भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/ध्वनिविज्ञान और औच्चारणिक ध्वनि का विवेचन

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

ध्वनिविज्ञान और औच्चारणिक ध्वनि का विवेचन[सम्पादन]

ध्वनिविज्ञान

भाषा का आरम्भ ध्वनि से होता है। ध्वनि के अभाव में भाषा की कल्पना नहीं की जा सकती। ध्वनि (स्वन) के अध्ययन से समबंध्द शास्त्र या विज्ञान के लिए अंग्रेजी में (Phonetics, Phonology) ये दो शब्द चल रहे हैं। दोनों का सम्बन्ध ग्रीक शब्द 'Phone' से है, जिसका अर्थ 'ध्वनि' है। दोनों एक प्रकार से ध्वनि के विज्ञान हैं, किन्तु प्रयोग की दृष्टि से इसमें थोड़ा अन्तर है। 'फोनेटिक्स' में हम समान्य रूप से ध्वनि की परिभाषा , भाषा-ध्वनि, ध्वनियों के उत्पन्न करने के अंग ,ध्वनियों का वर्गीकरण और उनका स्वरूप आदि बातों पर विचार करते है। लेकिन 'फोनालाजी' में भाषा-विशेष ध्वनियों की व्यवस्था,इतिहास तथा परिवर्तन आदि का अध्ययन किया जाता है। संसकृत में ध्वनिविज्ञान का पुराना नाम 'शिक्षाशास्त्र' था। हिन्दी में इस प्रसंग में 'फोनेटिक्स' के लिए ध्वनिविज्ञान, ध्वनिशास्त्र ,स्वनविज्ञान आदि तथा 'फोनालाजी' के लिए ध्वनि-प्रक्रिया, स्वन-प्रक्रिया, या स्वनिमविज्ञान आदि नाम प्रयुक्त हो रहे है।

ध्वनि अध्ययन के तीन आधार है-- १) औच्चारणिक ध्वनिविज्ञान २) सांवहनिक ध्वनिविज्ञान , ३) श्रावणि ध्वनिविज्ञान। इनमें उच्चारण और ग्रहण का सम्बन्ध शरीर से है और संवहन का वायु-तंरगों से । वक्त के मुख से नि:सृत ध्वनि श्रोता के कान तक पहुँचती है। ध्वनि के उत्पादन के लिए वक्ता जितना आवश्यक है, उतना ही उसके ग्रहण के लिए श्रोता आवश्यक है,किन्तु वक्ता और श्रोता के बीच यदि ध्वनि के संवहन का कोई माध्यम न हो तो उत्पन्न ध्वनि भी निरर्थक हो जायेगी। यह कार्य वायु-तंरगों के द्दारा सिध्द होता है। वागिन्द्रियों की स्थिति और कार्य को ठीक से समझने के लिए शारीरिक रचना एवं क्रिया का थोडा़-बहुत ज्ञान आवश्यक है। शरीरविज्ञान की दृष्टि से मानव-शरीर निम्नलिखित तन्त्रों में विभाजित किया जाता है-- १) अस्थि-तन्त्र २) पेशी-तन्त्र ३) श्वसन-तन्त्र ४) पाचन-तन्त्र ५) परिसंचरण-तन्त्र ६) उत्सर्जन-तन्त्र ७) तन्त्रिका-तन्त्र ८) अन्त:स्त्रावी-तन्त्र ९) जनन-तन्त्र । जिसमें से दो ही श्वसन-तन्त्र और पाचन-तन्त्र से सम्बन्धित है।

औच्चारणिक ध्वनिविज्ञान ( Articulatory Phonetics)[सम्पादन]

Places of articulation.svg

ध्वनियों के उच्चारण वाग्यंत्र ( Vocal apparatus) से होता है जिसे उच्चारण अवयव ( Vocal Prangan) भी कहते है। ये वाग्य-यंत्र है--

१.स्वरयंत्र:- ध्वनि की उत्पति का आरमि्भक अवयव स्वरयंत्र ही है। श्वास-नली उसके ऊपरी भाग में सि्थत होती है। घोषध्वनि के उच्चारण में स्वर यंत्र में कम्पन होता है।

२. गलबिल:- यह स्वरतंत्री और नासारंध्र के बीच का रिक्त स्थान है। इसे उपलिजिह्वा भी कहते हैं,यहीं से जिहवा का आरम्भ होता है।

३. जिहवा:- जिहवा वाक्यंत्र का प्रमुख भाग है। इसके चार भाग होते हैं- पश्च भाग, मध्य भाग, अग्रभाग, दाँत को स्पर्श करने वाला भाग। इनसे विभिन्न ध्वनि उत्पन्न करने में सहायता मिलती है।

४. अलिजिहव:- अलिजिहव को कौवा भी कहते हैं। कोमल तालु से लटकता हुआ मांसपिण्ड है। यह अरबी तथा फ्रेंच ध्वनियाँ उत्पन्न करने में सहायक होता है।

५. मुख-विवर:- अलिजिहव या कौवा के एक ओर नासिका विवर होता है तथा दूसरी ओर मुख-विवर होता है। इसी मुख-विवर में ही कोमल तालु , कठोर तालु , मूर्धा , वतर्स, जिहवा, दाँत आदि सि्थत होते हैं, जो ध्वनि-उच्चारण में सहायक होते हैं।

६. कोमलतालु:- मुख विवर के ऊपर के पिछले भाग को कोमल तालु कहते हैं।

७. कठोरतालु:- मुखविवर के गोलकार अगले भाग को कठोर तालु कहते हैं। यह सि्थर और कठोर होने के कारण कठोर तालु कहा जाता है।तालव्य ध्वनियों की उत्पति में सहायक होता है।

८. मूर्धा:- कठोर तालु और कोमल तालु की संधि वाला भाग मूर्धा कहलाता है, इससे टवर्ग (ट् , ठ् , ड् , ढ् , ण) ध्वनियों का उच्चारण होता है।

९. वतर्स:- दन्तमूल के पास सि्थत ऊपरी मसूढे़ होते हैं, उन्हें वतर्स कहा जाता है। ये जीभ की सहायता से 'र' 'न्ह' आदि ध्वनियाँ उत्पन्न करने में सहायक होते हैं।

१०. दाँत:- दन्तमूल से ही दाँतों की पंक्तियाँ (ऊपर तथा निचली) निकलती हैं। यह विभिन्न ध्वनियों के उच्चारण में सहायक होते हैं। जिहवाग्र की सहायता से त-वर्ग के उच्चारण ( त, थ, द, ध, न) में सहायता मिलती है।

११. ओष्ठ:- मुखविवर के बाहरी भाग पर दन्तपंक्तियों के समीप दो ढक्कनदार भाग स्थित होते हैं, वे ओष्ठ कहलाते हैं। इनकी सहायता से ओष्ठ्य ध्वनियाँ (प, फ, ब, भ, म) उच्चारित होती हैं।

१२. नासिकाविवर:- मुख और नासिका के बीच जो खाली स्थान होता है, वह नासिका विवर कहलाता है। अनुनासिक ध्वनियों के उच्चारण में नासिका विवर सहायक होता है।

अत: शरीरविज्ञान की दृष्टि से दो ही तन्त्र आते है-- १) श्वसन-तन्त्र २) पाचन-तन्त्र। वस्तुत: श्वसन-तन्त्र और पाचन तन्त्र बाहर और भीतर के छोरों पर एक-दूसरे से अलग हैं और बीच में ( कंठ के पास) मिले हुए है। नासिका से भीतर गया भोजन कुछ दूर तक एक ही मार्ग से जाते हैं,किन्तु गले से उतरने पर उनके मार्ग भिन्न हो जाते हैं-- श्वास-वायु श्वास-नली की सहायता से फेफडो़ं में पहुँच जाती है और भोजन भोजन-नली की सहायता से आमाशय में। यदि धोखे से भोजन श्वास-नली में पहुँच जाये तो तत्काल मृत्यु हो सकती है। इसलिए प्रकृति ने भोजन-नली के द्दार पर एक आवरण दे रखा है जो भोजन निगलते समय श्वास-नली के मुख को बन्द कर देता है। इससे भोजन श्वास-नली में न जाकर सीधे आमाशय में चला जाता है। जब कभी भूल से कोई कण श्वास-नली के द्दार पर पहुँचता है तो तत्क्षण भीतर से वायु उसे बाहर फेंकने का प्रयास करती है जिसे लोग 'सरकना' कहते है। श्वसन-तन्त्र के अवयव- फेफड़े , स्वर-तन्त्र, नासिका-विवर है। और पाचन-तन्त्र के अवयव- मुखविवर और ग्रसनिका है। ध्वनियों के उत्पादन के लिए किससे क्या सहायता मिलती है इनका स्थूल परिचय आवश्यक है।

१. फेफडा़:- मनुष्य में श्वास-नि:श्वास की क्रिया निरन्तर चलती रहती है। नींद में बहुत सारे व्यापार बन्द हो जाती है, फिर भी यह व्यापार बन्द नहीं होता । प्रश्वास से आक्सीजन के द्दारा रक्त-शोधन होता है। और नि:श्वास से कार्बन डाइ-आक्साइड दूषित तत्व शरीर से निकाला जाता है। अत: कुछ देर तक आक्सीजन न मिले तो मनुष्य का प्राणान्त हो जाये। इस प्रकार नि:श्वास वाली दूषित या निरर्थक वायु से ही ध्वनि की उत्पति होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि ध्वनि या भाषा श्वसन-क्रिया की उपजात (बाइ-प्रोडक्ट) है। इस प्रकार ध्वनि का उत्पति में फेफडो़ं का प्रत्यक्ष उपयोग तो नहीं किन्तु वही स्थान हैं जहाँ से बाहर निकलने वाली वायु का उपयोग ध्वनि के उत्पादन के लिए।

२. स्वर-यन्त्र:- श्वास-नली के उपरिभाग में स्वर-यन्त्र का एक अवयव है। फेफडे से निकलती वायु स्वर-यन्त्र से होकर ही बाहर जाती है। स्वर-यन्त्र के बीच होठों के आकार की दो मांसल झिल्लिया हैं जिन्हें स्वर-तन्त्री कहते है। ये झिल्लिया आमने-सामने पीछे से आगे तक फैली हुई हैं जो काफी़ लचीली होती है। स्वर-तन्त्रियों के बीच के छिद्रों को कंठ-द्दार या काकल कहते हैं। स्वर-तन्त्रियों की मुख्यत: तीन अवस्थाएँ होती हैं--

(क)स्वर-तन्त्रियों की सामान्य अवस्था जिसमें वे पृथक् , शिथिल, नि:स्पन्द पड़ी रहती है। इस अवस्था में श्वास-निश्वास की क्रिया अविरत चलती रहती है,क्योकि बीच का छिद्र कंठ-द्दार (काकल) खुला होता है जिससे वायु फेफडो में आती-जाती रहती है। इसी अवस्था में अघोष ध्वनियों का उच्चारण होता है।

(ख) स्वर-तन्त्रियों की दूसरी अवस्था वह है जिसमें वे परस्पर निकट आकर सट जाती हैं और नि:श्वास-वायु के निकलने के समय उन में कम्पन उत्पन्न होता है। इस अवस्था में जिन ध्वनियों का उच्चारण होता हैं, उन्हें घोष कहते है।

(ग) स्वर-तन्त्रियों की एक अवस्था यह भी है कि वह पास आ जाती हैं,पर सटती नहीं और इस तरह वायु के आने-जाने का मार्ग अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है। यह दोनों की मध्यवर्ती अवस्था है-न बिल्कुल खुली,न बिल्कुल सटी। इसी अवस्था में फुसफुसाइट वाली ध्वनियाँ उत्पन्न होती है।

३. ग्रासनिका

ग्रासनिका का दूसरा और प्राचीन नाम गलबिल है जिसकी सि्थति कंठछिद्र के ऊपर और मुख के नीचे है। आईने में मुख खोलकर देखने से गले की पिछली दीवार दिखायी देती है; वह ग्रसनिका की ही दीवार है। ध्वनि के उच्चारण में पहले ग्रसनिका का कोई महत्त नहीं माना जाता था,किन्तु अब माने जाने लगा है। ग्रसनिका के विभिन्न आकार ग्रहण करने से स्वरों के उच्चारण में,विशेषकर उनके तान में,अन्तर पड़ता है।

४.मुख

ध्वनियों के उत्पादन में मुख का सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण योग है। केवल मुख न कहकर इसे मुखविवर कहना अधिक उपयुक्त है। मुखविवर में ऊपर गोलाकार छत है और नीचे जिह्मा । छत के तीन भाग किये जा सकता हैं- सबसे पीछे कोमल तालु है जिससे एक छोटा-सा मांसपिंड लटकता दीखता है। इस मांसपिंड को अलिजिह्मा या काकल कहते हैं। कोमल तालु के आगे कठोर तालु है जो सम्पूर्ण तालु का मध्य भाग है। फिर दन्तकूट मिलता है जो ऊपर के दाँतों के पीछे का खुरदरा हिस्सा है। इसे ही मूर्धा भी कहते है। मुख छत के तीन भागों से आगे बढ़ने पर दन्त-पंकि्तयाँ मिलती हैं और उनसे आगे ओष्ठ । ध्वनियों के उच्चारण में यदि किसी इनि्द्रय का सबसे अधिक उपयोग होता है तो जिह्म का। जिह्मा के चार भाग है- जिहापश्च , जिहापृष्ठ, जिहाग्र , जिहाणि। मुखविवर की अनेक आकृतियों तथा कोमल तालु, जिहा, ओष्ठ, आदि के संचालन से अनेक ध्वनियाँ उत्पन्न होती है।

५. नासिका-विवर

नासिका और मुख की छत के बीच जो रिक्त स्थान है, उसे ही नासिका-विवर कहते हैं। कोमल तालु और अलिजिहा को ऊपर-नीचे करके नासिका-विवर को पूर्णत: खोला या बन्द किया जा सकता है। नासिका का उपयोग अनुनासिक वर्णों के उच्चारण में होता है।

सांवहनिक अथवा प्रसारणिक ध्वनिविज्ञान (Acoustic phonetic[सम्पादन]

भाषा-विज्ञान में इसके अन्तर्गत इस बात का अध्ययन किया जाता है कि कैसे ध्वनि लहरों द्वारा वक्ता के मुंह से श्रोता के कान तक ले जायी जाती है। ऐसा होता है कि फेफड़े से चली हवा ध्वनि-यंत्रों की सक्रियता के कारण आन्दोलित होकर निकलती है और बाहर की वायु में अपने आन्दोलन के अनुसार एक विशिष्ट प्रकार के कम्पन में लहरे पैदा कर देती है। ये लहरें ही सुनने वाले के कान तक पहुंचाती है और वहां श्रवणेन्द्रिय में कम्पन्न पैदा कर देती है। सामान्यतः इन ध्वनि-लहरों की चाल ११००-१२०० फीट प्रति सेकेंड होती हैं। ज्यों-ज्यों ये लहरें आगे बढ़ती जाती हैं, इनकी तीव्रता घटती जाती है। इसी कारण दूर के व्यक्ति को धीमी सुनाई पड़ती है। कायमोग्राफ, लोरिगोस्कोप, आॅसिलोग्राफ, एंडोस्कोप आदि अनेक यंत्रों के सहारे भौतिकशास्त्र में इन लहरों का बहुत गम्भीर अध्ययन किया जाता हैं।

श्रावणिक ध्वनिविज्ञान (Auditory phonetics)[सम्पादन]

इसमें इस बात का अध्ययन होता हैं कि हम कैसें सुनते है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए कान की बनावट को देख लेना होगा। हमारा कान तीन भागों में बंटा हैं। जो बाह्य कर्ण, मध्यकर्ण और अभ्यंतर कर्ण। बाह्य कर्ण के दो भाग पहला जो ऊपर टेढ़ा-मेढ़ा दिखाई देता है। यह भाग सुनने की क्रिया में अपना कोई विशेष महत्व नहीं रखता। दूसरा भाग छिद्र या कर्ण-नलिका के बाहरी भाग से आरम्भ होकर भीतर तक जाता है। इस भाग की कर्ण-नलिका की लम्बाई लगभग एक इंच होती है। मध्यवर्ती कर्ण एक छोटी-सी कोठरी है जीसमें तीन छोटी-छोटी अस्थियां होती है। इन अस्थियों का एक सिरा बाह्य कर्ण की झिल्ली से जुड़ा रहता है और दूसरी ओर इसका सम्बन्ध आभ्यन्तर कर्ण से। इस भाग में शंख के आकार का एक अस्थि-समूह होता है। इसके खोखलें भाग में इसी आकार की झिल्लियां होती है। इन दोनों के बीच एक प्रकार का द्रव पदार्थ भरा रहता है। इस भाग के भीतरी सिरे की झिल्ली से श्रावणी शिरा के तन्तु आरम्भ होते है जो मस्तिष्क से सम्बन्ध रहते हैं। ध्वनि की लहरों जब कान में पहुंचती हैं तो बाह्य कर्ण के भीतरी झिल्ली पर कम्पन्न उत्पन्न करती हैं। इस कम्पन्न का प्रभाव मध्यवर्ती कर्ण की अस्थियों द्वारा भीतरी कर्ण के द्रव पदार्थ पर पड़ता है और उसमें लहरे उठती हैं जिसकी सूचना श्रावणी तन्तुओं द्वारा मस्तिष्क में जाती है और हम सुन लेते हैं।

संदर्भ[सम्पादन]

१.भाषाविज्ञान की भूमिका --- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा । दीप्ति शर्मा। पृष्ठ--१८९-१९४

२.भाषा विज्ञान -- र्डॉ० भोलानाथ तिवारी। प्रकाशक--किताब महल,पुर्नमुद्रण--२०१७,पृष्ठ--३०९,३१०, ३१८

३.भाषा-विज्ञान के सिध्दान्त --- डाँ० मीरा दीक्षित । पृष्ठ-- ५२