भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/भाषा की परिवर्तनशीलता और परिवर्तन के कारण

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

भाषा की परिवर्तनशीलता और परिवर्तन के कारण[सम्पादन]

परिवर्तन सृष्टि की प्रत्येक वस्तु का नियम है। कोई भी वस्तु जिस रूप में उत्पन्न होती है, उसी रूप में सदा नहीं रहती। वस्तुत: परिवर्तन का ही नाम उत्पति , विकास , या विनाश है; ये तीनों परिवर्तन के विभिन्न रूप है; किन्तु परिवर्तन की गति सभी वस्तुओं में एक-जैसी नहीं होती । भाषा भी परिवर्तन के इस नियम का अपवाद नहीं है। आज कोई भाषा उसी रूप में नहीं बोली जाती जिस रूप में आज से एक हजार वर्ष पहले बोली जाती थी। यदि यह किसी प्रकार सम्भव होता कि सौ पीढियों पहले के अपने पूर्वजों से हमारी भेंट हो पाती तो दोनों बडी उलझन और पशोपेश की सि्थति में मिलते । न तो हम उनकी बात समझ पाते और न वे हमारी । इस कथन में सन्देह हो तो अपभ्रंश की कोई रचना उठाकर देख लीजिये। भाषा परिवर्तन-सम्बन्धी कारणों को दो वर्गों में रख सकते है। १) बाह्म कारण २) आभ्यन्तर कारण । जिनमें भौगोलिक , ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक , प्रभाव आते है, इन्हें बाह्म कारण और परिवर्तन के कुछ कारण तो स्वय भाषा में विधमान रहते हैं, उन्हें आभ्यन्तर कारण कहते है।

बाह्य कारण[सम्पादन]

भौगोलिक प्रभाव

भाषा के परिवर्तन में भोगोलिक प्रभाव को महत्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार जलवायु का प्रभाव मनुष्य के शारीरिक गठन पर ही नहीं , उसके चरित्र और ध्वनि-पध्दति पर भी पडता है। यदि यह कहें कि पहाडी भागों में रहने वालों की भाषा कोमल होती है। जैसे इटली के निवासियों की, और समतल मैदानों की भाषा परूष जैसे भोजपुरी बोलने वालो की । अत: भौगोलिक प्रभाव की व्यापकता सन्दिग्ध है, सभी परिसि्थतियों में सही नहीं उतरता क्योकि एक मात्र भूगोल का प्रभाव नहीं होता अन्य प्रभाव समाहित होते है। भाषा के परिवर्तन में भौगोलिक प्रभाव नहीं है ऐसा कहना गलत होगा मात्र चाहे जितनी भी कम हो , उसके प्रभाव को अस्वीकार नहीं किया जा सकता ।

ऐतिहासिक प्रभाव

भाषा के परिवर्तन में भूगोल का प्रभाव अलक्षित होता ही है,किन्तु इतिहास का बहुत स्पष्ट । ऐतिहासिक कारणों में विदेशी आक्रमण , राजनीतिक विप्लव, व्यापारिक आदि । हिन्दी में हजारों शब्द अरबी, फारसी, तुर्की , अंग्रेजी आदि से आये है। इनमें कुछ तो इतने सहज और स्वाभाविक बन गये हैं उन्हें विदेशी कहना भी कठिन मालूम पडता है। इन शब्दों से हिन्दी में अनेकविध परिवर्तन हुए हैं-ध्वनि में, शब्द-भण्डार में, यहाँ तक वाक्य-विन्यास में । हिन्दी में पहले क़, ख़, ग़,ज़ ध्वनियाँ नहीं थी। ऐसे ही फ़ारसी के- हवा , हुनर किताब और अरबी के- कैंची, चाकू, दारोगा , अंग्रजी के-- स्कूल , एजेंट, गिलास आदि शब्द आ गये है।

सांस्कृतिक प्रभाव

सांस्कृतिक प्रभाव की चर्चा इतिहास के अन्तर्गत की जा सकती है। चूँकि वह भी ऐतिहासिक घटनाओं का ही एक अंग है। किन्तु स्पष्टता के लिए पृथक विचार करना अच्छा है। भारत के स्वधीनता-संग्राह के समय सांस्कृतिक जागरण हुआ । स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनके द्दारा संस्थापित समाज ने आर्यसमाज ने, हिन्दी की महत्ता घोषित कर उसके प्रसार के लिए उर्वर क्षेत्र तैयार किया। उर्दू के बदले हिन्दी के पठन-पाठन, और फारसी-अरबी शब्दों के बदले संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग किया। इस सांस्कृतिक जागरण के कारण भाषा के स्वरूप में बडा क्रानि्तकारी परिवर्तन हुआ। स्वाधीनता-संग्राम के फलस्वरूप 'सत्याग्रह' , 'असहयोग-आन्दोलन', आदि शब्द उत्पन्न हुए।

साहित्यिक प्रभाव

भाषा को परिवर्तित करने में कभी-कभी साहित्यिक प्रभाव भी महत्वपूण सिध्द होते है। मध्ययुग का भारतीय अथवा यूरोपियन इतिहास इसका प्रमान है। भारत में संस्कृत का एकच्छत्र प्रभाव था। भकि्त-आन्दोलन के कारण जनरूचि में ऐसा परिवर्तन हुआ कि पाठक ही नहीं , लेखक भी संस्कृत से लोक-भाषाओं पर उतर आये। उत्तर से लेकर दक्षिण तक सम्रग भारत इस लहर में निमजि्जत हो गया। कबीर , तुलसी, जायसी, सूर आदि ने हिन्दी की विभिन्न बोलियों में अभिव्यज्जना किया। अत: भाषा के इस क्रानि्तकारी परिवर्तन ने भारत के साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप में बदल दिया।

वैज्ञानिक प्रभाव

विज्ञान की विभिन्न शाखाओं ने विगत दो शताबि्दयों से अकल्पनीय प्रगति की है जिसके कारण असंख्य नयी वस्तुओं और नये तत्वों का अविष्कार हुआ है। उन वस्तुओं और तत्वों के नामकरण की आवश्यकता से हजारों-हजार नये शब्द गढने पडे हैं, जिसने भाषा अत्यधिक समृध्द हुई है। यह वैज्ञानिक शब्दावली आधुनिक युग और विज्ञान की, देन है। अत: विज्ञान ने मनुष्य को ही नहीं, भाषा को भी रूपान्तरित कर दिया। अत: साधारणत: बाह्म कारणों में ये ही आते है। प्रत्येक प्रभाव की मात्रा सदा एक समान नहीं होती कभी वह लक्षित तो कभी अलक्षित होती है।

आभ्यन्तर कारण[सम्पादन]

प्रत्येक वस्तु के विकास में कुछ तो बाह्म कारणों और परिसि्थतियों का हाथ तो कुछ कारण स्वंय उस वस्तु में अन्तर्निहित होता हैं। एक ही वातावरण में पलने वाला मनुष्य कोई नाटा, कोई लम्बा; कोई सबल होता है। इसका कारण स्वंय उस मनुष्य की अन्तर्निहित शकि्त ही है। इसी प्रकार भाषा के विकास या परिवर्तन में बाह्म करणों का तो प्रभाव रहता ही है, किन्तु स्वंय भाषा की प्रकृति भी उस परिवर्तन की भूमिका तैयार करती है। जो कारण भाषा की प्रकृति या स्वरूप से सम्बन्ध है, उन्हें आभ्यन्तर कारण कहा जाता है।

प्रयन्त-लाघव

भाषा में परिवर्तन करने वाले आभ्यन्तर कारणों में सबसे महत्तवपूर्ण है प्रयन्त-लाघव। प्रयन्त-लाघव का सीधा अर्थ होता है- श्रम की अल्पता अर्थात् अधिक श्रम न करना। मनुष्य की सहज प्रवृति है कि न्यूनतम श्रम से वह अधिकतम लाभ उठाना चाहता है। मजदूर काम से जी चुरता है, हाथ-पैर हिलाने में ही नहीं जीभ हिलाने में भी मनुष्य संकोच करता है। उदाहरण-- 'तुम कब घर जाओगे ?' 'कल।' 'और लौटोगे कब?' 'परसों।' प्रयन्त-लाघव के अन्तर्गत भाषा-सम्बन्धी परिवर्तन की कई प्रकियाएँ आती हैं। आगम , लोप , विकार , विपर्यय, समीकरण, विषमीकरण, स्वर भकि्त ।

१.आगम:- कभी-कभी ऐसा होता है कि शब्द में ऐसे संयुक्ताक्षर आ जाते हैं जिनका उच्चारण आसानी से नहीं हो पाता । अत: किसी स्वर की सहायता लेकर उसका उच्चारण करना अधिक सुविधाजनक मालूम होता है। शब्द में नयी ध्वनि का आ जाना आगम कहलाता है। आगम स्वर और व्यजनों दोनों का हो सकता है। स्थान-भेद से आगम के तीन भेद हैं-- आदि,मध्य,और अन्त। उदाहरण, स्वर आगम-- स्कूल, स्तुति, इस्त्री शब्दों का उच्चारण बहुत लोग इस्कूल, स्तुति, इस्त्री करते हैं। व्यंजन आगम-- शाप> सराप ।

२.लोप:- जब दो संयुक्त ध्वनियों के उच्चारण में कठिनाई होती है तो उच्चारण-सौकार्य के लिए उनमें से एक का लोप कर दिया जाता है। जैसे-- ज्येष्ठ > जेठ ; दूग्ध > दूध; स्टेशन > टेसन ।

३. विकार:- उच्चारण की सूविधा के लिए एक ध्वनि में परिवर्तित हो जाना विकार कहलाता है। जैसे:- कृष्ण > कान्ह ; स्तन > थन ; हस्त > हाथ ।

४. विपर्यय:- विपर्यय का अर्थ है उलटना। कभी-कभी शब्द के वर्णों का क्रम उच्चारण में उलट जाता ह; इसे ही विपर्यय कहते है। जैसे- अमरूद > अरमूद ; आदमी > आमदी ।

५. समीकरण:- जब दो भिन्न ध्वनियाँ पास रहने से सम हो जाती हैं तो उसे समीकरण कहते हैं। समीकरण के दो भेद हैं- १) पुरोगामी २) पश्चगामी । जैसे-- पुरोगामी समीकरण- वार्ता > बात ; कर्म > काम । पश्चगामी समीकरण- अगि्न > आग ; रात्रि > रात ।

६. बिषमीकरण:- जब दो निकटस्थ ध्वनियों के उच्चारण में कठिनाई का अनुभव होता है तो उसमें भेद कर दिया जाता है। भेद ला देने के कारण ही इस परिवर्तन को विषमीकरण कहते हैं।जैसे- कंकण > कंगन; मुकुट > मउर ; काक > काग।

७. स्वर-भकि्त:- संयुक्त व्यजनों के उच्चारण में जीभ को अधिक असुविधा होती है और वहाँ धक्का देकर जीभ को आगे बढाना पडता है। उस असुविधा को दूर करने के लिए संयुक्त व्यजनों के बीज जब कोई स्वर रख दिया जाता है तो उसे स्वर-भकि्त कहते हैं। जैसे- मूर्ति > मूरत; स्नान > सनान; कर्म > करम ।

बल

बोलते समय किसी बात पर अधिक ज़ोर देने के लिए या उसे स्पष्ट करने के लिए शब्द या वाक्य के किसी अवयव का उच्चारण अधिक बल देकर किया जाता है। बोलने के क्रम में मेज़ पर हाथ पटकना या पंजों पर खडा हो जाना उसी बल को दृढ़ करने का साधन है। जैसे-- बैठे नहीं जाता बेकार; जाओगे ऊब, नद्दी में डूब, दे न दो कहीं अपनी जान ।

भावातिरेक

प्रेम, क्रोध, शोक, आदि भावों में अतिरेक से भी शब्दों का रूप बदल जाता है। उदाहरणार्थ-- बाबू का बबुआ, बच्चा का बचवा, बेटी का बिटिया ।

अपूर्ण अनुकरण

किन्हीं दो व्यकि्तयों का शारीरिक संघटन एक-जैसा नहीं होता जिसके कारण किसी की आवाज बड़ी सुरीली तो किसी की कर्कश । आंगिक संघटन के साथ मानसिक संघटन में भी अनुकरण का प्रभाव पड़ता है।जिस तरह सबकी आकृति एक नहीं होती उसी तरह प्रकृति भी एक नहीं होती। कोई तीव्र-बुध्दि का तो कोई मन्द-बुध्दि का होता है । अत: ग्रहण करने की क्षमता उसी रूप में होती है। उदाहरण- पिता का अपूर्ण अनुकरण पुत्र ने किया; फिर उसका अपूर्ण अनुकरण उसके पुत्र ने किया। इस तरह कई पीढ़ियों के बाद अनुकरण की अपूर्णता काफी़ व्यापक हो जाती है। जिसका अनिवार्य प्रभाव भाषा पर पड़ता है।

सादृश्य

किसी प्रयोग को देखकर उसके मूल जाने उसी अधार पर प्रयोग कर बैठना सादृश्य के अन्तर्गत आता है। कुछ भाषाविज्ञानी इसे मिथ्या-सादृश्य कहते है। जैसे-असुर का 'अ' भी अज्ञानमूलक परिवर्तन के कारण अभि उपसर्ग का 'अ'भी नय्-वाची बन गया है अन्यथा वेदों में तो असु अथात् प्राणों की रक्षा करनेवाले को असुर कहा गया है उसका अर्थ देव होता है। जो संसकृत और हिन्दी दोनों में सवीकृत हो चुका है। भाषा में परिवर्तन के ये मुख्य प्रयोजन है।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भाषाविज्ञान की भूमिका -- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा । दीप्ति शर्मा । पृष्ठ-- ७७-९२