सामान्य अध्ययन २०१९/कला और साहित्य

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सामान्य अध्ययन २०१९
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कला और साहित्य के लिए किए गए सरकारी प्रयास[सम्पादन]

  • मुंबई में भारत का प्रथम राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय का उद्घाटन किया जाएगा।
  • वर्ल्ड सिटीज़ डे (31 अक्तूबर,2019) के अवसर पर यूनेस्को ने भारत के मुंबई तथा हैदराबाद समेत विश्व के 66 शहरों को रचनात्मक शहरों के नेटवर्क में शामिल किया है।

इससे पूर्व भारत के चेन्नई और वाराणसी को यूनेस्को के संगीत शहरों में शामिल किया गया है, जबकि जयपुर को शिल्प तथा लोककला के शहर के रूप में शामिल किया गया है।

  • 5 अगस्त,2019 को ललित कला अकादमी का 65वाँ स्थापना दिवस मनाया गया। इस अवसर पर संस्कृति मंत्री ने कला शिविर और कला तथा पेंटिंग प्रदर्शनी का उद्घाटन किया तथा मिथिला की लोक चित्रकला शीर्षक वाली पुस्तक का विमोचन भी किया।
ललित कला अकादमी का उद्घाटन 5 अगस्त,1954 को नई दिल्ली में तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने किया था। यह एक स्वायत्त संस्था है। यह एक केंद्रीय संगठन है जो स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पहचान जैसे- मूर्तिकला,चित्रकला,गृह निर्माण कला आदि क्षेत्रों में स्थापित करने हेतु किया गया था।
  • पीपुल्स चॉइस अवार्ड 2019(People’s choice awards 2019) भारतीय सैंड आर्टिस्ट सुदर्शन पटनायक को अमेरिका के प्रतिष्ठित 'सैंड स्कल्पटिंग फेस्टिवल' 2019 में प्रदान किया गया।

रेत पर उकेरी गई आकृति में इन्होंने समुद्रों में होने वाले प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने का एक संदेश दिया था। इस तस्वीर में प्लास्टिक में उलझे कछुए और मछली के पेट के अंदर प्लास्टिक की बोतल आदि को रेखांकित किया गया, जो कि प्लॉस्टिक प्रदूषण की एक बानगी है।

मैसाचुसेट्स के बोस्टन में 'रिवर बीच' पर आयोजित इस प्रतियोगिता में पटनायक के अलावा विश्व के 15 टॉप सैंड आर्टिस्टों ने भाग लिया था।
  • ‘भारतीय संस्कृति पोर्टल’ का शुभारंभ केंद्रीय संस्कृति मंत्री के द्वारा भारत की समृद्ध मूर्त और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की जानकारी प्राप्त करने के लिये किया गया। यह पहला सरकारी अधिकृत पोर्टल है जहाँ संस्कृति मंत्रालय के विभिन्न संगठनों (जैसे- भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार,गांधी स्मृति और दर्शन स्मृति,भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र) के ज्ञान एवं सांस्कृतिक संसाधन एक ही मंच पर सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान,बॉम्बे की एक टीम द्वारा विकसित किया गया तथा डेटा का संकलन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) द्वारा किया गया है। वर्तमान में इस पर 90 लाख से अधिक वस्तुओं के बारे में जानकारी उपलब्ध है।

यह परियोजना भारत की ‘डिजिटल इंडिया’ पहल का हिस्सा है, जो देश एवं विदेश दोनों में भारत की समृद्ध मूर्त और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की जानकारी देती है।

  • यूनेस्को द्वारा प्रत्येक वर्ष 19 नवंबर से 25 नवंबर तक विश्व धरोहर सप्ताह मनाया जाता है। भारत में विश्व धरोहर सप्ताह भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा मनाया जाता है।

इसका उद्देश्य समृद्ध धरोहर के प्रति लोगों को जागरूक करना और इनके संरक्षण के लिये प्रयास करना है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण और कई अन्य संग्रहालयों द्वारा प्राचीन स्मारकों के महत्त्व एवं संरक्षण के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिये विश्व धरोहर सप्ताह मनाया जाता है।

भारत में 38 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं जिनमें से 30 सांस्कृतिक स्थल,7 प्राकृतिक स्थल और 1 मिश्रित स्थल शामिल हैं।

यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर स्थलों की सूची में ‘जयपुर’ सबसे नया है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)(United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization) वर्ष 1945 में स्थापित यह संस्था स्थायी शांति बनाए रखने के रूप में "मानव जाति की बौद्धिक और नैतिक एकजुटता" को विकसित करने के लिये की गई थी। इसका मुख्यालय पेरिस (फ्राँस) में स्थित है। गठन: 16 नवंबर, 1945 कार्य: शिक्षा, प्रकृति तथा समाज विज्ञान, संस्कृति और संचार के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय शांति को बढ़ावा देना। उद्देश्य: इसका उद्देश्य शिक्षा एवं संस्कृति के अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से शांति एवं सुरक्षा की स्थापना करना है, ताकि संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में वर्णित न्याय, कानून का राज, मानवाधिकार एवं मौलिक स्वतंत्रता हेतु वैश्विक सहमति बन पाए।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण(Archaeological Survey of India-ASI)

संस्‍कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत इसके अतिरिक्‍त प्राचीन संस्‍मारक तथा पुरातत्त्वीय स्‍थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के प्रावधानों के अनुसार, यह देश में सभी पुरातत्त्वीय गतिविधियों को विनियमित करता है। यह पुरावशेष तथा बहुमूल्‍य कलाकृति अधिनियम, 1972 को भी विनियमित करता है।

दृश्य कला[सम्पादन]

चित्रकला[सम्पादन]

कोलम (रंगोली) Kolams help women map business potential पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण भारत के केरल एवं तमिलनाडु राज्यों में कोलम/रंगोली (Kolam) छोटे उद्यम चलाने वाली गरीब महिलाओं के लिये एक सहायक उपकरण की भूमिका निभा रही है।

कोलम एक ज्यामितीय रेखा है, जो घुमावदार छोरों से बनी होती है तथा डॉट्स के ग्रिड पैटर्न के चारों ओर खींची जाती है। विगत वर्षों के दौरान कोलम की सहायता से क्षेत्रों के नक़्शे बनाए जा रहे हैं जिसमें दुकानों, चाय के स्टालों, पानी के स्पॉटों, मंदिरों एवं अन्य स्थानों की स्थिति प्रदर्शित की जा रही है। कोलम से प्रेरित नक्शे हज़ारों महिलाओं के लिये नए व्यवसाय शुरू करने में सहायक हो रहे हैं क्योंकि इन नक्शों से प्राप्त जानकारी के आधार पर महिलाएँ यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि किस उद्यम को कहाँ शुरू किया जा सकता है या कहाँ दुकान स्थापित करनी है। इन नक्शों ने अब तक तमिलनाडु के छह ज़िलों में 5,000 से अधिक महिलाओं को स्थायी आय का स्रोत प्रदान कर लाभ पहुँचाया है।

कोलम (रंगोली) दक्षिण भारत के केरल तथा तमिलनाडु राज्यों में रंगोली को कोलम कहते हैं। कोलम को घरों में समृद्धि लाने का प्रतीक माना जाता है। तमिलनाडु में प्रत्येक सुबह लाखों महिलाएँ सफेद चावल के आटे से जमीन पर कोलम बनाती हैं। कोलम (रंगोली) शुभ अवसरों पर घर के फ़र्श को सजाने के लिये बनाई जाती है। कोलम बनाने के लिये सूखे चावल के आटे को अँगूठे व तर्जनी के बीच रखकर एक निश्चित आकार में गिराया जाता है। इस प्रकार धरती पर सुंदर नमूना बन जाता है। कभी कभी इस सजावट में फूलों का प्रयोग किया जाता है। फूलों की रंगोली को पुकोलम कहते हैं।

नीलगिरि के जंगलों में किल कोटागिरी (Kil Kotagir) के करिकियूर (Karikiyoor) में 40 प्रतिशत रॉक पेंटिंग्स (शैल चित्रकला) मानवीय हस्तक्षेप के कारण नष्ट हो रही है।इसके उत्तराधिकारी इरुला आदिवासी समुदाय,अवैध ट्रेकर्स द्वारा इन चित्रकलाओं को पहुँच रही क्षति के कारण बेहद नाराज़ है।

करिकियूर में शैल चित्रों पर पाई जाने वाली लिपियों के चित्र उत्तरी भारत के सिंधु सभ्यता स्थलों में पाई गई लिपि से मिलते जुलते हैं। दक्षिण पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया के जातीय समूहों से उत्पन्न इरुला जनजाति तमिलनाडु के उत्तरी ज़िलों तिरुवलुर जनपद (बड़ी संख्या में),चेंगलपट्टू,कांचीपुरम,तिरुवान्नामलाई आदि तथा केरल के वायनाड,इद्दुक्की,पलक्कड़ आदि ज़िलों में बड़ी संख्या में निवास करती हैं।ये इरुला भाषी तथा कमज़ोर जनजातीय समूहों (Particularly Vulnerable Tribal Groups- PVTGs)से संबंधित हैं।

  • पट्टचित्र चित्रकारीओडिशा के इस चित्रकारी को साइक्लोन फणि ने नुकसान पहुँचाया है।

पट्टचित्र का नाम संस्कृत शब्दों पट्ट (कैनवास) और चित्र से लिया गया है।कैनवास पर की जाने वाली इस चित्रकला में समृद्ध रंगों का प्रयोग, रचनात्मक रूपांकन और डिज़ाइनों तथा सरल विषयों का चित्रण किया जाता है। इस चित्रकला में ज़्यादातर चित्र पौराणिक विषयों पर आधारित होते हैं। इस कला के माध्यम से प्रस्तुत कुछ लोकप्रिय विषय हैं- थिया बधिया - जगन्नाथ मंदिर का चित्रण; कृष्ण लीला - भगवान कृष्ण के रूप में जगन्नाथ का एक बच्चे के रूप में अपनी शक्तियों का प्रदर्शन; दासबतारा पट्टी - भगवान विष्णु के दस अवतार; पंचमुखी - भगवान गणेश का पाँच मुख वाले देवता के रूप में चित्रण। पट्टचित्र को कपड़े पर चित्रित करते समय कैनवास को पारंपरिक तरीके से तैयार किया है। इसके बेस को नरम, सफेद, चाक पाउडर और इमली के बीज से बने गोंद के साथ लेपन करके तैयार किया जाता है। सबसे पहले पेंटिंग के बॉर्डर को पूरा करने की परंपरा है। फिर चित्रकार हल्के लाल और पीले रंग का उपयोग करके ब्रश के साथ स्केच बनाना शुरू करता है। इसमें आमतौर पर सफेद, लाल, पीले और काले रंग इस्तेमाल किये जाते हैं। पेंटिंग पूरी होने के पश्चात् इसे चारकोल की जलती आग के ऊपर रखा जाता है और सतह पर लाह/लाख (lacquer) लगाया जाता है। इससे पेंटिंग जल प्रतिरोधी, टिकाऊ और चमकदार बन जाती है।

हस्तकला[सम्पादन]

  • सिरुमुगई शॉल (Sirumugai Shawl)तमिलनाडु के मामल्लपुरम् में भारत-चीन द्विपक्षीय बैठक के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भेंट की है।

सिरुमुगई शॉल कोयंबटूर से लगभग 35 किलोमीटर दूर सिरुमुगई (तमिलनाडु) नामक स्थान पर रामलिंगम् सोद्दमबिगई बुनकर सहकारी समिति द्वारा सोने और सिल्क से बनाई गई है।

सिरुमुगई नीलगिरि पहाड़ियों के मध्य, भवानी नदी के तट पर स्थित है। भवानी, कावेरी की सहायक नदी है।

इन शॉलों पर इससे पहले थिरुकुरल (तमिल ग्रंथ) के 1330 दोहे,विश्व के सात आश्चर्य और कई राष्ट्रीय नेताओं के चित्र निर्मित किये गए हैं। इसके अतिरिक्त विवाह के अवसर पर इन शॉलों पर पर वर और वधू के चित्र भी बनाए जाते हैं।

  • टैनबो कला (Tanbo Art):-केरल के एक किसान ने प्रसिद्ध गुरुवायुर मंदिर के हाथी (गुरुवायुर केसवन) का चित्रण टैनबो कला (Tanbo Art) के रूप में किया।

यह जापान की कला जिसमें लोग धान के खेत में चित्रण करने के लिये विभिन्न प्रकार के रंगों और किस्मों का धान बोते हैं।

गुरुवायुर मंदिर केरल राज्य के त्रिशूर ज़िले में स्थित है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप में भगवान गुरुवायुरप्पन की मूर्ति स्थापित है।

इस मंदिर को 'बैकुंठद्वार' व 'दक्षिण की द्वारका' भी कहा जाता है। केवल हिन्दुओं को प्रवेश की अनुमति है।

गुरुवायुर केसवन को प्राचीन काल से केरल के सिद्ध मंदिर के हाथी के रूप में जाना जाता है यह राजसी हाथी भगवान गुरुवायुरप्पन को समर्पित था। इस हाथी की वर्ष 1976 में मृत्यु हो गई।
  • कोंडापल्ली खिलौनेजो कि आंध्र प्रदेश के सांस्कृतिक प्रतीक हैं, भारत तथा विदेशों में ऑनलाइन, थोक एवं खुदरा प्लेटफार्मों में सबसे अधिक बिकने वाले हस्तशिल्प उत्पादों में से एक हैं।

कोंडापल्ली खिलौने को केंद्र सरकार से भौगोलिक संकेतक (GI) का टैग भी मिल चुका है। लेपाक्षी हस्तशिल्प एम्पोरियम (Lepakshi Handicraft Emporium) के अनुसार, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इन खिलौनों की गुणवत्ता से संबंधित ग्राहकों की प्रतिक्रिया बहुत सकारात्मक है। उल्लेखनीय है कि लेपाक्षी, अमेज़ॅन और मायस्टेटबज़ार जैसे प्लेटफॉर्म इस शिल्प को बढ़ावा देने वाले उत्पादों का समर्थन करते हैं। चुनौतियाँ चीन के मशीन से बने खिलौनों से होने वाली प्रतिस्पर्द्धा कोंडापल्ली खिलौनों के लिये एक बड़ी बाधा है, क्योंकि मशीन की तुलना में इन हस्तशिल्प खिलौनों का उत्पादन बहुत कम हो पाता है। इतनी कड़ी प्रतिस्पर्द्धा में इन खिलौनों को बाज़ार में अपना स्थान बनाने के लिये काफी अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ी चुनौती टेल्ला पोनिकी (Tella Poniki) लकड़ी की निरंतर हो रही कमी है जिससे इन खिलौनों को बनाया जाता है, साथ ही यह लकड़ी अपने प्रारंभिक वर्षों में मीठी और अपेक्षाकृत नरम होती है, इसलिये यह विभिन्न कीटों का शिकार भी हो जाती है।

  • इलेक्ट्रॉनिक पावरलूम के उपयोग के माध्यम से पारंपरिक पट्टामादई रेशमी चटाई (तमिलनाडु के तिरुनेलवेली ज़िले) के निर्माण में प्रौद्योगिकी का समावेश बुनकर समुदाय के लिये उच्च उत्पादन और आय सुनिश्चित कर रहा है। हस्तनिर्मित पट्टामादई रेशमी चटाई को पट्टू पई (Pattu paai) भी कहा जाता है। कोराई घास ( Korai Grass) से निर्मित पट्टामादई चटाई को भौगोलिक संकेत (GI) का दर्जा प्राप्त है। ये चटाईयाँ विशेष रूप से शादी समारोहों के लिये बनाई जाती हैं और इसमें दुल्हन एवं दूल्हे के नाम के साथ-साथ शादी की तारीख भी होती है।

प्रदर्शन कला[सम्पादन]

संगीत कला[सम्पादन]

  • इंडिया इंटरनेशनल गिटार फेस्टिवल 2019 में विश्व को ‘पुष्पा वीणा’ से अवगत कराया गया है।

इसका आविष्कार एक प्रसिद्ध भारतीय स्लाइड गिटारवादक ‘पंडित देबाशीष भट्टाचार्य’ ने किया है। पुष्पा वीणा एक ध्वनिक स्लाइड वाद्य यंत्र है यह पंडित देवाशीष भट्टाचार्य के त्रिमूर्ति गिटार (चतुरंगी, आनन्दी और गंधर्व) की पिछली रचनाओं से बहुत अलग एवं अद्वितीय है। पुष्पा वीणा भारत और एशिया के साथ-साथ दुनिया के शास्त्रीय और लोक संगीत की प्राचीन कला का प्रतिनिधित्व करता है।

वीणा वस्तुतः तंत्री वाद्यों का संरचनात्मक नाम है, इसमें तंत्री तारों के आलावा,घुड़च,तरब के तार तथा सारिकाए होती हैं।

वीणा से ही रुद्र वीणा,सरस्वती वीणा,विचित्र वीणा विकसित हुई हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में रुद्र वीणा को बजाया जाता है। कर्नाटक संगीत में प्रयुक्त होने वाला ‘तानपुरा या तम्बूरा’ दक्षिण भारतीय वीणा डिज़ाइन है।

  • ध्रुपद उस्ताद और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित रमाकांत गुंदेचा का निधन हो गया है।

ध्रुपद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की एक प्राचीन श्रेणी है। ध्रुपद ध्रुव+पद से मिलकर बना है जिसका अर्थ है निश्चित नियम वाला जो अटल हो तथा नियम में बँधा हुआ हो। इसमें संस्कृत शब्दों का उपयोग किया जाता है और इसका उद्गम मंदिरों में हुआ था। इस गायन शैली में भक्ति रस, वीर रस, शांत रस तथा शृंगार रस की प्रधानता रहती है। ध्रुपद रचनाओं में 4 से 5 पद होते हैं और ये रचनाएँ जोड़ों में गाई जाती हैं। प्राचीन काल में ध्रुपद को कलावंत कहा जाता था। इस शैली के विकास में संगीत सम्राट तानसेन एवं उनके गुरु स्वामी हरिदास का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसके प्रमुख गायकों में डागर बंधु, गुंदेचा बंधु, पंडित रामचतुर मल्लिक, पंडित सियाराम तिवारी आदि शामिल हैं। इसे गाते समय कंठ और फेफड़ों पर अधिक ज़ोर दिया जाता है और पुरुष ही इसे गा सकते हैं, इसलिये इसे मर्दाना गायकी भी कहा जाता है। हाल के दिनों में कुछ महिलाओं ने भी इसे गाने की शुरुआत की है जिसमें भारत की अमिता सिन्हा महापात्रा और पकिस्तान की आलिया राशिद प्रमुख हैं।

नृत्यकला[सम्पादन]

  • विश्व प्रसिद्ध खोन रामलीला (KHON Ramlila)हेतु उत्तर प्रदेश सरकार का संस्कृति विभाग देश का पहला प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है।
थाईलैंड की खोन रामलीला को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया गया है।

यह रामलीला के दृश्यों को दर्शाता एक नकाबपोश नृत्य है। इस नृत्य के दौरान कोई संवाद नहीं होता बल्कि पृष्ठभूमि की आवाज़ें ही रामायण की पूरी कहानी का बयान करती हैं। खोन रामलीला का प्रदर्शन अपने सुंदर पोशाक और सुनहरे मुखौटों के लिये भी प्रसिद्ध है।

  • कुटियाट्टमयूनेस्को के मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल। संस्कृत परंपराओं (Sanskrit classicism) पर आधारित कुटियाट्टम केरल के सबसे पुराने पारंपरिक थिएटर में से एक है।मलयालम शब्द ‘कुटी’ का अर्थ है ‘संयुक्त’ या ‘एक साथ’ एवं ‘अट्टम’ का अर्थ है,‘अभिनय’ अतैव ‘कुटियाट्टम’ का अर्थ ‘संयुक्त अभिनय’ होता है।

कुटियाट्टम का प्रदर्शन पुरुष अभिनेताओं के समुदाय द्वारा किया जाता है जिन्हें ‘चक्यार’ कहा जाता है और महिला कलाकारों को ‘नंगियार’ कहा जाता है, इन्हें ‘नंबियार’ नामक ढोलवादकों द्वारा संगीत दिया जाता है। हाल ही में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कपिला वेणु ने ‘पार्वती विरहम’ का किरदार निभाया। पार्वती विरहम सदियों पुराने कुटियाट्टम नामक नाटक संग्रह का एक भाग है।

  • ‘ओट्टम थुलाल (Ottam Thullal)’ केरल का एक नृत्य-नाट्य कला प्रदर्शन है,जिसे कुंचन नांबियार ने चाक्यार कूथु के विकल्प के रूप में विकसित किया था। कुंचन नांबियार ने अपने दौर में समाज में प्रचलित सामाजिक-राजनीतिक संरचना और समाज के पूर्वाग्रहों के खिलाफ विरोध प्रदर्शित के लिये इसे एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया था। धीरे-धीरे यह केरल के मंदिरों में प्रस्तुत किया जाने लगा एवं सबसे लोकप्रिय लोक कला बन गया।
  • कुचिपुड़ी नृत्य (आंध्र प्रदेश) का मंचन अमेरिका के लॉस एंजिल्स में स्थित वॉल्ट डिज़नी कॉन्सर्ट हॉल में किया जाएगा।

कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश की एक नृत्य शैली है,जिसका जन्म आंध्र प्रदेश के कुचेलपुरम गाँव में हुआ था। यह गीत एवं नृत्य का समन्वित रूप है। भागवत पुराण इसका मुख्य आधार है। इस नृत्य में पद संचालन एवं हस्तमुद्राओं का विशेष महत्त्व है। कुचिपुड़ी नृत्य का सबसे लोकप्रिय रूप मटका नृत्य है। इस नृत्य से संबंधित प्रमुख कलाकार हैं- यामिनी कृष्णमूर्ति, राधा रेड्डी, भावना रेड्डी, यामिनी रेड्डी आदि।

  • नाट्यशास्त्र उत्सव (Natyasastra Utsav) का आयोजन 1-3 दिसंबर तक संगीत नाटक अकादमी द्वारा कलाक्षेत्र फाउंडेशन और भरत इलांगो फाउंडेशन फॉर एशियन कल्चर के सहयोग से किया गया।

नाट्यशास्त्र एक प्राचीन ग्रंथ है जिसमें नाट्य कला के विभिन्न पहलुओं और नाट्य सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन किया गया है। माना जाता है कि ऋग्वेद से पाठ्य वस्तु,सामवेद से गान,यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस योजना लेकर भरत मुनि ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व नाट्यशास्त्र की रचना की थी। नाट्यशास्त्र को ‘पंचम वेद’ भी कहा जाता है। विशेषताएँ:-संस्कृत में रचित इस ग्रंथ को 36 अध्यायों में विभाजित किया गया है,जिसमें ललित कला का वर्णन करते हुए 6000 से अधिक छंदबद्ध सूत्र या पद लिखे गए हैं। यह ग्रंथ भरत मुनि से नाट्यवेद के बारे में पूछने वाले साधुओं और भरत मुनि के बीच एक संवाद के रूप में लिखा गया है। भरत मुनि ने इस ग्रंथ में नाटक के कुल 15 प्रकारों का वर्णन किया है। साथ ही इसमें आठ प्रकार के छोटे नाटकों का भी उल्लेख किया गया है। ग्रंथ में अभिनय के चार पहलुओं का वर्णन किया गया है:-

  1. अंगिक:-शरीर के कुछ हिस्सों की गतियों के माध्यम से संदेश पहुँचाना।
  2. वाचिक:-संवाद सहित अभिनय।
  3. आहार्य:-वेशभूषा और श्रृंगार।
  4. सात्विक:-होंठ,भोंहों एवं अन्य अंगों के सूक्ष्म संचलन से आंतरिक भावों का प्रकटन।
  • नृत्य समीक्षक एवं इतिहासकार डॉ सुनील कोठारी को सत्रिया नृत्य (Sattriya Dance) को लोकप्रिय बनाने के लिये माधवदेव पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

सत्रिया नृत्य की उत्पत्ति 15वीं शताब्दी में श्रीमंत शंकरदेव द्वारा शुरू किये गए नव-वैष्णव आंदोलन के एक हिस्से के रूप में ‘सत्र’ मठ में हुई थी। शंकर देव ने इसे अंकीयानाट के प्रदर्शन के लिये विकसित किया था। यह पूर्वोत्तर भारत के असम की प्रसिद्ध नृत्य शैली है। संकलन: इसमें पौराणिक कथाओं का समावेश होता है प्रारंभ में यह नृत्य पुरुषों द्वारा किया जाता था परंतु अब इसे महिलाओं द्वारा भी किया जाता है। नृत्य करने वाले पुरुष को ‘पाक’ तथा महिला को ‘प्राकृत पाक’ कहा जाता है। इसमें शंकरदेव द्वारा संगीतबद्ध रचनाओं का प्रयोग होता है, जिसे ‘बोरगीत’ कहा जाता है। इसमें ढोल,ताल एवं बांसुरी का प्रयोग होता है और वर्तमान में इसमें हारमोनियम का प्रयोग भी किया जाने लगा है। इस नृत्य शैली को संगीत अकादमी द्वारा 15 नवंबर, 2000 को शास्त्रीय नृत्य की सूची में शामिल कर लिया गया। विशेषताएँ:-इस नृत्य को कई विधाओं जैसे- अप्सरा नृत्य, बेहर नृत्य, चाली नृत्य, दशावतार नृत्य, मंचोकनृत्य, रास नृत्य में बाँटा गया है। इस नृत्य में भी अन्य शास्त्रीय नृत्यों की भाँति नाट्यशास्त्र, संगीत रत्नाकार एवं अभिनय दर्पण के सिद्धांतों का प्रयोग होता है। प्रमुख नर्तक/नर्तकियाँ: इस नृत्य से संबंधित प्रमुख नर्तकों में रामकृष्ण तालुकदार तथा कृष्णाक्षी कश्यप आदि हैं।

  • हाल ही में असम के लोकनृत्य भओना (Bhaona) के अंग्रेज़ी संस्करण का आयोजन आबू धाबी में किया गया।

उद्देश्य:

  1. स्थानीय लोक संस्कृति का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार।
  2. संत शंकरदेव के विचारों का प्रचार-प्रसार।

भओना असम का लोकनृत्य है। यह नव-वैष्णव आंदोलन से संबंधित है। संत-सुधारक शंकरदेव द्वारा भओना की शुरुआत लगभग 500 वर्ष पहले की गई थी।

प्रारंभ में शंकरदेव ने इसमें गाए जाने वाले गीत (बोरगीत) संस्कृत भाषा में लिखे लेकिन कालांतर में उन्होंने बोरगीत के लिये असमिया और ब्रजावली/ब्रजबुली का उपयोग किया।
वेशभूषा और आभूषणों से सुसज्जित कलाकारों द्वारा संवादों, गीतों और नृत्यों का प्रदर्शन किया जाता है इसमें सामान्यतः भारी ड्रम और झाँझ बजाते हुए 40-50 लोग शामिल होते हैं।
इसका कथ्य पौराणिक कथाओं पर आधारित होता है और इसका प्रयोग सत्रिया शास्त्रीय नृत्य में भी किया जाता है।

इसके अतिरिक्त रामायण और शंकरदेव कृत अंकियानाट का मंचन किया जाता है।

सामान्यतः इसका मंचन नामघर (मंदिर) और जतरा (वैष्णव मठों) में किया जाता है।

मुख्य केंद्र: असम का माजुली क्षेत्र वैष्णव संस्कृति और भओना का केंद्र है।

सत्रिया शास्त्रीय नृत्य:

इसका प्रारंभ 15वीं सदी में शंकरदेव द्वारा किया गया था वर्तमान में यह भारत का एक शास्त्रीय नृत्य है।
शंकरदेव ने इसे अंकियानाट के मंचन के लिये शुरू किया था इसमें शंकरदेव द्वारा संगीतबद्ध रचनाओं बोरगीत का प्रयोग किया जाता है।
इसमें ढोल, ताल और बाँसुरी का प्रयोग होता है हाल के दिनों में इसमें हारमोनियम का भी प्रयोग होने लगा है।
इस नृत्य को कई विधाओं में बाँटा गया है, जैसे- अप्सरा नृत्य, बहार नृत्य, चाली नृत्य, दशावतार नृत्य, मंचोक नृत्य, रास नृत्य आदि।
  • एरुमेली पेट्टा थुलल (ERUMELI Petta Thullal)

केरल राज्य प्रदूषण बोर्ड द्वारा इस अनुष्ठान के दौरान उपयोग किये जाने वाले रसायन युक्त रंगों को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया है।

पेट्टा थुलल

भगवान अयप्पा की पौराणिक कथाओं में बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाने के लिये एक पवित्र नृत्य है। यह केरल में प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाले सबरीमाला तीर्थयात्रा अवधि के अंतिम पड़ाव की शुरुआत को दर्शाता है। प्रतिबंधित करने का कारण: बोर्ड के अनुसार, इन रंगों में सीसा, आर्सेनिक और कैडमियम सहित खतरनाक धातुओं की उपस्थिति पाई गई है। ये धातु न सिर्फ त्वचा के लिये हानिकारक हैं बल्कि मृदा और जल स्रोतों को भी प्रदूषित करते हैं। रासायनिक रंगों का विकल्प: तेलंगाना राज्य कृषि विश्वविद्यालय द्वारा इसके विकल्प के तौर पर एक कार्बनिक सिंदूर के उपयोग का सुझाव दिया गया है। यह कार्बनिक सिंदूर एक लाल रंजक है जो मूल रूप से सिनाबार खनिज पाउडर से बनाया जाता है।

  • गीत गोविंद (Geet Govind) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र(Indira Gandhi National Centre for the Arts) द्वारा आयोजित जन्माष्टमी समारोह है। इस अवसर पर छह शास्त्रीय कला परंपराओं का प्रदर्शन करते हुए दो दिवसीय उत्सव मनाया गया।

सभी नृत्यों में से केवल 8 नृत्यों को शास्त्रीय नृत्य का दर्ज़ा दिया गया है,जिसका वर्णन निम्नानुसार है: शास्त्रीय नृत्य

मार्शल आर्ट[सम्पादन]

  • केरल राज्य युवा कल्याण बोर्ड द्वारा युवा महिलाओं के आत्मविश्वास और मानसिक एवं शारीरिक शक्ति बढ़ाने हेतु ’कलारिपयट्टु’ (Kalaripayattu) प्रशिक्षण का आयोजन किया गया है।

कलारिपयट्टु की उत्पत्ति के संबंध में दो मत हैं, कुछ लोग केरल को इसका उत्पत्ति स्थल मानते हैं तथा कुछ पूरे दक्षिण भारत को इसका उत्पत्ति स्थल मानते हैं। कलारिपयट्टु दो शब्दों कलारि तथा पयट्टु से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ युद्ध की कला का अभ्यास होता है। ऐसी मान्यता है कि प्राचीन समय में यह युद्ध शैली अगस्त्य ऋषि एवं भगवान् परशुराम द्वारा सिखाई जाती थी, इसके साथ ही इस युद्ध कला का वेदों में भी वर्णन मिलता है। इसके अलावा इसका उल्लेख संगम साहित्य में भी मिलता है। प्राचीन समय में 7 वर्ष से कम आयु के बच्चो को इस युद्ध कला का प्रशिक्षण दिया जाता था। इसे विश्व में मार्शल कला का सर्वाधिक प्राचीन और वैज्ञानिक रूप माना जाता है। लड़ाई का ‘कलारि याती’ नामक प्रशिक्षण स्कूलों में दिया जाता है। इसकी शुरुआत शरीर की तेल मालिश से होती है इसके बाद चाट्टोम (कूद),ओट्टम (दौड़),मिरिचिल (कलाबाजी) आदि करतब दिखाए जाते हैं जिसके बाद भाला, कटार, तलवार, गदा,धनुष बाण जैसे हथियारों को चलाना सिखाया जाता है। भारत में प्रचलित अन्य युद्धकलाएँ:

  1. सिलांबम (तमिलनाडु)
  2. मर्दानी (महाराष्ट्र)
  3. थांग-टा, सरित- साराक और छीबी गद-गा (मणिपुर)
  4. ठोडा (हिमाचल प्रदेश)
  5. मुष्टि युद्धकला ( उत्तर प्रदेश)
  6. पारीकदा (पश्चिम बंगाल और बिहार)
  7. कथी सामू (आंध्र प्रदेश)
  8. गतका (पंजाब)
  9. पाईका अखाड़ा (ओडिशा)
  • होरी हब्बा (Hori Habba) एक प्रकार का बैल-पकड़ने वाला कर्नाटक का लोक खेल (Folk Game) है।

इसका आयोजन फसल बुवाई के मौसम में या दीपावली के आस-पास किया जाता है। यह खेल तमिलनाडु के जल्लीकट्टू एवं दक्षिण कन्नड़ ज़िले के कंबाला के समान ही खेला जाता है। इसमें सैकड़ों प्रशिक्षित और सजे हुए बैलों को भारी भीड़ के बीच दौड़ाया जाता है तथा निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहले पहुँचने वाले बैल को विजेता घोषित किया जाता है। साथ ही इसमें लोगों द्वारा भीड़ के बीच से भागते बैल को पकड़ने का प्रयास भी किया जाता है।

वास्तुकला[सम्पादन]

  • भारी वर्षा के कारण आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में स्थित ठोटलाकोंडा बौद्ध परिसर (Thotlakonda Buddhist Complex) का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है। दूसरी शताब्दी ई.पू. का ठोटलाकोंडा बौद्ध परिसर बौद्ध धर्म की प्राचीन हीनयान शाखा से संबंधित है। यह परिसर श्रीलंका, इंडोनेशिया, कंबोडिया आदि देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का केंद्र रहा है।
  • बेलम गुफा महोत्सव का आयोजन आंध्र प्रदेश के कुरनूल में अवस्थित बेलम गुफाओं (Belum Caves) को लोकप्रिय बनाने के लिये किया जाएगा। इस महोत्सव का उद्देश्य लोगों को कुरनूल के इतिहास के बारे में जानकारी देना है।

पाँच वर्षों के अंतराल के बाद ज़िले में आयोजित होने वाला यह पहला पर्यटन महोत्सव होगा। महोत्सव के लिये 'कंदनवोलू सम्बरालु' (Kandanavolu Sambaralu) नाम प्रस्तावित किया गया है यह कुरनूल का मूल नाम है। बेलम गुफा भारतीय उप-महाद्वीप की सबसे बड़ी गुफा प्रणाली और एक संरक्षित स्मारक है जिसमें जनता को प्रवेश की अनुमति है। इन्हें ‘बेलम गुहलू’ (Belum Guhalu) के नाम से भी जाना जाता है।

भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे लंबी प्राकृतिक गुफाएँ मेघालय में क्रेम लियत प्राहा गुफाएं (Krem Liat Prah caves) हैं।

ये गुफाएँ हज़ारों वर्ष पुरानी हैं तथा इनका विकास भूमिगत जल के निरंतर प्रवाह द्वारा हुआ है। ये गुफाएं स्टैलेक्टाइट (Stalactite) और स्टैलेग्माईट (Stalagmite) संरचनाओं की तरह स्पेलोटेम (Speleothem) संरचनाओं के लिये प्रसिद्ध हैं।

स्पेलोटेम किसी गुफा में एकत्रित द्वितीयक खनिज भंडार हैं।

प्राचीन काल में इन गुफाओं पर जैन और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा कब्जा कर लिया गया था। बौद्ध-पूर्व युग से संबंधित 4500 वर्ष पुराने पात्र इनकी उपस्थिति को सुनिश्चित करते हैं।

  • जंगुबाई गुफा मंदिर और कपलाई गुफाएँ महाराष्ट्र-तेलंगाना सीमा पर अवस्थित है। इसको गोंड,परधान तथा कोलम आदि आदिवासी जनजातियों द्वारा तीर्थस्थल के रूप में माना जाता है।
कोलम जनजाति (कोलावर) महाराष्ट्र की एक अनुसूचित जनजाति है। ये लोग आंध्र प्रदेश,छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भी रहते हैं।

ये कोमली भाषा बोलते है,जो गोंड भाषा की तरह द्रविड़ भाषाओं का मध्यवर्ती समूह है। ये हिंदू धर्म के तहत एक पत्नी/पति विवाह (Monogamy) का पालन करते हैं।

वर्ष 2018 में सरकार द्वारा महाराष्ट्र राज्य में कटकारिया (कठोडिया), कोलम और मारिया गोंड को विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों के रूप में चिह्नित किया गया है।
गोंड जनजाति छत्तीसगढ़,झारखंड,मध्य प्रदेश,आंध्र प्रदेश,कर्नाटक,गुजरात,महाराष्ट्र,बिहार और पश्चिम बंगाल में फैली हुई है।

मुख्यतः यह जनजाति विंध्य और सतपुड़ा के बीच के जंगलों और पहाड़ी इलाकों में निवास करती है।

परधान जनजाति गोंड जनजाति का एक उपसमूह है जो मध्य भारत में रहते हैं।

इस जनजाति का अधिकांश हिस्सा महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में रहता है। इस जनजाति के लोगों की प्राथमिक भाषा उनकी अपनी ‘परधान’ भाषा है लेकिन कुछ परधान जनजाति के लोग हिंदी, मराठी और गोंडी भाषा भी बोलते हैं। परधान जनजाति का पारंपरिक व्यवसाय त्योहारों और जीवन के महत्त्वपूर्ण समारोहों में गायन एवं संगीत है।

  • मामल्लपुरम के ‘शोर मंदिर’ के उत्तरी किनारे को अपरदित हो रही तटरेखा का सामना करना पड़ रहा है। तटरेखा में हर साल 4-5 मीटर की कमी आ रही है।

‘भारतीय तटरेखा में परिवर्तन पर राष्ट्रीय मूल्यांकन रिपोर्ट’ (1990-2016) के अनुसार, तमिलनाडु में पिछले दो दशकों में तटरेखा का 41% अपरदन हुआ है। रिपोर्ट में बताया गया है कि सर्वेक्षण से पता चला है कि 991.47 किलोमीटर की तटरेखा में से लगभग 407.05 किमी तटरेखा का कटाव हो चुका है। ‘राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र’ की रिपोर्ट के अनुसार इस कटाव के निम्नलिखित कारण हैं-

  1. बंदरगाहों का निर्माण
  2. समुद्र तट पर रेत खनन
  3. समुद्र-स्तर में वृद्धि
  4. चक्रवात
  5. नदियों के पार बांधों का निर्माण

मामल्लपुरम (महाबलीपुरम या सेवन पैगोडा)चेन्नई से 60 किलोमीटर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी के कोरोमंडल तट पर स्थित एक शहर है। मामल्लपुरम के स्मारक और मंदिर,जिनमें शोर मंदिर परिसर शामिल हैं,को सामूहिक रूप से वर्ष 1984 में यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल के रूप में नामित किया गया था। तीन तीर्थों वाला एक मंदिर (शोर मंदिर) शोर मंदिर भारत के तमिलनाडु राज्य के एक छोटे से शहर मामल्लपुरम में समुद्र के किनारे स्थित है। इसे स्थानीय रूप से अलाइवय-के-कोविल (Alaivay-k-kovil) के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले ग्रेनाइट बोल्डर पर टिका हुआ है। इसे संभवत: नरसिंहवर्मन द्वितीय के शासनकाल में बनाया गया था, जिसे राजसिम्हा (पल्लव शासक) के रूप में भी जाना जाता है, जिन्होंने 700 से 728 ई तक शासन किया था। इस परिसर में तीन अलग-अलग तीर्थ हैं:-दो भगवान शिव और एक विष्णु को समर्पित है। तीनों तीर्थों में ‘विष्णु तीर्थ’ सबसे पुराना और छोटा है। शोर मंदिर परिसर में एक कटे हुए पत्थरों से निर्मित और एक मुक्त खड़ा संरचनात्मक मंदिर है। यह परिपक्व द्रविड़ वास्तुकला के सभी तत्त्वों को प्रदर्शित करता है।

  • कीर्ति मठ की 25वीं स्थापना वर्षगाँठ के उद्घाटन समारोह के अवसर पर मैक्लोडगंज,धर्मशाला में 14वें दलाई लामा ने मुख्य अतिथि के रूप में हिस्सा लिया।

कीर्ति गोम्पा (मठ) की स्थापना वर्ष 1472 में त्सोंगखापा (Tsongkhapa) के एक शिष्य रोंगपा चेनाकपा (Rongpa Chenakpa) ने की थी। कीर्ति रिनपोचे (Kirti Rinpoche) द्वारा स्थापित पहला कीर्ति मठ गीलरंग (Gyelrang) में था। इस समय चीन के सिचुआन में दो मुख्य कीर्ति मठ तकत्संग ल्हामो (Taktsang Lhamo) और नगावा प्रांत में स्थित हैं। चीन द्वारा तिब्बत पर आक्रमण किये जाने से पहले यह क्षेत्र खाम के ऐतिहासिक तिब्बती क्षेत्र का हिस्सा था। टकत्संग ल्हामो (Taktsang Lhamo) को ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के दौरान नष्ट कर दिया गया था और अब इसे फिर से बनाया गया है। 12वें कीर्ति त्सेन्जब रिनपोचे (मठ का मुखिया बनने वाले 55वें लामा) अब निर्वासन में रहते हैं। कीर्ति त्सेन्जब रिनपोचे ने तिब्बती निर्वासित भिक्षुओं को आश्रय देने के लिये अप्रैल 1990 में भारत के धर्मशाला में एक कीर्ति मठ की स्थापना की थी।

  • दक्षिण कोरिया के बौद्ध भिक्षुओं ने बिहार के बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर (Mahabodhi Temple) में प्रार्थना की।

महाबोधि मंदिर परिसर भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित चार पवित्र स्थलों में से एक है। गौतम बुद्ध को यहाँ एक पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस परिसर के पहले मंदिर का निर्माण सम्राट अशोक द्वारा तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में कराया गया था तथा वर्तमान मंदिर अनुमानतः 5 वीं या 6 वीं शताब्दी में निर्मित माना जाता है। यह सबसे प्राचीन बौद्ध मंदिरों में से एक है जो पूरी तरह से ईंटों से बना हुआ है।

महाबोधि मंदिर को वर्ष 2002 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।

बुद्ध के अनुयायियों के दो वर्ग थे- उपासक (जो परिवार के साथ रहते थे) और भिक्षु (जिन्होंने गृहस्थ जीवन त्यागकर संयासी जीवन अपना लिया)। बौद्ध भिक्षु एक संगठन के रूप में रहते थे जिन्हें बुद्ध ने संघ का नाम दिया। स्त्रियों को भी संघ में प्रवेश की अनुमति दी गई। संघ के सभी सदस्यों को समान अधिकार प्राप्त थे।

  • आंध्र प्रदेश के कुन्नूर ज़िले में अवस्थित बिलासुर्गम गुफा (Billasurgam Caves) के जीर्णोद्धार की योजना बनाई जा रही है।

भू-वैज्ञानिकों के अनुसार,ये गुफाएँ लगभग 5,000 वर्ष से अधिक पुरानी हैं। इन गुफाओं की खोज सर्वप्रथम प्रसिद्ध ब्रिटिश भू-वैज्ञानिक रॉबर्ट ब्रूस फूट (Robert Bruce Foote) ने वर्ष 1884 में की थी।

चेन्नई के पल्लावरम में पेलियोलिथिक काल के पत्थर के औजारों की खोज भी रॉबर्ट ब्रूस फूट द्वारा की गई थी।

बिलासुर्गम गुफा की खुदाई के दौरान पाए गए विभिन्न प्रकार के पत्थर के औजार, जानवरों के अवशेष और मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े प्रागैतिहासिक काल में मानव गतिविधि के अस्तित्व को दर्शाते हैं।

  • 18वीं शताब्दी में निर्मित रंगदुम/रेंगदुम बौद्ध मठ लद्दाख की सुरू घाटी (Suru Valley) में स्थित है। यह एक तिब्बती बौद्ध मठ है जो गेलुग्पा संप्रदाय (Gelugpa Sec) से संबंधित है।

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण इस बौद्ध मठ को राष्ट्रीय महत्त्व का स्मारक घोषित किये जाने पर विचार कर रहा है।

  • 37 वर्ष पहले दक्षिणी तमिलनाडु के एक मंदिर से चोरी हुई एक प्राचीन पंचलोहे [एक प्रकार की मिश्रधातु जिसमें सोना(Au), चांदी (Ag), तांबा (Cu), जस्ता (Zn) और लोहा (Fe) होता है] की भगवान नटराज की मूर्ति को हाल ही में भारत वापस लाया गया है।

इस प्रतिमा में शिव को उनके दाहिने पैर पर संतलिुत रूप से खड़े हुए और उसी पैर के पंजे से अज्ञान या विस्मृति के दैत्य ‘अपस्मार’ को दबाते हुए दिखाया गया है। साथ ही शिव भुजंगत्रासित की स्थिति में अपने बाएँ पैर को उठाए हुए हैं जो ‘तिरोभाव’ यानी भक्त के मन से माया या भ्रम का परदा हटाने का प्रतीक है। उनकी चारों भुजाएँ बाहर की ओर फैली हुई हैं और मुख्य दाहिना हाथ ‘अभय हस्त’ की मुद्रा में उठा हुआ है। उनका ऊपरी दायाँ हाथ डमरू, जो उनका प्रिय वाद्य है, पकड़े हुए तालबद्ध ध्वनि उत्पन्न करता हुआ दिखाया गया है। ऊपरी बायाँ ‘दोलहस्त’ मुद्रा में दाहिने हाथ की ‘अभयहस्त’ मुद्रा से जुड़ा हुआ है। उनकी जटाएँ दोनों ओर छिटकी हुई हैं और उस वृत्ताकार ज्वाला को छू रही हैं जो नृत्यरत संपूर्ण आकृति को घेरे हए है। नटराज के रूप में नृत्य करते हुए शिव की सुप्रसिद्ध प्रतिमा का विकास चोल काल से हो चुका था और उसके बाद इस जटिल कांस्य प्रतिमा के नाना रूप तैयार किये गए।

Rock-cut Cave in Kozhikode
  • कोझीकोड में रॉक-कट गुफा

केरल राज्य पुरातत्त्व विभाग (Kerala State Archaeology Department) को कन्नूर जिले के पोथुवाचेरी (Pothuvachery) में एक रॉक-कट गुफा (rock-cut cave) से लोहे की तलवार, एक छेनी तथा कुछ सजाए गए मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं। अर्द्ध-गोलाकार आकार की इस गुफा का व्यास 2.5 मीटर और ऊँचाई 90 सेमी. है। केरल राज्य पुरातत्त्व विभाग के अनुसार, कन्नूर ज़िले में प्राप्त हुई वस्तुएँ मेगालिथिक युग की हैं। वैज्ञानिकों द्वारा 105 सेमी. लंबी तलवार का निरीक्षण करने पर पाया गया कि यह तलवार लगभग 2,500 साल पुरानी है। हालाँकि यह तलवार दुर्लभ नहीं है। इससे पहले भी कोझीकोड के कुरुवत्तुर (Kuruvattur) से इसके ही समान रॉक-कट गुफा से एक तलवार पाई गई थी जो मेगालिथिक लोगों की तकनीकी प्रगति के बारे में ऐतिहासिक जानकारी प्रदान करती है। हालाँकि रॉक-कट गुफा की खोज कन्नूर शहर से 12 किलोमीटर दूर माविल्यी गाँव में मणिक्यिल मंदिर मार्ग के पास है।

  • टेराकोटा ग्राइंडर(Terracota Grinder)
टेराकोटा की हड़प्पाकालीन वस्तु

खादी व ग्रामोद्योग आयोग द्वारा वाराणसी के सेवापुरी में पहला टेराकोटा ग्राइंडर (Terracota Grinder) लॉन्च किया गया। मशीन के द्वारा बेकार और टूटे मिट्टी के बर्तनों का पाउडर बना कर बर्तन निर्माण में इसका पुनः उपयोग किया जा सकेगा। इससे पहले बेकार पड़े मिट्टी के बर्तनों को खल-मूसल के द्वारा पाउडर बनाया जाता था तथा इसके महीन पाउडर को साधारण मिट्टी में मिलाया जाता था। एक निश्चित मात्रा में इस पाउडर को मिलाने से नए तैयार होने वाले बर्तन अधिक मज़बूत होते हैं। इससे बर्तन के निर्माण में आने वाली लागत में भी कमी आएगी और बर्तन बनाने के लिये मिट्टी की कमी की समस्या भी दूर होगी। साथ ही गाँवों में रोज़गार के अवसर सृजित होंगे। इस ग्राइंडर को खादी व ग्रामोद्योग आयोग के चेयरमैन ने डिज़ाइन किया है तथा इसका निर्माण राजकोट की एक इंजीनियरिंग इकाई ने किया है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत खादी व ग्रामोद्योग आयोग ने जयपुर में प्लास्टिक मिश्रित कागज का निर्माण भी प्रारंभ किया है। यह निर्माण कार्य री-प्लान (प्रकृति में प्लास्टिक को कम करना) परियोजना के तहत कुमारप्पा राष्ट्रीय हस्त निर्मित कागज संस्थान (Kumarappa National Handmade Paper Institute- KNHPI) में किया जा रहा है।

बावली का पुनरुद्धार मुगल सम्राट जहाँगीर द्वारा अरब की सराय (Arab Ki Sarai) में निर्मित बावली को विरासत एवं जल संरक्षण के दोहरे उद्देश्य से पुनर्जीवित किया जा रहा है।

वर्तमान में देश के कई शहर पानी की भारी कमी का सामना कर रहे हैं। अतः बावली को पुनर्जीवित कर जल संरक्षण किया जा सकता है। 16वीं शताब्दी की दीवार से घिरी बावली जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल हुमायूँ के मकबरे के भीतर स्थित है, यह ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। संभवतः इस बावली के पास स्थित कुएँ का पानी बादशाह जहाँगीर ने पिया होगा, व्यापारियों के साथ बातचीत की होगी तथा दूर- दूर से व्यापारियों ने यहाँ पर अपना सामान बेचा होगा। ये बावली पारंपरिक ज्ञान को उजागर करने तथा जल संरक्षण के लिये एक तरह की गाइडबुक है। नीति निर्माताओं एवं पर्यावरणविदों को वर्तमान परिदृश्य में इस पर काम करने की आवश्यकता है क्योंकि सिंचाई, फव्वारा या बगीचों को पानी देने के लिये पानी की आवश्यकता होती है। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में बावलियों के कई संरचनात्मक तत्त्व ढह गए हैं। बावली की मुख्य दीवारें मरम्मत किये जाने योग्य नहीं हैं तथा इनके क्षरण को रोकने के लिये तत्काल आवश्यक उपाय किये जाने की आवश्यकता है।

9वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में मौजूद मार्कंडेश्वर मंदिर परिसर में 24 अलग-अलग प्रकार के मंदिर हुआ करते थे। वर्तमान में इन 24 मंदिरों में से 18 खंडहर हो चुके हैं। यह वेनगंगा नदी के किनारे मरकंडा गाँव में स्थित है। इस मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य वर्ष 2017 से चल रहा है। इन्हीं मंदिरों की वजह से गढ़चिरौली को ‘मिनी खजुराहो’ या ‘विदर्भ का खजुराहो’ भी कहा जाता है।

जयपुर विश्व धरोहर स्थल में शामिल अपनी प्रतिष्ठित स्थापत्य विरासत और जीवंत संस्कृति के लिये जाना जानेवाला जयपुर,को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल किया गया। 30 जून से 10 जुलाई तक बाकू (अज़रबैजान) में चल रहे यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति के 43वें सत्र में इसकी घोषणा की गई। जयपुर के अलावा यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति ने ईराक के विशाल क्षेत्र में फैले प्राचीन मेसोपोटामियाई शहर बेबीलोन को भी विश्व धरोहरों की सूची में शामिल किया है। स्मारक एवं स्थलों पर अंतर्राष्ट्रीय परिषद (The International Council on Monuments and Sites- ICOMOS) ने वर्ष 2018 में जयपुर शहर का निरीक्षण किया था। सांस्कृतिक स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त करने वाला अहमदाबाद के बाद जयपुर शहर देश का दूसरा शहर बन गया है। अब यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों में भारत के विरासत स्थलों की कुल संख्या 38 हो गई है। इसमें 30 सांस्कृतिक, 7 प्राकृतिक तथा 1 मिश्रित स्थल हैं। जयपुर को वर्ष 1727 में सवाई जय सिंह द्वितीय के संरक्षण में स्थापित किया गया था।

आंध्र प्रदेश में हाल में चूना पत्थर से निर्मित एक बौद्ध अवशेष स्तंभ पाए गए हैं। जिसके केंद्र में अर्द्ध कमल बना हुआ तथा शीर्ष भाग ऊपर की ओर खुदा हुआ है। यह इक्ष्वाकु काल (Ikshvaku Times) के अमरावती कला शैली (Amaravati School of Art) से संबंधित है। यह स्तंभ किसी बौद्ध मठ के स्तंभ का हिस्सा हो सकता है, जहाँ बौद्ध शिक्षक बुद्ध के धम्म पर नियमित प्रवचन देते रहे होंगे। विजयवाड़ा और अमरावती के सांस्कृतिक केंद्र द्वारा शुरू किये गए एक जागरूकता अभियान के तहत इन अवशेषों का अन्वेषण किया गया। यह सांस्कृतिक केंद्र आंध्र प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में उपेक्षा के शिकार सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिये कार्य करता है।

हाल ही में यूनेस्को (United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization- UNESCO) ने ओरछा शहर की स्थापत्य विरासत को विश्व धरोहर स्थलों की अस्थायी सूची में शामिल किया है। यदि यह स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की अंतिम सूची में शामिल हो जाता है, तो यह यूनेस्को की विश्व धरोहरों की सूची में शामिल होने वाला भारत का 38वाँ स्थल होगा। यूनेस्को की सूची में शामिल 37 भारतीय विरासत स्थलों में मध्य प्रदेश के तीन प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल- भीमबेटका के शैलाश्रय (Rock Shelters of Bhimbhetka) , सांची का बौद्ध स्मारक (Buddhist Monuments at Sanchi) और खजुराहो के स्मारकों का समूह (Khajuraho Group of Monuments) शामिल हैं।

हाल ही में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India- ASI) की टीम द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा के दौरान हड़प्पा संस्कृति की टेराकोटा वस्तुओं से लेकर गुप्त काल (5वीं-6वीं शताब्दी ईस्वी) तक की मूर्तियों की एक श्रृंखला की पहचान की गई है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण टीम ने न्यूयॉर्क में अमेरिकी सुरक्षा विभाग के आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन द्वारा ज़ब्त कलाकृतियों का निरीक्षण किया। एएसआई की टीम ने लगभग 100 वस्तुओं की पहचान की है जिनमें विभाग द्वारा जब्त 17 वस्तुएँ भी शामिल हैं। इन प्राचीनकालीन वस्तुओं में तमिलनाडु के सुट्टामल्ली (Suttamalli) और श्रीपुरंतन मंदिरों (Sripurantan temples) के सुंदर कांस्य कलाकृतियाँ तथा महाकोका देवता (Mahakoka Devata) की एक अति महत्तवपूर्ण प्रतिकृति भी है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India- ASI)-पुरातात्त्विक अनुसंधान,वैज्ञानिक विश्लेषण,पुरातात्त्विक स्थलों की खुदाई,स्मारकों के संरक्षण और राष्ट्रीय महत्त्व के क्षेत्रों के संरक्षण, स्थल संग्रहालयों के रखरखाव तथा प्राचीन वस्तुओं से संबंधित विधायिकाओं के समग्र विनियमन के लिये एक प्रमुख संगठन है। 1861 में स्थापित,इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। यह संस्कृति विभाग के अधीन एक संलग्न कार्यालय है। एक महानिदेशक, दो संयुक्त महानिदेशक तथा 17 निदेशक कर्त्तव्यों के निर्वहन में महानिदेशक की सहायता करते हैं।


पिंगुली चित्रकथा 17वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग ज़िले में स्थित पिंगुली गाँव में प्रसिद्ध हुआ। यह आदिवासी कला है, जिसका अभ्यास महाराष्ट्र के ठाकर जनजाति द्वारा किया जाता है। ठाकर समुदाय एक अनुसूचित जनजाति है जिसकी आबादी 2000 है। माना जाता है कि इसकी पुन: छत्तीस उप-जातियाँ है। उप-जाति को जमात के रूप में भी जाना जाता है। इस चित्रकथा के चार रूप हैं:

  • चमड़े की छाया कठपुतलियाँ
  • लकड़ी की कठपुतलियाँ (कालसूत्री)
  • चित्रकथाएँ (चित्रकथा)
  • बुलॉक आर्ट शो


पंचलोहा पारंपरिक रूप से सोना, सिल्वर, कॉपर, जिंक और आयरन का मिश्र धातु होता है। कुछ मामलों में जस्ता के बजाय टिन या सीसा का उपयोग भी किया जाता है। यह एक प्राचीन शिल्प है जो अपनी सुंदरता और उससे जुड़ी परंपरा की भावना के कारण विकसित हुआ। यह दक्षिण भारत का विशिष्ट कला रूप है एवं अक्सर तस्करी के कारण खबरों में रहती है।शिल्प शास्त्र प्राचीन ग्रंथों का एक संग्रह है, जिसमें कला, शिल्प और उनके डिज़ाइन, नियमों, सिद्धांतों और मानकों का वर्णन है। तंजावुर ज़िले का स्वामीमलाई कांस्य और पंचलोहा उत्पादों का केंद्र है। भारत सरकार ने स्वामीमलाई के इस कला रूप को पेटेंट प्रदान किया है।

डोमखर रॉक आर्ट सैंक्चुरीनिचले लद्दाख में डोमखर गाँव में सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर एक रॉक आर्ट सैंक्चुरी है। इन चट्टानों पर अंकित पुरातन लिपियाँ 2,000 साल पहले मध्य एशिया में रहने वाली खानाबदोश जनजातियों में पाई जाने वाली लिपियों से मेल खाती हैं। यह रॉक आर्ट उस युग के दौरान इंसानी आवागमन के पैटर्न पर भी प्रकाश डालती है। इस सैंक्चुरी में जानवरों की आकृतियाँ भी है।

राजस्थान का बगरू ब्लॉक प्रिंटिंग’ छपाई

  • छपाई के इस पारंपरिक तकनीक में राजस्थान के बगरू गाँव के छीपा समुदाय के लोग सिद्धहस्त हैं।
  • यह लकड़ी के साँचों (ब्लॉक्स) के साथ प्राकृतिक रंगों के उपयोग के कारण प्रसिद्ध है।
  • हाल ही में छीपा समुदाय की हैंड-ब्लॉक प्रिंटिंग को प्रदर्शित करने के लिये राजस्थान के बगरू में तितानवाला संग्रहालय (Titanwala Museum) का उद्घाटन किया गया है।

उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां युवा पुरस्‍कार, 2018 26 जून, 2019 को गुवाहाटी (असम) में आयोजित सामान्‍य परिषद की बैठक में उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां युवा पुरस्‍कार, 2018 के लिये एक संयुक्‍त पुरस्‍कार सहित 32 कलाकारों का चयन किया गया।

चयनित कलाकारों ने कला प्रदर्शन के अपने-अपने क्षेत्रों में युवा प्रतिभाओं के रूप पहचान बनाई है। उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां युवा पुरस्‍कार कला प्रदर्शन के विविध क्षेत्रों में उत्‍कृष्‍ट युवा प्रतिभाओं की पहचान करने, उन्‍हें प्रोत्‍साहन देने और उन्‍हें जीवन में शीघ्र राष्‍ट्रीय मान्‍यता देने के उद्देश्‍य से 40 वर्ष से कम आयु के कलाकारों को प्रदान किया जाता है। उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां युवा पुरस्‍कार के तहत 25,000 रुपए की नकद राशि प्रदान की जाती है। चयनित कलाकारों को यह पुरस्कार संगीत नाटक अकादमी के अध्‍यक्ष द्वारा एक विशेष समारोह के दौरान प्रदान किया जाएगा। संगीत नाटक अकादमी, संगीत, नृत्‍य और नाटक की राष्‍ट्रीय अकादमी है। यह देश में कला प्रदर्शन का शीर्ष निकाय है।

2019 में चर्चित मंदिर या विरासत स्थल[सम्पादन]

  • आंध्रप्रदेश के नेल्लोर में नायडूपेट के निकट गोट्टीप्रोलू में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की एक टीम द्वारा की गई खुदाई के पहले चरण में व्यापक तौर पर ईंटों वाली संरचना से घिरी एक विशाल बस्ती के अवशेष मिले हैं।

गोट्टीप्रोलू (13° 56’ 48” उत्तर; 79° 59’ 14” पूरब) में नायडूपेट से लगभग 17 किलोमीटर पूरब और तिरूपति तथा नेल्लोर से 80 किलोमीटर दूर स्वर्णमुखी की सहायक नदी के दाएँ किनारे पर स्थित है। विस्तृत कटिबंधीय अध्ययन और ड्रोन से मिली तस्वीरों से एक किलेबंद प्राचीन बस्ती की पहचान करने में मदद मिली है। बस्ती की पूर्वी और दक्षिणी ओर किलाबंदी काफी स्पष्ट है, जबकि दूसरी ओर आधुनिक बस्तियों के कारण यह अस्पष्ट प्रतीत होती है। खुदाई में मिली कई अन्य प्राचीन वस्तुओं में विष्णु की एक आदमकद मूर्ति और वर्तमान युग की शुरूआती शताब्दियों के दौरान प्रयोग किये जाने वाले विभिन्न प्रकार के बर्तन शामिल हैं। इस खुदाई में पक्की ईंटों से निर्मित संरचना मिली है, जो 75 मीटर से अधिक लंबी, लगभग 3.40 मीटर चौड़ी और लगभग 2 मीटर ऊँची है। खुदाई में ईंटों से बना आयताकार टैंक भी मिला है।

स्थल के निर्माण की समायावधि:- ईंटों का आकार 43-40 सेमी आकार है, जिसकी तुलना कृष्णा घाटी यानी अमरावती और नागार्जुनकोंडा की सातवाहन/इक्ष्वाकु काल की संरचनाओं से की जा रही है। ईंटों के आकार और अन्य खोजों के आधार पर इन्हें दूसरी-पहली शताब्दी ईस्वी पूर्व अथवा उसके कुछ समय बाद (लगभग 2000 वर्ष पूर्व) के समय का माना जा रहा है।

खुदाई में मिले अवशेषों के अलावा, गाँव के पश्चिमी हिस्से की खुदाई से विष्णु की मूर्ति भी मिली है। इस क्षेत्र के लोगों ने, प्राचीनकाल में व्यापार में सुगमता के लिये समुद्र, नदी और झील (पुलिकट) से निकटता को ध्यान में रखते हुए, 15 किलोमीटर की दूरी पर दो नगरों को बसाने को प्रमुखता दी थी।

  1. विष्णु की आदमकद मूर्ति

खुदाई से प्राप्त विष्णु की मूर्ति की ऊँचाई लगभग 2 मीटर है। विष्णु की यह प्रतिमा चार भुजाओं वाली है जिसमें ऊपर की ओर दाहिनी तथा भुजाओं में क्रमशः चक्र और शंख विद्यमान है। नीचे की ओर दाहिनी भुजा श्रेष्ठ वरदान मुद्रा में है और बायाँ हाथ कटिहस्थ मुद्रा (कूल्हे पर आराम की मुद्रा) में है। अलंकृत शिरोवस्त्र, जनेऊ/यज्ञोपवीत (तीन सूत्रों वाला धागा) और सजावटी वस्त्र जैसी मूर्तिकला विशेषताएँ इस तथ्य की और संकेत करती हैं कि यह मूर्ति पल्लव काल (लगभग 8 वीं शताब्दी) की है।

  1. दूसरी प्राचीन वस्तु जो खुदाई से प्राप्त हुई है वह है स्त्री की लघु मूर्ति (टेराकोटा से निर्मित) जिसमें दोनों हाथ ऊपर की ओर उठे हुए हैं।
  2. शंक्वाकार घड़े :-मिटटी के बर्तनों में सबसे आकर्षक खोज निर्माण संरचना के पूर्व दिशा में रखे गए शंक्वाकार घड़ों या जार का तल/आधार है। इस तरह के शंक्वाकार जार तमिलनाडु में व्यापक रूप से पाए जाते हैं और ऐसा माना जाता है कि इन्हें रोमन एम्फ़ोरा जार (ऐसे जार जिन्हें पकड़ने के लिये दो हैंडल बने होते थे) की नकल करके बनाया गया है।

खुदाई से प्राप्त टूटी हुई टेराकोटा पाइप की एक शृंखला जो एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, से इस स्थल के निवासियों द्वारा निर्मित नागरिक सुविधाओं के बारे में पता चलता है। जल निकासी की व्यवस्था (Drainage system) स्थल की खुदाई से प्राप्त जल निकासी के अवशेषों से उस समय की जल निकासी व्यवस्था को समझा सकता है। पुरापाषाण और नवपाषाण काल के मिश्रित पत्थर के औजार इस क्षेत्र में प्रागैतिहासिक जीवन की और भी संकेत करते हैं। स्थल का महत्त्व खुदाई स्थल पर एम्फोरा जारों की उपस्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि ये बस्तियाँ व्यापार का महत्त्वपूर्ण केंद्र रही होंगी। समुद्र तट से स्थल की निकटता से पता चलता है कि यह स्थल समुद्री व्यापार में शामिल रणनीतिक बस्ती के रूप में कार्य करता होगा। स्थल पर भविष्य में किये जाने वाला शोध कार्यों से इस स्थल के बारे में और अधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आएंगे। गोट्टीप्रोलू और इसके चारों और 15 किमी. के दायरे में किये अन्वेषणों से महत्त्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं जैसे- पुडुुरु में ऐतिहासिक ऐतिहासिक बस्ती, मल्लम में सूर्यब्रह्मण्य मंदिर, यकासिरी (Yakasiri) में अद्वितीय रॉक-कट लेटराइट वापी/बावड़ी (Step-well) तथा तिरुमुरु के विष्णु मंदिर। इसके अलावा इस स्थल के पूर्व में समग्र समुद्री तट विभिन्न प्रकार के पुरावशेषों से भरा हुआ है, जो सांस्कृतिक रूप से एक दूसरे से संबंधित हैं। प्रागैतिहासिक समय के दौरान 15 किलोमीटर के दायरे में स्थित ये दोनों किलेबंद नगरीय बस्तियाँ इस बात का संकेत देती हैं कि महत्त्वपूर्ण रणनीतिक उपस्थिति (समुद्र तट, नदी तथा पुलीकट झील से निकटता) के चलते इस स्थान को व्यापार हेतु अधिक प्रमुखता दी गई थी।

  • आंध्र प्रदेश के नेल्लोर ज़िले के कोटरकोना (Kotrakona) में स्थित श्री मल्लिस्वरन मंदिर (Sri Malliswaran Temple) के नवीनीकरण का कार्य प्रारंभ किया गया है। चोलों (11वीं शताब्दी)द्वारा इस मंदिर का निर्माण उत्तर की ओर आक्रमण करने से पहले बनाया गया था। इस मंदिर में उपस्थित खजाने के कारण आक्रमणकारियों द्वारा इस मंदिर को बार-बार लूटा गया।

निर्माण के बाद काफी दिनों तक यह मंदिर जंगलों से घिरा हुआ था और जनसामान्य की पहुँच से बाहर था। वर्ष 1975 के आस-पास स्थानीय समुदाय द्वारा इसकी खोज की गई और ग्रामीणों द्वारा इसके परिसर के आस-पास सफाई कराई गई। स्थापत्य विशेषताएँ:-इस मंदिर के परिसर में आंतरिक प्रकरम (Inner Prakaram), विमानगोपुरम (Vimanagopuram), राजगोपुरम (Rajagopuram), चार मंडपम और देवी भुवनेश्वरी का मंदिर है लेकिन इन संरचनाओं को आक्रमणकारियों द्वारा नुकसान पहुँचाया गया था।

ठोटलाकोंडा बौद्ध परिसर

अक्टूबर माह के भारी वरिस के कारण आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में स्थित ठोटलाकोंडा बौद्ध परिसर (Thotlakonda Buddhist Complex) का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है।दूसरी शताब्दी ई.पू. का यह परिसर बौद्ध धर्म की प्राचीन हीनयान शाखा से संबंधित है। यह परिसर श्रीलंका, इंडोनेशिया, कंबोडिया आदि देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का केंद्र रहा है।

कनिष्क के समय में आयोजित चौथी बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म की ‘हीनयान’ शाखा का उद्भव हुआ। हीनयान में बुद्ध को महापुरुष के रूप में स्थापित किया गया है। यह मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता है और आत्म अनुशासन तथा ध्यान के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने की कोशिश करता है।हीनयान का आदर्श है- अर्हत पद की प्राप्ति।

रंगदुम/रेंगदुम बौद्ध मठ (Rangdum Buddhist Monastery) लद्दाख के कारगिल ज़िले में स्थित इस मठ को भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय महत्त्व का स्मारक घोषित किये जाने पर विचार किया जा रहा है।ताकि लद्दाख में पर्यटन को बढ़ावा मिल सके।

18वीं शताब्दी में निर्मित यह मठ लद्दाख की सुरू घाटी (Suru Valley) में स्थित है।सिंधु नदी की सहायक नदी सुरू,इस घाटी में बहती है।
यह गेलुग्पा संप्रदाय (Gelugpa Sec) से संबंधित एक तिब्बती बौद्ध मठ है।

वर्ष 1861 में स्थापित भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण,संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत एक प्रमुख संगठन है। जिसका मुख्य कार्य राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासतों का पुरातत्त्वीय अनुसंधान तथा संरक्षण करना।

EIR 21 एक्सप्रेस

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73 वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के उपलक्ष्य में, EIR-21 द्वारा संचालित एक हेरिटेज स्पेशल सर्विस चेन्नई के एगमोर से कोडम्बक्कम तक संचालित की गई। EIR-21 विश्व की सबसे पुरानी स्टीम लोकोमोटिव (Steam Locomotive) है।

वर्ष 1855 लोको का निर्माण इंग्लैंड के किटसन,थॉम्पसन और हेविट्सनने किया। तथा इस लोको का नाम ‘EIR 21 एक्सप्रेस’ रखा।
फेयरी क्वीन की तरह ही दिखनेवाली यह लोको फेयरी क्वीन की तरह ही 164 साल पुरानी है।
वर्ष 1855 में बनी ‘द फेयरी क्वीन’ (The Fairy Queen) दुनिया की सबसे पुरानी कार्यरत स्टीम लोकोमोटिव है।
वर्ष 1996 में द फेयरी क्वीन का परिचालन पूरी तरह से बंद करके वर्ष 1997 में फेयरी क्वीन ट्रेन टूर बना दिया गया तथा वर्ष 1998 में इसका वाणिज्यिक परिचालन फिर से शुरू किया गया।

दुनिया के सबसे पुराने कामकाजी लोकोमोटिव के रूप में प्रमाणित और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड प्राप्त कर चुका है। EIR-21 के कई हिस्से विकृत तो कई लापता हो गए थे जबकि कुछ हिस्से टूट गए थे।इस प्रकार उपयोग करने योग्य नहीं होनो के बावजूद लोको वर्क्स,पेरम्बूर द्वारा वर्ष 2010 में फिर से तैयार किया गया।और तब से भारतीय रेलवे के विरासत मूल्य को प्रदर्शित करने के लिये इसे चलाया जाता है।


पुराना किला ‘ज़ब्त एवं पुनर्प्राप्त पुरावस्तुओं की गैलरी’ Purana Qila ‘Gallery of Confiscated and Retrieved Antiquities’ 31 अगस्त, 2019 को केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रहलाद सिंह पटेल ने नई दिल्ली स्थित पुराना किला में ज़ब्त एवं पुनर्प्राप्त पुरावस्तुओं की गैलरी (Gallery of Confiscated and Retrieved Antiquities) का उद्घाटन किया।

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India-ASI) द्वारा निर्मित यह गैलरी पुराना किला के धनुषाकार प्रकोष्ठों (Arched Cells) में स्थित है और सार्वजनिक रूप से ज़ब्त एवं पुनर्प्राप्त प्राचीन वस्तुओं को प्रदर्शित करती है। गैलरी में प्रदर्शित धरोहर केंद्रीय पुरातन संग्रह (Central Antiquity Collection-CAC) का एक हिस्सा है, जो पुराना किला में स्थित है। इसे ASI द्वारा खोजे गए और उत्खनन किये गए पुरावशेषों एवं उन पुरावस्तुओं, जिन्हें विदेश मंत्रालय तथा विभिन्न कानून लागू करने वाली एजेंसियों की सहायता से पुनः प्राप्त और ज़ब्त किया गया था, के लिये बनाया गया था। ‘ज़ब्त और पुनर्प्राप्त की गई प्राचीन वस्तुओं की गैलरी’ प्राचीन से लेकर आधुनिक काल तक से संबंधित 198 पुरावशेषों का एक हिस्सा प्रदर्शित करती है। गैलरी में प्रदर्शित वस्तुएँ आद्य-ऐतिहासिक से लेकर आधुनिक काल तक तथा विभिन्न उद्गम स्थानों से जुड़ी हुई हैं। पुनर्प्राप्त या ज़ब्त किये गए पुरावशेषों की विस्तृत श्रृंखला में पत्थर और धातु की मूर्तियाँ, सिक्के, चित्र, हाथी दाँत और तांबे की कलाकृतियाँ, वास्तुशिल्प पैनल आदि शामिल हैं। अतीत में कई मूल्यवान पुरावशेष, कलाकृतियाँ और मूर्तियाँ भारत से चुराकर विदेशों में बेच दी गई। पुरातनता और कला निधि अधिनियम, 1972 एवं नियम 1973 के अनुसार, यह भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण का कर्त्तव्य है कि वह चोरी, अवैध निर्यात को रोके तथा पुरावशेषों के घरेलू व्यापार को विनियंत्रित करे।

मामल्‍लपुरम Mamallapuram तमिलनाडु के मामल्‍लपुरम में दूसरे भारत-चीन अनौपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किये जाने की संभावना है।

शिखर सम्मेलन आयोजित करने के साथ-साथ दोनों देशों के नेताओं द्वारा इस क्षेत्र के प्राचीन स्मारकों का दौरा भी किये जाने की संभावना है। इस क्षेत्र के स्मारकों को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में वर्गीकृत किया गया है। अप्रैल 2018 में वुहान (चीन में) में पहली अनौपचारिक शिखर बैठक के दौरान दोनों देशों के नेताओं ने हुबेई प्रोविंशियल म्यूज़ियम (Hubei Provincial Museum) का दौरा किया था। हाल ही में मामल्लपुरम में ही केंद्रीय रक्षा मंत्रालय के वार्षिक कार्यक्रम डिफेंस एक्सपो 2018 (Defence Expo 2018) की मेज़बानी की गई थी। मामल्लपुरम के बारे में

मामल्लपुरम जिसे महाबलीपुरम या सप्त पैगोडा भी कहा जाता है, एक शहर है जो चेन्नई से 60 किमी. दूर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी के कोरोमंडल तट पर स्थित है। इस शहर के धार्मिक केंद्रों की स्थापना 7वीं शताब्दी के हिंदू पल्लव राजा नरसिंहवर्मन द्वारा की गई थी जिन्हें मामल्ला के नाम से भी जाना जाता था, इनके नाम पर ही इस शहर का नाम रखा गया था। यहाँ पर 7वीं-8वीं शताब्दी के पल्लव मंदिर और स्मारक हैं जिनमें मूर्तिकला, गुफा मंदिरों की एक श्रृंखला तथा समुद्र तट पर एक शिव मंदिर भी शामिल है। शहर के स्मारकों में पाँच रथ, एकाश्म मंदिर, सात मंदिरों के अवशेष हैं, इसी कारण इस शहर को सप्त पैगोडा के रूप में जाना जाता था। उल्लेखनीय है कि पूरी विधानसभा को सामूहिक रूप से वर्ष 1984 में यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल में शामिल किया गया था।

नीला गुंबद पाँच साल के व्यापक संरक्षण कार्य के बाद अद्वितीय स्मारक 'नीला गुंबद' (Nila Gumbad) जो हुमायूँ के मकबरे के परिसर में स्थित है, को अब जनता के लिये सुलभ बनाया जाना सुनिश्चित किया गया है।

'नीला गुंबद' (Nila Gumbad) स्मारक के गुंबद का रंग नीला है। मकबरा (Mausoleum) भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India- ASI) के तहत सूचीबद्ध है तथा आगा खान ट्रस्ट फॉर कल्चर (Aga Khan Trust for Culture- AKTC) द्वारा इसका संरक्षण किया जा रहा है। नीला गुंबद दिल्ली में मुगल युग की सबसे पुरानी संरचनाओं में से एक है जो संभवतः पूर्व-मुगल या शुरुआती मुगल काल में बनाया गया था। इस स्मारक का निर्माण कब और किसने किया इसकी प्रमाणित जानकारी अब तक प्राप्त नहीं हो सकी है। जब हुमायूँ का मकबरा बनाया गया था, तब परिसर में आस-पास की बहुत सारी संरचनाएँ शामिल थीं, नीले गुंबद वाला स्मारक भी इसका हिस्सा बन गया था। स्मारक एवं उसके आस-पास के बगीचों की भव्यता 19वीं शताब्दी से बिगड़ने लगी थी। नीला गुम्बद स्मारक के उत्तरी भाग में निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन का निर्माण किया गया था जो इस स्मारक को धीरे-धीरे समाप्त कर रहा था।

राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण की क्लीयरिंग प्रणाली संस्कृति और पर्यटन राज्य मंत्री ने छह राज्यों के 517 स्थानीय निकायों के लिये राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (National Monuments Authority- NMA) के लिये एक एकीकृत अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) ऑनलाइन आवेदन प्रसंस्करण प्रणाली (NOPAS) लॉन्च किया है।

प्रमुख बिंदु NOPAS को सितंबर 2015 में NMA द्वारा लॉन्च किया गया था, लेकिन यह दिल्ली में केवल पाँच शहरी स्थानीय निकायों और मुंबई में एक नागरिक निकाय तक सीमित था। अब, इस सुविधा का विस्तार छह और राज्यों मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, झारखंड एवं तेलंगाना में किया गया है। यह सिस्टम ऑनलाइन तरीके से भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्मारकों के निषिद्ध और विनियमित क्षेत्रों में निर्माण-संबंधी कार्यों के लिये अनापत्ति प्रमाण-पत्र देने की प्रक्रिया को स्वचालित करता है। NMA निषिद्ध और विनियमित क्षेत्र में निर्माण से संबंधित गतिविधि के लिये आवेदकों को अनुमति देने पर विचार करता है। संस्कृति मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (NMA) की स्थापना प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल एवं अवशेष AMASR (संशोधन एवं मान्यता) अधिनियम, 2010 के प्रावधानों के अनुसार की गई है। आवेदक को शहरी स्थानीय निकाय द्वारा संबंधित एजेंसियों को भेजे जाने वाले एक एकल फॉर्म को भरने की आवश्यकता है, जिसमें से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) आवश्यक है। पोर्टल का भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के स्मार्ट 'स्मार्क' मोबाइल एप के साथ एकीकरण है, जिसके माध्यम से आवेदक अपने भूखंड का पता लगाता है और छवियों के साथ-साथ उसके भूखंड के भू-समन्वयकों को निकटता के साथ NIC पोर्टल में अपलोड किया जाता है।

बहरीन टेम्पल प्रोजेक्ट(Bahrain temple project) हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री ने बहरीन में 200 साल पुराने श्रीकृष्ण मंदिर हेतु 4.2 मिलियन डॉलर की पुनर्विकास परियोजना का शुभारंभ किया।

प्रमुख खाड़ी देशों की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्र के सबसे पुराने मंदिर श्रीनाथजी (मनामा) के दर्शन किये और RuPay कार्ड लॉन्च करने के बाद इसी से प्रसाद भी खरीदा। मनामा में श्रीनाथजी (श्री कृष्ण) मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य इस साल के अंत में शुरू होगा। मंदिर के पुनर्विकास में इसकी 200 साल पुरानी विरासत को उजागर किया जाएगा और नए प्रतिष्ठित परिसर में गर्भगृह और प्रार्थना हॉल होंगे। पारंपरिक हिंदू विवाह समारोहों और अन्य अनुष्ठानों के लिये भी यहाँ सुविधाएँ होंगी, जिसका उद्देश्य बहरीन को शादी के गंतव्य के रूप में बढ़ावा देना तथा पर्यटन को विकसित करना है।

मकराना के संगमरमर विश्व भर में प्रसिद्ध राजस्थान में पाए जाने वाले मकराना के संगमरमर को विश्व विरासत (Global Heritage) सूची में शामिल किया गया है।

भू-वैज्ञानिक विज्ञान के अंतर्राष्ट्रीय संघ (International Union of Geological Sciences-IUGS) की एग्ज़ीक्यूटिव कमेटी ने ग्लोबल हेरिटेज स्टोन रिसोर्सेज के भारतीय शोध दल के प्रस्ताव पर मकराना को विश्व विरासत माना तथा इसे ग्लोबल हेरिटेज के रूप में मान्यता दी। IUGSसामान्य अध्ययन२०१९/महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्धान के अनुसार, मकराना का संगमरमर भूगर्भीय दृष्टि से कैंब्रियन काल के पहले की कायांतरित चट्टानों से बना है। कायांतरित चट्टाने मूल रूप से चूना पत्थर के कायांतरण से बनती हैं। यह संगमरमर विश्व की सबसे उत्कृष्ट श्रेणियों की चट्टानों में से एक है। विश्व की कई इमारतें मकराना के संगमरमर से बनी हैं। इसकी सफेदी हमेशा बनी रहती है। इसी सफेद संगमरमर से विश्व प्रसिद्ध आगरा का ताजमहल निर्मित है। जयपुर राजपरिवार का सिटी पैलेस और बिड़ला मंदिर भी मकराना संगमरमर से बना हुआ है। वर्तमान में मकराना के खानों से संगमरमर का अत्यधिक दोहन होने के कारण अब बहुत कम संगमरमर ही बचे हैं।

राष्ट्रीय फिल्म विरासत मिशन देश की सिनेमाई विरासत को संरक्षित और सुरक्षित करने के लिये सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की एक महत्त्वपूर्ण पहल है।इस मिशन को वर्ष 2017 में लॉन्च किया गया था। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य आधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्‍यम से फिल्‍मों की करीब डेढ़ लाख रीलों का संरक्षण तथा लगभग 3500 फिल्‍मों का डिजिटलीकरण करना है।

तेलंगाना के वारंगल जिले के पालमपेट स्थित भगवान शिव को समर्पित रामप्पा मंदिर को यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल का दर्ज़ा मिलने की संभावना[सम्पादन]

  • वास्तुकार रामप्पा द्वारा काकतीय युग में निर्मित यह मंदिर एक घाटी में बना है और इसका आधार ऐसी ईंटें हैं जिन्हें वैज्ञानिक रूप से पानी में तैरता हुआ दिखाया गया है।
  • यह एक ऐसा मंदिर है जो अपने वास्तुकार के नाम से जाना जाता है, न कि अपने शासक या इसमे स्थापित देवता के नाम से।
  • अबतक रामप्पा मंदिर वारंगल किले के हजार स्तंभ मंदिर, स्वयंभू मंदिर और कीर्ति थोरनास के साथ एक 'नामांकन क्रम' का हिस्सा था। परंतु अब,इस मंदिर को बालू पत्थर (sandstone)विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामांकित किया गया है।[१]
  • जुलाई के पहले सप्ताह में अजरबैजान में होने वाली विश्व धरोहर समिति की बैठक के 43 वें सत्र में इस पर विचार किया जाएगा।

कच्छ (गुजरात) में किये गए पुरातात्विक उत्खनन में हड़प्पा सभ्यता के शुरुआती चरण के दौरान प्रचलित अंत्येष्टि रिवाजों की खोज[सम्पादन]

  • केरल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं और छात्रों के एक 47 सदस्यीय दल ने कच्छ के खटिया गाँव में एक-डेढ़ महीने के लिये डेरा डाला और हड़प्पा सभ्यता के कब्रिस्तान के नमूनों का अध्ययन किया।[२]
  • उन्होंने अलग-अलग दिखने वाली 300 कब्रों में से 26 की खुदाई की। इन सभी आयताकार कब्रों को भिन्न-भिन्न पत्थरों का उपयोग करके बनाया गया था तथा कंकालों को एक विशिष्ट तरीके से रखा गया था।
  • शवों के सिर पूर्व दिशा की ओर पश्चिम दिशा में पैरों के बगल में, पुरातत्वविदों को मिट्टी के बर्तन और अन्य कलाकृतियाँ मिली, जिसमें शंख-चूड़ी, पत्थर और टेराकोटा से बने मोती, कई लिथिक उपकरण और पीसने वाले पत्थर शामिल थे।
  • शव के बगल में सामान संभवतः मृत्यु के पश्चात् जीवन की अवधारणा को प्रस्तुत करता है।
  • खुदाई की गई 26 कब्रों में से सबसे बड़ी 6.9 मीटर लंबी और सबसे छोटी 1.2 मीटर लंबी थी।[३]
  • उनमें से अधिकांश में मानव के कंकाल के अवशेष विघटित पाए गए। मनुष्यों के साथ जानवरों के कंकालों की उपस्थिति भी कुछ कब्रों में दर्ज की गई थी।
  • शोधकर्ताओं ने दफनाने के तरीके को असमान पाया। प्राथमिक दफन और माध्यमिक दफन (जब प्राथमिक दफन के अवशेषों को किसी अन्य कब्र में ले जायाजाए) के उदाहरण पाए गए।
  • एक पूर्ण मानव कंकाल को प्राप्त किया गया,जिसे महाराजा स्याजिराव विश्वविद्यालय के संकाय सदस्य कांति परमार की सहायता से प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी एक बॉक्स में रखा गया।
  • बरामद कंकाल और कलाकृतियों को केरल विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में प्रदर्शन के लिये रखा जाएगा।
  • अन्य कंकालों को विभिन्न प्रयोगशालाओं में आयु, लिंग, परिस्थितियों को समझने के लिये तथा डीएनए की मुख्य विशेषताओं के परीक्षण लिये भेजा जाएगा।

9 मार्च को उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्त्व संस्थान का उद्घाटन[सम्पादन]

  • पुरातत्त्व संस्थान (Archaeological Institute) संस्कृति मंत्रालय के तहत भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण का अकादमिक विंग है।[४]
  • संस्थान में छात्रों को सहायक, उत्साहवर्द्धक और चुनौतीपूर्ण शैक्षणिक वातावरण उपलब्‍ध कराया जाता है, जिससे वे पुरातत्त्व के क्षेत्र में अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन कर पाते हैं। संस्थान पुरातत्त्व के विभिन्न क्षेत्रों में व्यावसायिक कार्यशालाओं का आयोजन भी करता है।
  • इस संस्थान का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य छात्रों को पुरातत्त्व के क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करने का अवसर प्रदान करना है।[५]
  • 28 अक्तूबर, 2016 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 100वीं जयंती के अवसर पर संस्थान भवन की आधारशिला केंद्रीय गृहमंत्री द्वारा रखी गई थी।
  • कुंभ मेला यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल है।
  • यह मेला प्रयागराज (गंगा, यमुना, और पौराणिक सरस्वती के संगम पर), हरिद्वार (गंगा पर),उज्जैन (शिप्रा पर) और नासिक (गोदावरी पर) में हर चार साल पर रोटेशन के आधार पर आयोजित किया जाता है। लाखों लोग अलग-अलग जाति, पंथ या लिंग के बावजूद प्रत्येक कुंभ में शामिल होते हैं।
  • संस्कृति मंत्रालय ने अपने अधीन एक स्वायत्त संगठन, संगीत नाटक अकादमी को, अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से संबंधित मामलों के लिये नोडल कार्यालय के रूप में नियुक्त किया है, जिसमें यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची के लिये नामांकन तैयार करना शामिल है

बौद्ध सर्किट के अंतर्गत पाँच नई परियोजनाओं को मंज़ूरी बौद्ध सर्किट स्वदेश दर्शन योजना के तहत विकास के लिये चिह्नित विषयगत (थीम आधारित) सर्किटों में से एक है। मंत्रालय ने इस सर्किट के तहत 361.97 करोड़ की 5 नई परियोजनाओं को मंज़ूरी दी है। ये पाँच परियोजनाएँ हैं-

  1. सांची-सतना-रीवा-मंदसौर-धार में बौद्ध सर्किट का विकास (मध्य प्रदेश)
  2. श्रावस्ती, कुशीनगर, और कपिलवस्तु में बौद्ध सर्किट का विकास (उत्तर प्रदेश)
  3. बोधगया के पश्चिमी तरफ माया सरोवर के निकट कन्वेंशन सेंटर का निर्माण (बिहार)
  4. जूनागढ़-गिर-सोमनाथ-भरूच-कच्छ-भावनगर-राजकोट-मेहसाणा बौद्ध सर्किट का विकास (गुजरात)
  5. सलीहुंडम-थोटलाकोंडा-बाविकोन्डा-बोज्जनाकोंडा-अमरावती-अनुपू बौद्ध सर्किट का विकास (आंध्र प्रदेश)

इस योजना की शुरुआत 2014-15 में की गई थी।

  • संगराई नृत्य आदिवासी समुदाय मोग (Mog) द्वारा किया जाने वाला नृत्य है जो बंगाली कैलेंडर के अनुसार, चैत्र (अप्रैल में) माह के दौरान मनाए जाने वाले संगराई उत्सव के अवसर पर किया जाता है।
  • हड़प्पा सभ्यता का विस्तार भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों तक था।
  • भित्तिचित्र या ‘पेट्रोग्लिफ्स’ (Petroglyphs) पत्थर की छेनी और हैमरस्टोन का उपयोग करके चट्टान की सतह पर उकेरी गई नक्काशी।
  • भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने आगरा में दो मुगलकालीन स्मारकों- आगा खान और हाथी खान की हवेली को राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में चुना है।
  • ओडिशा के बोलनगीर ज़िले में रानीपुर झारियाल के पास मंदिरों के एक समूह को राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में घोषित किया गया है। यह शैव धर्म, बौद्ध धर्म, वैष्णववाद और तंत्रवाद के धार्मिक विश्वासों का एक संयोजन है। यह स्थल चौसठ (64) योगिनी मंदिरों या बिना छतों वाले मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है- जिन्हें हाईपेथ्रल मंदिरों के रूप में जाना जाता है।

2019 के चर्चित साहित्य,भाषा या साहित्यिक सम्मान[सम्पादन]

  • हाल ही में आए अयोध्या फैसले में उच्चतम न्यायालय द्वारा कहा गया कि 16वीं शताब्दी के दस्तावेज़ आईन-ए-अकबरी (Ain-i-Akbari) में भगवान राम के जन्म के समय का उल्लेख है।

आईन-ए-अकबरी मुगल शासक अकबर के प्रशासन से संबंधित है। यह अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फज़ल द्वारा फ़ारसी भाषा में लिखी गई थी। यह अबुल फज़ल द्वारा रचित ‘अकबरनामा’ का ही एक भाग है। अकबरनामा के तीन भाग हैं जिसमें से तीसरे भाग को 'आईन-ए-अकबरी' कहते हैं।

  1. प्रथम भाग में अकबर के पूर्वजों तथा उसके आरंभिक जीवन का वर्णन है।
  2. दूसरा भाग अकबर काल के घटनाक्रमों से संबंधित है।
  3. तीसरे भाग अर्थात् आईन-ए-अकबरी में अकबर के शासनकाल से संबंधित आँकड़े तथा शासन-व्यवस्था संबंधी अन्य नियमों का वर्णन है।

अकबरनामा का अंग्रेज़ी अनुवाद 20वीं शताब्दी की शुरुआत में हेनरी बेवरिज द्वारा किया गया था।

  • उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां युवा पुरस्‍कार कला प्रदर्शन के विविध क्षेत्रों में उत्कृष्ट युवा प्रतिभाओं की पहचान करने तथा उन्‍हें प्रोत्‍साहन देने के उद्देश्‍य से से दिया जाता है।

यह पुरस्कार 40 वर्ष से कम आयु के कलाकारों को प्रदान किया जाता है। 26 जून, 2019 को गुवाहाटी (असम) में आयोजित सामान्‍य परिषद की बैठक में उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां युवा पुरस्‍कार, 2018 के लिये एक संयुक्‍त पुरस्‍कार सहित 32 कलाकारों का चयन किया गया।


महर्षि बादरायण व्यास सम्मान[सम्पादन]

  • उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में प्रदान किया गया।
  • हर वर्ष संस्कृत, फारसी, अरबी, पाली एवं प्राकृत, शास्त्रीय ओड़िया, शास्त्रीय कन्नड़, शास्त्रीय तेलुगू और शास्त्रीय मलयालम भाषा के विद्वानों को प्रदान किया जाता है।
  • 2002 में इस पुरस्कार की शुरुआत हुई और यह 30 से 45 वर्ष के आयु वर्ग में चयनित युवा विद्वानों को दिया जाता है।
  • इस पुरस्कार के तहत एक सम्मान पत्र, एक स्मृति चिह्न और एक लाख रुपए का नकद पुरस्कार दिया जाता है। बादरायण एक भारतीय दार्शनिक थे, जिनके बारे में लगभग कोई भी व्यक्तिगत विवरण विश्वसनीय रूप से ज्ञात नहीं है।[६]

शहीद कोश[सम्पादन]

  • संस्कृति मंत्रालय द्वारा 1857 के विद्रोह की 150वीं वर्षगाँठ के अवसर पर भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) को भारत के स्वाधीनता संग्राम के शहीदों के नामों का संकलन 'डिक्शनरी ऑफ मार्टर्स : इंडियाज़ फ्रीडम स्ट्रगल (1857-1947)', तैयार करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी।पाँच खंडों (क्षेत्रवार) में प्रकाशित किया गया है।

खंड 1, भाग एक और भाग दो- इस खंड में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के 4,400 से अधिक शहीदों को सूचीबद्ध किया गया है।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. https://www.thehindu.com/news/national/telangana/ramappa-temple-for-world-heritage-site/article26692459.ece
  2. https://timesofindia.indiatimes.com/city/rajkot/archaeologists-find-remains-of-another-pre-harappan-site-in-kutch/articleshow/67858503.cms
  3. https://www.thehindu.com/news/national/kerala/excavations-in-kutch-shed-light-on-early-harappan-custom/article26499706.ece
  4. https://www.designforuminternational.com/project/pandit-deen-dayal-upadhyaya-institute-of-archeology/
  5. https://pib.gov.in/Pressreleaseshare.aspx?PRID=1568438
  6. https://www.thehindu.com/news/cities/puducherry/sanskrit-scholar-to-get-badrayan-award/article7610298.ece