भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा/रूप-परिवर्तन के कारण और दिशाएँ

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रूप-परिवर्तन के कारण[सम्पादन]

भाषा का प्रमुख गुण हैं परिवर्तन। अतः उसके अवयव-ध्वनि, अर्थ, पद, वाक्य में विभिन्न परिस्थितियों के कारण समय-समय पर परिवर्तन लक्षित होते हैं। उन परिवर्तन के अनेक कारण होते हैं। ये कारण संक्षेप में निम्नांकित हैं—

  1. एकरूपता: यह प्रवृत्ति अनेक भाषाओं में मिलती हैं। संस्कृत में अक्रांत शब्द अधिक है। उक्रांत, इक्रांत तथा व्यंजनात्मक शब्द कम हैं। अक्रांत शब्द ही अधिक स्थिर व प्रभावशाली हैं। प्रकृत में अक्रांत शब्दों का बाहुल्य है। संस्कृत के 'अग्ने' के स्थान पर प्राकृत में 'अग्गिस्स' मिलता हैं। हिन्दी की बोलियों में भी एकरूपता की प्रवृत्ति पाई जाती हैं।
  2. सादृश्य: एकरूपता की इस प्रवृत्ति के मूल में सादृश्य की भावना है। अनेक समान शब्दों के रहते हुए असमान शब्दों का प्रयोग अनुचित होता हैं। मानव इस स्थिति से बचने के लिए सादृश्य का प्रयोग करता है। संस्कृत में नपुंसकलिंग था अप्रभंश काल में नपुंसकलिंग के रूप भी पुल्लिंग के समान बन गए। परिणाम यह हुआ कि नपुंसलिंग समाप्त हो गया। अरबी-फारसी के संपर्क के कारण हिन्दी के अनेक शब्द स्त्रीलिंग हो गए हैं, जैसे: "आय", "आयु", "आत्मा", आदि।
  3. सरलता: आज का मनुष्य सरलता का आग्रही हो गया है। मनुष्य कम-से-कम प्रयत्न में अधिकाधिक लाभ चाहता है। अतः अपने मुख की सुविधा के लिए वह अपवादों को निकालकर उनके स्थान पर नियम के अनुसार चलने वाले रूपों को याद रखना चाहता है। जिस प्रकार ध्वनियों के उच्चारण में प्रयत्न-लाघव काम करता है, उसी प्रकार रूप प्रयोग में चयन के अवसर पर सरलता का अधिक आग्रह करता है। जैसे: आदित्य, सूर, सूरज, सूर्य, भास्कर इत्यादि शब्दों में से सूर्य और सूरज सरलता के कारण अधिक ग्राह्य है।
  4. अनेकरूपता: इस प्रवृत्ति के कारण भी पद-परिवर्तन होता है। शब्दों की समानता भ्रम में डाल देती है। अतः इस भ्रमात्मक स्थिति के निराकरण के लिए अनेकरूपता का सहारा लेना पड़ता है। प्राकृत में ध्वनि-विकास के कारण 'पुत्राः' और 'पुत्राम्' से 'पुत्रा' बना।
  5. नवीनता का आग्रह: मनुष्य एक ओर यदि परम्परा-प्रमी है तो दूसरी ओर नवीनता का आग्रही भी। सदा परम्परा से लिपटे रहना उसे स्वीकार नहीं होता। यदि नवीनता का आग्रह न हो तो भाषा में ही क्या, किसी वस्तु में परिवर्तन नहीं हो सकेगा। उसी नवीनता के आग्रह के फलस्वरूप भाषा में नए पदों की रचना होती हैं। जैसे- कल्पना से परि-कल्पना, प्रयोग से संप्रयोग, रचना से संरचना आदि।
  6. बल: बल देने के प्रयास में भी रूपों में परिवर्तन हो जाता है और नए पदों का जन्म होता है। बल के कारण ही 'अनेक' शब्द आज बहुवचन रूप 'अनेकों' में और 'खालिस' के स्थान पर 'निखालिस' प्रयुक्त हो रहा है।
  7. अज्ञान:- अज्ञानता के कारण भी कभी-कभी नए रूपों का निर्माण हो जाता है। कभी लोग अज्ञानता के कारण शब्दों का प्रयोग करते हैं और प्रचलित हो जाने के कारण मूल रूप भूल जाते हैं। और जो परिवर्तित नया रूप सामने आता है वह चल पड़ता है। उदाहरणस्वरूप, 'फजूल' के स्थान पर 'बेफज़ुल', कृपणता के स्थान पर कृपणताई, और 'अभिज्ञ' के स्थान पर 'भिज्ञा' आदि।

रूप-परिवर्तन की दिशाएँ[सम्पादन]

रूप-परिवर्तन की तीन दिशाएँ मानी जाती हैं: पद का आगम, पद का लोप और पद का विपर्यय।

  1. पद का आगम: बोलते समय शब्द के आगे तो कभी पीछे कोई सार्थक व निरर्थक शब्द आ जाता है। कालांतर में ऐसे शब्द लेखन और व्यवहार में प्रयुक्त हो जाते हैं। जैसे—'कोलेज-वोलेज', 'रोटी-वोटी', 'लड़की-वड़की', आदि।
  2. पद का लोप: कभी उच्चारण में तो कभी लेखन में हम कतिपय पदों का लोप कर देते हैं। कृतियों के नामों और व्यक्तियों के नामों के साथ यह प्रवृति अधिक दिखाई देती है। यथा— 'इंदु शेखर' को 'इंदु' या 'शेखर' तथा 'पृथ्वीराज रासो' को 'रासों' नाम से कहने लगते हैं।
  3. पद-विपर्यय: इसमें पदों का भिन्न अर्थों में प्रयोग होता है। एक भाषा का शब्द उसी रूप में, पर दूसरे अर्थ में दूसरी भाषा में प्रयुक्त होते हैं तब विपर्यय कहते हैं। जैसे— अंग्रेज़ी का एक शब्द "glass" काँच को कहते हैं, पर हिन्दी में 'गिलास' काँच के बने पात्र को कहते हैं। आज तो हम स्टील या पीतल से बने पात्र को भी ग्लास कहने लगते हैं।