भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/भाषा के विभिन्न रूप

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भाषा के विभिन्न रूप[सम्पादन]

जितने व्यकि्त हैं, उतनी भाषाएँ है; कारण किन्हीं दो व्यकि्तयों के बोलने का ढंग एक नहीं होता । वस्तुत: प्रेमचन्द की भाषा प्रसाद से भिन्न है और पन्त की निराला से। हिन्दी का प्रयोग तो यों सभी करते है; फिर यह अन्तर क्यों ? यह इसलिए कि उस भाषा के पिछे उनका व्यकि्तत्व है। व्यकि्तत्व का प्रभाव शिक्षित व्यकि्तयों की ही भाषा में नहीं , बलि्क अशिक्षितों की भाषा में पाया जाता है। अत: वक्ता के भेद से भाषा के अनेक रूप हो जाते हैं। उदाहरणार्थ-- शिक्षा , संस्कृति , व्यवसाय , वातावरण , पर्यावरण आदि। हमने देखा भाषा के तीन रूप होते हैं -- वाणी , भाषा ,अधिभाषा;किन्तु दो व्यवहारिक है उन पर विचार किया जा सकता है।

१.परिनिष्ठित भाषा

भाषा का आदर्श रूप वह है जिसमें वह एक वृहत्तर समुदाय के विचार-विनिमय का माध्यम बनती है, अर्थात् उसका प्रयोग शिक्षा , शासन , और साहित्य-रचना के लिए होता है। हिन्दी , अंग्रेजी , रूसी , फ्रांसीसी इसी क्षेणी की भाषाएँ हैं। भाषा के इस रूप को मानक , आदर्श या परिनिष्ठित कहते हैंँ, जो अंग्रेजी के 'स्टैंडर्ड' शब्द का रूपान्तर है। परिनिष्ठित भाषा विस्तृत क्षेत्र में प्रयुक्त और व्याकरण से नियन्त्रित होती है।

२.विभाषा (बोली)

एक परिनिष्ठित भाषा के अन्तर्गत अनेक विभाषाएँ या बोलियाँ हुआ करती हैं। भाषा के स्थानीय भेद से प्रयोग-भेद में जो अन्तर पडता है, उसी के आधार पर विभाषा का निर्माण होता है। ऐसी सि्थति में यह असम्भव है कि बहुत दूर तक भाषा की एकरूपता कायम रखी जा सके । स्वभावत: एक भाषा में भी कुछ दूरी पर भेद दिखायी देने लगता है। यह स्थानिय भेद , जो मुख्तत: भौगोलिक कारणों से होता है।

उदाहरणार्थ --

खडी बोली -- जाता हूँ ।

ब्रजभाषा -- जात हौं।

भोजपुरी -- जात हईं ।

अत: स्थानीय भेद को विभाषा कहते हैं।

३.अपभाषा

भाषा में ही जब सामाजिक दृष्टि से ऐसे प्रयोग आ जाते हैं, जो शिष्ट रूचि को अग्राह्म प्रतीत होतें हैं तो उनको अपभाषा कहतें हैं। अंग्रेजी में स्लैंग कहते हैं। नवीनता , विनोद , उच्छृंखलता ,संस्कारहीनता आदि अनेक अभाषा हैं। समान्यत: अपभाषा शिष्ट भाषा में ग्रहण नहीं होता है,किन्तु कोई प्रयोग बहुत चल पडता है तो वह शिष्ट भाषा बन जाती है।

४.विशिष्ट ( व्यावसायिक )

समाज कोई अरूप वस्तु नहीं है। व्यकि्त सामाजिक प्राणी कहा जाता है तो समाज के किसी विशिष्ट रूप को ध्यान में रखकर । समाज में उसकी कोई-न-कोई सि्थति होती है, वह कोई-न-कोई काम करता है। व्यवसाय के अनुसार अनेक क्षेणियाँ बन जाती है; जैसे -- किसान , लोहार , बढई , जुलहा ,दर्जी , कुमहार डाँक्टर, वकील आदि। इन सभी व्यवसायों की अलग-अलग शब्दावली होती है। और उनका व्यवसाय उसी की शब्दावली में चलती है। आप किसी की भाषा सुनकर आसानी से निर्णय कर सकते है।

५.कूटभाषा

भाषा की सामान्यत: विशेषता अपनी बात को दूसरों तक पहुँचाने का माध्यम है अर्थात् भाषा का प्रयोग अभिव्यज्जना के लिए होता है, किन्तु भाषा का एक और उपयोग संसार में जितना मिथ्या-भाषण होता है, वह सब किसी-न-किसी बात को छिपाने के लिए ,अगर छिपना उद्देश्य नहीं होता तो मिथ्या-भाषण की कोई आवश्यकता न थी। कूट-भाषा के दो प्रमुख प्रयोजन हैं--१) मनोरंजन २) गोपन । कविता में कूट भाषा का प्रयोग मनोरंन के लिए और अपराधी , चोर , विद्रोही या गुप्तचर गोपन के लिए करते है।

६.कृत्रिम भाषा

कृत्रिम भाषा उसे कहतें हैं जो स्वाभाविक रूप से विकसित नहीं होता बलि्क गढकर बनाया जाता है। संसार में भाषाओं की अधिकता के कारण बोधगम्यता में में बडी बाधा पडती है और जब तक एक-दूसरे की भाषाएँ जाने परस्पर बात करना असम्भव है। राजनीति ,वाणिज्य, व्यवसाय , भ्रमण जैसी असुविधाओं को दूर कर अन्तरराष्टीय व्यवहार के लिए एक सामान्य भाषा प्रस्तुत करना ही कृत्रिम भाषा के आविष्कार का उद्देश्य है। अत: कृत्रिम भाषा को अन्तरराष्टीय भाषा भी कहते है। 'एसपेरांतो' संसार की एक कृत्रिम भाषा है।

७.मिक्षि्त भाषा

हलके-फुलके व्यापारिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए अनेकत्र मिक्षि्त्र भाषा का उपयोग होता है। उदाहरणार्थ -- पिजिन (Pidgin) इंगि्लश का प्रयोग चीन में होता है। पिजिन इंगि्लश में शब्द अंग्रेजी के रहते हैं, किन्तु ध्वनि-प्रक्रिया और व्याकरण चीनी है।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भाषाविज्ञान की भूमिका --- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा ।दीपि्त शर्मा । पृष्ठ - ४५-५२