भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/पश्चिमी हिन्दी की बोलियाँ और भाषागत विशेषताएँ

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पश्चिमी हिन्दी की बोलियाँ और भाषागत विशेषताएँ[सम्पादन]

पश्चिमी हिन्दी:- इस उपभाषा का क्षेत्र पश्चिम में अम्बला से लेकर पूर्व में कानपुर की पूर्वी सीमा तक, एवं उत्तर में जिला देहरादून से दक्षिण में मराठी की सीमा तक चला गया है। इस क्षेत्र के बाहर दक्षिण में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के प्राय: मुसलमानी घरों में पश्चिमी हिन्दी का ही एक रूप दक्खिनी हिन्दी व्याप्त है। इस उपभाषा के बोलने वालों की संख्या छह करोड़ से कुछ ऊपर है। साहित्यिक दृष्टि से यह उपभाषा बहुत संपन्न है। दक्खिन हिन्दी व्रजभाषा और आधुनिक युग में खडी़ बोली हिन्दी का विशाल साहित्य मिलता है। सूरदास, नन्ददास, भूषण, देव, बिहारी, रसखान आदि के नाम सर्वविदित हैं। खडी़ बोली की परम्परा भी लम्बी है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनके युग के साहित्यकारों, महावीर प्रसाद द्दिवेदी, छायावादी और प्रगतिवादी तथा तथा अधतन साहित्यकारों ने खडी़ बोली हिन्दी को विकसित करने में बहुमूल्य योगदान दिया। पश्चिमी हिन्दी में उच्चारणगत खडा़पन है, अर्थात तान में थोडा़ आरोह होता है। पश्चिमी हिन्दी की प्रकृति सामान्य भाषा हिन्दी अर्थात् खडी़ बोली के अनुरूप है। वास्तव में यही पश्चिमी हिन्दी भारत की सामान्य भाषा हो गई हैं। इसकी उपबोलियाँ हैं; १) खडी़ बोली(कौरवी), २) व्रजभाषा, ३) बुंदेली, ४) हरियाणी(बांगरू), ५) कन्नौजी।

खडी़ बोली(कौरवी)[सम्पादन]

दिल्ली से उत्तरपूर्व यमुना के बायें किनारे तराई तक फैला हुआ जितना विस्तृत प्रदेश है उसका कोई नाम ही नहीं है, यधपि उसकी अपनी एक विशिष्ट बोली है जिसके आधार पर आधुनिक हिन्दी का विस्तार और प्रचार-प्रसार हुआ है। इस बोली को हिन्दुस्तानी, सरहिन्दी, बोलचाल की हिन्दुस्तानी, खडी़ बोली आदि कई नाम दिये गए हैं। इन सबसे अच्छा और सही नाम 'कौरवी' है। यह वही प्रदेश है जिसे पहले कुरू जनपद कहते थे। खडी़ बोली तो मूलत: उसे कहते हैं जिसे सामान्य या मानक हिन्दी भी कहा जाता है। कौरवी रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, देहरादून के मैदानी भाग, अंबला(पूर्वी भाग) तथा पटियाला के पूर्वी भाग में बोली जाती है। इसका क्षेत्र हरियाणी, व्रज और पहाडी़ बोलियों के बीच में पड़ता है। लोकगीत और लोकवार्तायें मिलती हैं, परन्तु उच्च साहित्य मानक हिन्दी में ही मिलता है। बोलने वालों की संख्या डेढ़-दो करोड़ है।

कौरवी भाषा की विशेषताएँ:- पश्चिमी हिन्दी में उच्चारणगत खडा़पन है, अर्थात् तान में थोडा़ आरोह होता है। इसकी प्रधान विशेषताएँ हैं,

१. इसमें कई शब्दों के आदि अक्षर में स्वरलोप होता है; जैसै- गूँठा (अंगूठा), साढ़ (असाढ़), कट्ठा (इकट्ठा), ठाना (उठाना) आदि।

२. इसमें औ का ओ सुनाई देता है; जैसे- होर (और), नो (नौ), ओरत (औरत) आदि।

३. कौरवी में मूर्धन्य ध्वनियों की अधिकता है; जैसे- देणा, लेणा, कहाणी, चाल्ण आदि।

४. ड़ , ढ़ , के स्थान पर ड , ढ प्राय: सुनने में आता है; जैसे- बडा, डौढा, भोंडा आदि।

५. म्ह, न्ह, र्ह, ल्ह, व्ह आदि निराली ध्वनियाँ है; जैसे- म्हारा, तुम्हैं, न्हाना, सुन्हैरा, ल्हास(लाश), ल्हैर(लहर) आदि

६. महाप्राण के बदले अल्पप्राण का प्रयोग ,जैसे- सुराई (सुराही), बोज (बोझ), जीब (जीभ), पौदा (पौधा), मैंबी (मैं भी) गुच्चा (गुच्छा) आदि।

७. हिन्दी में स्त्रीलिंग कारक चिन्हों में विविधता है। इसमें धोबन, चमारन, ठकुरान- स्त्री रूप और घास, नाक-पुल्लिंग रूप है। कारकों में बहुवचन- ओ के बदल-े ऊं का प्रयोग होता है; जैसे- मरदों (मरदूँ), बेट्टियों (बेट्टयूँ) आदि।

८. इसमें उत्तम पुरूष और मध्यम पुरूष सर्वनामों के रूपों में कोई अन्तर नहीं है।बल्कि मुझ, तुझ का उच्चारण मुज और तुज तथा वह के स्थान पर ऊ, ओ पर यू, यो होता है।

९. इसमें संख्यावाचक विशेषणों का उच्चारण कुछ-कुछ भिन्न है; जैसे- ग्यारै, बारै, छयालिस, उणसठ, पिचासी, ठासी, आदि।

व्रजभाषा[सम्पादन]

व्रज का अर्थ है गोस्थली, वह क्षेत्र जहाँ गायें रहती हैं। रूढ़ अर्थ में मथुरा और उसके आस-पास 84 कोस तक के मंडल को व्रजमंडल कहते हैं। परन्तु भाषा की दृष्टि से यह क्षेत्र इससे अधिक विस्तृत है। मथुरा, आगरा, और अलीगढ़ जिलों में व्रजभाषा का शुध्द रूप मिलता है। बरेली, बदायूँ, एटा, मैनपुरी, गुडगाँव, भरतपुर,करौली, ग्वालियर तक व्रजभाषा के थोडे़-बहुत मिश्रण पाये जाते हैं, परन्तु प्रमुखत: बोली व्रजभाषा ही है। जनसंख्या तीन करोड़ के लगभग है। अत: व्रजभाषा का साहित्य अत्यंत विशाल है।

व्रजभाषा की विशेषताएँ:-

१. व्रजभाषा हस्व ए और ओ अतिरिक्त ध्वनियाँ है। शब्दों के अंत में हस्व इ और उ होते है; जैसे- बहुरि, करि, किमि, बाघु, मनु, कालु आदि।

२. हिन्दी में पद के अंत में जो ए , ओ होते है, उनके स्थान पर ऐ , औ पाये जाते हैं; जैसे- करै, घर मै, ऊधौ, साधु कौ आदि।

३. व्यंजन का अल्पप्राण में प्रयोग, जैसे- बारा (बारह), भूंका (भूखा), हात (हाथ) आदि।

४. ल और ड़ के स्थान पर' र 'में प्रयोग जैसे- परयो (पडा़), झगरो (झगडा़), पीरो (पीला), दूबरो (दूबला) ।

५. बहुत से शब्दों के व्यंजन संयोग हैं परन्तु प्राय: संयोग को स्वरभक्ति से तोड़ देते हैं; जैसे- बिरज (व्रज), सबद (शब्द), बखत (वक्त) आदि।

६. इसमें प्राय: शब्द के बीच र का लोप हो जाता है तथा र के संयोगवाला दूसरा व्यजंन द्दित्व हो जाता है; जैसे- घत्ते (घर से), सद्दीन में (सर्दियों में), मदरसा (मदर्सा) आदि।

बुंदेली[सम्पादन]

बुंदेला राजपूतों का प्रदेश होने के कारण जिस क्षेत्र का नाम बुंदेलखंड पडा़, उसकी बोली को बुंदेलखंडी या बुंदेली कहते हैं। यह बोली उत्तर प्रदेश के झाँसी, उरई, जालौन, हमीरपुर और बाँदा (पशचिमी भाग) में, तथा मध्य प्रदेश के ओड़छा, पन्ना, दतिया, चरखारी, सागर, टीकमगढ़, छिंदवाडा़, होशंगाबाद और बालाघाट के अतिरिक्त ग्वालियर (पूर्वी भाग) और भोपाल में बोली जाती है। जनसंख्या डेढ़ करोड़ के लगभग है। बुंदेलखंड मध्यकाल में एक प्रसिध्द सांस्कृतिक और साहित्यिक केन्द्र रहा है। तुलसीदास, केशवदास, बिहारी, मतिराम, ठाकुर आदि कवि यहीं के रहने वाले थे। कतिपय विद्दानों का कहना है कि जिसे हम व्रजभाषा काव्य कहते हैं वह वस्तुत: बुंदेली का काव्य है।

बुंदेली भाषा की विशेषताएँ:-

१. उच्चारण की दृष्टि से व्रजभाषा और बुंदेली में बहुत कम अन्तर है। महाप्राण व्यजंनों के अल्पप्राणीकरण की प्रवृति व्रजभाषा से अधिक हैं; जैसे- दई (दही), कंदा (कंधा), सूदो (सूधो), कइ (कही), लाब (लाभ), डाँडी़ (डाढी़)।

२. संज्ञा के दो रूप मिलते हैं, जैसे- घोडो़, घुड़वा; बेटी, बेटिया; मालिन, मलिनिया; बैल, बैलवा, ठकुरान, ठकुराइन आदि।

३. इसमें शब्द के बीच में 'र' का लोप पाया जाता है, जैसे- साए (सारे), तुमाओ (तुम्हारा), गाई (गारी), भाई (भारी)।

४. सर्वनामों में कोई विशेष अन्तर दिखाई नहीं देता।' मैं ' की अपेक्षा 'हम' का प्रयोग अधिक होता है।

५. इसमें संख्यावाचक शब्दों का प्रयोग होता है, जैसे- गेरा (ग्यारह), चउदा (चौदा), सोरा (सोलह), पाँचमौं, छटमौं।

हरयाणी (बांगरू)[सम्पादन]

यह बोली हरयाणा, पटियाला, पंजाब के दक्षिणी भाग और दिल्ली के आस-पास के गाँवों में बोली जाती है। साहित्यिक दृष्टि से इसका कोई विशेष महत्व नहीं है। लोक-साहित्य तो सभी बोलियों में पाया जाता है। इसमें भी है

हरियाणी भाषा की विशेषताएँ:-

१. हरयाणी की ध्वनियां वही हैं जो कौरवी की। संज्ञा के रूपों में तिर्यक् रूप बहुवचन आकारान्त होता है; जैसे- घरां से, छोहरियां ने आदि।

२. इसमें 'न' के स्थान पर 'ण' का प्रयोग अधिक मिलता है। जैसे- कोण जावै से (कौन जाता है।)

३. इसमें सहायक क्रिया (हूँ, है, हैं) के स्थान पर सूँ , सै , सैं , का प्रयोग होता है। जैसे- करता है( करता सै), मिलते हैं ( मिलते सैं) ।

४. पंजाबी में 'त' के स्थान पर 'द' का प्रयोग मिलता है। जैसे- करता सै (करदा सै), मिलते सैं (मिलदे सैं) ।

कन्नौजी[सम्पादन]

कान्यकुब्ज या कन्नौज किसी युग में एक जनपद का नाम था। इसका पुराना नाम पांचाल था। कन्नौज ही इस बोली का केन्द्र है। पूर्व में कानपुर तक दक्षिण में यमुना नदी तक, और उत्तर में गंगा पार हरदोई, शाहजहाँपुर और पीलीभीत तक इसका क्षेत्र है। कन्नौजी और व्रजभाषा में बहुत ही कम अन्तर है। वास्तव में अवधी मिल जाने से इसमें थोडी़ भिन्नता आ गई है। कुछ विद्वान इसको तो व्रजभाषा से भिन्न बोली नहीं मानते है।

संदर्भ[सम्पादन]

१. हिन्दी भाषा--- डा. हरदेव बाहरी । अभिव्यक्ति प्रकाशन , २०१७ ,पृष्ठ--१७२-२०१