भारतीय काव्यशास्त्र (दिवि)/रस: स्वरूप, लक्षण, अंग तथा भेद

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भारतीय काव्यशास्त्र (दिवि)
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रस का स्वरुप और लक्षण[सम्पादन]

' रस ' शब्द का प्रयोग भारतीय साहित्य में आदिकाल से ही विविध अर्थों में मिलता है । सामान्य अर्थ में इस शब्द का प्रयोग पदार्थों का रस , आयुर्वेद का रस , साहित्य का रस और मोक्ष या भक्ति रस होता रहा है। भारतीय काव्यशास्त्र में रस सिध्दांत सर्वाधिक महत्त्व का अधिकारी रहा है। भरतमुनि का विख्यात सूत्र - विभावानुभाव व्यभिचारसंयोगाद् रस-निष्पति: की मान्यताओं को परवर्ती आचार्यों ने अपने-अपने रूप में किया है। रस के स्वरूप पर आचार्यों ने विशेषकर अभिनव गुप्त ने प्रकाश डाला और उन्हीं की मान्यताओं और धारणाओं को परवर्ती आचार्यों - मम्मट , विश्वनाथ आदि ने अपने रूप में ढाल लिया । इन सब आचार्यों में से विश्वनाथ ने रस स्वरूप की व्याख्या न करके , इनके समय तक उसका जो स्वरूप स्थिर हो गया था , उसी का संग्रह कर दिया है। रस स्वरूप के विषय में इनका निम्नलिखित श्लोक संग्रह और व्यवस्था दोनों दृष्टियों से अवेक्षणीय है-

सत्वोद्रेकादखण्डस्वप्रकाशानंदचिन्मयः
वेद्यान्तरस्पर्शशून्यो ब्रह्मास्वाद सहोदरः।
लोकोत्तरचमत्कार प्राणः कैश्चित्यमातृभिः । स्वाकाखदभिन्नत्वेनाध्यमास्वाद्यते रसः ।

इस प्रकार विश्वनाथ के अनुसार-

(१) रस अखंड है- रस उस स्थायीभाव का दूसरा नाम है जिसका संयोग विभाव , अनुभाव ,संचारीभाव ( व्यभिचारी ) के समन्वित रूप के साथ हो , ना की इनमें से किसी एक या दो के साथ हो । इसीलिए समूहावलम्बनात्मक अनुभूति को ही रस कहते हैं । यद्यपि रस अपने अंशों में निर्मित है । तथापि उसके भी अंश को उससे अलग नहीं किया जा सकता । अतः इसे अखंड माना जाता है इसका एक अन्य अभिप्राय यह भी लिया जाता है कि रस स्वतः पूर्ण है , या अधिक या कम नहीं हो सकता । इसे कोटियों में नहीं बांटा जा सकता । दूसरे शब्दों में प्रत्येक सहृदय को रस का आस्वादन सामान्य रूप से प्राप्त होता है । इसका तात्पर्य यह है कि रस उस स्थायिभाव का अपर नाम है जिसका संयोग विभाव, अनुभाव, संचारिभाव, इन तीनों के समन्वित अथवा समंजित रूप के साथ हो, न कि इनमें से किसी एक अथवा दो के साथ।

(२)रस स्वप्रकाश है- तात्पर्य जिस प्रकार सूर्य स्वयं प्रकाशवान है उसी प्रकाश रस भी स्वयं प्रकाशित है । इसे प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं है । संभवतः इसी कारण इसे अपने आकार से अभिन्न भी कहा जा सकता है।

(३)अपने आकार से अभिन्न है- रस जिस रूप में आस्वादित होता है , इसके अतिरिक्त यह और किसी तरह या प्रकार की अनुभूति नहीं है। सहृदय की अपनी अनुभूति ही रस का रूप धारण कर लेती है। दूसरे शब्दों में रस के आस्वादन प्रसंग में एक सहृदय की अनुभूति किसी अन्य सहृदय की अनुभूति न तो सहायक बनती है और न उसे किसी अन्य रूप में प्रभावित ही कर सकती है ।

(४) रस चिन्मय- रस शुद्ध रूप से चेतन ही है , अपितु चेतनता प्रधान है । इसका मतलब यह है कि रस आत्मा की भांति शुद्ध न सही , किन्तु सचेतन अथवा प्राणवान आनन्द है - यह निद्रा , मद्यपान आदि जन्य भौतिक आनंदों के समान जड़ आनंद नहीं है। रसानुभूति आत्म - चेतना के प्रकाश से प्रकाशित होती है। अर्थात् इसमें आनन्द का अभाव और चैतन्य आत्मास्वाद का सदभाव होता है।

(५)वेधांतर स्पर्श शून्य - इसका मतलब है कि रस के आस्वादन के समय किसी अन्य प्रकार के ज्ञान का स्पर्श तक नहीं हो पाता। इस समय किसी सांसारिक घटना अथवा विचार के स्मरण आने की तो संभावना ही नहीं होती , यहाँ तक कि काव्य या नाटक के किसी विशिष्ट स्थल या दृश्य की ओर हमारा ध्यान ही नहीं रहता। सत्य तो यह है कि हम अपना आस्तित्व तक भूल जाते हैं और देश , काल , लिंग और वयः आदि के बंधन से नितान्त मुक्त हो जाते हैं।

(६)रस ब्रह्मास्वादसहोदर है- रस को ब्रह्मास्वाद बताने की अपेक्षा उसका सहोदर कहा गया है । अर्थात् रस का आनंद ब्रह्मास्वाद तो नहीं , पर उसके समान अवश्य है । रस का सहृदय लगभग उतना ही आस्वाद प्राप्त करता है । जितना कोई साधक योगी ब्रह्म - प्राप्ति के द्वारा प्राप्त करता है । ब्रह्मास्वाद की प्राप्ति के समय योगी अथवा साधक सांसारिक विकारों से नितान्त विमुक्त होता है , इधर काव्यास्वाद के समय भी सहृदय सांसारिक विकारों से विमुक्त होता है । अर्थात वे तत्काल के लिए दब अवश्य जाते हैं, पर सामान्य स्थिति आने पर पुन: अपने रूप में और प्राय: पहले की अपेक्षा अधिक उद्दाम रूप में जाग्रत हो उठते हैं।

(७)रस लोकोत्तरचमत्कारप्राण- रस का प्राण है लोकोत्तर चमत्कारा । चमत्कार का अर्थ है विस्मय । अर्थात चित का विस्तार । दूसरे शब्दों में चमत्कार , चित्त का विकासजन आह्राद है । रस का प्राण वहीं आनन्द है किन्तु वह लोकोत्तर होना चाहिए । इस प्रकार ' रस लोकोतर चमत्कार प्राण का समग्र रूप में अर्थ है कि रस लोकोत्तर एवं चित्तविकास - जनक आनंद से युक्त होता है । चित विकासजनक आनन्द तो मानव को अन्य लौकिक घटनाओं में भी मिलता है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि आचार्य विश्वनाथ द्वारा प्रस्तुत रस का स्वरूप सर्वमान्य है। अत: डां. नगेन्द्र के शब्दों में - विविध भावों और अभिनयों से व्यंजित भाव की कलात्मक अभिव्यंजना का भावमूलक काव्यसौंदर्य रस है।

रस के अंग[सम्पादन]

रस के संबंध में भरत के प्रसिद्ध सिद्धांत है, विभावानुभाव व्यभिचारी संयोगाद रसनिष्पत्ती:। अर्थात विभाव,अनुभाव और व्यभिचारी भाव के सहयोग से रस निष्पत्ति (अभिव्यक्ति) होती है । इस कथन के द्वारा यह स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं होता कि उक्त तीनों भागों या तत्वों के परस्पर सहयोग से रस अभिव्यक्ति है या तीनों के किसी अन्य तत्व के संयोग होने पर। इस कथन का तात्पर्य यह है कि सहृदयों का स्थायिभाव जब विभाव, अनुभाव और संचारिभाव का संयोग प्राप्त कर लेता है तो रस रूप में निष्पन्न हो जाता है। इन चारों को रस के अंग कहते हैं। इनका स्वरूप इस प्रकार हैं।

(१) स्थायीभाव - सहृदय के अन्त:करण में जो मनोविकार वासना रूप से सदा विद्यमान रहते हैं । इन भावो को अन्य कोई भी भाव दवा नहीं सकता उन्हें ही स्थायीभाव कहते हैं।

विश्वनाथ ने इसे और भी स्पष्ट किया है-

 "अविरुद्धा विरुद्धा वयं तिरोधातुमक्षमाः। आस्वादाङकुरकन्दोऽसौ भावः स्थायीति संमतः।।"

अर्थात् अविरुद्ध या विरुद्ध भाव जिसे दबा न सके , आस्वाद का मूलभूत वह भाव ही स्थायी भाव है। ये स्थायी भाव प्रत्येक सहृदय के मन में सुप्त अवस्था में रहते हैं और अनुकूल परिस्थिति में जागृत होते है। स्थायिभावों की संख्या सामान्यतः नौ मानी जाती है- रति, हास, शोक, उत्साह, क्रोध, भय, जुगुप्सा, विस्मय और निर्वेद।

ये क्रमश: रसों के रूप में निष्पन्न होते हैं- श्रृंगार, हास्य, करूण, वीर, रौद्र, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और शान्त। इनके अतिरिक्त एक अन्य रस वत्सल भी माना जाता है जिसका स्थायीभाव 'वात्सल्य' है। रस का स्थायिभाव के साथ सम्बन्ध सहृदयों के अन्त:करण में रति आदि स्थायिभाव वासना रूप से सदा उस प्रकार विद्यमान रहते हैं जिस प्रकार मिट्टि में गन्ध।

(२) विभाव - लोक में जो पदार्थ सहृदय के अन्त:करण में वासना रूप में स्थित रति , उत्साह , शोक आदि भावों के उधबोधक ( जागृत करने वाले ) कारणों को ही विभाव कहते है । विभाव का अर्थ है - कारण । विभाव सामाजिक के हृदयस्थित रति स्थायीभावों को बढ़ाता हैं , उनका विभावन करते हैं , उन्हें आस्वाद योग्य बनाते हैं । विभाव के दो भेद है- (क) आलंबन विभाव , (ख)उद्दीपन विभाव (क) आलंबन विभाव - आलम्बन विभाव दो प्रकार के होते हैं - (1) विषय और ( 2 ) आश्रय जिस सामाजिक के अन्त : करण में स्थित स्थायी भाव जागृत होकर रस बनता है , उसे आश्रय कहते हैं । आश्रय का स्थायीभाव जिस वस्तु या पात्र को देखकर जागृत होता है , उसे आलम्बन कहते हैं ।

उदाहरणार्थ , शकूंतला को देखकर दुष्यंत के हृदय में उसके प्रति रतिभाव जागृत हो जाने पर शकुंतला को ' आलम्बन ' कहेंगे और दुष्यंत को आश्रय , तथा वे दोनों पात्रों को आलम्बन - विभाव कहते हैं , और यही दोनों सामाजिक के स्थायीभावों को रसास्वाद तक पहुँचने के कारण है ।

(ख) उद्दीपन विभाव वे कहलाते हैं जो रस को उद्दीप्त करते हैं। अर्थात् जो स्थायीभावों को उद्दीप्त करके उनकी आस्वादन क्षमता बढ़ाते हैं और उन स्थायीभावों को रसावस्था तक पहुंचाने में सहायक होते हैं। उद्दीपन विभाव दो प्रकार के माने गये हैं- १) आलम्बनगत बाह्य चेष्टाएं २) बाह्य वातावरण।

उदाहरणार्थ- श्रृंगार रस में दुष्यन्त (आश्रय) के रतिभाव को अधिक तीव्र करने वाली शकुन्तला (आलम्बन) कटाक्ष, भुजा-विक्षेप आदि चेष्टाएं, रौद्र रस में परशुराम के क्रोध को उद्दीप्त करने वाली लक्ष्मण की व्यंग्योक्तियां आदि आलम्बन-गत बाह्य चेष्टाएं उद्दीपन-विभाव कहलाती है।

(३) अनुभाव रति आदि स्थायीभावों को उद्दीप्त करने वाली आश्रय की बाह्य चेष्टाएँ अनुभाव कहलाती हैं । अनुभाव का शाब्दिक अर्थ है - भावमनु अनुभावः , अर्थात जो रति स्थायीभावों के बाद उत्पन्न होते है । अथवा जो उत्पन्न स्थायी भावों का अनुभव कराते है। अतः जो भावो के कार्य है, अथवा जिनके द्वारा रति भावों का अनुभव होता है, वे अनुभाव कहलाते हैं । अनुभाव चार माने गये हैं - १) आंगिक - आर्थात् शरीर सम्बन्धी चेष्टाएं। २) वाचिक - अर्थात् वाग्व्यापार। ३) आहार्य - अर्थात् वेश-भूषा, अलंकरण, साजसज्जा आदि। ४) सात्त्विक - अर्थात् सत्व के योग से उत्पन्न कायिक चेष्टाएं। इनका निर्वहण स्वत: ही, बिना यत्न के आश्रय द्वारा हो जाता है। अतः इस वर्ग में आने वाली आश्रय की सभी चेष्टाएं 'अयत्नज' कहलाती हैं। सात्त्विक अनुभाव आठ माने गये हैं- स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु, वैवणर्य, अश्रु और प्रलय।

(४) संचारीभाव (व्यभिचारीभाव)- संचारी का अर्थ है साथ-साथ चलना और संचरणशील होना। संचारी-भाव स्थायीभावों के सहकारी कारण हैं, यही उन्हें रसावस्था तक ले जाते हैं और स्वयं बीच में ही लुप्त हो जाते हैं। संचारीभाव अस्थिर मनोविकार या चित्तवृत्तियां हैं। ये आश्रय और आलम्बन के मन में उठते और मिटते हैं। अतः अस्थिर मनोविकार या चित्रवृतियां 'संचारीभाव' कहलाती हैं। यों संचारीभाव अनगिनत हैं, फिर भी सुविधा की दृष्टि से इनकी संख्या ३३ मानी गई है- निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, मद, श्रम, आलस्य, दीनता, चिंता, मोह, स्मृति, धृति, व्रीड़ा, चापल्य, हर्ष, आवेग, जड़ता, गर्व,अवमर्ष ,अवहित्था, उग्रता, मति, व्याधि, उन्माद, त्रास, वितर्क।

रस का भेद[सम्पादन]

आचार्य भरत ने आठ रस माने थे। उनके अनुसार वे आठ रस है क्रमशः

(१)श्रृंगार जिसका ('रति'या 'प्रेम' स्थाई भाव है), (२)हास्य ('हास' स्थाई भाव) (३)करुण( शोक स्थायी भाव ) (४)रौद्र (क्रोध स्थायी भाव ) (५)वीर ( ' उत्साह ' स्थायी भाव ) (६)भयानक ( 'भय ' स्थायी पाव ) (७)विभत्स ( जगुप्सा स्थायी भाव ) और (८)अदभुत (विस्मय ' स्थायी भाव ) तदांतर (९)शांत रस ( ' निर्वेद ' स्थायी भाव) के शामिल होने से रस - संख्या नौ हो गई और (१०)भक्ति ( भगवत प्रेम या भगवत रति ' स्थायी भाव) मानने से रस दस तथा (११)वात्सल को रस मानने से रस संख्या ग्यारह हो गई । इस प्रकार वर्तमान में रसों की संख्या ग्यारह मानी जाती - और इन्हें ही रस के भेद भी कहा जाता है ।