भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा/भाषा के विकास-सोपान

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आंगिक भाषा[सम्पादन]

विकासवाद के अनुसार मनुष्य भी एक दिन अन्य पशुओं की कोटि का ही जीव था, अर्थात् उसकी कोशिशें पशुओं-जैसी ही होती थीं। भाषा नाम की वस्तु उसे उपलब्ध नहीं थी और वह आंगिक कोशिशों या इंगितों की सहायता से अपनी बात अपनी योनि के दूसरे सदस्यों तक पहुँचता था। मनुष्य अपनी प्रारंभिक अवस्था में अन्य पशुओं की अपेक्षा अधिक बुद्धि-संपन्न था, इसमें कोई संदेह नहीं। बंदर आनंद के समय किलकारी भरते हैं, क्रोध के समय किटकिटाते हैं, मनुष्य भी ऐसे कोशिशें करता होगा, क्योंकि तब तक उसमें वाणी का विकास नहीं हुआ था। आंगिक कोशिशें भाव के घातक रहे हैं, क्योंकि वह जीवन-निवाह के सीमित था।

वाचिक भाषा[सम्पादन]

आंगिक भाषा से आगे बढ़कर वाचिक भाषा तक पहुँचना मानव-इतिहास की क्रांतिकारी उपलब्धि थी। जहाँ आंगिक भाषा इने-गिने स्थूल-इंगितों तक ही सीमित थी, वहाँ वाचिक भाषा भाव और विचार के संप्रेषण की असीम संभावनाओं से संपन्न थी। मनुष्य की वृतियों केवल खाने-पीने तक सीमित नहीं रहीं वह भाषा की सहायता से सूक्ष्म-से सूक्ष्म बातें दूसरों तक पहुँचाने में समर्थ हो गया; उसके चिंतन और विचार की परिधि इतनी विस्तृत हो गई कि उसमें भूगोल, खगोल, सब अँट गए।

लिखित भाषा[सम्पादन]

साहित्य, विज्ञान, कला के क्षेत्र में मनुष्य की समस्त बौद्धिक उपलब्धियों का सबसे बड़ा आधार लिपि या भाषा का लिखित रूप है। वाचिक भाषा कान की भाषा थी, किंतु लिपि के अविष्कार के बाद आँख की भी एक भाषा बन गयी अब तो लिपि का विकास नेत्र की सीमा पार कर गया और नेत्रहीनों के लिए ब्रेल लिपि बन गई। लिपि के कारण ही, आज हजारों वर्ष पहले आविभूत व्यास, वाल्मीकि, कालिदास, आदि की रचनाएँ हमें उपलब्ध हैं। किंतु मनुष्य लिपि की इस क्रांतिकारी उपलब्धि से भी तृप्त नहीं हुआ।

यांत्रिक भाषा[सम्पादन]

लिपि में स्थायित्व भले ही हों, उसकी सबसे बड़ी सीमा यह थी कि भाषा का रूप उसमें निर्जीव हो जाता है। आज बहुत बार यह इच्छा होती है कि कालिदास, विधापति या सूर के मुख से ही हम उनकी कविता का पाठ सुन पाते, किंतु लिपि उनकी वाणी को प्रस्तुत करने में अक्षम है। भाषा की इस निर्जीवता को दूर करने के प्रयास से यांत्रिक भाषा का प्रादुभाव हुआ। आज नाना प्रकार के रिकाडिंग यंत्रों के द्वारा हम किसी की ध्वनि को अनंत काल तक के लिए सुरक्षित रख सकते हैं। महात्मा गाँधी को दिवंगत हुए बावन वर्ष हो गए, किंतु आज भी उनकी वाणी टेपरिकाडर, आदि की सहायता से उसी रूप में हमारे कानों में गूँज उठती है जिस रूप में उनके जीवन-काल में गूँजती थी।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. भाषाविज्ञान की भूमिका — आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा। दीप्ति शर्मा। पृष्ठ: 27-30