भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/वाक्यविज्ञान और उसके भेद

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वाक्यविज्ञान[सम्पादन]

वाक्यविज्ञान भाषाविज्ञान की वह शाखा है, जिसमें पदों के पारस्परिक सम्बन्ध का विचार किया जाता है। ध्वनि का सम्बन्ध भाषा के उच्चारण से है, उसमें जब सार्थकता का समावेश हो जाता है तो वह परस्पर अन्वय का योग्य बन जाता है तो उसे पद कहते है। पद ध्वनि और वाक्य के बीच संयोजक कड़ी है क्योकि उसमें उच्चारण और सार्थकता दोनों का योग होता है,किन्तु न तो ध्वनि की तरह वह केवल उच्चारण है और न ही पूर्णता सार्थक। पदविज्ञान में पदों की रचना पर विचार होता है , अर्थात- संज्ञा, क्रिया, विशेषण, कारक, लिंग, वचन, पुरूष, काल आदि लेकिन पदों का कहाँ , कैसे प्रयोग होगा इसका विषय वाक्यविज्ञान है। अत: पद और वाक्य के सम्बन्ध में दो सिध्दान्त है, अन्विताभिधानवाद का कहना है कि पदों को जोड़ने से वाक्य बनता है जबकि अभिहितान्वयवाद का कहना है कि वाक्य को तोड़ने से पद बनते है। आधुनिक भाषाविज्ञान अन्विताभिधानवाद का समर्थक है उनका कहना है कि 'भाषा की न्यूनतम पूर्ण सार्थक इकाई वाक्य है। लेकिन अर्थ की दृष्टि से वाक्य कभी पूर्ण नहीं होता जैसे-- 'उसने उससे वह बात कह दी। यह बात पूर्ण रूप अपनी बात कहने में असमर्थ है। फिर कामचलाऊ परिभाषा-- " वाक्य भाषा की वह सहज इकाई है जिसमें एक या अधिक शब्द (पद) होते होते है तथा अर्थ की दृष्टि से पूर्ण हो या अपूर्ण , व्याकरणिक दृष्टि से अपने विशिष्ट संदर्भ में अवश्य पूर्ण होती है, साथ ही उसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कम-से-कम एक समापिका क्रिया अवश्य होती है। अत: वाक्य निष्पति के लिए तीन चीजे़ अपेक्षित हैं-- १) आकांक्षा २) योग्यता ३) आसत्ति।

वाक्य के भेद[सम्पादन]

विभिन्न आधारों पर वाक्य के अनेक भेद होते हैं--

१. क्रिया के अनुसार

भाषा में क्रिया का स्थान प्रमुख है। वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में वाक्य में अवश्य वर्तमान रहती है। संसकृत , लैटिन, आदि पुरानी भाषाओं में तथा बंगला,रूसी आधुनिक भाषाओं में बिना क्रिया के भी वाक्य मिलते है,किन्तु सामान्यत: वाक्य क्रियायुक्य होता है। इस प्रकार क्रिया के होने न होने के आधार पर दो प्रकार के होते है-- १) क्रियायुक्त २) क्रियाहीन ।

१) क्रियायुक्त वाक्य:- जिसमें क्रिया हो । अधिकांश भाषाओं में वाक्य इसी प्रकार के होते है। (क)हिन्दी,अंग्रेजी आदि में सहायक क्रिया के बिना काम नहीं चल सकता। हिन्दी या अंग्रेजी में बिना 'है' या 'इज' का प्रयोग किये वाक्य अधूरा लगता है। जैसे- 'यह मेरी पुस्तक' या 'दिस माइ बुक' खटक जाता है। 'यह मेरी पुस्तक है, या 'दिस इज माइ बुक' कहने पर आकांक्षा पूर्ण निवृति होती है। (ख) बहुत सारे मुहावरे ऐसे हैं जिनमें क्रिया का प्रयोग नही होता जैसे- जिसकी लाठी उसकी भैंस, जैसी करनी वैसी भरनी आदि। (ग) एक पद वाले वाक्यों में जैसे- साँप, भूकम्प, आग । (घ) प्रश्न वाले वाक्य- तुम कहाँ जा रहे हो? -- दिल्ली।

२. रचना के अनुसार

रचना के अनुसार वाक्य के तीन भेद हैं- १) सरल २) संयुक्त ३) मिश्र।

१) सरल:- जिसमें एक उद्देश्य और एक विधेय अर्थात एक संज्ञा और एक क्रिया होती है; जैसे- लड़का पढ़ता है।

२) संयुक्त:- इसमें अनेक प्रधान उपवाक्य होते हैं जिनके साथ अनेक आश्रित उपवाक्य रहते हैं; जैसे - जिस दिन भगवान् ने आलू का निर्माण किया होगा,उस दिन उसे यह गुमान भी नहीं हुआ होगा।

३)मिश्र:- जिसमें एक मुख्य उपवाक्य रहता है,किन्तु आश्रित उपवाक्य एक या अनेक हो सकते है; जैसे- जो विद्दान होता है,उसका सर्वत्र सदा आदर होता है।

३.अर्थ के अनुसार

अर्थ के अनुसार वाक्य के आठ भेद माने जाते हैं- १) विधि वाक्य २) निषेध-वाक्य ३) प्रश्न-वाक्य ४) अनुज्ञा-वाक्य ५) इच्छार्थक-वाक्य ६) सन्देहार्थक-वाक्य ७) संकेतार्थक-वाक्य ८) विस्मयादिबोधक-वाक्य।

४.शैली के अनुसार

शैली के अनुसार वाक्य के तीन भेद होते हैं- १) शिथिल २) समीकृत ३) आवर्तक। इन तीनों भेदों के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा खींचना सम्भव नहीं है। फिर भी ये भेद व्यावहारिक उपयोग के हैं।

१) शिथिल वाक्य:- इसमें वक्ता एक के बाद दूसरी बात, उन्मुक्त भाव से कला का सहरा लिए कहता चलता है, जैसे- 'अयोध्या सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी थी। हम जिस समय के बात कह रहे हैं उस समय महाराज दशरथ अयोध्या के राजा थे।'

२) समीकृत वाक्य:- यह संगीत और संतुलन की नैसर्गिक, मानवीय इच्छा की पूर्ति करता है। जैसे - राजा,वैसी प्रजा ; जिसकी लाठी,उसकी भैंस आदि।

३.आवर्तक वाक्य:- इसमें चरम सीमा अन्त में आती है। श्रोता या पाठक उत्सुकतापूर्वक प्रतिक्षा करता रहता है और तब उसके सामने वह बात आती है जो वक्ता या लेखक उसे बताना चाहता है, इस शैली के वाक्य वक्ताओं या नेताओं अधिक करते है। जैसे-- 'यदि हम चाहते हैं कि हमारी स्वतन्त्रता सुरक्षित रहे , यदि हम चाहते हैं कि हमारी सीमा की ओर देखने की भी हिम्मत शत्रु को न हो आदि।

अत: वाक्य का प्रयोग करते समय एक साथ चिन्तन, उपयुक्त पद का चयन, व्याकरणिक गठन और उच्चारण का ध्यान रखना पड़ता है। चूँकि वाक्य भाषा की प्रमुख इकाई है, इसलिए ध्यान भी उस पर सबसे अधिक देना उचित हैँ।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भाषाविज्ञान की भूमिका --- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा । दीप्ति शर्मा। पृष्ठ--२४१-२५२

२. भाषा विज्ञान -- र्डॉ० भोलानाथ तिवारी। प्रकाशक--किताब महल, पुर्नमुद्रण--२०१७ पृष्ठ--२३३