भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/भाषा की उत्पति

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भाषा की उत्पति[सम्पादन]

भाषा की उत्पत्ति से दो बातें पाता चलता है। १) ध्वनन अर्थात् बोलने की शकि्त से २) उच्चारित ध्वनि तथा अर्थ संयोग से । जहाँ तक ध्वनन (ध्वनि उत्पन्न करने ) का प्रश्न है , अणगिनत पशु-पक्षियों में भी पाया जाता है; जैसे -- कुत्ता भौं-भौं करता है, बिल्ली म्याऊँ-म्याऊँ, कोयल कू-कू ।इस ध्वनि में सार्थकता का अभाव है, इसलिए यह उस अर्थ में भाषा नहीं है जो मनुष्य में पायी जाती है। आज से लाखों साल पहले की सि्थति बताने का कोई साधन नहीं था कि भाषा की उत्पति कैसे हुई , यह प्रश्न लगभग वैसा ही है जैसे मनुष्य की उत्पति अत: अब तक कोई समुचित और स्विकार्य समाधान नहीं मिलने से आधुनिक भाषाविज्ञान ने इस समस्या पर विचार करना बन्द कर दिया है।कई विद्दानों ने इस बिषय पर विचार किया है उनका सिध्दान्तों का ऐतिहासिक महत्व है; कम-से-कम इतना तो पता चलता है कि भाषोउत्पति के सम्बन्ध में उन्होनें क्या सोचा है।

१.दिव्योत्पति ( डिवाइन ) सिध्दान्त

ईश्वरवादी प्रत्येक कार्य-कलाप ,यहाँ तक सृषि्ट का भी सम्बन्ध दिव्य शकि्त से मानते है। उनका मानना है कि ईश्वर मनुष्य को उत्पन्न कर सकता है तो भाषा क्यों नहीं मनुष्य जब भी उत्पन्न हुआ होगा तो अपनी सम्पूण विशेषताओं के साथ इसलिए वह अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक शरीरिक सौष्ठव , आंगिक स्वच्छन्दता और विकसित चेतना है।

समीक्षा:- इस सिध्दान्त में आपत्ति यह है कि यदि मानव-भाषा ईश्वर-प्रदत्त है तो उसमें इतना भेद क्यों अन्य पशुओं की भाषा तो संसार में एक ही है। सभी देशों के कुत्ते एक-सा भूँकते है; घोडे एक समान ही हिनहिनाते है; अन्य पशु-पक्षियों की बोली में भी एकरूपता दीखती है; फिर , वह एकरूपता मनुष्य की बोली में क्यों नहीं पायी जाती है। अत: स्पष्ट है कि यह मत वैज्ञानिक दृषि्ट से अग्राह्म है।

२.संकेत (सिम्बल) सिध्दान्त

कुछ विद्दानों का मत है कि आरम्भ में मनुष्य भी पशुओं के समान सिर , आँख , हाथ , पैर आदि अंगों को चलाकर अपना अभिप्राय व्यक्त किया करता करता था , किन्तु इससे उसका अभिप्राय पूर्णत: व्यक्त नहीं हो पाता था इस असुविधा को दूर करने के लिए मनुष्य ने पारस्परिक विचार-विनिमय द्दारा ध्वन्यात्मक भाषा को जन्म दिया।

समीक्षा:- यह सिध्दान्त मान लेता है कि एक समय ऐसा था जब मनुष्य को भाषा नहीं मिली थी तो उसकी आवश्यकता का अनुभव मनुष्य को कैसे हुआ? आज भी बन्दरों या बैलों को उसकी आवश्यकता का अनुभव कहाँ हो रहा है? यदि होता तो वे भी कोई महासभा करके अपने लिए एक भाषा बना लेता और अपने विचारों को अधिक पूर्णता से व्यक्त कर पाते। अत: अनेक शंकाएँ हैं जिनका समाधान इस सिध्दान्त से नहीं होता।

३. रणन (डिड्-डांङ् ) सिध्दान्त

इस सिध्दान्त की ओर सर्वप्रथम संकेत प्लेटो ने किया था, किन्तु इसको पल्लवित मैक्समूलर ने। रणन-सिध्दान्त के अनुसार शब्द और अर्थ में एक प्रकार का रहास्यात्मक नैसर्गिक सम्बन्ध है। संसार में प्रत्येक वस्तु की अपनी विशिष्ट ध्वनि हुआ करती है जो किसी वस्तु से आहत होने पर व्यक्त हो जाती है। उदाहरणार्थ - यदि हथौडे से किसी धातु , लकडी , ईंट , पत्थर , शीशे आदि पर आघात करने पर विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न होंगी जिसे सुनकर कोई भी पहचान सकता है।

समीक्षा:- यह सिध्दान्त शब्द और अर्थ में नैसर्गिक सम्बन्ध मानता है जो तर्कसंगत से अधिक रहस्यात्मक है। जैसे जादूगर अपनी जादू से पलक मारते कुछ कर दिखता है,वैसे ही बाह्म वस्तुओं से सम्पर्क होते ही मनुष्य शब्द बनता चला गया और सारे शब्द निष्पन हो गये , वैसे उसकी शकि्त भी समाप्त हो गया अत: कहने की आवश्यकता नहीं कि इसमें वैज्ञानिकता का बिल्कुल अभाव है।

४. श्रमध्वनि ( यो-हे-हो ) सिध्दान्त

शारीरिक श्रम करते समय स्वभावत: श्वास-प्रश्वास की गति तीव्र हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप पेशियों का ही नहीं स्वर-तनि्त्रयों का भी आकुंचन-प्रसारण होने लगता है और उनका कम्पन बढ जाता है। अत: कुछ ध्वनियाँ अनायास निकलने लगती हैं। उदाहरणार्थ - कपङा धोते समय धोबी 'छियो-छियो' इसी तरह पालकी ढोते समय कहार, नाव खेते समय मल्लाह, रोलर खींचते मजदूर किसी-न-किसी प्रकार की ध्वनि करते है।

समीक्षा:- आवेगबोधक ध्वनियों के समान इन ध्वनियों में सार्थकता का अभाव है। छियो-छियो , हो-हो से कोई अर्थ नहीं निकलता । आवेगबोधक ध्वनियों का सम्बन्ध भाव की तीव्रता से और श्रमध्वनियों का शारीरिक क्रिया से, अन्यथा तात्विक दृष्टि से दोनों का अर्थ शून्य है। निरर्थक ध्वनियों से सार्थक भाषा की उत्पति की कल्पना अयुकि्तसंगत है।

५. अनुकरण ( बोउ-वोउ ) सिध्दान्त

बोउ-वोउ, भों-भों का अंग्रेजी रूपान्तर है। इस सिध्दान्त का नाम मैक्समूलर ने विनोद में रख दिया इस सिध्दान्त का वास्ताविक नाम 'अनोमेटोपीक थियरी' है। हिन्दी में इसके लिए शब्दानुकरणमूलतावाद चला है। इस सिध्दान्त के अनुसार वस्तुओं का नामकरण उतपन्न होने वाली प्राकृतिक ध्वनियों के आधार पर हुआ है। अर्थात जिस वस्तु से जैसी ध्वनि उत्पन्न हुई उसी के अनुकरण पर नाम रख दिया गया । जैसे - का-का रटने वाले को काक, कू-कू कूकने वाली को कोकिल आदि ।

समीक्षा:- यह सिध्दात मनुष्य को वाणी-विहीन मान लेता है और उसकी भाषा का आरम्भ पशु-पक्षियों या प्राकृतिक वस्तुओं की ध्वनियों के अनुकरण पर सिध्द करता है। परिणमस्वरूप मनुष्य पशु-पक्षियों से हीन कोटि का जीव सिध्द होता है। जिसमें ध्वनि उत्पन्न करने की सम्भावनाएँ ही नहीं वह ध्वन्यात्मक अनुकरण करने में कैसे समर्थ हो सकता है।

६. संगीत ( सिंग-सांग ) सिध्दान्त

आदिम मानव भावुकता के क्षणों में संगीतात्मक ध्वनियाँ उत्पन्न करता रहा होगा बाद में इन्हीं संगीतात्मक ध्वनियों से अर्थ का योग हुआ होगा और उससे भाषा का विकास ¡ येस्पर्सन ने गाने के खेल ( singing sport ) से उच्चारण के अवयवों के द्दारा उच्चारण के अभ्यास की बात कहकर समर्थन किया है।

समीक्षा:- भावुक क्षणों में मनुष्य की संगीतात्मक प्रवृति का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता तो फिर गुनगुनाने से अक्षर और शब्द तथा बाद में भाषा कैसे विकसित हुई । कहना नहीं होगा कि संगीत सिध्दान्त भी भाषा की उत्पति के प्रश्न के अन्य कल्पनाओं के समान एक कल्पना है। इसमें वैज्ञानिकता या तर्कपूण विवेचन का सर्वथा अभाव है।

निष्कर्ष:- इन सिध्दान्तों को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने के बाद स्पष्ट हो जाता है कि इनके उपस्थापकों ने तथ्यान्वेषण से अधिक कल्पना से काम लिया है। यह समस्या कब सुलझेगी, यह सन्दिग्ध है। इसलिए आधुनिक भाषाविज्ञान इस पर विचार-विमर्श करना भी समय का अपव्यय मानता है।

संदर्भ[सम्पादन]

१.भाषाविज्ञान की भूमिका -- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा । दीप्ति शर्मा । पृष्ठ-- ६५-७६