भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/भाषा की विशेषताएँ और प्रवृत्तियाँ

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भाषा की विशेषताएँ[सम्पादन]

भाषा-सम्बन्धी कुछ ऐसी विशेषताएँ और प्रवृतियाँ हैं, जो सभी भाषाओं में समान रूप से पायी जाती हैं। व्याकरण के नियम किसी भाषा-विशेष में लागू होते हैं, किन्तु जिन विशेषताओं और प्रवृत्तियों की चर्चा आगे की जायेगी उनका सम्बन्ध भाषा-मात्र से है।

१. भाषा सामाजिक वस्तु है

भाषा की उत्पति समाज से होती है और उसका विकास भी समाज में ही होता है।आरम्भिक पाठ माता ही पढाती है, क्योकि जन्म के बाद जितना सम्बन्ध उससे होता है,उतना समाज के किसी और प्राणी से नहीं । इसलिए उसके ऋण या अभार को स्वीकार करने के लिए मातृभाषा शब्द का प्रयोग कर दिया जाता है। किन्तु जिस भाषा को वह सिखाती है वह समाज की ही सम्पत्ति है, जिसे स्वयं उसने अपनी माता से प्राप्त करता है। अत: समाज को छोडकर भाषा की कल्पना हो ही नहीं सकती । सच पूछिए तो भाषा की उत्पति प्रधानत: सामाजिकता के निर्वाह के लिए ही हुई है।

२. भाषा का प्रवाह अविच्छिन है

मनुष्य के समान भाषा की भी धारा सतत प्रवहमान है। जिस प्रकार उदगम-स्थल से लेकर समुद्र-पर्यन्त नदी की धारा अविच्छिन होती है, वह कहीं भी सूखती या टूटती नहीं , उसी प्रकार जब से भाषा आरम्भ हुई तब से आज तक चली आ रही है और जब तक मानव-समाज रहेगा तब तक इसी प्रकार चलती रहेगी । व्यकि्त उसे अर्जित कर सकता है, उसमें थोडा-बहुत परिवर्तन भी कर सकता है, किन्तु न तो उसे उत्पन कर सकता है और न ही समाप्त कर सकता है।

३. भाषा सर्व-व्यापक है

मनुष्य का समस्त कार्य-कलाप भाषा से परिचालित होता है। व्यकि्त-व्यकि्त का सम्बन्ध या व्यकि्त-समाज का सम्बन्ध भाषा के बिना अक्लपनिय है। संस्कृत के महान भाषाविज्ञानी भर्तृहरि ने कहा है-- संसार में कोई ऐसा प्रत्यय नहीं है जो भाषा के बिना सम्भव हो।

४. '''भाषा सम्प्रेषण का मौखिक साधन है'''

हमने पहले देखा है, सम्प्रेषण के सांकेतिक ,आंगिक , लिखित , आदि अनेक रुप हैं, अर्थात् इनमें से किसी के द्दारा व्यकि्त अपना अभिप्राय दूसरों से प्रकट कर सकता है। यधपि उसके लिखित रूप में आरोह-अवरोह आदि का कोई निर्देश नहीं होता । तो भाषा का सर्वप्रमुख माध्यम यही है कि उसे बोलकर पारस्परिक सम्प्रेषण का काम लिया जाये अर्थात् अपना अभिप्राय दूसरों तक पहुँचाया जाये ।

५. भाषा अर्जित वस्तु है

मनुष्य जिस प्रकार आँख , कान , नाक ,मुँह आदि लेकर उत्पन्न होता है, उसी प्रकार भाषा लेकर नहीं, तात्पर्य कि भाषा जन्मजात वस्तु नहीं है। मनुष्य में पशुओं की अपेक्षा इतनी विलक्षणता और विशिष्टता होती है कि वह भाषा सीख सकता है, पशु नहीं अत: भाषा के अर्जन का अर्थ यही है कि उसे अपने चारों ओर के वातावरण से सीखना पडता है।

६. भाषा परिवर्तनशील है

सृषि्ट की प्रत्येक वस्तु के समान भाषा भी परिवर्तित होने वाली वस्तु है। किसी देश और किसी युग की भाषा ऐसी नहीं रही जो परिवर्तित न हुई हो। अनुकूल और प्रतिकूल परिसि्थतियों के कारण परिवर्तन में मात्रा का अन्तर भले ही हो, परिवर्तन का क्रम अनिवार्य है। यह परिवर्तन भाषा के सभी तत्वों में पाया जाता है। ध्वनि , शब्द , व्याकरण , अर्थ -- इनमें कोई अपरिवर्तित नहीं रहता , परिवर्तन का क्रम ऐसा है जो चतुर्वेदी और उपाध्याय की ज्ञान-गरिमा को भी कुछ नहीं समझता और उन्हें तोड-मरोड देता है।

७. '''प्रत्येक भाषा का ढाँचा स्वतन्त्र होता है'''

प्रत्येक भाषा की बनावट ही नहीं , ढाँचा भी दूसरी भाषा से भिन्न होता है। इसके अनेक कारण हैं, जिनकी चर्चा यहाँ अनपेक्षित है। हिन्दी में दो लिंग हैं, गुजराती में तीन ; हिन्दी में भूतकाल के छ: भेद हैं, रूसी में केवल दो; हिन्दी में दो वचन हैं, संस्कृत में तीन । कुछ भाषाओं में कुछ ध्वनियों का संयोग सम्भव है, पर दूसरी भाषाओं में नहीं । उदाहरणार्थ , अंग्रेजी में स् , ट् ,र जैसे स्टेटा , स्टीट आदि पर जापानी में सम्भव नहीं । रूसी में ह नही होता , ख होता है, अत: नेहरू को नेखरू ही लिख सकते है।

८. '''भाषा भौगोलिक रूप से स्थानीकृत होती है'''

प्रत्येक भाषा की भौगोलिक सीमा होती है अर्थात एक स्थान से दूसरे स्थान में भेद होना अनिर्वाय है। ' चार कोस पर पानी बदले आठ कोस पर बानी ' वाली कहावत में चरितार्थ है। इसी से भाषा में भाषा या बोली का प्रश्न उठता है। यह भाषा का स्वरूपगत भेद भौगोलिक भेद के आधार पर ही हुआ करता है।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भाषाविज्ञान की भूमिका --- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा । दीपि्त शर्मा । पृष्ठ--३८-४४