भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा/हिन्दी,हिन्दी प्रदेश और उसकी उपभाषाएँ

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हिन्दी[सम्पादन]

हिन्दी की भाषा का नाम हिन्दी है। इसी अर्थ में फिरदौसी और अलबरूनी (११वीं शती), अमीर खुसरो (१४वीं शती) और अबुल फ़जल (१७वीं शती), आदि ने हिन्दी शब्द को ग्रहण किया है। अमीर खुसरो ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'मैं' हिन्दुस्तानी तुर्क हूँ और हिन्दवी में बात करता हूँ। इस बात के अनेक प्रमाण मिलते हैं कि मध्य काल में हिन्दी या हिन्दवी को पूरे भारत की भाषा समझा जाता था; इसीलिए हिन्दी की बोलियों में देहलवी, बंगाली, मुल्तानी, मारवाडी़, सिन्धी, गुजराती, मरहट्टी, तिलंगी, कर्नाटकी, कशमीरी और विलोचिस्तानी गिनाई जाती रही है, बाद में जान पडा़ कि हिन्दी सार्वदेशिक भाषा नहीं है। तब हिन्दी शब्द का प्रयोग संकुचित अर्थ में अर्थात् मध्य भारत की भाषा के रूप में माना जाने लगा।

हिन्दी प्रदेश[सम्पादन]

हिन्दी ऐतिहासिक दृष्टि से युग-युग की मध्यप्रदेशीय भाषाओं- संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि की उत्तराधिकारिणी है। इन सब की सम्पत्ति- शब्दावली, मुहावरे, लोकोक्तियाँ, साहित्य और साहित्य की विविध विधाएँ इसी भाषा की विरासत में मिली हैं। ये भाषाएँ अपने-अपने यौवन-काल में मध्यदेशीय होते हुए भी देशव्यापी रही हैं। वस्तुत: हिन्दी भी सारे देश में व्याप्त है। व्यवहार में यह राष्ट्रभाषा अवश्य है- हिन्दी पूरे हिन्द की भाषा है; परन्तु देश के मध्य से दूर के कुछ लोगों के राजनीतिक स्वार्थों के कारण राज्यों द्दरा इसे राष्ट्रभाषा की मान्यता प्राप्त नहीं हो पाई। इसलिए अभी यह नहीं कहा जा सकता कि हिन्दी का क्षेत्र सारा भारत है। वह मध्यप्रदेश की भाषा है, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। पश्चिम में हरियाणा और पंजाब की सीमा से लेकर पूर्व में बिहार और बंगाल के बीच की सीमा तथा उत्तर तिब्बत, चीन की दक्षिण सीमा से लेकर खंडवा, मध्यप्रदेश की दक्षिण सीमा तक हिन्दी बोली जाती है। इस लंबे-चौडे़ क्षेत्र के अन्तर्गत हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार सम्मिलित है। इस पूरे क्षेत्र को ही हिन्दी प्रदेश कहते हैं। हिन्दी प्रदेश के बाहर भी, किन्हीं दूर-दराज के पहाडी़ और जंगली इलाकों को छोड़कर सारे भारत में, हिन्दी बोली-समझी जाती है। भारत की भाषाओं पर बहुत व्यापक और सर्वाधिक कार्य करने वाले विद्दान सर जार्ज ग्रियर्सन ने बिसवीं शताब्दीके शुरू में हिन्दी का क्षेत्र अम्बला, पंजाब से लेकर पूर्व में बनारस तक और उत्तर में नैनीताल की तलहटी से लेकर दक्षिण में बालाघाट(मध्य प्रदेश) तक निश्चित किया था। इधर पचास वर्षों में ये सम्बन्ध अधिक स्पष्ट और स्थायी हो गया कि बिहारी, राजस्थानी, और पहाडी़ बोलियाँ भी हिन्दी के अन्तर्गत हैं। आज यदि वे जिवित होते तो उन्हें यह स्वीकार करना पड़ता। धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, राजनीतिक, आर्थिक परिस्थितियों ने हिन्दी को एक बहुत बडे़ क्षेत्र में फैलने का अवसर दिया। इन क्षेत्रों में मारवाडी़-जयपुरी आदि(राजस्थान) में, मगही-मैथिली (बिहार) मे और कुमाउनी-गढ़वाली (उत्तर प्रदेश) बोलियाँ तो है- मारवाडी़ और मैथिली अत्यंत समृध्द भी हैं, किन्तु भाषाओं में इनका नाम नहीं गिना जाता- सब की भाषा हिन्दी ही है। इनकी अपनी कोई लिपि नहीं, साहित्य की कोई दीर्घ परम्परा नहीं, शासन द्दारा कोई मान्यता प्राप्त नहीं कोई मानक, स्वरूप नहीं, कोई सामान्य व्याकरण नहीं। अपनी पुस्तक 'राजस्थानी भाषा' में सुप्रसिध्द भाषा विज्ञानी डा. सुनीतिकुमार चटर्जी ने राजस्थानी को हिन्दी कहा है। किन्तु बिहारी के बारे में कारणवश मौन रहे। कलकत्ता के लोग, राजस्थानी को 'मारवाडी़ हिन्दी' कहते हैं और बम्बई तथा पंजाब में बिहारी का नाम 'पूर्बिया हिन्दी' प्रचलित है। पहाडी़ के बारे में ग्रियर्सन ने बहुत पहले कबूल किया था कि पहाडी़ नाम की कोई भाषा नहीं है, केवल वर्गीकरण की सुविधा के लिए यह नाम कल्पित किया गया है। लोकमत और व्यवहार की दृष्टि से मध्य पहाडी़- गढ़वाली और कुमाउनी- हिन्दी की बोलियाँ हैं। संविधान में भी राजस्थानी, बिहारी या पहाडी़ नाम की कोई 'भाषा' नहीं गिनाई गई।

हिन्दी की उपभाषाएँ[सम्पादन]

ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टि से इस भूखण्ड में पाँच प्राकृतें थीं- अपभ्रंश, शौरसेनी, अर्धमागधी, मागधी और खस। इन्हीं प्राकृतों से पाँच अपभ्रंशों और फिर उनसे हिन्दी की पाँच उपभाषाओं- राजस्थानी हिन्दी, पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी, बिहारी हिन्दी और पहाडी़ हिन्दी का विकास हुआ।

१)राजस्थानी हिन्दी:- यह उपभाषा सारे राजस्थान में, सिन्ध के कोने में और मलावा जनपद में बोली जाती है। वर्तमान समय में राजस्थानी बोलने वालों की संख्या चार करोड़ के लगभग है। एक युग में राजस्थानी साहित्य का बोलबाला था। चन्दबरदाई, दुरसाजी, बांकीदास, मुरारीदान, सूर्यमल्ल आदि बडे़-बडे़ प्रतिभाशाली कवियों के नाम प्रसिध्द हैं। बीसलदेव रासो के 'ढोला मारूरा दूहा और बेलि क्रिसन रूक्मिणी री' आदि गौरव ग्रंथ हैं। मीरा, दादू, चरण दास, हरिदास आदि संत कवियों की वाणियाँ भी भाषा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। गध साहित्य में बचनिकाओं, ख्यातों की अपनी विशाल परम्परा हैं। अधिकतर साहित्य मारवाडी़ में लिखा गया है।थौडा़-बहुत जयपुरी में भी प्राप्त है। हिन्दी की तुलना में राजस्थानी व्याकरण की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं- पुंल्लिंग एकवचन ओकारांत जैसे- तारो, हुक्को, धारो; बहुवचन और तिर्यक् एकवचन आकारांत होता है जैसे- तारा(कई तारे), हुक्का(अनेक हुक्के), पुंल्लिंग और स्त्रीलिंग के बहुवचन के अंत में आँ होता है, जैसे- ताराँ, बादलाँ । हिन्दी 'को' के स्थान पर नै, से के स्थान पर सूँ और का, के, की के स्थान पर रो, रा, री होता है।

२) 'बिहारी:- बिहारी की चार प्रमुख बोलियाँ हैं- भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका। इनका एक वर्ग मानकर उन्हें बिहारी नाम दिया गया है। इन बोलियों में वैषम्य अधिक और समानता कम है। इनमें जो सामान्य तत्व हैं भी, वे प्राय: सब पूर्वी हिन्दी में भी पाये जाते हैं, और जो भिन्न हैं वे बिहारी को एक अलग भाषा और एक सुगठित इकाई बनाने में बाधक हैं। मैथिली को छोड़कर बिहारी बोलियों का साहित्य प्रमुखत: लोक से सम्बन्ध है। कुछ वर्षो से भोजपुरी और आंगिका में साहित्यिक गतिविधि बढ़ने लगी है और अपनी-अपनी बोली के प्रति आस्था पनप रही है। बिहारी पूर्वी हिन्दी की अपेक्षा कुछ अधिक व्यंजनांत भाषा है; जैसे- घोडा़, भल, देखित। अक्षर के अंत में, कुछ विशिष्ट परिस्थितियों को छोड़कर संस्कृत की तरह अ उच्चारण होता है;जैसे- कमला= कमअ्ल

३)'पहाडी़ हिन्दी':- इसके अन्तर्गत गढ़वाली और कुमाउनी हैं। इन बोलियों पर मूलत: तिब्बत, चीनी और खस जाति की अनार्य भाषाओं का प्रभाव रहा है। धीरे-धीरे इन पर व्रजभाषा और अन्य भारतीय आर्य भाषाओं का प्रभाव बढ़ता गया है और अनार्य तत्व क्षीण होते गये हैं। इसके फलस्वरूप ये बोलियाँ हिन्दी के अधिक निकट हो गयी हैं। पहाडी़ हिन्दी की कोई साहित्यिक परम्परा नहीं हैं। अत: इसे उपभाषा कहने में भी संकोच होता है, किन्तु यह हिन्दी का एक विशिष्ट उपवर्ग अवश्य है। कुल जनसंख्या पचास लाख से अधिक नहीं है। इस उपवर्ग की हिन्दी में सानुनासिक स्वरों की अधिकता है। सभी स्वर और व्यंजन ध्वनियाँ राजस्थानी से मिलती-जुलती हैं। व्याकरण की दृष्टि से ये ओकारबहुला बोलियाँ हैं, जैसे- संज्ञाशब्द घोड़ो, विशेषण कालो,क्रिया चल्यो। पुंल्लिंग एकवचन में ओ का बहुवचन आ अथवा कुमाउनी में न और गढ़वाली में ऊँ होता है, जैसे- घोडा़, घोड़न, घोडूँ।

४) पश्चिमी हिन्दी:- इस उपभाषा का क्षेत्र पश्चिम में अम्बला से लेकर पूर्व में कानपुर की पूर्वी सीमा तक, एवं उत्तर में जिला देहरादून से दक्षिण में मराठी की सीमा तक चला गया है। इस क्षेत्र के बाहर दक्षिण में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के प्राय: मुसलमानी घरों में पश्चिमी हिन्दी का ही एक रूप दक्खिनी हिन्दी व्याप्त है। इस उपभाषा के बोलने वालों की संख्या छह करोड़ से कुछ ऊपर है। साहित्यिक दृष्टि से यह उपभाषा बहुत संपन्न है। दक्खिनी हिन्दी व्रजभाषा और आधुनिक युग में खडी़ बोली हिन्दी का विशाल साहित्य मिलता है। सूरदास, नन्ददास, भूषण, देव, बिहारी, रसखान, भारतेन्दु, और रत्नाकर आदि के नाम सर्वविदित हैं। खडी़ बोली की परम्परा भी लम्बी है। अमीर खुसरो से लेकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनके युग के साहित्यकारों, महावीर प्रसाद द्दिवेदी, छायावादी और प्रगतिवादी तथा अधतन साहित्यकारों ने खडी़ बोली हिन्दी को विकसित करने में बहुमूल्य योगदान दिया । पश्चिमी हिन्दी में उच्चारणगत खडा़पन है, अर्थात् तान में थोडा़ आरोह होता है। अ विकृत है। ऐ, औ मूल स्वर है, जैसे- बैल,। ड़ की अपेक्षा ड और न की अपेक्षा ण अधिक बोला जाता है।

५) पूर्वी हिन्दी:- पूर्वी हिन्दी का वही क्षेत्र है जो प्राचीन काल में उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल था। यह क्षेत्र उत्तर से दक्षिण तक दूर-दूर तक चला गया है। इसके अन्तर्गत उत्तर प्रदेश में अवधी और मध्य प्रदेश में बघेली तथा छत्तीसगढी़ का सारा क्षेत्र आता है; अर्थात् कानपुर से मिर्जापुर तक और लखीमपुर की उत्तरी सीमा से दुर्ग, बस्तर की सीमा तक क्षेत्र में पूर्वी हिन्दी बोली जाती है। बोलने वालों की संख्या पाँच करोड़ के लगभग है। अवधी में भरपूर साहित्य मिलता है। मंझन, जायसी, उस्मान,नूरमुहम्मद आदि सूफी कवियों का काव्य ठेठ अवधी में और तुलसी, मानदास, बाबा रामचरण दास, महाराज रघुराज सिंह आदि का रामकाव्य साहित्यिक अवधी में लिखा गया है। इस वर्ग की तीन बोलियाँ है- अवधी, बघेली और छत्तीसगढी़। सामान्यता की दृष्टि से जितना घनिष्ठ संबंध इनमें है, उतना हिन्दी की अन्य उपभाषाओं में नहीं है। ण की जगह सदा न, और श,ष, की जगह सदा स बोला जाता है। और ल की स्थान पर र का प्रयोग होता है।

संदर्भ[सम्पादन]

१. हिन्दी भाषा---डा. हरदेव बाहरी। अभिव्यक्ति प्रकाशन, २०१७, पृष्ठ--१६८-१७३