भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा/भाषा की परिवर्तनशीलता और परिवर्तन के कारण

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परिवर्तन सृष्टि की प्रत्येक वस्तु का नियम है। कोई भी वस्तु जिस रूप में उत्पन्न होती है, उसी रूप में सदा नहीं रहती। वस्तुतः परिवर्तन का ही नाम उत्पत्ति, विकास, या विनाश है; ये तीनों परिवर्तन के विभिन्न रूप है; किंतु परिवर्तन की गति सभी वस्तुओं में एक-जैसी नहीं होती। भाषा भी परिवर्तन के इस नियम का अपवाद नहीं है। आज कोई भाषा उसी रूप में नहीं बोली जाती जिस रूप में आज से एक हजार वर्ष पहले बोली जाती थी। यदि यह किसी प्रकार संभव होता कि सौ पीढ़ियों पहले के अपने पूर्वजों से हमारी भेंट हो पाती तो दोनों बड़ी उलझन और पशोपेश की स्थिति में मिलते। न तो हम उनकी बात समझ पाते और न वे हमारी। इस कथन में संदेह हो तो अपभ्रंश की कोई रचना उठाकर देख लीजिए।

भाषा परिवर्तन-संबंधी कारणों को दो वर्गों में रख सकते है। (क) बाह्म कारण, (ख) आभ्यंतर कारण, जिनमें भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक प्रभाव आते है, इन्हें बाह्म कारण और परिवर्तन के कुछ कारण तो स्वयं भाषा में विधान रहते हैं, उन्हें आभ्यंतर कारण कहते है।

बाह्य कारण[सम्पादन]

भौगोलिक प्रभाव[सम्पादन]

भाषा के परिवर्तन में भौगोलिक प्रभाव को महत्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार जलवायु का प्रभाव मनुष्य के शारीरिक गठन पर ही नहीं, उसके चरित्र और ध्वनि-पध्दति पर भी पड़ता है। यदि यह कहें कि पहाड़ी भागों में रहने वालों की भाषा कोमल होती है। जैसे इटली के निवासियों की, और समतल मैदानों की भाषा पुरुष जैसे भोजपुरी बोलने वालों की। अतः भौगोलिक प्रभाव की व्यापकता संदिग्ध है, सभी परिस्थितियों में सही नहीं उतरता क्योंकि एक मात्र भूगोल का प्रभाव नहीं होता दूसरे प्रभाव समाहित होते है। भाषा के परिवर्तन में भौगोलिक प्रभाव नहीं है ऐसा कहना गलत होगा मात्र चाहे जितनी भी कम हो, उसके प्रभाव को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

ऐतिहासिक प्रभाव[सम्पादन]

भाषा के परिवर्तन में भूगोल का प्रभाव अलक्षित होता ही है, किंतु इतिहास का बहुत स्पष्ट। ऐतिहासिक कारणों में विदेशी आक्रमण, राजनीतिक विप्लव, व्यापारिक आदि। हिन्दी में हजारों शब्द अरबी, फ़ारसी, तुर्की, अंग्रेजी आदि से आए है। इनमें कुछ तो इतने सहज और स्वाभाविक बन गए हैं उन्हें विदेशी कहना भी कठिन मालूम पड़ता है। इन शब्दों से हिन्दी में अनेक परिवर्तन हुए हैं—ध्वनि में, शब्द-भण्डार में, यहाँ तक वाक्य-विन्यास में भी। हिन्दी में पहले क़, ख़, ग़, ज़ ध्वनियाँ नहीं थी। ऐसे ही फ़ारसी के "हवा", "हुनर", "किताब" और अरबी के "कैंची", "चाकू", "दारोगा", अंग्रेज़ी के "स्कूल", "एजेंट", "गिलास", आदि शब्द आ गए है।

सांस्कृतिक प्रभाव[सम्पादन]

सांस्कृतिक प्रभाव की चर्चा इतिहास के अंतर्गत की जा सकती है। चूँकि वह भी ऐतिहासिक घटनाओं का ही एक अंग है। किंतु स्पष्टता के लिए पृथक विचार करना अच्छा है। भारत के स्वाधीनता-संग्राह के समय सांस्कृतिक जागरण हुआ। स्वामी दयानंद सरस्वती और उनके द्वारा संस्थापित समाज ने आर्य समाज ने, हिन्दी की महत्व घोषित कर उसके प्रसार के लिए उर्वर क्षेत्र तैयार किया। उर्दू के बदले हिन्दी के पठन-पाठन, और फारसी-अरबी शब्दों के बदले संस्कृत के तत्सम् शब्दों का प्रयोग किया। इस सांस्कृतिक जागरण के कारण भाषा के स्वरूप में बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। स्वाधीनता-संग्राम के फलस्वरूप 'सत्याग्रह', 'असहयोग-आंदोलन', आदि शब्द उत्पन्न हुए।

साहित्यिक प्रभाव[सम्पादन]

भाषा को परिवर्तित करने में कभी-कभी साहित्यिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण सिद्ध होते है। मध्ययुग का भारतीय अथवा यूरोपीय इतिहास इसका प्रमाण है। भारत में संस्कृत का एकछत्र प्रभाव था। भक्ति-आन्दोलन के कारण जनरूचि में ऐसा परिवर्तन हुआ कि पाठक ही नहीं, लेखक भी संस्कृत से लोक-भाषाओं पर उतर आए उत्तर से लेकर दक्षिण तक सरंग भारत इस लहर में निमज्जित हो गया। कबीर, तुलसी, जायसी, सूर, आदि ने हिन्दी की विभिन्न बोलियों में अभिव्यंजन किया। अतः भाषा के इस क्रांतिकारी परिवर्तन ने भारत के साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप में बदल दिया।

वैज्ञानिक प्रभाव[सम्पादन]

विज्ञान की विभिन्न शाखाओं ने विगत दो शताब्दियों से अकल्पनीय प्रगति की है जिसके कारण असंख्य नई वस्तुओं और नए तत्वों का आविष्कार हुआ है। उन वस्तुओं और तत्वों के नामकरण की आवश्यकता से हजारों-हजार नए शब्द गढ़ने पड़े हैं, जिसने भाषा अत्यधिक समृद्ध हुई है। यह वैज्ञानिक शब्दावली आधुनिक युग और विज्ञान की, देन है। अतः विज्ञान ने मनुष्य को ही नहीं, भाषा को भी रूपांतरित कर दिया। अतः साधारणतः बाह्म कारणों में ये ही आते है। प्रत्येक प्रभाव की मात्रा सदा एक समान नहीं होती कभी वह लक्षित तो कभी अलक्षित होती है।

आभ्यंतर कारण[सम्पादन]

प्रत्येक वस्तु के विकास में कुछ तो बाह्म कारणों और परिस्थितियों का हाथ तो कुछ कारण स्वयं उस वस्तु में अंतर्निहित होता हैं। एक ही वातावरण में पलने वाला मनुष्य कोई नाटा, कोई लंबा; कोई सबल होता है। इसका कारण स्वयं उस मनुष्य की अंतर्निहित शक्ति ही है। इसी प्रकार भाषा के विकास या परिवर्तन में बाह्म कारणों का तो प्रभाव रहता ही है, मगर स्वयं भाषा की प्रकृति भी उस परिवर्तन की भूमिका तैयार करती है। जो कारण भाषा की प्रकृति या स्वरूप से संबंध है, उन्हें आभ्यंतर कारण कहा जाता है।

प्रयंत-लाघव[सम्पादन]

भाषा में परिवर्तन करने वाले आभ्यंतर कारणों में सबसे महत्वपूर्ण है प्रयत्न-लाघव। प्रयत्न-लाघव का सीधा अर्थ होता है: श्रम की अल्पता अर्थात् अधिक श्रम न करना। मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है कि न्यूनतम श्रम से वह अधिकतम लाभ उठाना चाहता है। मज़दूर काम से जी चुरता है, हाथ-पैर हिलाने में ही नहीं जीभ हिलाने में भी मनुष्य संकोच करता है। उदाहरण:

तुम कब घर जाओगे?
कल।
और लौटोगे कब?
परसों।

प्रयत्न-लाघव के अंतर्गत भाषा-संबंधी परिवर्तन की कई प्रक्रियाएँ आती हैं। आगम, लोप, विकार, विपर्यय, समीकरण, विषमीकरण, स्वर भक्ति।

आगम[सम्पादन]

कभी-कभी ऐसा होता है कि शब्द में ऐसे संयुक्ताक्षर आ जाते हैं जिनका उच्चारण आसानी से नहीं हो पाता। अतः किसी स्वर की सहायता लेकर उसका उच्चारण करना अधिक सुविधाजनक मालूम होता है। शब्द में नई ध्वनि का आ जाना आगम कहलाता है। आगम स्वर और व्यंजनों दोनों का हो सकता है। स्थान-भेद से आगम के तीन भेद हैं — आदि, मध्य, और अंत। उदाहरण:

  • स्वर आगम: "स्कूल", "स्तुति", "स्त्री" शब्दों का उच्चारण बहुत लोग "इस्कूल", "इस्तुति", और "इस्त्री" करते हैं।
  • व्यंजन आगम: शाप → श्राप।

लोप[सम्पादन]

जब दो संयुक्त ध्वनियों के उच्चारण में कठिनाई होती है तो उच्चारण-सौकार्य के लिए उनमें से एक का लोप कर दिया जाता है। जैसे — ज्येष्ठ → जेठ ; दूग्ध → दूध; स्टेशन → स्टेसन।

विकार[सम्पादन]

उच्चारण की सूविधा के लिए एक ध्वनि में परिवर्तित हो जाना विकार कहलाता है। जैसे— कृष्ण → कान्हा; स्तन → थन; हस्त → हाथ।

विपर्यय[सम्पादन]

विपर्यय का अर्थ है उलटना। कभी-कभी शब्द के वर्णों का क्रम उच्चारण में उलट जाता ह; इसे ही विपर्यय कहते है। जैसे— अमरूद → अरमूद; आदमी → आमदी।

समीकरण[सम्पादन]

जब दो भिन्न ध्वनियाँ पास रहने से सम हो जाती हैं तो उसे समीकरण कहते हैं। समीकरण के दो भेद हैं— 1. पुरोगामी, 2. पश्चगामी। जैसे—

  • पुरोगामी समीकरण: वार्ता → बात; कर्म → काम।
  • पश्चगामी समीकरण: अगि्न → आग; रात्रि → रात।

बिषमीकरण[सम्पादन]

जब दो निकटस्थ ध्वनियों के उच्चारण में कठिनाई का अनुभव होता है तो उसमें भेद कर दिया जाता है। भेद ला देने के कारण ही इस परिवर्तन को विषमीकरण कहते हैं। जैसे— कंकण → कंगन; मुकुट → मउर ; काक → काग।

स्वर-भक्ति[सम्पादन]

संयुक्त व्यंजनों के उच्चारण में जीभ को अधिक असुविधा होती है और वहाँ धक्का देकर जीभ को आगे बढ़ाना पड़ता है। उस असुविधा को दूर करने के लिए संयुक्त व्यंजनों के बीज जब कोई स्वर रख दिया जाता है तो उसे स्वर-भक्ति कहते हैं। जैसे— मूर्ति → मूरत; स्नान → सनान; कर्म → करम।

बल[सम्पादन]

बोलते समय किसी बात पर अधिक ज़ोर देने के लिए या उसे स्पष्ट करने के लिए शब्द या वाक्य के किसी अवयव का उच्चारण अधिक बल देकर किया जाता है। बोलने के क्रम में मेज़ पर हाथ पटकना या पंजों पर खड़ा हो जाना उसी बल को दृढ़ करने का साधन है। जैसे— "बैठे नहीं जाता बेकार"; "जाओगे ऊब, नदी में डूब", "दे न दो कहीं अपनी जान"।

भावातिरेक[सम्पादन]

प्रेम, क्रोध, शोक, आदि भावों में अतिरेक से भी शब्दों का रूप बदल जाता है। उदाहरण: "बाबू" का "बबुआ", "बच्चा" का "बचवा", "बेटी" की "बिटिया"।

अपूर्ण अनुकरण[सम्पादन]

किन्हीं दो व्यक्तियों का शारीरिक संघटन एक-जैसा नहीं होता जिसके कारण किसी की आवाज़ बड़ी सुरीली तो किसी की कर्कश। आंगिक संघटन के साथ मानसिक संघटन में भी अनुकरण का प्रभाव पड़ता है। जिस तरह सबकी आकृति एक नहीं होती उसी तरह प्रकृति भी एक नहीं होती। कोई तीव्र-बुद्धि का तो कोई मंद-बुद्धि का होता है। अतः ग्रहण करने की क्षमता उसी रूप में होती है। उदाहरण— पिता का अपूर्ण अनुकरण पुत्र ने किया; फिर उसका अपूर्ण अनुकरण उसके पुत्र ने किया। इस तरह कई पीढ़ियों के बाद अनुकरण की अपूर्णता काफ़ी व्यापक हो जाती है। जिसका अनिवार्य प्रभाव भाषा पर पड़ता है।

सादृश्य[सम्पादन]

किसी प्रयोग को देखकर उसके मूल जाने उसी आधार पर प्रयोग कर बैठना सादृश्य के अंतर्गत आता है। कुछ भाषा-विज्ञानी इसे मिथ्या-सादृश्य कहते है। जैसे— असुर का 'अ' भी अज्ञानमूलक परिवर्तन के कारण "अभि-" उपसर्ग का "अ" हिस्सा नय-वाची बन गया है अन्यथा वेदों में तो "असु" अर्थात् "प्राणों" की रक्षा करने वाले को असुर कहा गया है उसका अर्थ देव होता है। जो संस्कृत और हिन्दी दोनों में स्वीकृत हो चुका है। भाषा में परिवर्तन के ये मुख्य प्रयोजन हैं।

सन्दर्भ[सम्पादन]

१. भाषा-विज्ञान की भूमिका — आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा। दीप्ति शर्मा। पृष्ठ: 77-92