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भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा/पूर्वी हिन्दी की बोलियाँ और भाषागत विशेषताएँ

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भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा
  1. भाषा का स्वरूप
  2. संसार की भाषाओं का वर्गीकरण
  3. भाषाविज्ञान के अंग
  4. भाषा की विशेषताएँ और प्रवृत्तियाँ
  5. भाषा के विकास-सोपान
  6. भाषा के विभिन्न रूप
  7. भाषा की उत्पत्ति
  8. भाषा की परिवर्तनशीलता और परिवर्तन के कारण
  9. रूप-परिवर्तन के कारण और दिशाएँ
  10. अर्थ-परिवर्तन के कारण और दिशाएँ
  11. ध्वनिविज्ञान और औच्चारणिक ध्वनि का विवेचन
  12. वाक्यविज्ञान और उसके भेद
  13. भाषाविज्ञान के अध्ययन क्षेत्र
  14. पदबंध की अवधारणा और उसके भेद
  15. शब्द और पद में अंतर और हिन्दी शब्द भण्डार के स्रोत
  16. पश्चिमी हिन्दी की बोलियाँ और भाषागत विशेषताएँ
  17. पूर्वी हिन्दी की बोलियाँ और भाषागत विशेषताएँ
  18. हिन्दी, हिन्दी प्रदेश और उसकी उपभाषाएँ
  19. आधुनिक हिन्दी का विकास क्रम
  20. सामान्य भाषा और काव्यभाषा: संबंध और अंतर

पूर्वी हिन्दी, हिन्दी वही क्षेत्र है जो प्राचीन काल में उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल था। यह क्षेत्र उत्तर से दक्षिण तक दूर-दूर तक चला गया है। इसके अंतर्गत उत्तर प्रदेश में अवधी और मध्य प्रदेश में बघेली तथा छत्तीसगढ़ी का सारा क्षेत्र आता है; अर्थात् कानपुर से मिर्ज़ापुर तक (लगभग 240 कि.मी.) और लखीमपुर की उत्तरी सीमा से दुर्ग, बस्तर की सीमा तक (लगभग 900 कि.मी.) के क्षेत्र में पूर्वी हिन्दी बोली जाती है। बोलने वालों की संख्या पाँच करोड़ के लगभग है। अवधी में भरपूर साहित्य मिलता है। मंझन, जायसी, उस्मान, नुरमुहम्मद आदि सूफी़ कवियों का काव्य ठेठ अवधी में और तुलसी, मानदास, बाबा रामचरण दास, महाराज रघुराज सिंह आदि का रामकाव्य साहित्यिक अवधी में लिखा गया है। इस वर्ग की तीन बोलियाँ हैं: अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी। सामान्यता की दृष्टि से जितना घनिष्ठ संबंध इनमें है, उतना हिन्दी के अन्य उपभाषाओं में नहीं है।

अवधी

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अयोध्या नाम का एक बहुत प्राचीन राज्य था। अयोध्या से औध और औध से अवध नाम पड़ा। अवध की बोली अवधी है। अवध प्रान्त के अन्तर्गत लखीमपुर खीरी, बहराइच, गोंडा, बाराबंकी, लखनऊ, सीतापुर, उन्नाव, फ़ैज़ाबाद, सुल्तानपुर, रायबरेली और हरदोई के जिले हैं। इनमें हरदोई जिले में अवधी नहीं बोली जाती। अवध के बाहर इलाहाबाद, फतहपुर, और जौनपुर तथा मिर्जापुर (पश्चिमी भाग) की बोली भी अवधी है। अवधी बोलने वालों की संख्या दो करोड़ से कुछ अधिक है। इसमें जायसी, उसमान, आदि सूफी़ कवियों और तुलसी, बाबा रामचरण दास, महाराज रघुराज सिंह आदि रामकवियों का प्रचुर साहित्य मिलता है। वर्तमान काल में रेडियों के माध्यम से बहुत से साहित्यकार सामने आए हैं।

विशेषताएँ

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  1. अ, इ, उ के हस्व और अतिहस्व दो-दो रूप मिलते हैं।'अ' किसी शब्द के अन्त में नहीं आता। हस्व ए, ओ, पाए जाते हैं। ऐ, औ सामान्य हिन्दी के कारण आ रहे हैं सामान्य अवधी में नहीं हैं।
  2. इसमें ण ध्वनि के स्थान पर न का प्रयोग होता है।
  3. इसमें ड, ढ, शब्द शुरू में आते हैं, मध्य और अन्त में नहीं जबकि ड़ और ढ़ शब्द अन्त में आते है।
  4. इसमें 'ल' के स्थान पर ' र ' का प्रयोग मिलता है। जैसे: अंजुरी, मूसर, फर, हर आदि।
  5. इसमें महाप्राण ध्वनियाँ के रूप में ख, छ, ठ, थ, फ, के स्थान पर घ, झ, ढ, ध, भ का प्रयोग होता है।
  6. इसमें संज्ञा के तीन रूप होते है; जैसे: घोरा, घोरवा, घोरउवा।
  7. इसमें सर्वनाम जे- के लिए जउन, जेकर, जिनकर, से के लिए तउन, तेकर, तिनकर तथा को के लिए कउन, केका, किनकर आदि का प्रयोग होता है।
  8. इसमें आकारान्त विशेषण बहुत कम है; जैसे: अच्छा, कुँआरा। ऐसे विशेषणों का रूप बहुवचन में एकारान्त और स्त्रीलिंग में ईकारान्त हो जाता है; जैसे: अच्छे, अच्छी, कुआँरे, कुआँरी।
  9. संख्यावाचक कुछ विशेषणों का उच्चारण इस तरह है- दुइ, तीनि, पान, छा, एगारा, सोरा, ओनइस, एकइस, पंचावन, साठि, सवाउ आदि।
  10. कुछ निराले शब्द भी है, जैसे: आँचर (स्तन), अकलंग (एक ओर), कांध (कंधा), खाँचि (टोकरी), गोड़ (पाँव), पातर (पतला), हाँड़ (हड्डी)।

बघेली

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अवधी और छत्तीसगढ़ी के मध्य में बघेली बोली जाती है। बघेलखंड में, बघेल राजाओं का राज्य था जिसकी राजधानी रीवा थी। रीवा के बाहर बघेली उत्तर प्रदेश की सीमा को छूती है और पश्चिम में दमोह और बाँदा की सीमा को। कुछ विद्वान इसे अवधी की उपबोली मानते हैं।

विशेषताएँ

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  1. अवधी की अपेक्षा इसमें छत्तीसगढ़ी की तरह 'व' के स्थान पर 'ब' का प्रयोग होता है; जैसे: आबा (आवा)।
  2. कारकचिहों में क, के बदले (का के, कहा को) तथा ते, के लिए (से के, तार) आदि का प्रयोग होता है।
  3. सर्वनामों के रूप में म्वा, मोहि (मुझे), त्वा, तोहि (तुझे), वाहि (उसको), याहि (इसको) के लिए प्रयोग होता है।
  4. इसमें विशेषणों का निर्माण प्रायः 'हा' प्रत्यय जोडंकर होता है; जैसै- अधिकहा, नीकहा।
  5. इसमें क्रियारूपों में भिन्नताएँ हैं, जैसे: चरामै का (चराने को), देखि कै (देखकर) आदि।

छत्तीसगढ़ी

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जिसे इतिहास में दक्षिण कोसल कहा गया है वह वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ भूखंड है। चेदि राजाओं के नाम पर इसका नाम चेदीशगढ़ पडा़। उसीसे छत्तीसगढ़ हो गया। इसके अन्तर्गत सरगुजा, कोरिया, बिलासपुर, रायपुर, रायगढ़, खैरागढ़, दुर्ग, नंदगाँव और काँकर आते हैं। यह बोली अवधी से बहुत मिलती है। जनसंख्या एक करोड़ से ऊपर है।

विशेषताएँ

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  1. ध्वनिगत विशेषताओं में महाप्राणीकरण की प्रवृत्ति पाई जाती है; जैसे: धौड़ (दौड़), कछेरी (कचहरी), झन (जन), जाथै (जात है।)
  2. इसमें 'स' के स्थान पर कहीं-कहीं 'छ' मिलता है; जैसे: छीता (सीता), छींचन (सींचना)।
  3. कर्म-सम्प्रदान का 'ला' परसर्ग और करण-अपादान का 'ले' का प्रयोग, जैसे: "ओ ओला कहिस" (उसने उसको कहा)।
  4. इसमें बहुवचन प्रायः 'मन' शब्द लगाने से बनता है; जैसे: टूटा मन (लड़के), हम मन (हम लोग) आदि।
  5. इसमें शिष्ट और अशिष्ट प्रयोगों में भी अन्तर होता है; जैसे: हन (शिष्ट), हवन (अशिष्ट)।

सन्दर्भ

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  1. हिन्दी भाषा — डॉ. हरदेव बाहरी, अभिव्यक्ति प्रकाशन, 2017, पृ. 173-202