भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/अर्थ-परिवर्तन के कारण और दिशाँए

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अर्थ-परिवर्तन[सम्पादन]

अर्थ में सदा परिवर्तन होता रहता है। ध्वनि या पद के परिवर्तन की प्रकिया के समान अर्थ भी स्थायी और अपरिवर्तनीय वस्तु नहीं है। उसमें भी परिवर्तन होता रहता है। उदाहरण के लिए संसकृत का शब्द आकाशवानी लें । संसकृत में इसका अर्थ 'देववाणी' है। तुलसी के समय भी यही अर्थ था। अत: रामचरितमानस में कहा गया है-' भै अकासबानी तेहि काला'। अब आकाशवाणी का अर्थ परिवर्तन होकर (हिन्दी मेंं) आँल इणि्डया रेडियो हो गया है। अत: अर्थ में परिवर्तन हो जाना ही अर्थ-परिवर्तन है।

अर्थ-परिवर्तन के कारण[सम्पादन]

अर्थतत्व एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। अत: अर्थ-परिवर्तन-सम्बन्धी सारी प्रक्रियाओं को लक्षणा और व्यजना का नाम दिया गया है। पाश्चात्य विद्दानों में टकर और मिशेल ब्रेआल ने सर्वप्रथम अर्थ-तत्व पर विचार किया और आधुनिक युग में आग्डेन और रिचडर्स की देन है। टकर के आधार पर तारापुरवाला ने अर्थ- परिवर्तन के निम्नलिखित कारण बताये हैं--

१. लाक्षणिक प्रयोग

भाषा का प्रमुख उपयोग भाव या विचार का सम्प्रेषण है, किन्तु मनुष्य सहज रूप से सौन्दर्यप्रियता , जैसे कलाओं का उपयोग कर रहा है, बोलते समय प्रत्येक वक्ता की इच्छा रहती है कि उसकी अभिव्यज्जना सुन्दर और प्रभावोत्पादक हो। किन्तु भाषा अभिव्यज्जना का बहुत अशक्त और असमर्थ माध्यम है। समस्त अनुभूतियों को शब्दों में बाँध देना असम्भव है। यों कहें कि भाषा की अभिव्यज्जनात्मक त्रुटि को पूर्ण करने के लिए ,अनेक साधन काम में लाये जाते है। लाक्षणिक प्रयोग भी उनमें से एक है। अत:उनमें शकि्त भरने के लिए अभिव्यज्जना की नवीन भंगिमाएँ अपनानी पड़ती हैं जो नवीन शब्द-प्रयोग से ही सम्भव हो पाती है। उदाहरण- नारियल की आँख, घड़े का मुँह, सरस कहानी आदि।

२. परिवेश का परिवर्तन

(क)भौगोलिक परिवर्तन :- वेद में 'उष्ट्र' शब्द का प्रयोग 'भैसे' के अर्थ में हुआ है ,किन्तु बाद में 'ऊँट' के लिए होने लगा। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि आर्य जहाँ रहते थे वहाँ ऊँट नहीं थे ,बाद में शीत भू-भाग से उष्ण-भाग की ओर आये और उन्हें एक नया जन्तु मिला जिसका नाम ऊँट रखा जिसका प्रयोग भैसें के लिए हुआ करता था।

(ख)सामाजिक परिवर्तन:- सामाज-भेद से एक ही शब्द के अर्थ में भेद आ जाता है और एक ही वस्तु के लिए भिन्न शब्दों का प्रयोग होने लगता है; जैसे -अंग्रेजी में मदर ,फादर,ब्रदर ,सिस्टर आदि शब्दों का अर्थ का जो अर्थ परिवार है,वही रोमन कैथलिक धार्मिक संगठन में नहीं।'सिस्टर' का अर्थ परिवार में 'बहन' किन्तु अस्पताल में (नर्स)। 'भाई' शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में होता है-सहोदर भ्राता, साला,बहनोई, आदि।

(ग)भौतिक परिवर्तन:- जैसे-जैसे भौतिक साधनों में परिवर्तन होता है,वैसे-वैसे वस्तुओं के नाम में जैसे पानी पीने का कोई बर्तन हमारे यहाँ रहा होगा किन्तु आज उसका नाम कोई नहीं जानता आज 'गिलास' नाम प्रचलित है जो अंग्रेजी की देन है।

३. विनम्रता-प्रदर्शन:-विनम्रता सामाजिक शिष्टाचार का अभिन्न अंग है। भाषा से किसी व्यकि्त की शिक्षा, संस्कृति , आभिजात्य आदि पता लग जाता है। फा़रसी तहजी़ब में चार बातों पर ध्यान दिया जाता है। चलना, बोलना और बैठना । उदाहरण- कैसे कृपा की? , 'मैं' निवेदन करना चाहता हूँ, आदि ।अत: किसी की भाषा सुनकर ही यह जान लिया जा सकता कि वह किस तबके का व्यकि्त है।

४. व्यंग्य:- इस प्रसंग में व्यंग शब्द का प्रयोग अंग्रेजी के 'आयरनी' का पर्याय है जिसका अर्थ आक्षेप करना । इसके लिए हमारे यहाँ 'विपरीत लक्षणा' शब्द का प्रयोग हुआ है। उदाहरण-'ऊधो, तुम अति चतुर सुजान' में गोपियों ने चतुर और सुजान शब्द विपरीत अर्थ में किया है, अर्थात तुम महा मुख और बुध्दिहीन हो जो हम-जैसी अबलाओं के सामने योग और निर्गुण ब्रह्म की चर्चा कर रहे हो।

६. भावनात्मक बल:- बौध्दिक उपयोग के साथ भाषा का भावात्मक उपयोग होता है। भावात्मक बल के कारण अनेक शब्दों के अर्थ में परिवर्तन हो जाता है। जैसे - बंगाल में एक मिठाई का नाम 'प्राणहरा' (प्राण लेने वाला) मिठाई का नाम 'प्राणहारा' उपयुक्त नहीं है लेकिन उनका लक्ष्य था मिठाई का अतिशय बताना।

७. सामान्य के लिए विशेष प्रयोग:- कभी-कभी पूरे वर्ग के लिए उसी वर्ग की एक वस्तु का प्रयोग किया जाता है। यह वस्तुता: अर्थ-विस्तार का ही एक रूप है। जैसे - 'सब्जी' शब्द का प्रयोग केवल (हरी) तरकारियों के लिए होना चाहिए , किन्तु उससे सभी तरकारियों बोध हो जाता है; आलू , टमाटर, कद्दू आदि।

८.अज्ञानता:- असुर पहले देववाचक था, किन्तु बाद में 'अ' निषेध (नय्) का अंश मान लिया गया और 'सुर' शब्द का प्रयोग देव के लिए होने लगा। फिर सुरमें 'अ' लगाकर 'असुर' से दानव का बोध कराया जाने लगा। क्रोध के लिए 'रंज' शब्द का प्रयोग अज्ञान का ही परिणाम है।

८.एक शब्द के विभिन्न अर्थों में प्रयोग:- ऐसा बहुत बार देखा जाता है कि किसी शब्द के तत्सम और तद्भव रूपों में अर्थ भेद हो जाता है, जैसे - खाध-खाद, भद्र- भद्दा,श्रेष्ठ- सेठ आदि।

अत: उपयुक्त चर्चा से स्पष्ट होता है कि अर्थ -परिवर्तन का कोई एक सुनिशि्चत कारण नहीं आन्तरिक, बाह्म , मानसिक , भौतिक आदि अनेक कारण है।

अर्थ-परिवर्तन की दिशाँए[सम्पादन]

अर्थ परिवर्तन किन-किन दिशाओं में होता हैं,अथवा 'उसके' कितने प्रकार होते हैं, इस बिषय पर सबसे पहले फ्रांसीसी भाषाविज्ञानवेता 'ब्रील' ने विचार किया था। उन्होंने तीन दिशाओं की खोज की: अर्थ-विस्तार , अर्थ-संकोच,अर्थादेश । अभी तक ये मान्य है-

१.अर्थ-विस्तार'

कोई शब्द पहले सीमित अर्थ में प्रयुक्त होता है और बाद में उसका अर्थ व्यापक हो जाता है; इसे ही अर्थ-विस्तार कहते हैं। जैसे- 'प्रवीण' शब्द का अर्थ आरम्भ में था-- अच्छी तरह वीणा बजानेवाला। किन्तु बाद में चलकर वह किसी भी काम में निपुणता का वाचक हो गया;जैसे--'वह झाडू देने में प्रवीण है' या 'भोजन बनाने में प्रवीण है,आदि।

२. अर्थ-संकोच

जिस प्रकार अर्थ का विस्तार सम्भव है,उसी प्रकार संकोच भी। प्राय: ऐसा देखा गया है कि कोई शब्द पहले विस्तृत अर्थ का वाचक था लेकिन बाद में सीमित अर्थ का वाचक हो गया है। उदाहरणार्थ-- गम् धातु से 'गो' शब्द निष्पन्न हुआ जिसका आरम्भिक अर्थ 'चलानेवाला', परन्तु आज प्रत्येक चलनेवाले जन्तु को गो नहीं कहते; यह शब्द पशु-विशेष के लिए रूढ हो गया है। इसी तरह 'जगत्' शब्द का अर्थ 'खूब चलनेवाला' पर मोटर,रेल,हवाई जहाज को जगत् नहीं कहते , यह संसार का वाचक हो गया है। अर्थ-संकोच निम्नलिखित कारणों से होता है-- (क) समास:- नीलाम्बर,पीताम्बर आदि शब्द बहुव्रीहि समास के कारण ही संकुचित अर्थ के वाचक हैं। जैसे- पीला वस्त्र धारण करनेवाला से -- बलराम या कृष्ण का बोध होता है।

(ख)उपसर्ग:- उपसर्ग शब्दों के अर्थ को संकुचित कर देता है। जैसे-- 'हार' शब्द विभिन्न अर्थों में होता है, जैसे - प्रहार,संहार,विहार,उपहार आदि।

(ग) विशेषण:- अर्थ-संकोच का एक बहुत बडा़ साधन विशेषण है। गुलाब शब्द से किसी भी रंग के गुलाब का बोध हो सकता है,किन्तु लाल गुलाब कह देने पर उजले, पीले,गुलाबी, हरी आदि का व्यवच्छेद हो जाता है।

(घ) पारिभाषिकता:- शब्दों का परिभाषिक रूप में प्रयोग हमेशा उनके अर्थ को संकुचित कर देता है। उदाहरण--'रस' शब्द का अनेक अर्थ हैं,किन्तु काव्यशास्त्र में उसका प्रयोग विभावादि के संयोग से उत्पन्न आनन्दानुभूति के लिए होता है।

(ङ)प्रत्यय:- प्रत्यय योग से भी अर्थ-संकोच होता है। एक ही धातु से निष्पन्न होने पर भी विभिन्न प्रत्ययों के कारण विभिन्न अर्थों के वाचक बन जाते हैं,जैसे--'मन्' धातु से मति, मत, मनन, मान आदि।

३.अर्थांदेश

आदेश का अर्थ है परिवर्तन । अर्थादेश में अर्थ का विस्तार या संकोच नहीं होता, वह बिल्कुल बदल जाता है, जैसे-- वेद में 'असुर' शब्द देवता का वाचक था परन्तु बाद में दैत्य का वाचक बन गया।'आकाशवाणी' का अर्थ पहले देववाणी था; अब उसका प्रयोग अखिल भारतीय रेडियो के लिए हो रहा है। अत: अर्थादेश में दो बाते सामने आती हैं- १) अर्थोंत्कर्ष २) १)अर्थापकर्ष। कुछ शब्दों का अर्थ पहले बुरा रहता है। और बाद में अच्छा हो जाना अर्थोंत्कर्ष है; जैसे-- साहस संसकृत में अच्छा शब्द नहीं था लूट, हत्या, चोरी लेकिन अब साहस का अर्थ हिम्मत होता है। २) कुछ शब्द पहले अच्छा रहता है और बाद में बुरा हो जाता है; जैसे-- पाखंड संन्यासियों के एक सम्प्रदाय का नाम था अशोक इनका बडा आदर करता, दान देता था। लेकिन आज 'पाखंड' ढो़ग का वाचक है। अत: अर्थ-परिवर्तन में उत्कर्ष की अपेक्षा अपकर्ष की प्रवृति अधिक पायी जाती है।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भाषाविज्ञान की भूमिका --- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा । दीप्ति शर्मा। पृष्ठ--२७३-२८६

२. भाषा विज्ञान -- र्डॉ० भोलानाथ तिवारी। प्रकाशक--किताब महल, पुर्नमुद्रण--२०१७, पृष्ठ-- २७५,२७९