भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/भाषाविज्ञान के अंग

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भाषाविज्ञान के अंग या मुख्य शाखाएँ[सम्पादन]

भाषा कहने से सामान्यत: चार तत्वों का बोध होत है-- ध्वनि , शब्द (पद) , वाक्य और अर्थ । पहले ध्वनि का उच्चारण होता है; फिर अनेक ध्वनियों से एक पद का निर्माण होता है; अनेक पदों से वाक्य संघटित होता है और उससे अर्थ की प्रतिति होती है। ध्वनि से अर्थ तक का क्रम अनवरत चलता रहता है। इसमें प्रत्येक की सीमा इतनी विस्तृत और व्यापक हो गयी है कि इनके विवेचन के लिए स्वतन्त्र शास्त विकसित हो गये हैं जिन्हें क्रमश: ध्वनिविज्ञान , पदविज्ञान , वाक्यविज्ञान , एवं अर्थविज्ञान कहते हैं।

१. ध्वनिविज्ञान

भाषा का आरम्भ ध्वनि से होता है। ध्वनि के अभाव में भाषा की कल्पना नहीं की जा सकती है और हमने देखा है, भाषाविज्ञान का विषय ध्वन्यात्मक भाषा ही है। इसलिए सवप्रथम ध्वनि का विवेचन आवश्यक है। ध्वनि के तीन पक्ष हैं-- १) उत्पादन ; २) संवहन ; और ३) ग्रहण । इनमें उत्पादन और ग्रहण का सम्बन्ध शरीर से है और संवहन का वायु- तरंगों से । वक्ता के मुख से नि:सृत ध्वनि क्षोता के कान तक पहुँचते है। ध्वनि के उत्पादन के लिए वक्ता जितना आवश्यक है, उतना ही उसके ग्रहण के लिए क्षोत्रा आवश्यक है, किन्तु वक्ता और क्षोत्रा के बीच यदि ध्वनि के संवहन का कोई माध्यम न हो तो उत्पन ध्वनि भी निरर्थक हो जायेगी । यह कार्य वायु-तंरगों के द्दारा सिध्द होता है। ध्वनि का उत्पादन या ग्रहण कैसे होता है, इसे अच्छी तरह समझने के लिए शरीर का थोडा-बहुत ज्ञान आवश्यक है। ध्वनि का संवहन वाला पक्ष भी तब तक अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता जब तक भौतिकी का थोडा-बहुत ज्ञान न हो । शरीरविज्ञान की दृषि्ट से मानव-शरीर निम्नलिखित तन्त्रों में विभाजित किया जाता है-- १. असि्थ-तन्त्र २. पेशी-तंन्त्र ३. श्वसन-तंन्त्र ४) पाचन-तन्त्र ५. परिसंचरण-तन्त्र ६.उत्सर्जन-तन्त्र ७. तनि्त्रका-तन्त्र ८. अन्त:स्त्रावी-तन्त्र ९. जनन-तन्त्र इन तन्त्रों के कार्यों पर ध्यान देने से दो ही तन्त्र ऐसे दीखते हैं जिनका सम्बन्ध भाषण से है वे हैं श्वसन-तन्त्र तथा पाचन-तन्त्र ।

२. पदविज्ञान

उच्चारण की दृषि्ट से भाषा की लघुतम इकाई ध्वनि है और सार्थकता की दृषि्ट से शब्द । ध्वनि सार्थक हो ही , यह आवश्यक नहीं है; जैसे -- अ, क, च, ट, त, प आदि ध्वनियाँ तो हैं, किन्तु सार्थक नहीं । किन्तु , अब, कब चल आदि शब्द हैं, क्योकि इनमें सार्थकता है,अर्थात् अर्थ देने की क्षमता है। पदविज्ञान में पदों के रूप और निर्माण का विवेचन होता है। सार्थक हो जाने से ही शब्द में प्रयोग-योग्यता नहीं आ जाती । कोश में हजारों-हजार शब्द रहते हैं, पर उसी रूप में उनका प्रयोग भाषा में नहीं होता । उनमें कुछ परिवतन करना होता है। उदाहरणार्थ कोश में ' पढना ' शब्द मिलता है और वह सार्थक भी है, किन्तु प्रयोग के लिए 'पढना' रूप ही पयाप्त नहीं है, साथ ही उसका अर्थ भी स्पष्ट नहीं होता । 'पढना' के अनेक अर्थ हो सकते है; जैसे पढता है, पढ रहा है, पढ रहा होगा 'पढना' के ये अनेक रूप जिस प्रक्रिया से सिध्द होते हैं, उसी का अध्ययन पदविज्ञान का विषय है। संसकृत के वैयाकरणों ने शब्द के दो भेद किये हैं-- शब्द और पद । शब्द से उनका तात्पर्य विभकि्तहीन शब्द से है जिसे प्रातिपादित भी कहते हैं। पद शब्द का प्रयोग वैसे शब्द के लिए किया जाता है जिसमें विभकि्त लगी हो। पद -रचना की चार पध्दतियाँ दृषि्टगोचर होती हैं-- १) अयोगात्मक २) अशि्लष्ट योगात्मक ३) शि्लष्ट योगात्मक ४) प्रशि्लष्ट योगात्मक

३. वाक्यविज्ञान

वाक्यविज्ञान भाषाविज्ञान की वह शाखा है, जिसमे पदों के पारस्परिक सम्बन्ध का विचार किया जाता है। हमने पहले देखा है कि ध्वनि का सम्बन्ध भाषा के उच्चारण से है, जो मुख्यता: शरीरिक व्यापार है। ध्वनि- समूह में जब सार्थकता का समावेश हो जाता है तो उसे पद कहते हैं। पद ध्वनि और वाक्य के बीच की संयोजक कडी है क्योंकि उसमें उच्चारण और सार्थकता दोनों का योग रहता है, किन्तु न तो ध्वनि की तरह वह उच्चारण है और न वाक्य की तरह पूणत: सार्थक ।

पदविज्ञान में पदों की रचना का विचार होता है, अर्थात संज्ञा , क्रिया , विशे्षण , कारक, लिंग , वचन , पुरूष , काल , आदि के वाचक शब्द कैसे बनते हैं, किन्तु उन पदों का कहाँ , कैसे प्रयोग होता है, यह वाक्यविज्ञान का विषय हैं। अभिहितान्वयाद के अनुसार पदों के योग से वाक्य बनती है, किन्तु उसके लिए तीन चीजें अपेक्षित हैं-- १. आकांक्षा , २. योग्यता , ३. आसत्ति ।

४. अर्थविज्ञान

अर्थविज्ञान के विवेच्य विषय हैं-- अर्थ क्या है? अर्थ का ज्ञान कैसे होता है? शब्द और अर्थ में क्या सम्बन्ध है? अनेकार्थक शब्द के अर्थ का निणय कैसे किया जाता है? अर्थ में परिवतन क्यों कैसे होता है? आदि । हम पहले देख चुके हैं कि मानव-भाषा का अन्यतम लक्षण उसकी सार्थकता है। अत: बिना अर्थ का विचार किये भाषा का विवेचन अधूरा रहेगा । हमारे यहाँ अर्थ का महत्व प्राचिन काल से माना जाता रहा है। यास्क ने कहा है कि जिस प्रकार बिना अगि्न के शुष्क ईंधन प्रज्वलित नहीं हो सकता , उसी प्रकार बिना अर्थ समझे जो शब्द दुहराया जाता है, वह कभी अभिपि्सत विषय को प्रकाशित नहीं कर सकता ।

उसी प्रसंग में उन्होंने फिर कहा है-- जो बिना अर्थ जाने वेदों का अध्ययन करता है, वह केवल भार ढोता है। अर्थ को जानने वाला ही समस्त कल्याणों का भागी होता है और ज्ञान की ज्योति से समस्त दोषों को दूर कर ब्रहम्त्व को प्राप्त करता है। कहने का तात्पर्य यह कि अर्थ के अभाव में भाषा का कोई महत्व नहीं है। शब्द तो अर्थ की अभिव्यकि्त का माध्यम है। इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि शब्द शरीर है तो अर्थ आत्मा । जिस तरह शरीर की सहायता से ही आत्मा का प्रत्यक्षीकरण होता है, उसी प्रकार शब्द की सहायता से ही अर्थ का बोध होता है।

अर्थबोध या संकेतग्रह के आठ साधन माने गये हैं--- १. व्यवहार ; २. आप्तवाक्य ; ३. उपमान; ४. वाक्यशेष (प्रकरण) ; ५. विवृति (व्याख्या ) ; ६. प्रसिध्द पद का सानि्नध्य ; ७. व्याकरण ; ८. कोश ।

५. प्रोक्तिविज्ञान किसी बात को कहने के लिए प्रयुक्त वाक्यों का उस समुच्चय को प्रोक्ति कहते हैं जिसमें एकाधिक वाक्य आपस में सुसंबध्द होकर अर्थ और संरचना की दृष्टि में एक इकाई बन गए है। अंग्रेजी का एक पुराना शब्द 'डिस्कोर्स' है। उसी को अब अंग्रेजी में इस अर्थ का शब्द मान लिया गया हैं। इसी ने एक प्रतिशब्द रूप हिन्दी में 'प्रोक्ति'शब्द हो रहा हैं। समाजभाषाविज्ञान के विकास के कारण इस ओर लोगों का ध्यान गया है। अर्थ और संरचना आदि सभी दृष्टियों से विचार करने पर प्रोक्ति ही भाषा की मूलभूत सहज इकाई ठहरती है और क्योंकि समाज में विचार विनिमय के लिए उसी (प्रोक्ति) का प्रयोग किया जाता है तथा वाक्य उसी का विश्लेषण करने पर प्राप्त होते हैं अतः वाक्य मूलत: भाषा की सहज इकाई नहीं हो सकते। जैसे- युध्द में रावण-पक्ष के काफी लोग मारे गए या राम ने रावण को बाण से मारा आदि। ये सभी वाक्य आपस में सुसंबद्ध है। प्रोक्ति भाषाविज्ञान में एककालिक, कालक्रमिक, तुलनात्मक, व्यतिरेकी तथा सैध्दांतिक रूप में अध्ययन करते हैं।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भाषाविज्ञान की भूमिका--- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा । दीप्ति शर्मा। पृष्ठ-- १८०-१८७

२. भाषा विज्ञान --- डाँ० भोलानाथ तिवारी। प्रकाशक--किताब महल,पुर्नमुद्रण--२०१७,पृष्ठ-३०

भाषाविज्ञान के गौण शाखाएँ[सम्पादन]

१. मनोविज्ञान-भाषाविज्ञान

भाषा का सम्बन्ध विचारों या भावों से है, अर्थात भाषा विचारों या भावों की अभिव्यक्ति का साधन है। व्यक्ति पर्यावरण अथवा परिस्थिति से प्रभावित होता है और उस प्रभाव की अभिव्यक्ति प्रतिक्रिया के रूप में होती है। वह प्रतिक्रिया मानसिक, शरीरिक अथवा वाचिक हो सकती है। जैसे, अप्रिय बात देखने या सुनने पर हमारा मन क्षुब्ध और खिन्न हो जाता है। जो हमारी मानसिक प्रतिक्रिया का परिणाम है। कहीं हमारे पैर पर यदि आग का एक कण आ गिरे तो हम अविलम्ब पैर हटा लेते है। तात्पर्य यह है कि जब तक कोई विचार या भाव मन में नहीं उठे तब तक भाषा का उच्चारण हो ही नहीं सकता ।अत: विचार या भाव का सम्बन्ध मन (मस्तिष्क) से है जिसका अध्ययन मनोविज्ञान से है।

२. इतिहास-भाषाविज्ञान

इतिहास और भाषाविज्ञान एक-दूसरे के लिए बहुत उपादेय और सहायक हैं। इतिहास के निर्माण में भाषाविज्ञान से बहुत सहायता मिलती है। प्राचीन अभिलेख, शिलालेख, सिक्के आदि के पढ़ने पर ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो इतिहास निर्माण का आधार प्रस्तुत करते हैं या इतिहस की टूटी कडि़याँ जोड़ने में सहायक होते हैं। उदाहरणार्थ , उत्तरी सीरिया में प्राप्त 'हित्ती' की कीलाक्षर लेखपटि्टयों को पढ़ने के बाद यह निश्चय हो गया कि 'हित्ती' भारत-यूरोपीय परिवार की भाषा है।

३. भूगोल-भाषाविज्ञान

जिस प्रकार इतिहास से भाषाविज्ञान का निकट सम्बन्ध है, उसी प्रकार भूगोल से भी। संसार की हजारों भाषाओं का सीमा-निर्धारण भूगोल की सहायता से ही किया जा सकता है। यदि भूगोल का ज्ञान न हो तो किसी भाषा की सीमा कहाँ तक मानेंगे, यह कहना कठिन है। जहाँ भाषाओं की सीमाएँ थोड़ी दूर पर बदलती हैं, वहाँ तो यह कार्य और कठिन हो जाता है। सीमावर्ती भाषाओं में दो-दो, तीन-तीन भाषाओं के लक्षण दिखने लगते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें किसके अन्तर्गत रखें, यह निर्णय करने के लिए भौगोलिक भाषावैज्ञानिक साधनों को काम में लाया जाता है।

४. समाजविज्ञान-भाषाविज्ञान

समाजविज्ञान में समाज का अध्ययन होता है, अर्थात् सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य के आचार, विचार, व्यवहार आदि का विश्लेषण किया जाता है। व्यक्ति और समाज का सम्बन्ध, व्यक्ति पर समाज का प्रभाव, समाज के निर्माण में व्यक्ति का प्रभाव आदि विषयों की चर्चा समाजविज्ञान करते है। भाषा भी सामाजिक सम्पति है। वह समाज में ही उत्पन्न और समाज में ही विकसित होती है। मनुष्य के आचार-विचार आदि में भाषा का कभी प्रत्यक्ष और कभी अप्रत्यक्ष प्रभाव रहता है। इस तरह भाषाविज्ञान समाजविज्ञान के बहुत समीप आ जाता है। जैसे, ब्राह्मण किसी दिन पंडित हुआ करते थे और क्षत्रिय किसी दिन ठाकुर। आज दोनों ज्ञान और अधिकार से वंचित हो गये हैं, फिर भी पुराने नाम ढोये जा रहे हैं। सामान्यत: शिष्टाचार से लेकर क्रान्तिकारी परिवर्तन तक भाषा के द्दारा ही सम्पन्न होता है।

संदर्भ[सम्पादन]

२. भाषाविज्ञान की भूमिका --- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा । दीपि्त शर्मा पृष्ठ--१७४,१८९, २२२,२४१,२५३