भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा/भाषाविज्ञान के अध्ययन क्षेत्र

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भाषा विज्ञान के रूप के सम्बन्ध में विद्वानों का एक मत नहीं है। हिन्दी में भाषाविज्ञान की अनेक पुस्तकों में दो प्रकार के मत मिलते हैं— 1. ध्वनिविज्ञान, 2. पदविज्ञान, 3. वाक्यविज्ञान, 4. अर्थविज्ञान आदि को भाषाविज्ञान की शाखाएँ मानने वालों में डॉ. बाबूराम सक्सेना, डॉ. भोलानाथ तिवारी आदि तथा वर्णनात्मक, तुलनात्मक, ऐतिहासिक आदि को भाषाविज्ञान की शाखाएँ मानने वाले विद्वानों में डॉ. कपिलदेव द्विवेदी, डॉ. देवेंद्र शर्मा, डॉ. देवीशंकर द्विवेदी आदि हैं परन्तु वास्तव में ध्वनिविज्ञान, पदविज्ञान, वाक्यविज्ञान, अर्थविज्ञान आदि को भाषाविज्ञान का अंग तथा वर्णनात्मक, तुलनात्मक, ऐतिहासिक एवं संरचनात्मक भाषाविज्ञान को भाषाविज्ञान की शाखाएँ मानना अधिक विचारसंगत और वैज्ञानिक है और ये भाषाविज्ञान के मूर्धन्य आचार्यों द्वारा मान्य है।

वर्णनात्मक भाषाविज्ञान[सम्पादन]

वर्णनात्मक भाषाविज्ञान को समकालिक, या एककालिक भी कहते हैं। इस पद्धति द्वारा किसी एक भाषा का किसी एक काल की संरचनात्मक विशेषताओं का विवेचन-विश्लेषण किया जाता है। इसमें जीवित भाषा या बोली के लिए वर्णनात्मक भाषाविज्ञान की पद्धति को अपनाया जाता है। कथित भाषा सामग्री के अभाव लिखित सामग्री को विश्लेषण का आधार बनाया जा सकता है। इस दृष्टि से किसी भी समय के साहित्य का अथवा किसी साहित्यकार की रचना का भाषावैज्ञानिक विश्लेषण वर्णनात्मक पद्धति होता है। वर्णनात्मक भाषाविज्ञान के अंतर्गत वर्णनात्मक ध्वनिविज्ञान, वर्णनात्मक पदविज्ञान, वर्णनात्मक वाक्यविज्ञान, वर्णनात्मक अर्थविज्ञान आदि का विवेचन होता है।

तुलनात्मक भाषाविज्ञान[सम्पादन]

आधुनिक भाषा विज्ञान का प्रारम्भ ही तुलनात्मक भाषा विज्ञान से माना जाता है। 'तुलनात्मक' का अर्थ है दो या दो से अधिक भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन तथा इस पद्धति में अध्ययन एक या कई कालों की भाषाओं का हो सकता है। इसमें ऐतिहासिक भाषाविज्ञान से भी सहायता ली जाती है। एक, दो या अधिक भाषाओं या बोलियों के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा उस अज्ञात भाषा का स्वरूप ज्ञात किया जाता है, जिससे वे दोनों निकली है। इसे भाषा का पुनर्निर्माण कहते है।

अठारहवीं उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोपीय विद्वानों ने प्राचीन लैटिन, यूनानी, ईरानी और ऋग्वेद भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला कि किसी समय भारत से लेकर यूरोप तक के लोग एक ही मूल भाषा का व्यवहार करते थे। भारत में तुलनात्मक भाषाविज्ञान का आरम्भ डॉ. सुनिति कुमार चैटर्जी, डॉ. सुकुमार सेन आदि के प्रयत्नों से कलकत्ता विश्वविधालय में हुआ। आज इसका क्षेत्र बहुत विस्तृत है।

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान[सम्पादन]

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान को कालक्रमिक, या द्विकालिक भी कहते हैं। किसी भाषा में विभिन्न कालों में हुए परिवर्तन पर विचार करना एवं उन परिवर्तनों के सम्बन्ध में सिद्धांतों का निर्माण ऐतिहासिक भाषा विज्ञान के अंतर्गत आता है। वर्णनात्मक पद्धति तथा ऐतिहासिक पद्धति में मुख्य अन्तर यह है कि वर्णनात्मक भाषा विज्ञान में किसी भाषा के अध्ययन करते समय या काल से सम्बन्धित स्वरूप का विश्लेषण होता है। इसलिए इसे एककालिक कहा जाता है जबकि दूसरी ओर ऐतिहासिक भाषा विज्ञान में भाषा का कालक्रमिक या द्विकालिक अध्ययन होता है। भाषा के विभिन्न कालों में होने वाले परिवर्तनों को उसके विकास की प्रकिया के द्वारा देखा जाता है कि कोई भी भाषा अपने प्राचीन रूप से किन सोपानों को पार कर वर्तमान स्थिति तक पहुँची है। जैसे, भाषा में ध्वनियों, शब्दावली, व्याकरणिक रूप, वाक्य-रचना आदि परिवर्तन होते रहते हैं। इन्हीं परिवर्तनों का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करना ही 'ऐतिहासिक भाषाविज्ञान' कहलाता है।

संरचनात्मक भाषाविज्ञान[सम्पादन]

संरचनात्मक पद्धति वर्णनात्मक भाषाविज्ञान पद्धति की अगली कड़ी है। इसमें भाषा के विभिन्न तत्वों के पारस्परिक सम्बन्धों को लेकर अध्ययन किया जाता है। संरचनात्मक भाषाविज्ञान के विभिन्न तत्वों का पारस्परिक संबंध अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है, जबकि वर्णनात्मक भाषाविज्ञान भाषा की भीतरी व्यवस्था से निरपेक्ष अध्ययन प्रस्तुत करता है। 'संचनात्मक भाषाविज्ञान' के प्रवर्तक 'जैलिग हैरिस' (अमरीका) ने 'Methods in structural Linguistics' नामक ग्रन्थ में इस पद्धति का विकास किया। इसमें यांत्रिक उपकरणों को अधिक महत्व दिया जाता है जिससे अनुवाद करने में विशेष सुविधा होती है।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. भाषा-विज्ञान के सिद्धांत — डॉ. मीरा दीक्षित। पृष्ठ: 45-47