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भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा/वाक्यविज्ञान और उसके भेद

विकिपुस्तक से
ॐ
भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा
  1. भाषा का स्वरूप
  2. संसार की भाषाओं का वर्गीकरण
  3. भाषाविज्ञान के अंग
  4. भाषा की विशेषताएँ और प्रवृत्तियाँ
  5. भाषा के विकास-सोपान
  6. भाषा के विभिन्न रूप
  7. भाषा की उत्पत्ति
  8. भाषा की परिवर्तनशीलता और परिवर्तन के कारण
  9. रूप-परिवर्तन के कारण और दिशाएँ
  10. अर्थ-परिवर्तन के कारण और दिशाएँ
  11. ध्वनिविज्ञान और औच्चारणिक ध्वनि का विवेचन
  12. वाक्यविज्ञान और उसके भेद
  13. भाषाविज्ञान के अध्ययन क्षेत्र
  14. पदबंध की अवधारणा और उसके भेद
  15. शब्द और पद में अंतर और हिन्दी शब्द भण्डार के स्रोत
  16. पश्चिमी हिन्दी की बोलियाँ और भाषागत विशेषताएँ
  17. पूर्वी हिन्दी की बोलियाँ और भाषागत विशेषताएँ
  18. हिन्दी, हिन्दी प्रदेश और उसकी उपभाषाएँ
  19. आधुनिक हिन्दी का विकास क्रम
  20. सामान्य भाषा और काव्यभाषा: संबंध और अंतर

वाक्यविज्ञान

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वाक्यविज्ञान भाषाविज्ञान की वह शाखा है, जिसमें पदों के पारस्परिक सम्बन्ध का विचार किया जाता है। ध्वनि का सम्बन्ध भाषा के उच्चारण से है, उसमें जब सार्थकता का समावेश हो जाता है तो वह परस्पर अन्वय का योग्य बन जाता है तो उसे पद कहते है। पद ध्वनि और वाक्य के बीच संयोजक कड़ी है क्योंकि उसमें उच्चारण और सार्थकता दोनों का योग होता है, मगर न तो ध्वनि की तरह वह केवल उच्चारण है और न ही पूर्णता सार्थक। पदविज्ञान में पदों की रचना पर विचार होता है, अर्थात- संज्ञा, क्रिया, विशेषण, कारक, लिंग, वचन, पुरुष, काल आदि लेकिन पदों का कहाँ, कैसे प्रयोग होगा इसका विषय वाक्यविज्ञान है। अतः पद और वाक्य के संबंध में दो सिद्धांत है, अभिताभिधान्वयवाद का कहना है कि पदों को जोड़ने से वाक्य बनता है जबकि अभिताभिधान्वयवाद का कहना है कि वाक्य को तोड़ने से पद बनते है। आधुनिक भाषाविज्ञान अभिताभिधान्वयवाद का समर्थक है उनका कहना है कि 'भाषा की न्यूनतम पूर्ण सार्थक इकाई वाक्य है। लेकिन अर्थ की दृष्टि से वाक्य कभी पूर्ण नहीं होता जैसे: "उसने उससे वह बात कह दी।" यह बात पूर्ण रूप अपनी बात कहने में असमर्थ है। फिर कामचलाऊ परिभाषा: "वाक्य भाषा की वह सहज इकाई है जिसमें एक या अधिक शब्द (पद) होते होते है तथा अर्थ की दृष्टि से पूर्ण हो या अपूर्ण, व्याकरणिक दृष्टि से अपने विशिष्ट संदर्भ में अवश्य पूर्ण होती है, साथ ही उसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कम-से-कम एक समापिका क्रिया अवश्य होती है। अतः वाक्य निष्पति के लिए तीन चीज़ें अपेक्षित हैं— 1. आकांक्षा, 2. योग्यता और 3. आसत्ति।

वाक्य के भेद

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विभिन्न आधारों पर वाक्य के अनेक भेद होते हैं—

क्रिया के अनुसार

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भाषा में क्रिया का स्थान प्रमुख है। वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में वाक्य में अवश्य वर्तमान रहती है। संस्कृत, लैटिन, आदि पुरानी भाषाओं में तथा बंगला, रूसी, आदि आधुनिक भाषाओं में बिना क्रिया के भी वाक्य मिलते है, किंतु साधारणतः वाक्य क्रियायुक्त होते हैं। इस प्रकार क्रिया के होने न होने के आधार पर दो प्रकार के होते है: 1. क्रियायुक्त, 2. क्रियाहीन।

क्रियायुक्त वाक्य

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क्रियायुक्त वाक्य वे वाक्य हैं जिसमें क्रिया होते हैं। अधिकांश भाषाओं में वाक्य इसी प्रकार के होते है।

  • हिन्दी, अंग्रेज़ी, आदि में सहायक क्रिया के बिना काम नहीं चल सकता। हिन्दी या अंग्रेज़ी में बिना 'है' या 'is' का प्रयोग किए वाक्य अधूरा लगता है। जैसे कि, "यह मेरी पुस्तक" या "this my book" खटक जाता है। "यह मेरी पुस्तक है", या "this is my book" कहने पर आकांक्षा पूर्ण निवृत्ति होती है।
  • बहुत सारे मुहावरे ऐसे हैं जिनमें क्रिया का प्रयोग नहीं होता, जैसे "जिसकी लाठी उसकी भैंस", "जैसी करनी वैसी भरनी", आदि।
  • एक पद वाले वाक्यों में क्रिया का इस्तेमाल नहीं होता, जैसे: "साँप!", "भूकंप!", "आग!"
  • प्रश्न वाले वाक्यों में भी कुछ ऐसा ही होता है: जैसे कि, "तुम कहाँ जा रहे हो?"—"दिल्ली।"

रचना के अनुसार

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रचना के अनुसार वाक्य के तीन भेद हैं: 1. सरल, 2. संयुक्त, और 3. मिश्र।

सरल
जिसमें एक उद्देश्य और एक विधेय अर्थात एक संज्ञा और एक क्रिया होती है; जैसे: "लड़का पढ़ता है।"
संयुक्त
इसमें अनेक प्रधान उपवाक्य होते हैं जिनके साथ अनेक आश्रित उपवाक्य रहते हैं; जैसे: "जिस दिन भगवान ने आलू का निर्माण किया होगा, उस दिन उसे यह गुमान भी नहीं हुआ होगा।"
मिश्र
जिसमें एक मुख्य उपवाक्य रहता है, किंतु आश्रित उपवाक्य एक या अनेक हो सकते है; जैसे: "जो विद्दान होता है, उसका सर्वत्र सदा आदर होता है।"

अर्थ के अनुसार

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अर्थ के अनुसार वाक्य के आठ भेद माने जाते हैं:

  1. विधि वाक्य
  2. निषेध-वाक्य
  3. प्रश्न-वाक्य
  4. अनुज्ञा-वाक्य
  5. इच्छार्थक-वाक्य
  6. सन्देहार्थक-वाक्य
  7. संकेतार्थक-वाक्य
  8. विस्मयादिबोधक-वाक्य

शैली के अनुसार

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शैली के अनुसार वाक्य के तीन भेद होते हैं: 1. शिथिल, 2. समीकृत, और 3. आवर्तक। इन तीनों भेदों के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा खींचना सम्भव नहीं है। फिर भी ये भेद व्यावहारिक उपयोग के हैं।

शिथिल वाक्य
इसमें वक्ता एक के बाद दूसरी बात, उन्मुक्त भाव से कला का सहारा लिए कहता चलता है, जैसे: "अयोध्या सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी थी। हम जिस समय के बात कह रहे हैं उस समय महाराज दशरथ अयोध्या के राजा थे।"
समीकृत वाक्य
यह संगीत और संतुलन की नैसर्गिक, मानवीय इच्छा की पूर्ति करता है। जैसे - "जैसा राजा, वैसी प्रजा"; "जिसकी लाठी, उसकी भैंस", आदि।
आवर्तक वाक्य
इसमें चरम सीमा अन्त में आती है। श्रोता या पाठक उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करता रहता है और तब उसके सामने वह बात आती है जो वक्ता या लेखक उसे बताना चाहता है, इस शैली के वाक्य वक्ताओं या नेताओं अधिक करते है। जैसे: "यदि हम चाहते हैं कि हमारी स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, यदि हम चाहते हैं कि हमारी सीमा की ओर देखने की भी हिम्मत शत्रु को न हो आदि।

अतः वाक्य का प्रयोग करते समय एक साथ चिंतन, उपयुक्त पद का चयन, व्याकरणिक गठन और उच्चारण का ध्यान रखना पड़ता है। चूँकि वाक्य भाषा की प्रमुख इकाई है, इसलिए ध्यान भी उस पर सबसे अधिक देना उचित हैं।

सन्दर्भ

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  1. भाषाविज्ञान की भूमिका — आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा। दीप्ति शर्मा। पृष्ठ: 241-252
  2. भाषा विज्ञान — डॉ. भोलानाथ तिवारी। प्रकाशक: किताब महल, पुर्नमुद्रण: 2017, पृष्ठ: 233