भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा/आधुनिक हिन्दी का विकास क्रम

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भाषा के आधार पर यदि संसार की जातियों का वर्गीकरण किया जाए तो कहा जा सकता है कि एक तो आर्य जातियाँ है और दूसरी अनार्य जातियाँ। आर्यों के पूर्वज पूरे यूरोप, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और भारतीय उपमहाद्वीप (जिसके अंतर्गत भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका) में फैल गए थे। यूरोप के 17वीं. से 18वीं. शताब्दी में, अर्थात् साम्राज्यवादी युग में, लोग कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, आस्टे्लिया, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में अपने उपनिवेश बनाकर रहने लगे। इन सब देशों के आदिवासियों पर यूरोपीय या आर्य परिवार की भाषाओं का इतना प्रभाव पड़ा है कि वहाँ की मूल भाषाएँ दब-सी गई हैं। अब इन देशों की सामान्य या मुख्य भाषाएँ आर्य परिवार की हैं। विद्वानों ने इस वृहत् परिवार का नाम भारत-यूरोपीय (भारोपीय) रखा है। संसार का सबसे बड़ा भाषा-परिवार यही है। भूमंडल की कुल 350 करोड़ जनसंख्या में इस भारोपीय (आर्य) परिवार की भाषाएँ बोलने वालों की संख्या 150 करोडं हैं। साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ये भाषाएँ अत्यंत प्रगतिशील, उत्कृष्ट और समृध्द हैं। अतः आर्य भाषा के दो वर्ग हैं — 1. यूरोपीय आर्य भाषाएँ और 2. भारत-ईरानी आर्य भाषाएँ।

भारत-ईरानी वर्ग की तीन शाखाएँ हैं — 1. ईरानी (ईरान और अफ़ग़ानिस्तान की भाषाएँ), 2. दरद (कश्मीर और पामीर के पूर्व-दक्षिण की भाषाएँ), और 3. भारतीय आर्य भाषाएँ। भारतीय आर्य भाषाओं का इतिहास लगभग साढे़ तीन हजार वर्षों का है। अर्थात् इनका इतिहास ईसा से लगभग पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व से प्रारम्भ होता है। धर्म, समाज, साहित्य, कला और सांस्कृतिक की दृष्टि से तथा प्राचीनता गंभीरता और वैज्ञानिकता के विचार से भारतीय आर्यभाषा बहुत महत्वपूर्ण है। संसार का प्राचीनतम ग्रंथ-ऋग्वेद इसी भाषा में है। विकास क्रम के अनुसार भारतीय आर्यभाषा को तीन कालों में बाँटा जाता है—

  1. प्राचीन काल (1500 ई.पू. से 500 ई.पू.)
  2. मध्य काल (500 ई.पू. से 1000)
  3. आधुनिक काल (1000 ई.पू. से वर्तमान)

१)प्राचीन काल:- प्राचीन आर्यभाषा को दो भागों में बाँटा जाता हैं--१) वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. 1000) २) लौकिक संस्कृत (1000ई.पू.-- 500)प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओं में वैदिक तथा संस्कृत्य प्रमुख मानी जाती है। ऋग्वेद से वैदिक भाषा का, वाल्मीकी रामायण से लौकिक संस्कृत का कवि माना गया है। इसका रूप ऋग्वेद में देखने को मिलता है। पाणिनी ने 500 ई.पू. इस भाषा में व्याकरणिक रूप 'अष्टाध्यायी' की रचना की थी।

२)मध्य काल:- मध्यकालीन आर्यभाषा को तीन भागों में बाटाँ गया हैं--१) पालि (500 ई.पू.-- 1000) २) प्राकृत (1000 ई.---500 ई.) ३) अपभ्रंश या अवहट्ट (500--1000 ई.)

१) पालि:- मध्यकालीन आर्यभाषाओं का युग पालि भाषा के उदय से आरंभ होता है। पालि शब्द की व्युत्पति 'पल्लि' (ग्रामीण भाषा के शब्द), 'पाटलि' (पाटलिपुत्र अर्थात् मगध की भाषा), पंक्ति, पालि को पालनेवाली (अर्थात् बौध्द साहित्य की रक्षा करनेवाली) आदि शब्द से माना गया है। लेकिन नाम से यह स्पष्ट नहीं होता कि यह किस प्रदेश की मूल भाषा थी। मगध सम्राट अशोक के पुत्र महाराजकुमार महेंद्र पालि साहित्य को तीन पिटारों (त्रिपिटक) में भरकर सिंहल(श्रीलंका) ले गए थे, अतः वहाँ के बौध्द मानते रहे हैं कि पालि मगध की भाषा है। परन्तु मागर्धी के जो लक्षण प्राकृत वैयाकरणों ने बताए हैं और अशोक के अभिलेखों में मिलते हैं, वे पालि से भिन्न हैं। यह पूर्व की भाषा नहीं जान पड़ती। विद्वानों ने मथुरा और उज्जैन के बीच के प्रदेश को इसका क्षेत्र माना है। यह भाषा इतनी व्यापक हो गई थीं कि अपना धर्म प्रचार करने के लिए भगवान बुध्द ने इसें अपना माध्यम बनाया; भले ही इस पर मागधी बोली का प्रभाव अवश्य पड़ा है। कोई बोली जब साहित्य में स्थान पाती है तो उसमें अपने साथ कई बोलियों के तत्व आ ही जाते हैं। पालि भाषा के अध्ययन के प्रमुख आधार है- त्रिपिटक (बुध्द वचन), टीका (अट्ठकथा), साहित्य,और वंश (ऐतिहासिक) साहित्य जो ११वीं शती तक बराबर लिखा जाता रहा है। अपने समय में पालि का प्रचार न केवल उत्तरी भारत में था अपितु बर्मा, लंका, तिब्बत, चीन की भाषाओं पर उसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। प्राचीन आर्यभाषा से आधुनिक आर्य भाषाओं के क्रमिक विकास की बीच की स्थितियों को समक्षने के लिए पालि का महत्व बहुत अधिक है। संस्कृत ध्वनियों का जनसाधारण में कैसा उच्चारण होता था, उसकी व्याकरणिक जटिलताओं को सुलझाने के लिए लोक में क्या प्रयत्न हो रहा था, इस सब की जानकारी पहले-पहल पालि में प्राप्त होती है।

२) प्राकृत:- 'प्रकृतेः आगतं प्राकृतम्' अर्थात् जो भाषा मूल से चली आ रही है उसका नाम 'प्राकृत' है। उस समय मूल भाषा कौन थी, इसके बारे में मतभेद है। हेमचंद्र, मार्कंडेय, सिंहदेव, आदि आचार्यों ने मूल भाषा संस्कृत और उनसे उत्पन्न प्राकृत माने हैं। संस्कृत उस समय जन भाषा थी, वही विकसित-विकृत होते-होते प्राकृत प्रसिध्द हुई। दूसरा विचार यह है कि प्रकृति का अर्थ स्वभाव होता है, तो जो भाषा स्वभाव से सिध्द है, वह प्रकृत है। प्रकृति का एक अर्थ 'प्रजा' भी है। 'राजा' शब्द का निर्वचन करते हुए कालिदास ने लिखा है- राजा प्रकृतिरज्जनात् अर्थात् 'राजा' इसलिए कहलाता है कि वह प्रकृति (प्रजा) का रंजन करता है, अपनी प्रजा को प्रसन्न रखता है। प्राच्य भाषाओं के एक विद्वान, पिशल भी मानते हैं कि प्राकृत की जड़ जनता की बोलियों के भीतर है। जनसाधारण की बोलियाँ तो युग-युग से चली आ रही हैं। वेस (वेष), दूलभ (दुर्लभ), दूडम (दुर्दम), सुवर्ग (स्वर्ग) आदि वेद के ये शब्द प्राकृत के ही तो हैं। कोई भी भाषा पहले जनभाषा होती है, साहित्य में पड़कर और समाज तथा शासन से मान्यता पाकर भाषा हो जाती है। व्रजभाषा या खडी़ बोली कौरवी एक क्षेत्रीय बोली ही थी, साहित्य में आकर भाषा बन गई। जनभाषा ही मूल है, वही प्राकृत है। प्राकृत में प्रचुर साहित्य मिलता है- धार्मिक भी, लौकिक भी। बौध्द और जैन साहित्य प्रमुख रूप से मागधी और अर्धमागधी में, और लौकिक साहित्य शौरसेनी(गध) और महाराष्ट्री(पध) में प्राप्त है। गौडवहो और सेतुबंध जैसे महाकाव्य तथा गाथासप्तशती और वज्जालग्ग जैसे खंडकाव्य प्राकृत की बहुमूल्य संपत्ति हैं। एक समय कहा जाता था कि संस्कृत काव्य इसकी होड़ में पिछड़ गया है। इस साहित्य के आधार पर व्याकरण ग्रंथ लिखे गए जिनमें वररूचि कृत 'प्राकृत प्रकाश' और आचार्य हेमचंद्र का 'प्राकृत व्याकरण' प्रसिध्द हैं। व्याकरणों ने प्राकृत भाषा में वैसी ही जकड़न ला दी जैसी पाणिनि, कात्यायन आदि वैयाकरणों ने संस्कृत में। तब यह भाषा लोकभाषा नहीं रह गई, शिक्षित वर्ग की भाषा बन गई, तो इसका स्थान अपभ्रंश और अवहट्ट ने ले लिया। वररूचि ने चार प्राकृतों का नाम लिया है- शौरसेनी, माहाराष्ट्री, मागधी और पैशाची। परन्तु, इनमें अध्र्द मागधी का नाम जोड़ देना आवश्यक है- इसमें भी भरपूर साहित्य मिलता है।

३) अपभ्रंश:- अपभ्रंश मध्यकालीन आर्यभाषा की तीसरी अवस्था का नाम है। व्याडि और महाभाष्यकार पंतजलि ने संस्कृत के मानक शब्दों से भिन्न संस्कारच्युत, भ्रष्ट और अशुध्द शब्दों को अपभ्रंश की संज्ञा दी। वाग्भट्ट और आचार्य हेमचन्द्र ने अपभ्रंश को ग्रामभाषा कहा है। कुछ विद्वानों ने इसे देशी भाषा कहा है। दण्डी ने इसे आभीरादि की भाषा कहा है। गुर्जर, आभीर, जाट आदि अनेक जातियाँ जो बाहर से आकर पश्चिमी भारत में बस गई थीं, आरम्भ में भारतीय संस्कृति में दीक्षित नहीं हो पाई थीं, इसलिए उनकी भाषा को अपभ्रष्ट समझा जाता था। धीरे-धीरे उन पर शौरसेनी प्राकृत का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उनकी भाषा को मान्यता दी जानी लगी। राजसत्ता पाने के पर ये लोग 'राजपुत्र' कहलाने लगे। राजसत्ता के साथ अपभ्रंश का विस्तार भी हुआ और यह भाषा राजभाषा ही नहीं, साहित्य-भाषा और देशभाषा बन गई। सातवीं शती से लेकर ग्यारहवीं शती के अंत तक इसकी विशेष उन्नति हुई। मार्कण्डेय और इतर आचार्यों ने अपभ्रंश के कुल तीन भेद बताये हैं-- नागर (गुजरात की बोली), उपनागर (राजस्थान की बोली), व्राचड (सिंध की बोली)। इस प्रसंग में यह भी बताया गया है कि राजस्थानी अपभ्रंश की जेठी बेटी हैं। अपभ्रंश को आभीर-गुर्जर आदि की भाषा कहते आ रहे हैं। इससे भी सिध्द होता है कि यह उत्तर-पश्चिमी भूखंड की भाषा थी। यह सही है कि साहित्यिक भाषा बनने पर इसने विस्तार पाया और धीरे-धीरे आस-पास की प्राकृतों को प्रभावित किया, सबसे अधिक शौरसेनी को। इसी से माना जा सकता है कि हिन्दी के विकास में इसका विशेष योगदान है। कालिदास के नाटकों में कुछ पात्रों के कथन अपभ्रंश में हैं। आठवीं शती में सिध्दों के चर्यापदों में पूर्वी प्राकृत मिश्रित अपभ्रंश मिलती है। इसी समय के आस-पास चरित काव्य, प्रेमाख्यानक काव्य, रासो काव्य, खण्डकाव्य और स्फुट कविताएँ मिलती हैं। इनमें महापुरण, जसहर चरिउ, णायकुमार चरिउ, पाहुड़ दोहा आदि रचनाएँ हैं।

४) अवहट्ट:- भाषा परिवर्तनशील है। कोई भाषा जब साहित्य का माध्यम होकर एक प्रतिष्ठित रूप ग्रहण करती है और व्याकरण के नियमों में बँध जाती है, तब वह जनभाषा से दूर हो जाती है। अपभ्रंश की भी यही गति हुई। अपभ्रंश के ही परिवर्तित रूप को अवहट्ट कहा गया है। ग्यारहवीं से लेकर चौदहवीं शताब्दी के अपभ्रंश कवियों ने अपनी भाषा को अवहट्ट कहा है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ज्योतिरीश्वर ठाकुर ने अपने 'वर्ण रत्नाकर' में किया। 'प्राकृत पैंगलम' की भाषा को उसके टीकाकार वंशीधर ने अवहट्ट माना है। संदेशरासक के रचियता अब्दुररहमान ने भी अवहट्ट भाषा का उल्लेख किया है। मिथिला के विधापति ने अपनी कृति 'कीर्तिलता' की भाषा को अवहट्ट कहा है। इन सबने जिन भारतीय भाषाओं के नाम गिनाये हैं- सांस्कृत, प्राकृत, मागधी, शौरसेनी, पिशाची उनमें या तो अपभ्रंश नाम लिया या अवहट्ट। दोनों को एक साथ नहीं रखा। इससे लगता है कि अपभ्रंश और अवहट्ट में कोई भेद नहीं समझा गया। आधुनिक भाषाविज्ञानियों ने तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर अवहट्ट को उत्तरकालीन या परवर्ती अपभ्रंश माना है और बताया गया है कि निश्चय रूप से अवहट्ट में ध्वनिगत, रूपगत और शब्दसंबंधी बहुत से तत्व ऐसे हैं जो इसे पूर्ववर्ती अपभ्रंश से अलग करते हैं। संनेहरासय और कीर्तिलता के अतिरिक्त वर्णरत्नाकर और प्राकृतपैंगलम के कुछ अंश, नाथ और सिध्द साहित्य, नेमिनाथ चौपाई, बहुबलि रास, आदि अवहट्ट की प्रसिध्द रचनाएँ हैं।

३)आधुनिक काल:- आधुनिक भारतीय भाषाओं के काल का प्रारम्भ दसवी. शताब्दी से माना जाता है। इन भाषाओं की उत्पत्ति प्राकृत से मानी जाती है तथा इनका सम्बन्ध किसी-न-किसी रूप में अपभ्रंश से जोड़ा जाता है: यथा- सांस्कृत>प्राकृत>अपभ्रंश>आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ। आधुनिक काल की भाषाएँ अनेक हैं, हिन्दी, बंगला, उडि़या, असमी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी।भाषाविदों के मत में उस समय के शोरसेनी, पेशाची, ब्राचड़, खस, महाराष्ट्री, अर्धमागधी तथा मागधी अपभ्रंशों से ही आधुनिक आर्य भाषाएँ विकसित हुई हैं। हिन्दी उनमें एक है जो सब भारतीय आर्य भाषाओं की बडी़ बहन है, और सबसे अधिक जनसमूह द्दारा बोली-समझी जाती है। हिन्दी की तीन कालक्रमिक स्थितियाँ हैं-- १) आदिकाल (सन् 1000 से 1500 ई.) २) मध्यकाल (सन् 1500 से 1800 ई.) ३) आधुनिक काल सन् 1800 से आज तक)

१) आदिकाल:- आधुनिक आर्यभाषा हिन्दी का आदिकाल अपभ्रंश तथा प्राकृत से अत्यधिक प्रभावित था। आदिकालीन नाथों और सिध्दों ने इसी भाषा में धर्म प्रचार किया था। इस काल में हिन्दी में मुख्य रूप से वही ध्वनियाँ मिलती हैं जो अपभ्रंश में प्रयुक्त होती थीं। अपभ्रंश के अलावा आदिकालीन हिन्दी में 'ड़', 'ढ़' आदि ध्वनियाँ आई हैं। मुसलमान शासकों के प्रभाव से अरबी तथा फारसी के कुछ शब्दों के कारण भी कुछ नये व्यंजन- ख,ज, फ, आदि आ गये। ये व्यंजन अपभ्रंश में नहीं मिलते थे। अपभ्रंश के तीन लिंग थे। किन्तु प्राचीन हिन्दी में नपुंसक लिंग समाप्त हो गया। प्राचीन काल में चारण भाटों ने इसी भाषा में डिंगल साहित्य अर्थात् 'रासों' ग्रंथों का निर्माण किया।

२) मध्यकाल:- इस काल में अपभ्रंश का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया और हिन्दी की तीन प्रमुख बोलियाँ विशेषकर अवधी, ब्रज तथा खडी़ बोली स्वतन्त्र रूप से प्रयोग में आने लगी। साहित्यिक दृष्टि से इस युग में मुख्यत: ब्रज और अवधी में साहित्य निर्माण हुआ। कृष्णभक्ति शाखा के संत कवियों ने ब्रज भाषा में अपने ग्रन्थों का निर्माण किया तथा रामभक्ति शाखा के कवियों ने अवधी भाषा में अपनी रचनाओं का निर्माण किया। इसके साथ ही प्रेमाश्रयी शाखा के सूफी कवियों ने भी अवधी में अपनी रचनाएँ लिखीं। ब्रज तथा अवधी के साथ-साथ खडी़ बोली का भी प्रयोग इस युग में काफी पनपा। मुसलमान शासकों के प्रभाव से खडी़ बोली में अरबी तथा फारसी शब्द प्रचलित हुए और उसके विकास का श्रीगणेश हुआ।

३) आधुनिक काल:- अठारहवीं शती में ब्रज तथा अवधी भाषा की शक्ति तथा प्रभाव क्षीण होता गया और राजनीतिक परिवर्तनों के कारण उन्नीसवीं शती के प्रारम्भ से ही खडी़ बोली का मध्यप्रदेश की हिन्दी पर भारी प्रभाव पड़ा। बोलचाल, राजकाज तथा साहित्य के क्षेत्र में खडी़ बोली हिन्दी का व्यापक पैमाने पर प्रयोग होने लगा था। भाषाविज्ञान की दृष्टि से हिन्दी भाषा के पाँच उपभाषा वर्ग माने गयेहैं-

१) पश्चिमी हिन्दी--- इसके अन्तर्गत कौरवी(खडी़ बोली), बागरू (हरियाणवी),ब्रज, कन्नौजी एवं बुंदेली।

२) पूर्वी हिन्दी-- इसके अन्तर्गत भोजपुरी,मैथिली,मगही आदि बोलियाँ।

३) बिहारी हिन्दी--इसके अन्तर्गत भोजपुरी, मैथिली, मगही बोलियाँ।

४) राजस्थानी हिन्दी--इसके अन्तर्गत मारवाडी़, जयपुरी (हाडो़ती), मेवाडी़, और मालवी आदि बोलियाँ आती हैं।

५) पहाडी़ हिन्दी--इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से गढ़वाली तथा कुमाउँनी बोलियाँ आती हैं।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. हिन्दी भाषा — डॉ. हरदेव बाहरी। अभिव्यक्ति प्रकाशन, 2017, पृष्ठ: 9, 10, 15, 21, 34, 42
  2. प्रयोजनमूलक हिन्दी: सिद्धांत और प्रयोग--- दंगल झाल्टे। वाणी प्रकाशन, आवृत्ति 2018, पृष्ठ: 19, 21, 22