भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/संसार की भाषाओं का वर्गीकरण

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संसार की भाषाओं का वर्गीकरण[सम्पादन]

संसार में जितनी भाषाएँ बोली जाती हैं उनकी निशि्चत संख्या ज्ञात नहीं हैं, किन्तु अनुमान किया जाता है कि 3,000 के लगभग भाषाएँ हैं। वस्तुत: भाषाओं की निशि्चत संख्या बताना असम्भव है, क्योंकि यह वही बता सकता है जो सारी भाषाओं को जानता हो और एक भाषा से दूसरी भाषा के अन्तर से परिचित हो। वर्गीकरण से किसी वस्तु के अध्ययन में सहयता मिलती है। संसार की भाषाओं के वर्गीकरण के कई आधार हो सकते हैं, किन्तु भाषाविज्ञान की दृषि्ट से दो ही अधार माने गये हैं--- १) आकृतिमूलक और २) पारिवारिक ।

आकृतिमूलक वर्गीकरण[सम्पादन]

आकृतिमूलक वर्गीकरण का सम्बन्ध अर्थ से नहीं होता; उसका सम्बन्ध शब्द की केवल बाह्म आकृति या रूप या रचना- प्रणाली से होता है। इसलिए इस वर्गीकरण में उन भाषाओं को एक साथ रखा जाता है जिनके पदों या वक्यों की रचना का ढंग एक होता है। पद या वाक्य की रचना को ध्यान में रखकर इस वर्गीकरण को पदात्मक या वाक्यात्मक भी कहते है। अंग्रेजी में इसे Morphological कहते हैं। आकृतिमूलक के दो प्रमुख भेद हैं-- १) अयोगात्मक और २) योगात्मक ।

१) अयोगात्मक :- अयोगात्मक भाषा उसे कहते हैं जिसमें प्रकृति-प्रत्यय जैसी कोई चीज नहीं होती है और न शब्दों में कोई परिवतन होता है। प्रत्येक शब्द की स्वतन्त्र सत्ता होती है और वाक्य में प्रयुक्त होने पर भी वह सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है। इसलिए इस वर्ग की भाषा में शब्दों का व्याकरणिक विभाजन नहीं होता अर्थात् संज्ञा , सवनाम , विशेषण , क्रिया-विशेषण , आदि कोटियाँ नहीं होती ।

उदाहरण--

राम बीट्स श्याम । श्याम बीट् राम ।

इन दोनों वाक्यों के शब्दों में कोई अन्तर नहीं है; केवल स्थान बदल दिया गया है। पहले वाक्य में राम कर्ता और श्याम कर्म है, किन्तु दुसरे वाक्य में केवल स्थान बदल जाने से ही श्याम कर्ता और राम कर्म हो गया है।


२) योगात्मक :- योगात्मक शब्द से स्पष्ट है, इस वर्ग की भाषाओं में प्रकृति-प्रत्यय के योग से शब्दों की निष्पति होती है। योगात्मक के तीन प्रमुख भेद हैं-- १) अशि्लष्ट योगात्मक २) शि्लष्ट योगात्मक ३) प्रशि्लष्ट योगात्मक ।

१. अशि्लष्ट योगात्मक :- अशि्लष्ट योगात्मक भाषाओं में अर्थतत्व के साथ रचनातत्व का योग होता है। इस वर्ग की भाषा तुर्की है।

२. शि्लष्ट योगात्मक :- शि्लष्ट योगात्मक वर्ग में वे भाषाएँ आती हैं जिनमें रचनात्मक के योग से अर्थातत्व वाले अंश में कुछ परिवर्तन हो जाता है, जैसे -- नीति , वेद ।

३. प्रशि्लष्ट योगात्मक :- प्रशि्लष्ट योगात्मक भाषा वह है जो जिसमें अर्थातत्व और रचनातत्व का ऐसा मिक्षण हो जाता है कि उनका पृथक्करण सम्भव नहीं होता । इस वर्ग की भाषाओं में अनेक अर्थतत्वों का थोडा-थोडा अंश कटाकर एक शब्द बन जाता है। जैसे - जिगमिषति = वह जाना चाहता है।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भाषाविज्ञान की भूमिका --- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा । दीपि्त शर्मा । पृष्ठ -- ९३- १०४

पारिवारिक वर्गीकरण[सम्पादन]

भाषाओं का एक अन्तरंग सम्बन्ध भी है जो केवल बाह्म रचना तक ही सीमित नहीं , बलि्क अर्थ को आधार बनाकर चलता है। जिस प्रकार एक पूवज से उत्पन सभी मनुष्य एक गोत्र के माने जाते हैं, उसी प्रकार एक भाषा से कालान्तर में अनेक सगोत्र भाषाओं की उत्पति भी होती है जो एक परिवार में रखी जाती हैं। अत: यहाँ उत्पति का अर्थ सहसा आविभाव नहीं , बलि्क क्रमिक विकास समझना चाहिए ।

हमने देखा है कि केवल रचनातत्व के आधार पर भाषा का जो वर्गीकरण होता है वह आकृतिमूलक वर्गीकरण है, पर रचनातत्व और अर्थतत्व के समि्मलित आधार पर किया गया वग्रीकरण पारिवारिक वग्रीकरण कहलाता है। भाषाओं के परिवार-निधारण के लिए निम्नलिखित बातों पर विचार करना होता है-- १) ध्वनि ; २) पद-रचना ; ३) वाक्य-रचना ; ४) अर्थ ; ५) शब्द-भण्डार , ६) स्थानिक निकटता । इन छ: आधारों पर भाषाओं की परिक्षण करने पर कहा जा सकता है कि वे एक परिवार की हैं या नहीं। विश्व में जो भाषाएँ अधिकृत रूप से जानी जाती हैं उन्हें मुख्यत: बारह परिवारों में विभाजित किया गया है--

१) सेमेटिक कुल :--- हजरत नोह के सबसे बडे पुत्र 'सैम' के नाम के अनुसार इस परिवार का नामाभिधान हुआ है। इस कुल की भाषाओं का क्षेत्र फिलिस्तीन , अरब, इराक, मध्य एशिया तथा मिस्त्र, इथोपिया, अल्जीरिया, मोरोक्को तक माना जाता है। यहूदियों की प्राचीन भाषा हिब्रू तथा अरबी इसी परिवार की भाषाएँ हैं।

२) हेमेटिक परिवार :--- हामी परिवार को ही हेमेटिक परिवार कहा जाता है। इस परिवार की प्रमुख भाषाओं में कुशीन , लीबीयन , सोमाली तथा हौंसा आदि

३) तिब्बती- चीनी कुल :--- नाम से ही स्पष्ट है कि तिब्बत तथा चीन में इसकी प्रधानता है। जापान को छोडकर अन्य सभी बौध्य धर्मावलम्बी देश-तिब्बत , चीन , ब्रह्मदेश , स्याम में इस परिवार की भाषाएँ बोली जाती है।

४) युराल-अल्ताई परिवार:--- इस भाषा परिवार का लोगों के युराल तथा अल्ताई पवतों में निवास करने के कारण यह नामाभिधान हुआ है। इस परिवार की भाषाएँ चीन के उत्तर में मंचूरिया, मंगोलिया, साइबेरिया आदि तुर्की, तातारी,मंचू, मंगोली, किरगिज प्रमुख भाषाएँ हैं।

५) द्रविड परिवार:--- द्रविड जाति द्दारा बोली जाने वाली समस्त भाषाओं का सामूहिक नाम द्रविड परिवार है। इस कुल की भाषाएँ बोलने वाले मुख्य रूप से दक्षिण भारत तथा लक्षद्दीप के निवासी हैं। इस कुल की मुख्य भाषाएँ -- तमिल , मलायाम , तेलुगु तथा कन्नड ।

६) आस्टोनेशिया कुल :--- इस परिवार की प्रमुख भाषाओं में इंडोनेशिया की मलय, फिजी की फिजीयन, जावा की जावानीज तथा न्यूजीलैण्ड की मओरी आदि।

७) बाँटु परिवार :--- बाँटु का अर्थ - मनुष्य ।' बाँटु ' अफ्रिका खण्ड का भाषा परिवार है। इस परिवार की मुख्य भाषाओं में जुलु, काफिर , सेंसतों, स्वाहिलि आदि ।

८) काकेशीय कुल :--- कैसि्पयन सागर के मध्य काकेशस पहाड के निकटवर्ती प्रदेश इस कुल की भाषाएँ हैं। मुख्य भाषा -- जार्जियन ।

९) अमेरिकी भाषा-परिवार :--- यह उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका के मूल निवासियों की करिब चार सौ भाषाएँ आती हैं, कुकूचुला और गुअर्नी प्रमुख हैं।

१०) फिनी उग्रिक कुल :--- यह क्षेत्र हंगेरी , फिनलैण्ड , एस्थोनिया , लेयलैण्ड आदि प्रमुख भाषाएँ फिनी , हंगोरियन हैं।

११) एसि्कमो भाषा कुल :--- ग्रीनलैण्ड तथा एलुशियन द्दीपमाला का प्रदेश आते है। जिसका सम्बन्ध उत्तरी अमेरिका से जुडा है।

१२) भारोपीय परिवार :--- यह परिवार भारत से यूरोप तक फैला है। इसलिए इसे भारोपीय, परिवार कहा गया है। इस परिवार को ' आर्य परिवार ' तथा ' इण्डो-यूरोपियन ' परिवार के नामों से भी जाना जाता है। यह परिवार विश्व के सभी भाषा-परिवारों से अधिक बडा होने के साथ अत्यन्त समृध्द एवं उन्नत मानी जाती हैं। समस्त यूरोप , अफगानिस्तान , ईरान , नेपाल , रूष तथा दक्षिण भारत को छोडकर शेष सभी भारतवर्ष में बोली जाती हैं। ग्रीक , अवस्ता, लैटिन , पाली, संस्कृत आदि प्रसिध्द भाषाएँ इस परिवार की हैं। भारोपिय परिवार दो परिवारो में विभाजित हैं, केन्टुम और शतम् ।

संदर्भ[सम्पादन]

१. भाषाविज्ञान की भूमिका --- आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा । दीपि्त शर्मा । पृष्ठ - १०५,१०६

२. प्रयोजनमूलक हिन्दी: सिध्दान्त और प्रयोग --- दंगल झाल्टे । वाणी प्रकाशन, आवृति--२०१८, पृष्ठ -- १७,१८