नाथ

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संस्कृत - काव्यशास्त्र की परंपरा में अतिम महत्त्वपूर्ण आचार्य है पंडितराज जगन्नाथा इन्होंने । अपना काव्य - लक्षण इस प्रकार दिया है

' रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम् । '

अर्थात् रमणीय अर्थ के प्रतिपादक शब्द को काव्य कहते हैं । यहाँ ' रमणीयार्थ ' शब्द की व्याख्या अपेक्षित है । स्वयं पंडितराज जगन्नाथ इसकी व्याख्या करते हुए बताते है कि जिसके ज्ञान से लोकोत्तर अर्थात् अलौकिक आनन्द की प्राप्ति हो वह अर्थ रमणीय है , काव्य से यदि केवल आनन्द को प्राप्ति ही मानो जाए तो फिर ' तुम्हारे घर में पुत्र उत्पन हुआ ' आदि वाक्यों से जो आनन्द मिलता है , उसका काव्य से प्राप्त आनंद में कोई पार्थक्य ही न रह जाएगा , जबकि ऐसे वाक्यों को काव्य न मानना निर्विवाद सिद्ध है । इसलिए आचार्य जगन्नाथ ने इस लक्षण को व्याख्या दूसरे शब्दों में इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है - ' जिस शब्द अथवा शब्दों के अर्थ की भावना करने से किसी अलौकिक आनन्द की प्राप्ति हो उसको काव्य कहते हैं । वस्तुत : आचार्य जगन्नाथ का यह लक्षण अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।

निष्कर्ष

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उपयुक्त काव्य लक्षणों का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि भामह , रूद्रट , मम्मट , और कुन्तक आदि शब्दार्थ को काव्य मानने के पक्षधर है , तो दंडी , विश्वनाथ ,और जगन्नाथ आदि केवल शब्द को काव्य मानते हैं। शब्दार्थ को काव्य मानेवाले वाले आचार्यों का तर्क है कि काव्य में शब्द और अर्थ दोनों का समान महत्व है , इसलिए शब्दार्थ ही काव्य हो सकता है । केवल शब्द नहीं जबकि केवल शब्द को काव्य मानने वाले आचार्यों का तर्क है कि शब्द अर्थ को मानने का कोई प्रमाण नहीं है। हिंदी में रामचंद्र शुक्ल ने काव्य को परिभाषित करते हुए लिखा - "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आयी है, उसे कविता कहते हैं।" शुक्ल जी की यह परिभाषा बताती है कि भारतीय साहित्यशास्त्र व्यावहारिक एवं संतुलित है।