भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा/ध्वनिविज्ञान और औच्चारणिक ध्वनि का विवेचन

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भाषा का आरंभ ध्वनि से होता है। ध्वनि के अभाव में भाषा की कल्पना नहीं की जा सकती। ध्व-संस्कृत में ध्वनिविज्ञान का पुराना नाम 'शिक्षाशास्त्र' था। हिंदी में इस प्रसंग में 'फ़ोनेटिक्स' के लिए ध्वनिविज्ञान, ध्वनिशास्त्र, स्वनविज्ञान आदि तथा 'फ़ोनॉलॉजी' के लिए ध्वनि-प्रक्रिया, स्वन-प्रक्रिया, या स्वर्निमविज्ञान, आदि नाम प्रयुक्त हो रहे हैं।

ध्वनि अध्ययन के तीन आधार है: (क) औच्चारणिक ध्वनि-विज्ञान, (ख) सांवहनिक ध्वनि-विज्ञान, (ग) श्रावणि ध्वनि-विज्ञान। इनमें उच्चारण और ग्रहण का सम्बन्ध शरीर से है और संवहन का वायु-तंरगों से। समय के मुख से निः सृत ध्वनि श्रोता के कान तक पहुँचती है। ध्वनि के उत्पादन के लिए वक्ता जितना आवश्यक है, उतना ही उसके ग्रहण के लिए श्रोता आवश्यक है, मगर वक्ता और श्रोता के बीच यदि ध्वनि के संवहन का कोई माध्यम न हो तो उत्पन्न ध्वनि भी निरर्थक हो जाएगी। यह कार्य वायु-तंरगों के द्वारा सिद्ध होता है। वागिंद्रियों की स्थिति और कार्य को ठीक से समझने के लिए शारीरिक रचना एवं क्रिया का थोड़ा-बहुत ज्ञान आवश्यक है। शरीर-विज्ञान की दृष्टि से मानव-शरीर निम्नलिखित तंत्रों में विभाजित किया जाता है: 1. अस्थि-तंत्र, 2. पेशी-तंत्र, 3. श्वसन-तंत्र, 4. पाचन-तंत्र, 5. परिसंचरण-तंत्र, 6. उत्सर्जन-तंत्र, 7. तंत्रिका-तंत्र, 8. अंतःस्त्रावी-तंत्र, और 9. जनन-तंत्र। जिसमें से दो ही श्वसन-तंत्र और पाचन-तंत्र से संबंधित है।

औच्चारणिक ध्वनिविज्ञान[सम्पादन]

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ध्वनियों के उच्चारण वाग्यंत्र से होता है जिसे उच्चारण अवयव भी कहते है। ये वाग्य-यंत्र है—

  1. स्वरयंत्र: ध्वनि की उत्पत्ति का आरंभिक अवयव स्वरयंत्र ही है। श्वास-नली उसके ऊपरी भाग में स्थित होती है। घोषध्वनि के उच्चारण में स्वर यंत्र में कंपन होता है।
  2. गलबिल: यह स्वरतंत्री और नासारंध्र के बीच का रिक्त स्थान है। इसे उपलिजिह्वा भी कहते हैं, यहीं से जिह्वा का आरंभ होता है।
  3. जिह्वा: जिह्वा वाक्यंत्र का प्रमुख भाग है। इसके चार भाग होते हैं- पश्च भाग, मध्य भाग, अग्रभाग, दाँत को स्पर्श करने वाला भाग। इनसे विभिन्न ध्वनि उत्पन्न करने में सहायता मिलती है।
  4. अलिजिहव: अलिजिह्व को कौवा भी कहते हैं। कोमल तालु से लटकता हुआ मांसपिण्ड है। यह अरबी तथा फ़्रांसीसी ध्वनियाँ उत्पन्न करने में सहायक होता है।
  5. मुख-विवर: अलिजिह्व या कौवा के एक ओर नासिका विवर होता है तथा दूसरी ओर मुख-विवर होता है। इसी मुख-विवर में ही कोमल तालु, कठोर तालु, मूर्धा, वतर्स, जिह्वा, दाँत आदि स्थित होते हैं, जो ध्वनि-उच्चारण में सहायक होते हैं।
  6. कोमलतालु: मुख विवर के ऊपर के पिछले भाग को कोमल तालु कहते हैं।
  7. कठोरतालु: मुखविवर के गोलकार अगले भाग को कठोर तालु कहते हैं। यह स्थिर और कठोर होने के कारण कठोर तालु कहा जाता है। तालव्य ध्वनियों की उत्पत्ति में सहायक होता है।
  8. मूर्धा: कठोर तालु और कोमल तालु की संधि वाला भाग मूर्धा कहलाता है, इससे ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) ध्वनियों का उच्चारण होता है।
  9. वतर्स: दंतमूल के पास स्थित ऊपरी मसूढ़े होते हैं, उन्हें वतर्स कहा जाता है। ये जीभ की सहायता से 'र' 'न्ह' आदि ध्वनियाँ उत्पन्न करने में सहायक होते हैं।
  10. दाँत: दंतमूल से ही दाँतों की पंक्तियाँ (ऊपर तथा निचली) निकलती हैं। यह विभिन्न ध्वनियों के उच्चारण में सहायक होते हैं। जिह्वाग्र की सहायता से त-वर्ग के उच्चारण (त, थ, द, ध, न) में सहायता मिलती है।
  11. ओष्ठ: मुखविवर के बाहरी भाग पर दंतपंक्तियों के समीप दो ढक्कनदार भाग स्थित होते हैं, वे ओष्ठ कहलाते हैं। इनकी सहायता से ओष्ठ्य ध्वनियाँ (प, फ, ब, भ, म) उच्चारित होती हैं।
  12. नासिकाविवर: मुख और नासिका के बीच जो खाली स्थान होता है, वह नासिका विवर कहलाता है। अनुनासिक ध्वनियों के उच्चारण में नासिका विवर सहायक होता है।

अतः शरीरविज्ञान की दृष्टि से दो ही तंत्र आते हैं — 1. श्वसन-तंत्र, और 2. पाचन-तंत्र।

वस्तुतः श्वसन-तंत्र और पाचन तंत्र बाहर और भीतर के छोरों पर एक-दूसरे से अलग हैं और बीच में (कंठ के पास) मिले हुए है। नासिका से भीतर गया भोजन कुछ दूर तक एक ही मार्ग से जाते हैं, मगर गले से उतरने पर उनके मार्ग भिन्न हो जाते हैं— श्वास-वायु श्वास-नली की सहायता से फेफड़ों में पहुँच जाती है और भोजन भोजन-नली की सहायता से आमाशय में। यदि धोखे से भोजन श्वास-नली में पहुँच जाए तो तत्काल मृत्यु हो सकती है। इसलिए प्रकृति ने भोजन-नली के द्वार पर एक आवरण दे रखा है जो भोजन निगलते समय श्वास-नली के मुख को बंद कर देता है। इससे भोजन श्वास-नली में न जाकर सीधे आमाशय में चला जाता है। जब कभी भूल से कोई कण श्वास-नली के द्वार पर पहुँचता है तो तत्क्षण भीतर से वायु उसे बाहर फेंकने का प्रयास करती है जिसे लोग 'सरकना' कहते है। श्वसन-तंत्र के अवयव-फेफड़े, स्वर-तंत्र, नासिका-विवर है। और पाचन-तंत्र के अवयव- मुखविवर और ग्रसनिका है। ध्वनियों के उत्पादन के लिए किससे क्या सहायता मिलती है इनका स्थूल परिचय आवश्यक है।

फेफड़ा[सम्पादन]

मनुष्य में श्वास-निःश्वास की क्रिया निरन्तर चलती रहती है। नींद में बहुत सारे व्यापार बंद हो जाती है, फिर भी यह व्यापार बंद नहीं होता। प्रश्वास से आक्सीजन के द्वारा रक्त-शोधन होता है। और निःश्वास से कार्बन डायॉक्साइड दूषित तत्व शरीर से निकाला जाता है। अतः कुछ देर तक आक्सीजन न मिले तो मनुष्य का प्राणांत हो जाए। इस प्रकार निःश्वास वाली दूषित या निरर्थक वायु से ही ध्वनि की उत्पत्ति होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि ध्वनि या भाषा श्वसन-क्रिया की उपजात (बाय-प्रोडक्ट) है। इस प्रकार ध्वनि का उत्पत्ति में फेफड़ों का प्रत्यक्ष उपयोग तो नहीं किन्तु वही स्थान हैं जहाँ से बाहर निकलने वाली वायु का उपयोग ध्वनि के उत्पादन के लिए।

स्वर-यंत्र[सम्पादन]

श्वास-नली के ऊपरी भाग में स्वर-यंत्र का एक अवयव है। फेफड़े से निकलती वायु स्वर-यंत्र से होकर ही बाहर जाती है। स्वर-यंत्र के बीच होंठों के आकार की दो मांसल झिल्लियाँ हैं जिन्हें स्वर-तंत्री कहते हैं। ये झिल्लियाँ आमने-सामने पीछे से आगे तक फैली हुई हैं जो काफ़ी लचीली होती है। स्वर-तंत्रियों के बीच के छिद्रों को कंठ-द्दार या काकुल कहते हैं। स्वर-तंत्रियों की मुख्यतः तीन अवस्थाएँ होती हैं—

  1. स्वर-तंत्रियों की सामान्य अवस्था जिसमें वे पृथक, शिथिल, निःस्पंद पड़ी रहती है। इस अवस्था में श्वास-निश्वास की क्रिया अविरत चलती रहती है, क्योंकि बीच का छिद्र कंठ-द्दार (काकुल) खुला होता है जिससे वायु फेफड़ों में आती-जाती रहती है। इसी अवस्था में अघोष ध्वनियों का उच्चारण होता है।
  2. स्वर-तंत्रियों की दूसरी अवस्था वह है जिसमें वे परस्पर निकट आकर सट जाती हैं और निःश्वास-वायु के निकलने के समय उन में कंपन उत्पन्न होता है। इस अवस्था में जिन ध्वनियों का उच्चारण होता हैं, उन्हें घोष कहते है।
  3. स्वर-तंत्रियों की एक अवस्था यह भी है कि वह पास आ जाती हैं, पर सटती नहीं और इस तरह वायु के आने-जाने का मार्ग अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है। यह दोनों की मध्यवर्ती अवस्था है-न बिल्कुल खुली,न बिल्कुल सटी। इसी अवस्था में फ़ुसफ़ुसाहट वाली ध्वनियाँ उत्पन्न होती है।

ग्रासनिका[सम्पादन]

ग्रासनिका का दूसरा और प्राचीन नाम गलबिल है जिसकी स्थित कंठछिद्र के ऊपर और मुख के नीचे है। आईने में मुख खोलकर देखने से गले की पिछली दीवार दिखायी देती है; वह ग्रसनिका की ही दीवार है। ध्वनि के उच्चारण में पहले ग्रसनिका का कोई महत्व नहीं माना जाता था, मगर अब माने जाने लगा है। ग्रसनिका के विभिन्न आकार ग्रहण करने से स्वरों के उच्चारण में, विशेषकर उनके तान में, अंतर पड़ता है।

मुख[सम्पादन]

ध्वनियों के उत्पादन में मुख का सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण योग है। केवल मुख न कहकर इसे मुखविवर कहना अधिक उपयुक्त है। मुखविवर में ऊपर गोलाकार छत है और नीचे जिह्वा। छत के तीन भाग किए जा सकता हैं- सबसे पीछे कोमल तालु है जिससे एक छोटा-सा मांसपिंड लटकता दिखता है। इस मांसपिण्ड को अलिजिह्वा या काकुल कहते हैं। कोमल तालु के आगे कठोर तालु है जो सम्पूर्ण तालु का मध्य भाग है। फिर दंतकूट मिलता है जो ऊपर के दाँतों के पीछे का खुरदरा हिस्सा है। इसे ही मूर्धा भी कहते है। मुख छत के तीन भागों से आगे बढ़ने पर दंत-पंक्तियाँ मिलती हैं और उनसे आगे ओष्ठ। ध्वनियों के उच्चारण में यदि किसी इंद्रिय का सबसे अधिक उपयोग होता है तो जिह्वा का। जिह्वा के चार भाग है- जिह्वापश्च, जिह्वापृष्ठ, जिह्वाग्र, जिहाणि। मुखविवर की अनेक आकृतियों तथा कोमल तालु, जिह्वा, ओष्ठ, आदि के संचालन से अनेक ध्वनियाँ उत्पन्न होती है।

नासिका-विवर[सम्पादन]

नासिका और मुख की छत के बीच जो रिक्त स्थान है, उसे ही नासिका-विवर कहते हैं। कोमल तालु और अलिजिह्वा को ऊपर-नीचे करके नासिका-विवर को पूर्णतः खोला या बंद किया जा सकता है। नासिका का उपयोग अनुनासिक वर्णों के उच्चारण में होता है।

सांवहनिक अथवा प्रसारणिक ध्वनिविज्ञान[सम्पादन]

भाषा-विज्ञान में इसके अंतर्गत इस बात का अध्ययन किया जाता है कि कैसे ध्वनि लहरों द्वारा वक्ता के मुंह से श्रोता के कान तक ले जाई जाती है। ऐसा होता है कि फेफड़े से चली हवा ध्वनि-यंत्रों की सक्रियता के कारण आंदोलित होकर निकलती है और बाहर की वायु में अपने आंदोलन के अनुसार एक विशिष्ट प्रकार के कम्पन में लहरे पैदा कर देती है। ये लहरें ही सुनने वाले के कान तक पहुंचाती है और वहां श्रवणेंद्रिय में कंपन पैदा कर देती है। सामान्यतः इन ध्वनि-लहरों की चाल 1100-1200 फ़ुट प्रति सेकंड होती हैं। ज्यों-ज्यों ये लहरें आगे बढ़ती जाती हैं, इनकी तीव्रता घटती जाती है। इसी कारण दूर के व्यक्ति को धीमी सुनाई पड़ती है। कायमोग्राफ़, लोरिगोस्कोप, ऑसिलोग्राफ़, एंडोस्कोप, आदि अनेक यंत्रों के सहारे भौतिकशास्त्र में इन लहरों का बहुत गम्भीर अध्ययन किया जाता हैं।

श्रावणिक ध्वनिविज्ञान[सम्पादन]

इसमें इस बात का अध्ययन होता हैं कि हम कैसे सुनते है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए कान की बनावट को देख लेना होगा। हमारा कान तीन भागों में बंटा हैं। जो बाह्य कर्ण, मध्यकर्ण और अभ्यंतर कर्ण। बाह्य कर्ण के दो भाग पहला जो ऊपर टेढ़ा-मेढ़ा दिखाई देता है। यह भाग सुनने की क्रिया में अपना कोई विशेष महत्व नहीं रखता। दूसरा भाग छिद्र या कर्ण-नलिका के बाहरी भाग से आरम्भ होकर भीतर तक जाता है। इस भाग की कर्ण-नलिका की लंबाई लगभग एक इंच होती है। मध्यवर्ती कर्ण एक छोटी-सी कोठरी है जिसमें तीन छोटी-छोटी अस्थियां होती है। इन अस्थियों का एक सिरा बाह्य कर्ण की झिल्ली से जुड़ा रहता है और दूसरी ओर इसका सम्बन्ध आभ्यंतर कर्ण से। इस भाग में शंख के आकार का एक अस्थि-समूह होता है।

इसके खोखले भाग में इसी आकार की झिल्लियां होती है। इन दोनों के बीच एक प्रकार का द्रव पदार्थ भरा रहता है। इस भाग के भीतरी सिरे की झिल्ली से श्रावणी शिरा के तंतु आरम्भ होते है जो मस्तिष्क से सम्बन्ध रहते हैं। ध्वनि की लहरों जब कान में पहुंचती हैं तो बाह्य कर्ण के भीतरी झिल्ली पर कंपन उत्पन्न करती हैं। इस कंपन का प्रभाव मध्यवर्ती कर्ण की अस्थियों द्वारा भीतरी कर्ण के द्रव पदार्थ पर पड़ता है और उसमें लहरे उठती हैं जिसकी सूचना श्रावणी तंतुओं द्वारा मस्तिष्क में जाती है और हम सुन लेते हैं।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. भाषाविज्ञान की भूमिका — आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा। दीप्ति शर्मा। पृष्ठ: 189-194
  2. भाषा विज्ञान — डॉ. भोलानाथ तिवारी। प्रकाशक: किताब महल, पुर्नमुद्रण: 2017, पृष्ठ: 309, 310, 318
  3. भाषा-विज्ञान के सिद्धांत — डॉ. मीरा दीक्षित। पृष्ठ: 52