भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा/भाषा की विशेषताएँ और प्रवृत्तियाँ

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

भाषा-संबंधी कुछ ऐसी विशेषताएँ और प्रवृत्तियाँ हैं, जो सभी भाषाओं में समान रूप से पायी जाती हैं। व्याकरण के नियम किसी भाषा-विशेष में लागू होते हैं, मगर जिन विशेषताओं और प्रवृत्तियों की चर्चा आगे की जाएगी उनका संबंध भाषा-मात्र से है।

भाषा सामाजिक वस्तु है[सम्पादन]

भाषा की उत्पत्ति समाज से होती है और उसका विकास भी समाज में ही होता है। प्रारंभिक पाठ माता ही पढ़ाती है, क्योंकि जन्म के बाद जितना संबंध उससे होता है, उतना समाज के किसी और प्राणी से नहीं। इसलिए उसके ऋण या आभार को स्वीकार करने के लिए मातृभाषा शब्द का प्रयोग कर दिया जाता है। किंतु जिस भाषा को वह सिखाती है वह समाज की ही संपत्ति है, जिसे स्वयं उसने अपनी माता से प्राप्त करता है। अतः समाज को छोड़कर भाषा की कल्पना हो ही नहीं सकती। सच पूछिए तो भाषा की उत्पत्ति प्रधानतः सामाजिकता के निर्वाह के लिए ही हुई है।

भाषा का प्रवाह अविच्छिन्न है[सम्पादन]

मनुष्य के समान भाषा की भी धारा सतत प्रवहमान है। जिस प्रकार उदगम-स्थल से लेकर समुद्र-पर्यंत नदी की धारा अविच्छिन्न होती है, वह कहीं भी सूखती या टूटती नहीं, उसी प्रकार जब से भाषा आरंभ हुई तब से आज तक चली आ रही है और जब तक मानव-समाज रहेगा तब तक इसी प्रकार चलती रहेगी। व्यक्ति उसे अर्जित कर सकता है, उसमें थोडा-बहुत परिवर्तन भी कर सकता है, मगर न तो उसे उत्पन्न कर सकता है और न ही समाप्त कर सकता है।

भाषा सर्व-व्यापक है[सम्पादन]

मनुष्य का समस्त कार्य-कलाप भाषा से परिचालित होता है। व्यक्ति-व्यक्ति का संबंध या व्यक्ति-समाज का संबंध भाषा के बिना अकल्पनीय है। संस्कृत के महान भाषाविज्ञानी भर्तृहरि ने कहा है, "संसार में कोई ऐसा प्रत्यय नहीं है जो भाषा के बिना संभव हो।"

भाषा संप्रेषण का मौखिक साधन है[सम्पादन]

हमने पहले देखा है, संप्रेषण के सांकेतिक, आंगिक, लिखित, आदि अनेक रुप हैं, अर्थात् इनमें से किसी के द्दारा व्यक्ति अपना अभिप्राय दूसरों से प्रकट कर सकता है। यद्यपि उसके लिखित रूप में आरोह-अवरोह आदि का कोई निर्देश नहीं होता। तो भाषा का सर्वप्रमुख माध्यम यही है कि उसे बोलकर पारस्परिक संप्रेषण का काम लिया जाए अर्थात् अपना अभिप्राय दूसरों तक पहुँचाया जाए।

भाषा अर्जित वस्तु है[सम्पादन]

मनुष्य जिस प्रकार आँख, कान, नाक, मुँह आदि लेकर उत्पन्न होता है, उसी प्रकार भाषा लेकर नहीं, तात्पर्य कि भाषा जन्मजात वस्तु नहीं है। मनुष्य में पशुओं की अपेक्षा इतनी विलक्षणता और विशिष्टता होती है कि वह भाषा सीख सकता है, पशु नहीं अतः भाषा के अर्जन का अर्थ यही है कि उसे अपने चारों ओर के वातावरण से सीखना पड़ता है।

भाषा परिवर्तनशील है[सम्पादन]

सृष्टि की प्रत्येक वस्तु के समान भाषा भी परिवर्तित होने वाली वस्तु है। किसी देश और किसी युग की भाषा ऐसी नहीं रही जो परिवर्तित न हुई हो। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण परिवर्तन में मात्रा का अंतर भले ही हो, परिवर्तन का क्रम अनिवार्य है। यह परिवर्तन भाषा के सभी तत्वों में पाया जाता है। ध्वनि, शब्द, व्याकरण, अर्थ — इनमें कोई अपरिवर्तित नहीं रहता, परिवर्तन का क्रम ऐसा है जो चतुर्वेदी और उपाध्याय की ज्ञान-गरिमा को भी कुछ नहीं समझता और उन्हें तोड़-मरोड़ देता है।

प्रत्येक भाषा का ढाँचा स्वतंत्र होता है[सम्पादन]

प्रत्येक भाषा की बनावट ही नहीं, ढाँचा भी दूसरी भाषा से भिन्न होता है। इसके अनेक कारण हैं, जिनकी चर्चा यहाँ अनपेक्षित है। हिन्दी में दो लिंग हैं, गुजराती में तीन ; हिन्दी में भूतकाल के छः भेद हैं, रूसी में केवल दो; हिन्दी में दो वचन हैं, संस्कृत में तीन। कुछ भाषाओं में कुछ ध्वनियों का संयोग संभव है, पर दूसरी भाषाओं में नहीं। उदाहरणार्थ, अंग्रेजी में स्, ट्, र, जैसे स्टेटा, स्ट्रीट आदि पर जापानी में संभव नहीं। रूसी भाषा में "ह" नहीं होता, "ख" होता है, अतः "नेहरू" को "नेख़रू" ही लिख सकते है।

भाषा भौगोलिक रूप से स्थानीयकृत होती है[सम्पादन]

प्रत्येक भाषा की भौगोलिक सीमा होती है अर्थात एक स्थान से दूसरे स्थान में भेद होना अनिर्वाय है। 'चार कोस पर पानी बदले आठ कोस पर बानी' वाली कहावत में चरितार्थ है। इसी से भाषा में भाषा या बोली का प्रश्न उठता है। यह भाषा का स्वरूपगत भेद भौगोलिक भेद के आधार पर ही हुआ करता है।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. भाषाविज्ञान की भूमिका — आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा। दीपि्त शर्मा। पृष्ठ: 38-44