भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/पदबंध की अवधारणा और उसके भेद

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पदबंध( Phase) की अवधारणा[सम्पादन]

जब एक से अधिक पद( रूप), एक में बँधकर एक व्याकरणिक इकाई (जैसे- संज्ञा, विशेषण, क्रिया-विशेषण आदि) का कार्य करें तो उस बँधी इकाई को पदबंध कहते हैं। उदाहरण-- (क) वहाँ पेड़ हैं। (ख) सौरभ के मकान के चारों ओर पेड़ हैं। पहले वाक्य में 'वहाँ ' एक क्रिया-विशेषण पद ( स्थानवाचक) है, दूसरे वाक्य में, 'सौरभ के मकान के चारों ओर ' यहाँ कई पदों की ऐसी इकाई है जो स्थानवाचक क्रिया-विशेषण का कार्य कर रही है, अत: यह क्रिया-विशेषण पद न होकर क्रिया-विशेषण पदबंध है।

पदबंध के भेद[सम्पादन]

समन्यता पदबंध आठ प्रकार के हो सकते हैं-- १) संज्ञा-पदबंध--- जैसे, इतनी लगन से कला की साधना करने वाला कलाकार' अवश्य सफल होगा।

२)सर्वनाम-पदबंध--- जैसे , मौत से इतनी बार जूझकर बच जाने वाला मैं भला मर सकता हूँ ।

३) विशेषण-पदबंध---जैसे, शरत पूनों के चाँद सा सुन्दर मुख किसको नहीं मोह लेता।

४) क्रिया-पदबंध--- जैसे, उसकी बात अब तो मान ली जा सकती है।

५) क्रिया-विशेषण-पदबंध--- जैसे, आगामी वर्ष के मध्य तक मेरा काम पूरा हो जाएगा।

६) संबंधबोधक-पदबंध--- जैसे, इस मकान से बाहर की ओर कोई बोल रहा है।

७) समुच्चयबोधक-पदबंध--- उसे मैं नहीं चाहता, क्योंकि वह झूठ बोलता है।

८) विस्मयादिबोधक-पदबंध--- हाय रे किस्मत ! यह प्रयास भी नाकाम रहा।

आजकल 'पद' शब्द के स्थान पर भी 'पदबंध' शब्द का प्रयोग विशेष संदर्भों में हो रहा है।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भाषा विज्ञान --- डाँ० भोलानाथ तिवारी। प्रकाशक--किताब महल,पुर्नमुद्रण--२०१७, पृष्ठ-- २३९,२४०